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मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

अब कट्टर हिंदुवादी संगठनों पर लगेगी लगाम

 


ध्रुवीकरण पर्याप्त, लाभार्थियों का वोट पर्याप्त

 

-देवेंद्र गौतम

उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से ज्यादा लाभार्थी योजना का लाभ मिला। मुसलमानों का यह हसास हो गया कि सत्ता बनाने बिगाड़ने की उनकी ताकत क्षीण हो चुकी है। इसलिए वे भाजपा के समक्ष आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ चुके हैं। ध्रुवीकरण का बचा खुचा काम भी पूरा करके उसे एक ठोस आकार दिया जा चुका। हिंदूवाद और लाभार्थी को मिलाकर एक मजबूत वोट बैंक तैयार हो चुका।

इसीलिए सरकार अब भगवा उपद्रवकारियों की नकेल कस रही है। 2014 के बाद यह पहला मौका है जब सांप्रदायिक हिंसा के बाद विश्व हिंदू परिषद् और बजरंग दल जैसे कट्टर हिंदुवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि जिस शोभायात्रा के दौरान जहांगीरपुरी में हिंसक टकराव हुआ उसके आयोजन के लिए प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई थी। इस कारण विहिप के एक नेता को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ यात्रा में शामिल कुछ और कार्यकर्ता भी गिरफ्तार किए गए हैं। दो नाबालिग सहित 22 गिरफ्तार लोगों में सिर्फ मुस्लिम नहीं कई हिंदू भी शामिल हैं। लिहाजा पुलिस की कार्रवाई को एकतरफा नहीं कहा जा सकता।

इधर विहिप के नेता विनोद वंसल ने दावा किया है कि शोभा यात्रा की प्रशासनिक अनुमति ली गई थी और वे कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी है कि उनके लोगों को झूठे मुकदमों में न फंसाएं। लेकिन विनोद बंसल ने प्रशासनिक अनुमति की कोई प्रति जारी नहीं की है। जाहिर है कि यह ज़ुबानी जमा-खर्च का नहीं, दस्तावेज़ी साक्ष्य का मामला है।

दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बनने के बाद कट्टर हिंदूवादी संगठनों को जैसे मनमानी की छूट मिल गई थी। इसके बाद अल्पसंख्यकों को धड़ल्ले से निशाना बनाया जाने लगा। म़ॉब लिंचिंग, जबरन हिंदूवादी नारे लगवाने आदि का सिलसिला शुरू हो गया था। पुलिस प्रशासन का भी उनके प्रति नर्म रवैया रहा। मॉब लिंचिंग के आरोपियों का केंद्रीय मंत्री स्तर के नेताओं ने माला पहनाकर स्वागत तक किया। यह उस समय की राजनीतिक जरूरत भी थी। भाजपा को अपना एक मजबूत वोट बैंक तैयार करना था। इसके लिए ध्रुवीकरण और भामाशाही योजनाओं की जरूरत थी। अब 8 वर्षों की शासन यात्रा के बाद तुष्टिकरण की राजनीति की हवा निकल चुकी है। मुस्लिम समाज को समझ में आ चुका है कि उन्हें संरक्षण देने वाले दलों का कोई वजूद शेष नहीं है और उन्हें भाजपा विरोध का रास्ता छोड़ना होगा। उत्तर प्रदेश के कई उलेमा अपने समाज के लोगों को भाजपा के प्रति अपनी धारणा बदलने की सलाह दे रहे हैं। एक तरह से कहें तो हिंदू वोट एक हद तक एकजुट हो चुके हैं और मुफ्त योजनाओं के जरिए 80 करोड़ लाभार्थी भाजपा के पक्के वोटर बन चुके हैं। लिहाजा अंधभक्तों और कट्टरपंथियों की राजनीतिक उपयोगिता खत्म हो चली है। उनकी उदंडता को संरक्षण देना भाजपा की मजबूरी नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक वैश्विक नेता की बन चुकी है। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने से उनकी लोकप्रियता को नुकसान हो सकता है। लिहाजा धीरे-धीरे संस्थाओं को काम करने की आजादी देकर वे गवर्नेंस की एक नई मिसाल कायम करने की ओर बढ़ सकते हैं। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना उनके पसंदीदा अधिकारियों में रहे हैं। जाहिर है कि ऊपर का इशारा मिले बिना उन्होंने संतुलित कार्रवाई का रास्ता नहीं अपनाया होगा। 2020 के दिल्ली दंगों के समय दिल्ली पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगा था। सुप्रीम कोर्ट तक ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाया था। दुनिया में बेहतरीन मानी जाने वाली दिल्ली पुलिस की छवि पर नकारात्मक असर पड़ा था। जहांगीरपुरी मामले में कार्रवाई के जरिए दिल्ली पुलिस ने 2020 के दाग़ मिटाने की कोशिश की है। आने वाले समय में सरकार की प्राथमिकताओं और कार्यशैली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। कट्टरपंथियों को यह बात समझने की जरूरत है।  

