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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

कोकर में सड़क पर उतरे आदित्य विक्रम व अजय राय

रांची। झारखंड  प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश डेलिगेट आदित्य विक्रम जायसवाल एवं प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता अजय राय ने संयुक्त रूप से अपने समर्थकों के साथ आज लालपुर एवं कोकर एरिया में झारखण्ड बन्द को लेकर सड़क पर उतरे। इस दौरान कांग्रेस नेताद्वेय ने पार्टी झंडा एवं बैनर के साथ लोकतांत्रिक तरीके से सड़क पर पैदल मार्च किया और शांति ढंग से आमलोगों को माला पहनाते हुए एवं हाथ मिलाते हुए झारखंड बन्द को सफल बनाने तथा तमाम विपक्ष पार्टियों को सहयोग करने का अनुरोध किया। बन्द कराने के उपरांत कांग्रेस नेताद्वेय आदित्य विक्रम जायसवाल एवं अजय राय को पूर्वाह्न 11ः30 बजे लालपुर डीएसपी राजकुमार मेहता एवं थाना प्रभारी रमोद सिंह ने दोनों कांग्रेस नेताओं तथा उनके समथकों को बस में बैठाकर (गिरफ्तार कर) जेल कैम्प मोरहाबाद ले गये।
इस अवसर पर आदित्य विक्रय जायवाल ने कहा कि राज्य के रघुवर सरकार पूरी तरह से तानाशाह हो चुकी है, कोरपोरेट एवं पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए भूमि अधिग्रहण बिल का संशोधन कराया है ताकि राज्य के गरीब आदिवासियों की जमीन को कम कीमतों में छीना जा सके। उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन का असर सीधा झारखंड के आदिवासियों-मूलवासियों पर पडेगा। सरकार के इस नीति से आज पूरा झारखंड की जनता आक्रोश है, इसका जवाब झारखंड की जनता आने वाले चुनाव में रघुवर सरकार को मुंह तोड़ देगी।
पूर्व प्रवक्ता अजय राय ने कहा कि भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण बिल संशोधन कर कृषि योग भूमि को गैर कृषि योग भूमि घोषित करने के लिए नियम बनाये हैं ताकि यहां के गरीब किसानों की जमीन को कोरपोरेटर घरानें के लोगों को दिया जा सके। ऐसे होने पर भविष्य में कृषि योग्य भूमि की काफी कमी होने की संभावनाएं है।
झारखंड बन्द कराने के दौरान लालपुर एवं कोकर एरिया से गिरफ्तार होने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं में मुख्य रूप से अजय राय  आसिफ जिआउल  अमरजीत सिंह,  ओम प्रकाश , राजीव चौरसिआ , गौरव आनंद , आशुतोष ,कुन्ज ,वैभाव ,दारा बड़ाइक ,नीतीश मामा ,दीपक ओझा ,प्रेम कुमार ,कुलदीप कुमार ,आदि शामिल थे

बंद की सफलता पर सुबोधकांत ने दी जनता को बधाई

विपक्षी गठबंधन की एकजुटता बनाए रखने की अपील


रांची। कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने झारखंड बंद को ऐतिहासिक करार देते हुए झारखंड की जनता और विपक्षी गठबंधन के नेताओं को बधाई दी है। श्री सहाय ने कहा कि यह विपक्षी एकता और उसके प्रति जनता के बढ़ते भरोसे का प्रतीक है। झारखंड की जनता रघुवर सरकार के नकाब के पीछे के चेहरे को पहचान चुकी है। उसके हिडेन एजेंडे को जान चुकी है। अब वे जनता को बहला या फुसला नहीं सकते। उनकी सत्ता के दिन पूरे हो चुके हैं। श्री सहाय ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और केंद्र की मोदी सरकार को सलाह दी है कि कम से कम अब तो कार्पोरेट की सेवा बंद कर जनता की सेवा पर ध्यान दें। आखिर जनता के बीच किस मुंह से जनादेश मांगने जाएंगे।
श्री सहाय ने विपक्षी गठबंधन के नेताओं को और मजबूती के साथ एकजुट होकर भगवा सरकार की जन विरोधी नीतियों का पर्दाफाश करने और  जनता के मुद्दों को लेकर संघर्ष तेज़ करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून में किसी तरह के संशोधन का प्रयास बर्दास्त नहीं किया जाएगा।

