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रविवार, 11 नवंबर 2018

सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने का रिकार्ड रघुवर सरकार के नाम


                    स्थापना दिवस पर विशेष

झारखंड स्थापना दिवस की तैयारी बैठक को संबोधित करते मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी

देवेंद्र गौतम
रांची। रघुवर दास झारखंड के पहले नेता हैं जो मुख्यमंत्री के रूप में लगातार राज्य का पांचवां स्थापना दिवस मनाने जा रहे हैं। 18 वर्षों के झारखंड में वे झारखंड के 10 वें मुख्यमंत्री हैं। राज्य गठन के 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इतने वर्षों में पहली बार कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है। रघुवर दास इस मायने में भाग्यशाली रहे कि उन्हें बहुमत पर आधारित
एक स्थिर सरकार मिली। हालांकि पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री होने के नाते उनके समक्ष जनता का विश्वास जीतने की गंभीर चुनौती थी। राजनेताओं की एक लाबी उनकी गतिविधियों पर तीखी नज़र गड़ाए हुए थी। उन्हें कटघरे में खड़ा करने की निरंतर कोशिशें होती रहीं। लेकिन वे पूरे धैर्य के साथ अपने काम में लगे रहे। उनके शासन काल में भ्रष्टाचार या घोटाले का कोई आरोप नहीं लगा। उनकी कुर्सी को न कभी कोई चुनौती मिली, न उन्हें सत्ता में बने रहने की चिंता करने की जरूरत पड़ी। इसीलिए उनका पूरा ध्यान विकास कार्यों की ओर केंद्रित रहा। जो कार्य पूरे हुए उनका विवरण और जो अधूरे हैं उनका कारण वे जनता से साझा भी करते रहे। कुछ महीने पूर्व बिजली की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई थी। उत्पादन और आपूर्ति के बीच संतुलन बिगड़ गया था। थर्म प्लांटों की कई यूनिटें कोयले के अभाव में बंद पड़ी थीं। लेकिन मुख्यमंत्री ने स्थिति पर काबू पा लिया और अब वे जुलाई 2019 तक निर्बाध बिजली आपूर्ति के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। अभी तक चार जिले शत-प्रतिशत विद्युतीकृत हो चुके हैं। शेष जिलों में विद्युतीकरण का काम तेजी से चल रहा है। इससे पहले जितने भी मुख्यमंत्री आए उनकी कुर्सी निरंतर डोलती रही और उनकी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा उसे बचाने में व्यय होता रहा। उन्हें समय से पूर्व गद्दी से हटना भी पड़ा। इस हिसाब से रघुवर दास लगातार सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।
      यही कारण है कि इस बार स्थापना दिवस समारोह को पहले से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ और कहीं ज्यादा भव्य तरीके से मनाया जा रहा है। 15 नवंबर की की शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम में झारखंड की जनता फिल्मी दुनिया के मशहूर गायक सुरेश वाडकर और गायिका कविता कृष्णमूर्ति की सुरीली आवाज सुनेगी। वहीं जिला स्तर पर भी असम का बिहू नृत्य, बिहार की कजरी, गुजरात का डांडिया और बंगाल के कलाकारों की कला का प्रदर्शन होगा। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग मुख्य समारोह में ग्रामीण विद्युतीकरण और खुले में शौच से मुक्त होने की दिशा में मिली उपलब्धियों पर लघु फिल्म प्रदर्शित करने जा रहा है। वहीं 13 से 15 नवंबर तक सरकारी भवनों और महत्वपूर्ण चौक-चौराहों पर आकर्षक विद्युत साज-सज्जा की जा रही है। समारोह स्थल पर निर्बाध विद्युत आपूर्ति, ध्वनि विस्तारक यंत्र, पेयजल की व्यवस्था, शौचालय की समुचित व्यवस्था, चिकित्सीय व्यवस्था आदि की जिम्मेवारी संबंधित विभागों के लोग उठाएंगे। इसके अलावा योग्य व्यक्तियों को झारखंड सम्मान से नवाजा जाएगा। साथ ही विभागवार शिलान्यास और लोकार्पण वाली योजनाओं की प्रकृति तय की गई। इसके साथ नव चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र, लाभुकों के बीच परिसंपत्ति का वितरण, कृषि विभाग द्वारा किसानों पर केंद्रित कार्यक्रमों, शत प्रतिशत विद्युतीकृत होनेवाले जिले और पूरे राज्य को खुले में शौचमुक्त घोषित करने की तैयारियों की गई हैं। स्थापना दिवस की सुबह प्रभातफेरी निकाली जाएगी। इस मौके पर मुख्यमंत्री आमंत्रण फुटबॉल प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा।
इस मौके पर सचिवालयों के गलियारे की सूनी दीवारें गुलजार होंगी। जिस गलियारे में जिस विभाग का दफ्तर होगा, वहां उस विभाग से जुड़ी परियोजना और कार्यक्रमों की फ्रेम की गई तस्वीरें लगाई जाएंगी। इससे गलियारे से गुजरनेवालों के सामने उस विभाग के काम-काज और उपलब्धियां मुखर हो उठेंगी। मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी आयोजन की तैयारी का स्वयं जायजा ले रहे हैं। उन्होंने विभागीय सचिवों को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से समन्वय कर इसे अमलीजामा पहनाने का निर्देश दिया।
स्थापना दिवस समारोह के इस जोशो-खरोश की एक वजह यह भी है कि वर्ष 2000 में झारखंड अलग राज्य बनने के बाद 2014 तक लगातार सूबे में राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा। इस बीच दस बार मुख्यमंत्री बदले गए। तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगाया गया। सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड शिबू सोरेन के नाम रहा। 2005 में वे मात्र 2 मार्च से 12 मार्च तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे थे। बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया था।
इस स्थापना दिवस पर रघुवर सरकार एक हज़ार योजनाओं का शिलान्यास करने वाली है। एक हज़ार खुले में शौच से मुक्त पंचायतों की घोषणा की जाने वाली है। सरकार की 101 उपलब्धियों का पत्रक भी जारी किया जाने वाला है।
2014 में रघुवर दास की सरकार सत्ता में आई थी, तब राज्य की विकास दर करीब 4.6 फीसदी थी। अब यह दहाई का आंकड़ा छूने को है। इसी तरह 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' के मामले में झारखंड देश में तीसरे नंबर पर है। इसी आधार पर निवेश हो रहे हैं। ज़ाहिर है कि रघुवर सरकार तेजी से विकास का दावा करने की स्थिति में हैं।