शनिवार, 10 नवंबर 2018

इतनी मीडिया विरोधी क्यों है मोदी सरकार






 ढाई लाख से अधिक अखबारों के टाइटिल रद्द
804 अखबार डीएवीपी की विज्ञापन सूची के बाहर

नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2016-17 के दौरान आरएनआई और डीएवीपी के नियमों में बदलाव के जरिए छोटे-मंझोले अखबारों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया साथ ही इलेक्ट्रोनिक और डिजिटल मीडिया के अनुकूलन की पूरी व्यवस्था कर ली। यह कोई नई बात नहीं है। केंद्र में जब भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनती है तो वह स्वयं को अपराजेय समझने लगती है। उसका पहला हमला मीडिया पर होता है। 1980 में जब इंदिरा गांधी की सरकार शर्मनाक हार के बाद पूरे दम-खम के साथ वापस लौटी तो वे जनता सरकार के ढाई वर्षों के दौरान अखबारों की भूमिका से बेहद खार खाई हुई थीं। उन्होंने अखबारों को सबक सिखाने के लिए कई उपाय किए। एक तो न्यूजप्रिंट का मामला अधर में लटकाये रखा। दूसरे टीवी के अधिकतम विस्तार की नीति अपनाई ताकि प्रिंट मीडिया का महत्व घटे। उन्होंने यह कोशिश नहीं की कि अखबारी कागज देश में बन कर सस्ता मिले या विदेशों से आयातित न्यूजप्रिंट का दाम कम हो। गरीब और मध्यमवर्गीय जनता को अखबार और पत्र पत्रिकाएं सस्ते दामों पर मिलें। उन्होंने ऐसी नीति अपनाई कि अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के दाम बेहिसाब बढ़ते चले गए। उधर जनहित के नाम पर कलर टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर रियायतें दी गईं जो पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में था।
         
नरेंद्र मोदी सरकार मीडिया से खार तो नहीं खाई हुई थी लेकिन संभवतः वे किसी किस्म की आलोचना सुनने के आदी नहीं थे। या मीडिया उनके एजेंडे में बाधा डाल सकता था। उन्होंने ऐसी सख्ती बरती कि छोटे-मंझोले अखबारों का संचालन मुश्किल हो गया। इससे आमजन की आवाज बुलंद करने वाली पत्र-पत्रिकाएं बंद होने लगीं उनसे जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बड़े मीडिया घरानों से सरकार को परेशानी नहीं थी क्योंकि वे पूरी तरह कारपोरेट के चंगुल में आ चुके थे। जनता के मुद्दों को दरकिनार कर वे रागदरबारी गाने लगे थे। सरकार को उन छोटे-मंझोले अखबारों से परेशानी थी जो अपने सरकारी तंत्र के अंदर की गड़बड़ियों का पर्दाफाश करते थे। जरूर उनके बीच ऐसे तत्व भी थे जो अखबारों पत्रिकाओं की आड़ में सिर्फ और सिर्फ सरकारी विज्ञापन हासिल करने की जुगत में लगे रहते थे। जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं रहता था। जो ब्लैकमेलिंग और उगाही के धंधे में भी लिप्त थे। लेकिन घुन का सफाया करने के नाम पर गेहूं के गोदाम में जहर का छिड़काव कर दिया गया।