कुवांरी माताओं के शिशुओं की परवरिश का सवाल




अनिमा इंदवार              फोटोः साभार
रांची। झारखंड की राजधानी रांची में नवजात शिशु को बेचे जाने के मामले का खुलासा होने के बाद एक नई बहस की ज़मीन तैयार हो गई है। कुवांरी माताओं के बच्चों की परवरिश आखिर कैसे होगी। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। सरकार लेगी या सामाजिक संस्थाएं। शिशु को बेचने का आरोप मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर लगा है। संस्था की कर्मचारी अनिमा सहित दो सिस्टर को शहर की कोतवाली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। आरोप है कि चैरिटी होम की महिला संचालक के साथ मिलकर अनिमा आधा दर्जन नवजात को बेच चुकी है। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की जांच में इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि एक बच्चा के एवज में 1.20 लाख रुपये तक लिये गए।

बाल कल्याण समिति ने नवजात बच्चे को इस समिति से बरामद कर लिया है. फिलहाल इन बच्चों को और प्रसव के लिए भर्ती माताओं को दूसरी संस्था में रखा गया है। कुछ और बच्चों के भी अवैध तरीके से बेचे जाने की बात सामने आयी है। उन बच्चों की मां के नाम पुलिस को मिले हैं। इसकी जांच की जा रही है। जांच के क्रम  में बच्चो की बिक्री में चैरिटी होम की संचालिका सिस्टर कोनसीलिया की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है।

पता चला है कि अविवाहित लड़की मिशनरीज ऑफ चैरिटी होम में प्रेग्नेंसी के दौरान रह रही थी। उसने एक मई को सदर अस्पताल रांची में एक लड़के को जन्म दिया। नवजात को अनिमा इंदवार ने संचालिका सिस्टर कोनसीलिया की मिलीभगत से उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के ओबरा में रहनेवाले दंपती सौरभ अग्रवाल व प्रीति अग्रवाल को अस्पताल खर्च के नाम पर महज 1.20 लाख रुपये में बेच दिया. तब वह मासूम चार दिन का ही था। तीन जुलाई को दंपती को बुलाकर अनिमा ने बच्चा यह कहकर वापस ले लिया कि इसे कोर्ट में पेश करना है। पता चला है कि अविवाहित मां स्वयं शिशु से छुटकारा पाने के लिए उसे बेचना चाहती थी। बिक्री की रकम में से 80 हजार रुपये दिए गए थे।
शिशु को बेचना कानूनन गलत है। नियमतः गर्भस्थ कुवांरी युवतियों को संस्था में रखने की जानकारी बाल कल्याण विभाग को दी जानी चाहिए लेकिन मदर टेरेसा जैसी हस्ती से जुड़ी संस्था ने इस नियम का पालन नहीं किया और मानव तस्करी का धंधा शुरू कर दिया यह खेदजनक है। कानूनी पक्ष के अलावा सामाजिक प्रश्न यह है कि किसी युवती के किसी कारण गर्भवती हो जाने पर उसकी देखभाल कैसे हो। उसकी पहचान गुप्त रखते हुए बच्चे की परवरिश का क्या इंतजाम हो। झारखंड और बिहार जैसे राज्यों के लिए यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां का समाज अभी इतना आधुनिक नहीं हुआ है कि किसी कुवांरी मां को उसके बच्चे के साथ चैन से जीने दे। चैरिटी संस्था यदि मां की पहचान गुप्त रखने की शर्त पर ऐसे शिशुओं की जानकारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को देती और कमेटी निःसंतान दंपत्तियों को शिशु को गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने का जिम्मा उठाती तो समस्या का निदान हो सकता था। सरकार को भविष्य में ऐसे मामलों के निराकरण के सटीक उपाय पर विचार कर से लागू करना चाहिए।
  