बाक्स
अब तक के मुख्यमंत्री

15 नवम्बर 2000 से 18 मार्च 2003, बाबूलाल मरांडी, भाजपा
18 मार्च 2003 से 2 मार्च 2005, अर्जुन मुंडा, भाजपा
2 मार्च 2005 से 12 मार्च 2005, शिबू सोरेन, झामुमो
12 मार्च 2005 से 18 सितंबर 2006, अर्जुन मुंडा, भाजपा
18 सितंबर 2006 से 28 अगस्त 2008, मधु कोडा, निर्दलीय
28 अगस्त 2008 से 18 जनवरी 2009, शिबू सोरेन, झामुमो
19 जनवरी 2009 से 29 दिसम्बर 2009, राष्ट्रपति शासन
30 दिसम्बर 2009 से 31 मई 2010, शिबू सोरेन, झामुमो
1 जून 2010 से 10 सितम्बर 2010, राष्ट्रपति शासन
11 सितम्बर 2010 से 18 जनवरी 2013, अर्जुन मुंडा, भारतीय जनता पार्टी
18 जनवरी 2013 से 13 जुलाई 2013 राष्ट्रपति शासन
13 जुलाई 2013 से 23 दिसम्बर 2014, हेमंत सोरेन, झारखंड मुक्ति मोर्चा
28 दिसम्बर 2014 से वर्तमान काल तक, रघुवर दास, भारतीय जनता पार्टी


अब तक के राज्यपाल

1. प्रभात कुमार- 15 नवंबर 2000 से 3 फरवरी 2002 तक
2. विनोदचंद्र पांडे (अतिरिक्त प्रभार)- 4 फरवरी 2002 से 14 जुलाई 2002 तक
3. एम रमा जोइस- 15 जुलाई 2002 से 11 जून 3003 तक
4. वेद मारवाह- 12 जून 2003 से 9 दिसंबर 2004 तक
5. सैय्यद सिब्ते रजी-10 दिसंबर 2004 से 25 जुलाई 2009 तक
6. के शंकरनारायण- 26 जुलाई 2009 से 21 जनवरी 2010 तक
7. एम ओ हसन फारुक मारिकार- 22 जनवरी 2010 से 3 सितंबर 2011 तक
सईद अहमद- 4 सितंबर 2011 से 18 मई 2015 तक
द्रौपदी मुर्मु-18 मई 2015 से वर्तमान तक





