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शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

किस दिशा में होगी हंस की अगली उड़ान

देवेंद्र गौतम
राजेंद्र यादव के देहांत के बाद हंस का प्रकाशन तो नियमित हो रहा है लेकिन इसमें साहित्य का वह रस नहीं रहा जो यादव जी के जमाने में था। इसमें बदलाव आ रहा है, जिसे कुछ हद तक सकारात्मक ही कहा जा सकता है।
साहित्यिक पत्रिका हंस की स्थापना भले 1930 में प्रेमचंद ने की थी लेकिन 1986 के बाद यह राजेंद्र यादव का ब्रांड बन गया। वामपंथी धारा के तहत स्त्री विमर्श और दलित विमर्श से संबंधित कहानियां और बहसें इसकी पहचान बन गईं थी। अब उनके देहांत के बाद उनके उत्तराधिकारी संपादक संजय सहाय और प्रबंध संपादक रचना यादव के नेतृत्व में जिस पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है वह हंस तो है लेकिन न राजेंद्र यादव की छाप होते हुए भी यह राजेंद्र यादव का हंस नहीं है। भले ही अभी इसके प्रारंभिक संकेत ही दिख रहे हैं लेकिन इसकी एक अलग दिशा में यात्रा शुरू हो चुकी है जिसे एक हद तक सकारात्मक ही कहा जा सकता है ।
राजेंद्र यादव के बेबाक और विवादास्पद संपादकीय लेख साहित्य प्रेमियों के मानस में एक अलग रस का प्रवाह करते थे। उनकी आलोचना भी खूब होती थी लेकिन राजेंद्र यादव की एक खासियत थी कि वे आलोचनाओं से नाराज अथवा विचलित नहीं होते थे, बल्कि उनका आनंद लेते थे। 28 अक्टूबर 2013 को उनके देहावसान के बाद वरिष्ठ कथाकार संजय सहाय संपादक बने। राजेंद्र यादव ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उन्हें सह संपादक की जिम्मेवारी देकर अपनी विरासत संभालने के लिए तैयार भी किया था। लेकिन यादव जी के देहांत के बाद संजय सहाय संपादकीय के नाम पर सिर्फ यादव जी के साथ बिताए दिनों के संस्मरण लिखे जा रहे हैं। इसके कारण एक संपादक के रूप में उनकी अपनी दृष्टि साहित्य जगत के सामने नहीं आ पा रही है। इस लिहाज से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि संजय सहाय इसे वास्तव में किस दिशा में ले जाएंगे। जहां तक रचनाओं के चयन का सवाल है अभी तक छप रही अधिकांश रचनाएं यादव जी के काल में चयनित हैं। लेकिन एक अंतर जरूर आया है कि अब यौन कुंठित रचनाकारों को पहले जैसा स्पेस नहीं मिल रहा है। उनमें विविधता आई है। धनबाद के कवि और हंस के वर्षों से नियमित पाठक अनवर शमीम कहते हैं, ‘राजेंद्र जी के समय स्त्री विमर्श के नाम पर हंस में यौन कुंठितों का जमावड़ा हो गया था। अब कम से कम विविध विषयों से संबद्घ साफ-सुथरी कहानियां आ रही हैं। बहसें भी स्तरीय हो रही हैं। मुझे तो बदलाव बेहतर लग रहा है।’
आज हिंदी साहित्यकारों का एक वर्ग हंस की नई टीम को अक्षम और नाकारा बताने का प्रयास कर रहा है। बाजाप्ता एक अभियान चला रखा है। इसका कारण यह है कि यादव जी के विरासत के दावेदारों की लंबी फेहरिश्त थी। लेकिन राजेंद्र यादव ने बहुत कुछ सोच समझकर अपने उîाराधिकारियों का चयन किया था। अब  जिन लोगों की उक्वमीदों पर पानी फिरा वह किसी न किसी रूप में अपनी खीज मिटा रहे हैं।
हंस का इतिहास प्रेमचंद से जुड़ा था, वर्तमान राजेंद्र यादव से जुड़ा है मगर इसका भविष्य इसकी नई टीम के साथ निर्धारित होना है। राजेंद्र जी ने स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के रूप में साहित्य की एक नई धारा की शुरूआत की थी। इनसे जुड़ी बहसों और कहानियों, कविताओं को इसमें जगह मिलने लगी थी। लेकिन उनका स्त्री विमर्श स्त्री मुक्ति के नाम पर यौन उत्श्रृंखलता की ओर केंद्रीत हो गया था। सेक्स का खुलापन हंस का की रचनाओं का मुख्य स्वर बन गया था। बहरहाल, राजेंद्र जी के संपादकीय बेबाक और विवादास्पद होने के बावजूद सुगढ़ भाषा में लिखे होते थे जिनमें एक अलग रस हुआ करता था। जो हंस की एक अलग पहचान बनाते थे। उनके समय में पत्रिका का वैचारिक पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता था।