बंद के दौरान सुबोधकांत ने दी गिरफ्तारी


कहा-विपक्ष की आवाज़ दबाना चाहती है सरकार



रांची। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय आज सम्पूर्ण विपक्ष बंदी के दौरान कांग्रेस भवन से जुलूस के शक्ल में अपर बाजार, शहीद चौक होते हुए मेन रोड पहुँचे। जहाँ जिला प्रशासन ने गिरफ्तार कर कैम्प जेल में रखा। श्री सहाय ने कहा कि रघुवर सरकार पूरी तरह से संवेदनशील हो गई है। किसानों, आदिवासियों की जमीन हडपना चाहती है और लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को लाठी डंडे और गोली के आवाज पर दबाना चाहती है। मौके पर सुरेन्द्र सिंह, राकेश सिन्हा, दीपक लाल, बैलेस तिर्की, योगेन्द्र सिंह, सोनू वर्मा, उदय प्रताप सिंह सहीत सैकडो कांग्रेसी कार्यकर्ता थे।

झारखंड बंद असरदार

रांची। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक के खिलाफ विपक्षी दलों का झारखंड बंद अधिकांश जिलों में सफल दिख रहा है। दिन के 12.30 बजे तक बंद समर्थकों के सड़क पर उतरने, कहीं-कहीं टायर जलाकर सड़क जाम करने और गिरफ्तारियां देने की खबरें आ रही हैं। लेकिन अभी तक कहीं से भी जोर जबर्दस्ती अथवा हिंसात्मक टकराव की खबर नहीं है। दुकानें बंद हैं। अधिकांश स्कूल बंद हैं। परीक्षाएं अपने निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक चल रही हैं। राजधानी रांची में सवारी गाड़ियां कम चल रही हैं लेकिन निजी वाहनों का परिचालन जारी है। सड़कों पर रोज की तरह वाहनों का आवागमन नहीं है लेकिन कहीं सन्नाटा नहीं है। सुरक्षा बल चप्पे-चप्पे पर नजर रख रहे हैं। नक्सली इलाकों में विशेष चौकसी बरती जा रही है। विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ निकले हैं लेकिन उनका प्रयास भी शांतिपूर्ण तरीके से बंद को सफल बनाने की है। हालांकि अभी पूरा दिन बाकी पड़ा है। 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

पौधरोपण का कार्यक्रम आयोजित



रांची। देश के जाने-माने ज्योतिषाचार्य एवं रांची के एक पुराने दैनिक अखबार के आध्यात्मिक संपादक आचार्य अमरेन्द्र मिश्रा के बूटी स्थित आवास पर पौधरोपण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर संयुक्त बिहार के मंत्री व राजद की प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी, तिरंगा सम्मान यात्रा के सूत्रधार व प्रसिद्ध समाज सेवी सुधांशु सुमन , पवन कुमार सिन्हा ,एक अखबार के वाईस प्रेजिडेंट और दिल्ली पुलिस के पूर्व आईपीएस अनिल ओझा ने सामूहिक रूप से ग्रीन इंडिया के तहत बूटी मोड़ के पास आचार्य अमरेन्द्र मिश्रा के आवास पर पौधा रोपण का कार्यक्रम संपन्न किया, इस कार्यक्रम में पूर्व आईपीएस श्री ओझा ने कहा कि रांची एक्सप्रेस संयुक्त बिहार का प्राचीनतम अखबार है। सम्पूर्ण बिहार और झारखंड के साथ देश के कोने कोने की खबरों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ जनता तक पहुंचाया जाता है जाता है। पिछले तीन वर्षों से अपने मुहिम "एक हाथ मे तिरंगा दूजे हाथ मे पौधा",  जय जवान जय किसान जैसे नारों को इस अखबार ने  देश के गांव गांव ,घर घर तक पहुंचाने का काम किया है, देश की एकता के लिए गांव गांव में तिरंगा सम्मान यात्रा और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पौधा रोपण देश भर में करना एक सराहनीय कदम है।