बुधवार, 22 अगस्त 2018

केरल की तबाही से सबक ले मानव समाज



-देवेंद्र गौतम

केरल में बाढ़ को प्राकृतिक आपदा घोषित किया जा चुका है। इसकी विभीषिका फिलहाल नियंत्रण में है। बाढ़पीड़ितों की मदद के लिए देश के तमाम राज्य ही नहीं विश्व समुदाय ने भी अपने हाथ बढ़ाए हैं। लेकिन केरल के हालात कब फिर रौद्र रूप धारण कर लेगा कहना कठिन है। प्रकृति की विनाशलीला धीरे-धीरे रौद्र रूप धारण करती जा रही है। केरल में बाढ़ की तबाही ने खंड प्रलय का दृश्य उत्पन्न कर दिया है। यह प्राकृतिक आपदा और राष्ट्रीय शोक का समय है। साथ ही सबक सीखने का अवसर भी। अगर इसके कारणों की पड़ताल कर उनका निराकरण नहीं किया गया तो आनेवाले समय में इस आपदा का विस्तार हो सकता है और सका और भी विकराल रूप उत्पन्न हो सकता है। फिलहाल औसत से 37 फीसद अधिक बारिश के पानी के साथ केरल की 41 नदियों और 80 बांधों का पानी 13 जिलों को अपने आगोश में ले चुका है। 300 से अधिक लोग काल कवलित और 3 लाख से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। 2000 से अधिक अस्थाई राहत शिविरों में लोगों को शरण लेनी पड़ी है। बिजली आपूर्ति, संचार व्यवस्था, सड़क परिवहन, रेल सेवा बाधित है। एयरोड्राम डूबे हुए हैं। हवाई सेवा भी अवरुद्ध है। हजारों घर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। 40 हजार हेक्टेयर में लगी फसलें नष्ट हो चुकी हैं। 134 पुल-पुलिया क्षतिग्रस्त हैं। 90 हजार किलोमीटर सड़कें बर्बाद हो चुकी हैं। अभी तक 21 हजार करोड़ के नुकसान का अनुमान लगाया गया है। न सिर्फ भारत के तमाम राज्य बल्कि पूरा विश्व चिंतित है। पिछले एक सौ साल का रिकार्ड टूट चुका है। आर्थिक मदद तथा राहत कार्य में योगदान के लिए कई राज्य सरकारें और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देश आगे आए हैं।
इस वर्ष का मानसून केरल ही नहीं देश के कई हिस्सों के लिए भारी पड़ा है। झारखंड, बिहार सहित अन्य राज्यों में ठनके की चपेट में आकर सैकड़ों लोग अपने प्राण गंवां चुके हैं। हजारों लोग जख्मी हो चुके हैं। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मानसून में देश के विभिन्न हिस्सों में 930 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। मानसून में ऐसी घटनाएं पहले भी होती थीं लेकिन प्रकोप का आकार और नुकसान की मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। हम विकास में तेजी लाने के चक्कर में विनाश को निमंत्रण देते जा रहे हैं।
केरल में इस स्थिति के उत्पन्न होने के कई तात्कालिक और पूर्ववर्ती कारण बताए जा रहे हैं। भूतकाल में प्रकृति के साथ निरंतर की गई छेड़छाड़ और वर्तमान की लापरवाही इस तबाही के मूल में बताई जा रही है। इस वर्ष केरल में औसत से 37 प्रतिशत अधिक बारिश हुई है और मौसम विभाग ने अभी और बारिश होने की भविष्यवाणी की है। पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि वनों की बेतहासा कटाई और पर्वत श्रृंखलाओं की बर्बादी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। एक तो बारिश ज्यादा हुई दूसरे तमिल नाडू सहित पड़ोसी राज्यों और स्वयं केरल के बांधों का पानी छोड़ दिया गया है। तबाही को कुछ कम किया जा सकता था यदि जलाशयों की क्षमता से अधिक होने पर पहले ही उनका पानी छोड़ दिया गया होता। वह समुद्र में मिल जाते। बांधों के कपाट भी ऐन उसी समय खोले गए जब सारी नदियां उफनती हुई आबादी बहुल इलाकों की ओर बढ़ने लगीं। पर्यावरण वैज्ञानिक बहुत पहले से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से हम बाज नहीं आ रहे हैं। लेकिन पर्यावरण संरक्षण को हम गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उसे एक फैशन के तहत लिया जा रहा है। सरकारी स्तर पर भी और नागरिक जीवन के स्तर पर भी। हम अपनी तबाही को स्वयं निमंत्रण दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तबाही उन जिलों में आई है जिन्हें पश्चिमी घाट के इकोलाजिकल सेंसेटिव जोन के अंतर्गत चिन्हित किया जा चुका है।
निश्चित रूप से आपदा के उपस्थित होने के बाद हमारी नींद टूटी है। राहत कार्य में तेजी लाने के प्रति सरकार भी सजग हो चुकी है और स्वयंसेवी संस्थाएं भी। भारतीय सेना की तीनों शाखाओं के अलावा केंद्र और राज्य सरकार की तमाम एजेंसियां स्थिति से निपटने में लगाई जा चुकी हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के निर्देश पर नौसेना औक तटरक्षक बलों की 400 नावें राहत कार्य में लगी हुई हैं। वायुसेना के दक्षिणी कमांड ने बाढ़ में फंसे लोगों को निकालने के लिए 22 हेलीकाप्टर और 6 छोटे विमान लगाए हैं। भारतीय सेना के कई अभियंताओं के साथ 700 से अधिक जवान बचाव कार्य में तैनात हैं। नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स दो दर्जन से अधिक टीमें तैनात हैं। स्वास्थ्य आपदा विंग बाढ़ खत्म होने के बाद संभावित रोगों के प्रकोप से निपटने की तैयारी में लगा है। झारखंड सरकार ने 5 करोड़ जबकि महाराष्ट्र ने 20 करोड़ और बिहार, गुजरात, दिल्ली पंजाब, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों ने 10-10 करोड़ की सहायता की घोषणा की है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने 500 करोड़ की वित्तीय सहायता के अलावा मृतकों के परिजनों को 3 लाख और गंभीर रूप से घायलों को 50 हजार की तत्काल मदद की घोषणा की है। गृह मंत्रालय भी 100 करोड़ की मदद दे रहा है। संयुक्त अरब अमीरात के प राष्ट्रपति ने बाढ़पीड़ितों की मदद के लिए एक कमेटी का गठन किया है।
यह तत्परता, यह चौकसी, यह सेवा भाव सराहनीय है लेकिन अगर यही भाव तबाही आने के पहले दिखाया गया होता तो इसका स्वरूप इतना विकराल नहीं होता। हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में तेजी आई है। मौसमों का चक्र असंतुलित होता जा रहा है। कभी आंधी-तूफान का प्रकोप होता है तो कहीं बाढ़ कहीं सूखे की त्रासदी। इन सबके मूल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अभाव है। समस्या सिर्फ भारत की नहीं वैश्विक है। वैश्विक स्तर पर सकी पड़ताल भी की जाती रही है। पहलकदमियां भी ली जाती रही हैं लेकिन कुल मामला बड़े-बड़े सेमिनारों का आयोजन कर विचार-विमर्श तक सीमित रह जाता है। ऐसे अवसरों पर बड़े-बड़े संकल्प लिए जाते हैं। फिर मामला जहां का तहां रह जाता है। विकसित देश विकासशील देशों पर पर्यावरण संरक्षण के लिए दबाव डालते हैं तो विकासशील देश विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण विनाश के लिए दोषी मानते हैं। पहले की तुलना में जागरुकता बढ़ी जरूर है लेकिन इसपर नियंत्रण पाने के लिए जितनी आवश्यकता है उतनी नहीं।
केरल की तबाही से यदि सबक नहीं लिया गया और से रोकने के लिए आवश्यक उपाय नहीं किए गए तो आनेवाले समय में हमें इससे भी बड़ी आपदाओं का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।


