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शनिवार, 30 जुलाई 2011

निजी स्कूलों का मायाजाल


 सरकारी सुविधाएं उठाने में निजी स्कूल हमेशा आगे रहते हैं लेकिन बच्चों और उनके अभिभावकों को किसी तरह की राहत नहीं देना चाहते. झारखंड सरकार ने सभी निजी स्कूलों को 20 फीसदी गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का निर्देश दिया था. लेकिन इसपर अभी कोई भी स्कूल अमल नहीं कर रहा है. करीब 8 वर्ष पूर्व राज्य सरकार ने निजी स्कूलों के बसों के अतिरिक्त कर में 40 फीसदी से अधिक की छूट दी थी. इस छूट के बाद बस भाड़े में बच्चों को कोई राहत नहीं दी गयी लेकिन पिछले 8 वर्षों में करोड़ों के राजस्व की बचत जरूर कर ली गयी.


13 जून 2003 को राज्यपाल के आदेश से तत्कालीन परिवहन सचिव विमल कीर्ति सिंह ने एक अधिसूचना जारी कर निजी विद्यालयों के प्रबंधकों द्वारा संचालित बसों के अतिरिक्त कर में 40 फीसदी से अधिक की छूट दी थी. अधिसूचना में छात्रों को बस भाड़े के रूप में पड़ रहे आर्थिक बोझ से राहत देने का निर्देश और साथ ही उनमें ओवरलोडिंग  नहीं करने की भी चेतावनी दी गयी थी. ऐसा पाये जाने पर छूट की  तिथि से 200 प्रतिशत  राशि  दंड के रूप में वसूलने का प्रावधान था. लेकिन व्यवहारतः बच्चों के अभिभावकों को किसी तरह की राहत नहीं दी गयी लेकिन इस छूट का पूरा लाभ उठाया गया. यह सिलसिला बदस्तूर जारी है. बसों का भाडा हर वर्ष बढ़ा दिया जाता है. बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अभिभावक इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाते. 
        उल्लेख्य है कि सिर्फ रांची में करीब 500 स्कूल बसें चलती हैं. जिनमें करीब 200 बसें स्कूल प्रबंधकों के सीधे नियंत्रण में हैं जबकि शेष 300 आउटसोर्स की गयी हैं. पूरे सूबे में यह संख्या हजारों का आकड़ा छूती हैं. उल्लेख्य है कि कर के रूप में 52 सीट वाली बसों से प्रतिवर्ष 6427 रूपये का कर निर्धारित है. जबकि स्कूल प्रबंधकों के सीधे नियंत्रण वाली बसों को छूट के बाद सिर्फ 3774 रूपये प्रतिवर्ष देय है. इस प्रकार सिर्फ रांची के 200 स्कूल बसों को प्रतिवर्ष कर में करीब 6.5 लाख की छूट मिल जा रही है. पिछले 8 वर्षों में  इस तरह उन्हें 50 लाख से भी अधिक की रियायत मिल चुकी है. पूरे राज्य में रियायत की यह राशि करोड़ों में है. लेकिन जिस मकसद से उन्हें यह रियायत दी गयी वह हल नहीं हो पा रहा है. बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह लादने की प्रवृति पूर्ववत बरक़रार है. अभिभावकों से मनमाना भाडा भी वसूला ही जा रहा है. 
             दिलचस्प बात यह है कि परिवहन विभाग के अधिकांश अधिकारीयों  को को यह जानकारी भी नहीं है कि अतिरिक्त कर क्या है और इस मद में कितनी राशि वसूली का प्रावधान है. कई घंटे फोन घुमाने के बाद बहुत मुश्किल से यह जानकारी मिल सकी. कुछ अनभिज्ञता और कुछ सुविधा राशि के प्रभाव में विभाग यह नहीं देख पाता कि राज्यपाल के आदेश की किस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

-----देवेंद्र गौतम 

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