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शनिवार, 2 जून 2012

खून-खराबे के एक नए दौर की आशंका



संदर्भ बरमेश्वर मुखिया हत्याकांड 

 बरमेश्वर मुखिया की हत्या के बाद उनके समर्थकों ने आरा समेत बिहार के विभिन्न इलाकों में जो उत्पात मचाया वह महज़ अपने नेता की हत्या के विरुद्ध उपजा आक्रोश भर नहीं था बल्कि उस जातीय उन्माद के जहर की अभिव्यक्ति थी जिसे मुखिया जी ने 90  के दशक के दौरान भरा था. उनका उद्देश्य सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और प्रशासन को उसकी बेचारगी का अहसास कराना भर था. सरकार चाहे जिसकी रही हो इस सेना के हिमायती उसके अंदर मौजूद रहे हैं. नक्सल विरोध के नाम पर इसे सत्ता का सहयोग परोक्ष रूप से मिलता रहा है. यही कारण है कि इस घटना के विरुद्ध कानून-व्यवस्था को धत्ता बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी. साथ ही अन्य जातियों खासतौर पर दलितों और पिछड़ों को यह सन्देश दिया गया कि मुखिया जी की हत्या से वे कमजोर नहीं पड़े हैं उनके तेवर बरक़रार हैं. फासीवादी ताकतों का प्रदर्शन इसी तरह का होता है. यह राजनीति की ठाकरे शैली है. महाराष्ट्र में शिव सैनिकों के सामने सरकारी तंत्र इसी तरह लाचार दिखता है.
इस हत्याकांड में कई सवाल अनुत्तरित हैं. सूचनाओं के मुताबिक मुखिया जी पूजा-पाठ कर सुबह छः-सात बजे घर से निकला करते थे. हत्या के दिन वे चार बजे क्यों निकले और हत्यारों को इस बात की भनक कैसे मिली कि वे चार बजे सुबह टहलने के लिए निकलेंगे? यह जानकारी तो उनके बहुत करीबी लोगों को ही हो सकती है.
दूसरी बात यह कि मुखिया समर्थकों की सरकारी नुमाइंदों के प्रति नाराजगी और धक्का-मुक्की का कारण तो समझ में आता है लेकिन अपनी ही विरादरी के दो विधायकों के साथ दुर्व्यवहार क्यों किया. वे आपराधिक पृष्ठभूमि के जरूर थे लेकिन रणवीर सेना के करीबी लोगों में गिने जाते थे. अगर उन्हें उनपर हत्या की साजिश में शामिल होने का संदेह था तो आमजन और सार्वजानिक संपत्ति पर गुस्सा उतारने का क्या कारण था. निश्चित रूप से रणवीर सेना में दरार पड़ चुकी है और इसके दो घड़ों के बीच कार्यपद्धति को लेकर अंतर्विरोध था जो मुखिया जी के जेल से निकलने के बाद वर्चस्व की लड़ाई में परिणत हो गया. एक घड़ा उस रास्ते पर चलना चाहता है जिसपर मुखिया जी चलते रहे हैं और दूसरा घड़ा वह जो उस रास्ते पर चलना चाहता है जिसपर मुखिया जी के जेल जाने और नक्सलियों के साथ संघर्ष में ठहराव के बाद वह चलता रहा है. मुखिया जी की हत्या इन दो धाराओं के बीच टकराव का ही परिणाम प्रतीत होती है. संभव है आने वाले समय में इस टकराव के कारण भोजपुर की धरती पर खून-खराबे का एक नया दौर शुरू हो जाये.

----देवेंद्र गौतम

(बरमेश्वर मुखिया के सम्बन्ध में और जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक क्लिक करें)


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