झाऱखंड के वन्य जीवन पर नक्सलवाद का ग्रहण



पलामू टाइगर रिजर्व में पिछले फरवरी माह के बाद किसी बाघ की मौजूदगी के संकेत नहीं मिले हैं। फरवरी में मात्र एक बाघ वन विभाग के कैमरे की जद में आया था। इसके बाद उसका भी अता-पता नहीं है। व्याघ्र अभयारण्य में नक्सलियों की राइफलें गरजती हैं या सुरक्षा बलों के बूटों की आवाज़। ऐसे में वन्य जीवन के लिए कोई जगह बचती नहीं है। जंगल के जानवर शांतिप्रिय होते हैं। बारूदी धमाकों से उनकी शांति भंग होती है और वे दूसरे इलाकों में चले जाते हैं। हाल में नक्सलियों ने इस इलाकें में स्थित बूढ़ा बांध पहाड़ पर लैंडमाइन विस्फोट किया था जिसमें सुरक्षाबल के छह जवान शहीद हो गए थे। कई जवान घायल हुए थे। कुछ ही दिन पहले वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया की एक सर्वे टीम आी थी। उसे वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन करना था और िसके लिए ट्रैप कैमरे लगाने थे। नक्सलियों की धमकी के बाद इस टीम को अपना काम पूरा किए बिना वापस लौट जाना पड़ा था। सरकारी तंत्र और वन विभाग उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सके थे।
यह देश के 9 व्याघ्र अभयारण्यों में एक है। यह 1026 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसका कोर एरिया 226 वर्ग किलोमीटर में है। इसके किनारे 200 से अधिक गांव बसे हुए हैं। किसी जमाने में यहां बाघों की बहुतायत थी। ब्रिटिश शासन काल में इनका जमकर शिकार किया गया। उस समय बाघ का शिकार बहादुरी की अलामत मानी जाता थी। बाघ मारने पर सरकार की ओर से ईनाम दिया जाता था और शिकारियों का नागरिक सम्मान होता था। आजादी के बाद भी की वर्षों तक बाघों के शिकार का सिलसिला जारी रहा। बाद में शिकार पर रोक लगी और बाघों को संरक्षण की शुरुआत हुई। पलामू के बेतला टाइगर रिजर्व की स्थापना 1974 में की गई। यह देश का पहला टाइगर प्रोजेक्ट था। 1932 में बाघों की गिनती की शुरुआत यहीं से हुई थी। वर्ष 1992 में यहां 55 बाघ पाए गए थे। 2003 में उनमें से मात्र 36 बाघ बचे थे। 30 बाघ अवैध शिकार की भेंट चढ़ चुके थे। वर्ष 2010 में यूएनओ ने  29 जुलाई को विश्व व्याघ्र दिवस के रूप में मनाने की घोषणा  की।
सरकार ने वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या दुगनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए आधारभूत संरचना को बेहतर करने का काम किया जा रहा है। बेतला टाइगर रिजर्व को इसके लिए 7 करोड़ की राशि आवंटित की गई थी लेकिन नक्सलियों के कारण इसमें बाधा आ रही है। 2012 में जब बाघों की गणना हुई तो पता चला कि मादा बाघ गिनती में सिर्फ पांच रह गई हैं। ऐसे में उनका प्रजनन सीमित संख्या में ही हो सकता था। दूसरे अभयारण्यों से मादा बाधों के लाने की योजना बनी लेकिन नक्सलियों के रहते वन्य जीवन की कोई योजना शायद ही फलीभूत हो सके। यहां बाघों के  अलावा हाथी, तेंदुआ, सांभर, चीतल सहित हजारों नस्लों के छोटे बड़े जानवर, 174 प्रकार के पक्षी निवास करते थे।  इसके जंगलों में 970 प्रकार के पेड़ पौधे और 139 तरह की दुर्लभ जड़ियां मिलती थीं। वन्य जीवन में रुचि रखने वाले हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते थे। अब उनकी संख्या नगण्य रह गई है। इससे स्थानीय ग्रामीणों के रोजगार के अवसर भी घटे हैं।  जबसे यह इलाका नक्सल आंदोलन की जद में आया है, वन्य जीवन सिमटता जा रहा है। हाल में हाथियों के एक झुंड ने अभयारण्य में लगे दो ट्रैप कैमरों को तोड़ डाला था। वन्य जीवन की निगरानी के लिए लगे इन कैमरों पर नक्सलियों की भी कुदृष्टि रहती है। क्योंकि जंगली जानवरों के साथ उनकी गतिविधियां भी रिकार्ड होती हैं। बेतला टाइगर रिजर्व ही नहीं झारखंड के जंगलों में वन्य जीवन के भविष्य  पर फिलहाल  नक्सलवाद का ग्रहण लगा हुआ है।

-देवेंद्र गौतम

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...