मोदी सरकार के नए नियमों के बाद आरएनआई और डीएवीपी काफी सख्त हो गए। समाचार पत्र के संचालन में जरा भी नियमों की अवहेलना होने पर आरएनआई समाचार पत्र के टाईटल पर रोक लगाने लगा। उधर, डीएवीपी विज्ञापन देने पर प्रतिबंध लगाने को तत्पर हुआ। देश के इतिहास में पहली बार लगभग 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए गए और 804 अखबारों को डीएवीपी ने अपनी विज्ञापन सूची से बाहर निकाल दिया गया। आरएनआई ने समाचार पत्रों के टाइटल की समीक्षा में समाचार पत्रों की विसंगतियां तलाश कर प्रथम चरण में  प्रिवेंशन ऑफ प्रापर यूज एक्ट 1950 के तहत देश के 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए। इसमें सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के 59703, और फिर उत्तर प्रदेश के 36822 पत्र-पत्रिकाएं शामिल थीं। इसके अलावा बिहार के 4796, उत्तराखंड के 1860, गुजरात के 11970, हरियाणा के 5613, हिमाचल प्रदेश के 1055, छत्तीसगढ़ के 2249, झारखंड के 478, कर्नाटक के 23931, केरल के 15754, गोआ के 655, मध्य प्रदेश के 21371, मणिपुर के 790, मेघालय के 173, मिजोरम के 872, नागालैंड के 49, उड़ीसा के 7649, पंजाब के 7457, चंडीगढ़ के 1560, राजस्थान के 12591, सिक्किम के 108, तमिलनाडु के 16001, त्रिपुरा के 230, पश्चिम बंगाल के 16579, अरुणाचल प्रदेश के 52, असम के 1854, लक्षद्वीप के 6, दिल्ली के 3170 और पुडुचेरी के 523 पत्र-पत्रिकाओं के टाइटिल रद्द किए गए।

अब पांच विधानसभा और लोकसभा के चुनाव सामने हैं। भारी संख्या में जनता की आवाज़ उठाने वाले छोटे-मंझोले अखबार बंद हो चुके हैं लेकिन उनकी बंदी से बेरोजगार हुए पत्रकार किसी न किसी माध्यम से अपनी कलम चलाते रहे हैं। कुछ अखबार उल्टी सांस लेते हुए भी जीवित बच गए हैं। मोदी की अपराजेय होने की खुशफहमी कई मौकों पर भंग हो चुकी है। दामन पर कई दाग भी लग चुके हैं। जिन्हें जनता देख रही है। अपने मीडिया विरोधी चेहरे को लेकर यह सरकार चुनाव में कौन सा चमत्कार दिखा पाती है, यही देखना है।



डीएवीपी विज्ञापन नीति पर लीपा का पत्र

(इसे 25 अगस्त 2016 को जारी किया गया था। )