निश्चित रूप से किसी संपादक की संपादकीय दृष्टि, रचना चयन के पैमाने और उसकी विचार यात्रा की क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती। राजेंद्र यादव के उत्तराधिकारी व हंस के वर्तमान संपादक संजय सहाय हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार हैं। उनके अंदर पत्रिका निकालने की प्रतिबद्घता है लेकिन उनसे राजेंद्र यादव का क्लोन होने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।
हिन्दी के चर्चित कवि मदन कश्यप कहते हैं, ‘संजय सहाय अच्छे कथाकार हैं। लेकिन संपादक बनने के बाद से अभी तक संपादकीय के रूप में वह राजेंद्र जी के प्रसंग ही लिखते आ रहे हैं। इसलिए फिलहाल हंस की भावी दशा और दिशा के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।’
फिर भी मदन कश्यप जी का मानना है, ‘पत्रिका पर असर तो पड़ा है। इसमें कमजोर कविताएं छप रही हैं कि राजेंद्र जी होते तो शायद ऐसी कविताएं नहीं छापते।  फिर भी रचना यादव के प्रबंधन कौशल और संजय सहाय की प्रतिबद्घता से यह उम्मीद जरूर बनती है कि पत्रिका का प्रकाशन नियमित रूप से जारी रहेगा और समय के अंतराल में इसकी एक नई पहचान भी बनेगी।’
हिंदी-उर्दू के गजलकार सौरभ शेखर का मानना है, ‘हंस में हिंदी गजल के नाम पर ऐसी रचनाएं छपती रही हैं जिनमें बहर का पालन नहीं होता। काफिया रदीफ तक की गल्तियां होती हैं। एक प्रतिष्टित पत्रिका के जरिए किसी विधा की कमजोर रचनाओं का प्रकाशन अफसोस जनक है। कम से कम नई टीम को इसपर ध्यान देना चाहिए।’
 हालांकि संपादक के देहांत के बाद एक लंबे समय तक पाठकों की स्मृति में उनकी छाप बनी रहती है। नई पहचान बनने में थोड़ा समय लग जाता है। युवा समीक्षक पंकज शर्मा का कहना है, ‘साहित्यिक पत्रिकाओं में प्राय: एक वर्ष के अंक तैयार रखे जाते हैं। अभी हंस में जो रचनाएं छप रही हैं उनमें से अधिकांश का चयन राजेंद्र जी का ही किया हुआ है। नई टीम की असली परख तो एक साल के बाद ही की जा सकेगी। फिर भी जितने बेहतर तरीके से हंस ने प्रेमचंद जयंती मनाई और उसके सालाना कार्यक्रम का आयोजन हुआ उससे बेहतर भविष्य की उक्वमीद बनती है।’
हालांकि हंस अगस्त अंक में प्रकाशित सर्वेश्वर प्रसाद सिंह के लेख ‘रामचरित मानस और प्रगतिशीलों के पूर्वाग्रह’ को हंस की वैचारिक यात्रा के किसी और दिशा में चल निकलने का संकेत बताया जा रहा है। मदन कश्यप कहते हैं, ‘रामचरित मानस के कुछ प्रसंगों पर दलितों और रूढि़वादियों का विरोध रहा है। प्रगतिशीलों का इससे खास वास्ता नहीं रहा है। इस बात को नजर-अंदाज कर दिया गया है। यह आलेख दक्षिणपंथी रूझान और सवर्णवादी मानसिकता को अभिव्यक्त करता है।’
संजय सहाय इसे जड़ता तोडऩे के एक प्रयास के रूप में देखते हैं उनका कहना है, ‘इस लेख को जानबूझ कर छापा गया है ताकि जड़ता टूटे। बहस छिड़े। तुलसी का मानस ने जनमानस को लंबे समय से प्रभावित किया है। साढ़े चार सौ वर्षों से बेस्ट सेलर बना हुआ है। इसके असर से इनकार नहीं किया जा सकता। बाल्मीकि के राम मानव थे जबकि तुलसी के राम अतिमानव। इसपर बहस होनी ही चाहिए।’
हालांकि संजय सहाय हंस को उसकी निर्धारित दिशा की ओर ले जाने की अपनी प्रतिबद्घता दुहराते हैं लेकिन राजेंद्र यादव की अपनी अलग व्याक्चया और सोच थी। वर्तमान वैश्विक और भारतीय परिस्थितियों को देखते हुए यदि हंस की नई टीम उदार वामपंथ अथवा वाममुखी मध्यमार्ग की धारा को अपनाती है तो इसे सकारात्मक बदलाव ही कहा जाएगा।




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devendra gautam
assistant editor
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