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शनिवार, 14 जनवरी 2012

'आल्हा'-लुप्त होती परंपरा

आरा, बिहार की ह्रदय स्थली रमना मैदान में लगभग हर शाम बुलंद आवाज़ में एक लोकगीत गूंजने लगता है.....इस गीत का जादू ऐसा की देखते ही देखते चारो ओर भीड़ इकठी हो जाती है....तालियाँ बजने लगती है ....वो हुंकार भरता है -
"रन में दपक -दप बोले तलवार ,
पनपन-पनपन तीर बोलत है ,
कहकह कहे अगिनिया बाण,
कटकट मुंड गिरे धरती पर "
जोश भर देनेवाली इस गायिकी को 'आल्हा' कहते है. इसे गानेवाले गायक का नाम है 'भोला'. इस लोक गायक का 'आल्हा' जब अपने चरम पर होता है तो सुननेवाले की भुजाएं फरकने लगती है ...खून की गति बढ़ जाती है....देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है...... कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया . उनका प्रण था की दुश्मन के हाथ देश की एक अंगुल धरती नहीं जाने देंगे-
"एक अंगुली धरती न देहब
चाहे प्राण रहे चली जाये "
जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं. मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन १२५० में लिखा गाया था . 'आल्हा' लोक गाथा है, जिसे भारत के लगभग सारे हिंदी प्रदेश में गाया जाता है..... हालाँकि क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव इनपर पड़ा है....भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही.....अन्य दूसरे प्रदेशों में भी कुछ ऐसा ही हाल है. लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. मतलब ये कि वह गाथा जिसे गा कर सुनाया जाये लोकगाथा कहलाती है.आल्हा ऊदल ११वीं सदी में चंदेल शासक के सेनानायक थे, जिनकी वीरता का वर्णन कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक ने गेय काव्य के रूप में किया है . इन्होने महोबे के विख्यात वीर आल्हा - ऊदल की कथा 'आल्हा' नामक छंद में लिखी है. यह छंद इतना लोकप्रिय हो गया कि पुस्तक का नाम ही 'आल्हा' पड़ गया. इसके बाद जो भी कविता इस छंद में लिखी गयी उसे 'आल्हा' कहा जाने लगा.वीर रस से ओत-प्रोत भोजपुरी प्रदेशों में आल्हा गाने की प्रथा बड़ी पुरानी है. दोनों वीर भाइयों आल्हा और ऊदल ने किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज से भीषण युद्ध किया. पावस ऋतु के अन्तिम चरण से लेकर पूरे शरद ऋतु तक सामूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत स्तर पर इन दोनों प्रदेशों में आल्हा-गायन होता है. आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं ५२ तो कहीं ५६ लड़ाइयाँ वर्णित हैं. इस लोकमहाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं. आल्हा या वीर छन्द अर्द्धसम मात्रिक छन्द है, जिसके हर पद (पंक्ति) में क्रमशः १६-१६ मात्राएँ, चरणान्त क्रमशः दीर्घ-लघु होता है. यह छन्द वीररस से ओत-प्रोत होता है. इस छन्द में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रचुरता से प्रयोग होता है। एक लोककवि ने आल्हा के छन्द-विधान को इस प्रकार समझाया है-
आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य।
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राई को तुरत पहाड़।
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़।
आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झाँझ, मँजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य का प्रयोग भी किया जाता है। आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आल्हा गानेवाले गायक के पास एक ढोल होता है..... गाने की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती जाती है, ढोल बजने की गति में वैसा ही परिवर्तन होता जाता है. युद्ध भूमि में आल्हा और ऊदल के अद्भुत शौर्य के कारनामों के प्रसंग के समय गायकों की मुखाकृति देखते ही बनती है.............कभी कभी ये जोश में आकर ढोलक पर ही चढ़ जाते हैं और उसे घुटनों से दबाकर "हई जवान" की हुंकार के साथ युद्ध वर्णन करने लगते है. आल्हा गानेवालों की खूबी होती है की अपने लम्बे गायन के क्रम में ये अपने श्रोताओं को जैसे बहा ले जाते है.... वो भी गायक के साथ एकत्व का अनुभव करने लगता है...वैसी ही उद्दाम भावना...वैसा ही जोश....देश पर मर मिटने कि वैसे ही अभिलाषा जाग जाती है जैसी कभी आल्हा और ऊदल कि रही होगी.
किन्तु देशप्रेम कि भावना को जगाने वाले आल्हा गायकों कि स्थिति बहुत दयनीय है. इनकी बदतर आर्थिक स्थिति इन्हें इस से मुह मोरने पर बाध्य कर रही है. कोई भी आल्हा गायक अपने बच्चों को यह हुनर नहीं सिखाता. अपने शहर के जिस भोला उर्फ आकाश राज बादल के बारे में मै बता रही थी उनकी हालत भी बहुत ख़राब है. इन्होने कभी लाल कृष्ण आडवानी, गवर्नर हाऊस, लालू यादव के यहाँ गायिकी का प्रदर्शन किया तो कोलकाता, रामेश्वरम, लखनऊ के बड़े मंचो पर अपना जोहर दिखाकर तालियाँ बटोरी....आज ये रमना मैदान में मजमा लगाकर गाते है और पेट भरने कि कोशिश करते है.......हम सब ने भी इसकी आदत बना ली है...इसे सुनते हुए गुज़र जाते है...थोड़ी बहुत चर्चा भी कर लेते है.....बहुत हुआ तो ऐसे ही लिख मारते है.....पर मदद के लिए कुछ नहीं करते........कुछ भी नहीं करते.......अपनी परंपरा को यु ही मिटने के लिए छोड़ देते है ........
-स्वयम्बरा
http://swayambara.blogspot.in/

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