मेरे साथियों,
पिछले दो महीने से डीएवीपी एड पॉलिसी को लेकर हम सभी परेशान हैं और इस पॉलिसी के विरोध में लीपा द्वारा अनेक कोशिश की गयी बल्कि हम सबने अपने अपने स्तर पर कोशिश की। लेकिन आज मैं आपसे कुछ ऐसे बिन्दुओं पर बात करने जा रहा हूँ जो शायद बहुत से साथियों को ना पसंद आये और कई लोग लीपा पर अनर्गल आरोप लगाने लगें, मेरे खिलाफ अभियान चलायें, मेरा पुतला फूकें और ना जाने क्या क्या हो..
लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ कि डीएवीपी की नई एड पॉलिसी आखिर किसके खिलाफ है? क्या यह वाकई स्माल और मीडियम अख़बारों के खिलाफ है? क्या वास्तव में 25000 से ज्यादा कॉपी छापने वाले अखबारों को सरकार के सामने गिड़गिड़ाने की जरुरत है या सरकार को इन अख़बारों के सामने घुटने टेकने की जरुरत है? (लेकिन 25000 छपे तो सही) अब सवाल है ऐसी पॉलिसी आखिर आई क्यूँ, और क्या हम इस नीति पर सरकार, किसी मंत्री, सिस्टम या डीएवीपी को गाली देकर अपने आप को संतुष्ट कर सकते हैं? इन सवालों पर सबको सोचने की जरुरत है लेकिन उससे पहले मैं बताना चाहता हूँ लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन को बनाने का हमारा उद्देश्य है कि रीजनल मीडिया में कार्य करने वाले अपने वरिष्ठ साथियों के सम्मान को पुन: स्थापित करें, उनकी आर्थिक समृद्धि के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था को विकसित कर सकें।
लेकिन समस्या यह है कि आज प्रकाशक और अखबार मालिक के तौर पर हमारे बीच कुछ ऐसे दलाल किस्म के लोग आ गये जिन्होंने रीजनल मीडिया के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर दिया है। ऐसे लोगों का पत्रकारिता या अखबार के प्रकाशन से कोई लेना देना नहीं है उनका मकसद सिर्फ पैसा या अपना रूतबा कायम करना है। ऐसे लोग उन प्रकाशकों को बदनाम कर रहे हैं जो पत्रकारिता को मिशन मानते हैं और अपने अखबार के माध्यम से जनता को न्याय दिलाने का काम करते हैं। ऐसे ही दलाल किस्म के लोगों की वजह से आज यह स्थिति आई है।
वो यह नहीं समझते कि डीएवीपी के कुछ भ्रष्ट अफसर ही पूरा राजतंत्र नहीं है और ना ही फर्जी सर्कुलेशन को चेक करना नामुमकिन है। ये तो एक उघड़ा हुआ सत्य है, जब ऐसे 50 कॉपी छापने वाले अखबार 50 और 75 हजार सर्कुलेशन दिखाते हैं तो वो ये भूल जाते हैं कि सरकार में बैठे लोग ये देख रहे हैं कि एक प्रिंटिंग प्रेस जिसकी क्षमता कम है फिर भी उसी की डिकलेरेशन के साथ 100-100 अखबार इतना बड़ा सर्कुलेशन दिखाने का दावा कर रहे हैं। मैं ऐसे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो अपने अखबार के माध्यम से लोगो की वर्षों से सेवा कर रहे हैं, उनके क्षेत्र में उनका अखबार आम लोगों की सशक्त आवाज़ बना हुआ है।
ऐसे प्रेरक प्रकाशक संपादक भी यदि अपने अखबार को लेकर डीएवीपी या किसी मंत्रालय में जाते है तो उनको हेय दृष्टि से देखा जाता है क्यूंकि हमारे बीच कई ऐसे लोग आ गये है जिन्हें ठीक से बोलना और पढ़ना नहीं आता फिर भी उन्होंने किसी तरह से अखबार का पंजीकरण करा लिया और एक ही लक्ष्य बना लिया कि अब डीएवीपी पैनल कराना है, और वो डीएवीपी के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों से अवैध गठजोड़ कर अखबार को पैनल करा लेते हैं और फिर शुरू होता एक के बाद एक एडिशन का खेल और उन अख़बारों का हक मारते रहते है जो ईमानदारी से छप रहे है। और सही सर्कुलेशन दिखा रहे हैं। डीएवीपी की नई नीति उन लोगों के खिलाफ है जो फर्जीवाडा करते हैं डीएवीपी विज्ञापन नीति उन समूहो के खिलाफ है जो ये समझते हैं कि मैं अपने अखबार के अगर 10 या15 ऐडिशन निकाल दूं तो15 विज्ञापन मिलेंगें, उनका काम ही है जुगाड़ करना।
लीपा ऐसी किसी भी नीति का पुरजोर समर्थन करती है जिससे ऐसे फर्जी पब्लिशर्स खत्म हो और रीजनल मीडिया की विश्वसनीयता फिर से बरकरार हो। इतना ही नहीं वर्तमान में हम देख रहें है कि नीति को पूरा समझे बिना कई लोगों ने अनर्गल प्रलाप शुरू कर दिया। यही वो लोग है जो पॉलिसी के रोल बैक की बातें कर रहें हैं। उन्हें समझना होगा कि सीना तानकर झूठ नहीं बोला जाता। मेरा हाथ जोड कर निवेदन है कि तर्कहीन आन्दोलन और अर्थहीन भूख हड़ताल (जिसे शाम होते ही तोड़ना पड़े) करके इस विषय को कमजोर मत बनाइये। अव्यवस्थित आंदोलनों और भूख हडतालों से रीजनल मीडिया की विश्वसनीयता ही कम होती है। हमारी ताकत है अखबार और इसी के माध्यम से अपनी ताकत दिखानी चाहिए। क्योंकि जब आन्दोलन होते हैं तो अखबर में ही छपते हैं।
हमने 25 जून की बैठक में प्रस्ताव रखा था कि हम क्यों ना हम खुद सरकार को कहें कि आप हमारे अख़बारों का सर्कुलेशन जाँच करें हम आरएनआई और सरकार को चैलेंज करे कि आइये हमारा सर्कुलेशन चेक कीजिये, और जाँच के बाद हमारा जितना भी सर्कुलेशन हो उसके आधार पर हमें विज्ञापन के लिये सूचिबद्ध करें। लीपा इस शक्ति के साथ सरकार पर दबाव बनायेगी कि जब एक अखबार ईमानदारी से चल रहा है और आपने उसका सर्कुलेशन चेक कर लिया तब आप उस अखबार को बिना किसी अनावश्यक कागजी कार्यवाही के डीएवीपी में सूचिबद्ध किजिये, अच्छा विज्ञापन रेट दिजिये, दलालों को खत्म कीजिये। परन्तु साथियों ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस मामले में बिल्कुल पाक-साफ है इस नीति के अंदर दो-तीन खामियां ऐसी है जिससे साफ पता चलता है कि सरकार और सरकार में बैठे लोगों ने रीजनल मीडिया को सिर्फ एक ही नजरिये से देखकर इस नीति को बनाया है। उन्होंने ये मान लिया है कि रीजनल मीडिया में जितने भी अखबार छपते हैं वो सभी फर्जी है और ये मान कर इस नीति को बनाया है। नई नीति के दो-तीन बिन्दुओं से ये साफ पता चलता है कि ऐसे लोग इस विषय पर कितने अज्ञानी है, अव्यवहारिक है।
मसलन विविधता से भरे इस देश में क्या हम सिर्फ 3 न्यूज एजेन्सी के भरोसे अखबारों को चला सकते हैं? क्या हम किसी अखबार को बाध्य कर सकते की उसको फ़लां न्यूज एजेन्सी से ही खबर लेनी होगी। ये सरकार की अज्ञानता, अव्यवहारिकता दिखाती है। दूसरा बिन्दू, सबके लिए प्रिंटिंग मशीन होना अनिवार्य कर दिया गया लेकिन यदि मेरा सर्कुलेशन 45000 है और मेरी मासिक पत्रिका है या मेरा 35 हजार सर्कुलेशन है और मेरा अखबार पाक्षिक है तो मुझे क्या जरूरत है प्रिंटिंग मशीन की? सरकार ने बिना समझे प्रिंटिंग मशीन को सबके लिये आधार बना दिया। तीसरा विरोध का घोर का बिन्दू है कि एक अखबार को सूचीबद्ध कराने के लिए अब 36 महीने का इंतजार करना होगा। पहले भी यही अवधि थी लेकिन पिछली सरकार ने इसे घटाकर 18 महीने किया था।
मुझे समझ नहीं आया कि इस अवधि को बढ़ा कर 36 महीने करने का क्या तर्क है? क्या सरकार चाहती है कि एक अखबार पहले अपने घरबार को गिरवी रखकर चले और चल कर खत्म हो जाए। सब जानते हैं कि एक अखबार का बिना व्यवसायिक घराने की सपोर्ट या सरकारी विज्ञापन के इतने लंबे समय चलना बेहद कठिन कार्य है। अगर आपके मापदंड पूरे करते हुए एक अखबार ने ये 18 महीने पूरे कर लिए तो आप उसको क्यू नहीं सूचीबद्ध कर सकते? उसको 36 महीने तक मरने के लिए क्यों छोड रहे हैं? क्या सरकार क्षेत्रीय समाचारपत्रों की हत्या करना चाहती है? क्या सरकार मीडिया को मैनेज करना चाहती है? कुल मिलाकर के लीपा का स्पष्ट रूख है विज्ञापन नीति के अंदर जो खामियां है उसको लीपा बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करगी।
नई नीति के इन बिन्दुओं का लीपा घोर विरोध करती है और ये पूरे साहस के साथ कहती है कि जब तक विज्ञापन नीति की यह कमियां ठीक नहीं होंगी लीपा चैन से नहीं बैठेगी। हो सकता है कि मेरा लेख पढ़ने के बाद आप लीपा के बारे आपकी सोच नकारात्मक हो जाये, लेकिन मेरे साथी मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि “लीड इंडिया ग्रुप” के अखबार ने आज तक सरकार से एक भी विज्ञापन नहीं लिया है, हमने अपने हित को त्याग कर अपने ऑफिस और एसोसिएशन को चलाने का संकल्प लिया। हम आज ऑनलाइन मीडियम और लिमिटेड प्रिंट से यह सब कर रहे है। ऑनलाइन मीडियम के माध्यम से हमने वहां अपनी ताकत से बड़ॆ-बड़े लोगो से लड़कर कर दिखाया है।
आप भी यह कर सकते हैं एक बार उस दिशा में देखें तो सही। अंत में आप सबसे कहना चाहूँगा कि पॉइंट सिस्टम को लेकर फार्म भरने की जो अंतिम तरीख है उससे डरने कि जरुरत नहीं है आप30 अगस्त तक इंतजार करें उसके पहले घोषणा होने की सम्भावना है अन्यथा अंतिम तारीख फिर बढ़ाई जायेगी और इतना आपको पूरे दृढ संकल्प के साथ आश्वस्त करना चाहूँगा कि इस पॉलिसी में जो अन्यायपूर्ण और मूर्खतापूर्ण बातें है उनको हटाने के लिये लीपा हर स्तर पर संघर्ष करेगी।
आपका साथी
सुभाष सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्षलीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन


रविवार, 17 जून 2018

संघ ही बनेगा तारणहार



            
  
उपचुनावों में लगातार अपनी जीती हुई सीटें गवांने के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं को समझ में आने लगा है कि उनका विजय रथ न मोदी के चमत्कार से संचालित था और न अमित शाह की रणनीतिक कुशलता से। संघ और भाजपा के समर्पित कार्यकर्त्ताओं की सक्रियता और आम जनता की आकांक्षाओं का लाभ भाजपा को मिल रहा था। शाह कार्यकर्त्ताओं की लगातार उपेक्षा करते रहे। उनसे जरखरीद गुलामों की तरह व्यवहार करने लगे। इधर नोटबंदी और जीएसटी की मार से बौखलाए देशवासियों का भी मोदी सरकार के प्रति मोहभंग होता गया। सरकार जनता के जख्मों पर मलहम लगाने की जगह बेतूकी दलीलें देती रही। मंत्रीगण गुस्सा भड़काने वाले बयान जारी करते रहे। शाह तो खैर खुद को बादशाह और चाणक्य के साक्षात अवतार समझने लगे। लोगों को यह समझाया जाता रहा कि उनका कोई विकल्प नहीं है। वे जो कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। तकलीफ हो रही है तो बर्दाश्त करें। जीडीपी और तरह-तरह की आंकड़ेबाजी के जरिए बताया जाता रहा कि भारत सबसे तेज़ अर्थ व्यवस्था बन चुका है। रोज कमाने-खाने वालों को भला इन आंकड़ो से क्या मतलब। उसे तो अपनी रोजी-रोटी पर भी संकट मंडराता दिखा। जीडीपी बढ़ने या घटने से से क्या अंतर पड़ता है।
इसी बीच विपक्षी दलों की एकता एक नई चुनौती के रूप में सामने आई। जनता को मोदीराज से छुटकारा पाने का रास्ता दिखाई पड़ने लगा। अपने अहंकारी स्वभाव और खुशफहमियों का ही भाजपा को खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। शाह और मोदी को अब समझ में आ रहा है कि राजनीतिक दल स्कूल नहीं होते जो हेडमास्टर की छड़ी से नियंत्रित होते हों। कार्यकर्त्ताओं की पहुंच अगर नेता तक नहीं होगी। पार्टी के अंदर उनकी भावनाओं की कद्र नहीं की जाएगी तो वे उदासीन होते जाएंगे। देशवासी जिस तरह अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से बेहतर काम की उम्मीद करते हैं उसी तरह क्षेत्र के लोग सत्तारुढ़ दल के कार्यकर्त्ताओं से अपनी समस्याओं के निदान की उम्मीद रखते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि उनकी पहुंच ऊपर के नेताओं तक नहीं है। पार्टी अध्यक्ष और मंत्री-संतरी उन्हें मिलने का समय ही नहीं देते तो उनको तरजीह देना बंद कर देते हैं। ऐसे में कार्यकर्त्ता वोटरों से किस मुंह से वोट मांगें। मोदी का चमत्कार यहीं फेल हो जाता है।
अब जो स्थिति उत्पन्न हुई है उससे भाजपा से कहीं ज्यादा चिंतित संघ है। संघ के लोग मोदी और शाह की जोड़ी को समय-समय पर सचेत करते रहे हैं। उनकी नीतियों की समीक्षा कर उन्हें संभावित परिणाम से आगाह करते रहे हैं लेकिन उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जब मामला फंसता नज़र आ रहा है तो संघ ही चुनावी वैतरणी पार कराने वाला दिखाई दे रहा है। संघ और भाजपा नेतृत्व के बीच लगातार मंथन चल रहा है। कार्यकर्त्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए चौपाल लगाने के अलावा हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। संघ ने विपक्षी एकता के चक्रव्यूह को तोड़ने और भाजपा की स्थिति मजबूत करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिर भी 2014 के परिणामों तक पहुंचना संभव नहीं दिख रहा है। चार वर्षों से अधिक अवधि तक आम जनजीवन को तरह-तरह की परेशानियों में झोंकने के बाद डैमेज कंट्रोल में सरकार जितना विलंब करेगी परिणाम उतना ही विपरीत आएगा। भारत की जनता चीजों का चुपचाप निरीक्षण करती रहती है और चुनाव के वक्त अपना फैसला सुना देती है। ईवीएम का तिलस्म भी तभी चलता है जब जनता का व्यापक समर्थन हो। बिहार में लालू प्रसाद बैलेट बाक्स से जिन्न निकालते थे लोकिन जब समर्थन घटा तो उनका जिन्न भी चिराग के अंदर समा गया। अब लाख घिसने पर प्रकट नहीं हुआ। सरकारी तंत्र का लाभ भी अनुकूल स्थितियों में ही मिलता है। कर्नाटक में राज्यपाल ने पूरा साथ दिया लेकिन भाजपा की सरकार नहीं बनवा सके। लिहाजा मोदी और शाह को खुशफहमियों की चहारदीवारी से बाहर निकलकर धरातल पर आना होगा और जनता से वादा करना होगा कि अर्थ व्यवस्था में सुधार के नाम पर ऐसे प्रयोग नहीं करेंगे जिससे लोगों की परेशानी बढ़े और नतीजा शून्य निकले। अगर प्रयोग करने भी हों तो जाने-माने अर्थ शास्त्रियों से परामर्श कर, पूरा होमवर्क करके, उसका ब्लू प्रिंट तैयार करने के बाद ही करें। उसके तात्कालिक और दीर्धकालीन प्रभावों पर मंथन कर लें। लोग मोदी की आर्थिक नीतियों के कारण ही नाराज हैं और विकल्प की तलाश कर रहे हैं। कांग्रेस के विकल्प में उन्होंने जिसे चुना अब उसके भी विकल्प की तलाश करनी पड़ रही है। सरकार ने न कार्यकर्त्ताओं की भावनाओं की कद्र की न जन भावनाओं को समझने की कोशिश की। नतीजा सामने है। अब संघ ही भाजपा के अस्तित्व पर मंडराते संकट को दूर करने का रास्ता निकाल सकता है।
-देवेंद्र गौतम

बुधवार, 13 जून 2018

लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ



देवेंद्र गौतम

रेलवे बोर्ड ने इस वर्ष विभिन्न जोनों में 10,000 पद समाप्त करने का निर्णय लिया है। इन्हें बेकार और अनुपयोगी करार दिया है। यह पीएम मोदी के हर वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन करने के वायदे के विपरीत है। हर सेक्टर में आर्थिक सुधार के नाम पर ले गए निर्णयों और प्रयोगों के कारण लोगों का रोजगार छिना है।
मोदी सरकार कहती है कि इन प्रयोगों का मीठा और सुखद फल भविष्य में मिलेगा। यह भविष्य कितने वर्षों के बाद आएगा। आएगा भी या नहीं पता नहीं। फिलहाल यह झूठी दिलासा देने की कवायद प्रतीत होता है। जो वर्तमान को नहीं सुधार सकते वे भविष्य सुधारने की बात करें तो हास्यास्पद लगता है। फिर बेढंगे तरीके से काम करने वाले दूरगामी लक्ष्य का भेदन कैसे कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नोटबंदी के उपरांत जब देखा कि 86 फीसद करेंसी को रद्द करने के बाद वैकल्पिक करेंसी तैयार नहीं है तो कैशलेस होने का आह्वान किया। इसके बाद अपनी कैशलेस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए आधार कार्ड से तमाम चीजों को जोड़ने का अभियान चलाया।
उस समय सरकार को लगता था कि इन प्रयोगों के कारण इंटरनेट पर जो दबाव पड़ेगा उसकी भरपाई जियो के 4 जी से हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बैंकिंग और इंटरनेट पर निर्भर दूसरी सेवाओं में सर्वर डाउन होने की समस्या बढ़ने लगी। अमेरिकी जीवन शैली की नकल करने में अपनी सीमाओं की सही पड़ताल नहीं की गई। नोटबंदी के जिन लाभों का दावा किया गया था वह नहीं मिले तो कहा जाने लगा कि इसका दूरगामी लाभ मिलेगा। लोगों ने नोटबंदी की पीड़ा से जरा राहत पाई, नकदी की किल्लत कुछ दूर हुई तो साहब ने जीएसटी लागू कर आर्थिक सुधारों के प्रति अपने संकल्प का लोहा मनवाने का कोशिश की। सर्वर ठीक ढंग से काम नहीं करने के कारण व्यापारियों का जीएसटी जमा करने में विलंब होता तो हर्जाना वसूल किया जाता। इस तरह के प्रयोगों से जनता परेशान हो उठी। टैक्स की वसूली में कड़ाई की सरकारी कोशिश के कारण देश में कैशलेस होने की जगह कैश पर निर्भरता बढ़ने लगी। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के समय से कई लाख करोड़ से ज्यादा की नकदी अभी प्रचलन में है। समाज को जिस दिशा में ले चलने की कोशिश हुई उसकी विपरीत दिशा में यात्रा होने लगी।
यह सरकार जो बोलती है उसका उल्टा हो जाता है। दो करोड़ रोजगार सृजन का वादा किया तो लोगों का रोजगार छिनने लगा। दरअसल बेरोजगारी मात्र समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय अभिशाप है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें इस समस्या को किसी न किसी रूप में बनाए रखती हैं। क्योंकि बेरोजगार न हों तो व्यस्था में कोई रौनक ही नहीं रह जाएगी। दरअसल लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा खूब होती है लेकिन सच्चाई यह है कि इसका एक पांचवा स्तंभ भी है। इस पांचवे स्तंभ का दारोमदार युवा बेरोजगारों पर हैं। चाहे  वे साक्षर हों या निरक्षर, ग्राणीण हों या शहरी, कुशल हों अथवा अकुशल। यदि वे न हों तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही बेरौनक हो जाएगी। इस व्यवस्था को टिकाए रखने में उनका अहम योगदान होता है। बेरोजगारों की यह जमात दुनिया के लगभग हर देश में कमोबेश मौजूद है। उनका प्रतिशत जरूर घटता बढ़ता रहता है। सत्तारुढ़ दल हो चाहे विपक्षी सभी बेरोजगारी दूर करने का नारा देते हैं, संकल्प लेते हैं, लेकिन इसे बरकरार रखना उनका गुप्त एजेंडा होता है। खासतौर पर उन देशों में जहां संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है और हर पांच साल पर चुनाव का सामना करना पड़ता है। बेरोजगार ही नहीं होंगे तो चुनावों में कार्यकर्ता कहां से आएंगे। राजनीतिक कार्यक्रमों में भीड़ कहां से जुटेगी। वही तो हैं जो कल-पुर्जे के समान कहीं भी फिट होने को सहर्ष तैयार रहते हैं। गनीमत है कि भारत इस मामले में धनी है। यहां कुल आबादी के 11 फीसद बेरोजगार हैं। उनकी संख्या 12 करोड़ से भी अधिक है। 125 करोड़ की आबादी में उनका यह अनुपात सही है। यही नहीं करोड़ों की संख्या में मौजूद अल्प बेरोजगार उन्हें और मजबूती प्रदान करते हैं। मोदी सरकार इस समुदाय की ताकत और उसकी पीड़ा को समझती थी। इसीलिए सत्ता तक पहुंचने के लिए उनके मुद्दे को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया। मोदी जी ने अपने चुनावी भाषणों में वादा किया कि चुनाव जीते और सत्ता में आए तो हर वर्ष कम से कम दो करोड़ रोजगार का सृजन करेंगे। युवा बेरोजगार खुश हुए। उनके चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन नेताओं के लिए कथनी और करनी में सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। सत्ता में आने के बाद हुआ यह कि आर्थिक सुधार का एजेंडा प्रमुख हो गया। तरह-तरह को प्रयोग करने पड़े। इससे बेरोजगारी दर में कमी की जगह वृद्धि होने लगी। इसकी दर पांच वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर जा पहुंची। मनमोहन सिंह के शासन काल के बराबर भी रोजगार सृजित नहीं हुए। भारत में 1915-16 में जहां विकास दर 7.3 फीसद पर पहुंची वहीं बेरोजगारी की दर 5 फीसद तक पहुंच गई। बाद में प्रधानमंत्री जी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह युवा बेरोजगार को पकौड़े बेचकर प्रतिदिन 200 रुपये कमाने का सुझाव देने लगे। विश्व पटल पर भारत की स्थिति मजबूत करने में इस सरकार को सफलता जरूर मिली। वैश्विक स्तर पर देश की साख मजबूत हुई। लेकिन निवेश के आश्वासन के बावजूद कोई बड़ा उद्योग सरज़मीन पर नहीं आया। पकौड़ा बेचने का मकसद दरअसल स्वरोजगार की ओर प्रेरित करना था लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अपनी बात कहने के लिए जो उदाहरण इस्तेमाल किया वह उसकी गंभीरता को हल्का कर गया। विपक्ष को आलोचना के लिए एक मुद्दा भी दे दिया। नरेंद्र मोदी या तो अपने वादे के प्रति गंभीर नहीं रहे या फिर इसके लिए सही योजना नहीं बना सके। अब पेड़ लगाते फल की उम्मीद का उदाहरण देकर लोगों को फुसलाया जा रहा है। युवा वर्ग का एक हिस्सा सब्जबाग देखकर खुशफहमी का शिकार बना हुआ है। यह तटस्थ भाव से स्थिति की समीक्षा नहीं कर पा रहा है।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

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