बुधवार, 13 जून 2018

अपने ही भष्मासुरों से घिरा पाक



 देवेंद्र गौतम
पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां लोकतंत्र सैनिक तानाशाही के साए में सांस लेता रहा है। एक झीना सा पर्दा है जो कई बार चेहरे सा हट गया है और परोक्ष सैनिक सत्ता तानाशाही का मुलम्मा चढाए प्रत्यक्ष सर पर सवार हो गई है। पूरी दुनिया जानती है कि वहां जनता की चुनी हुई सरकारें सेना के रिमोट से नियंत्रित होती रही हैं। सेना के जनरलों ने भारत को सबक सिखाने के लिए आतंकवादियों को पाला पोसा। उन्हें धार्मिक कट्टरता की घूंटें पिलाईं। अब उसके पाले हुए आतंकी इस्लामिक कानूनों के मुताबिक देश को चलाना चाहते हैं। 
कट्टरपंथियों के बीच आपसी अंतर्विरोध भी कम नहीं हैं। बरेलवी, अहमदिया और शिया वहाबियों से खार खाते हैं तो उन्हें खुद अलकायदा और आईएस का खौफ सताता है। जनता के अंदर उन्होंने भारत के खिलाफ इतना जहर भरा है कि आज हर पाकिस्तानी दहशतजदा है। स्थिति भयावह होती जा रही है।
दरअसल पाकिस्तान की स्थापना ही अनैतिक 'द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुई थी। 28 जनवरी, 1933 को चौधरी रहमत अली ने इंग्लैंड में 'नाऊ ऑर नेवर: आर वी लिव ऑर पेरिश फार एवर शीर्षक पैंफलेट जारी किया था। उन्होंने पाकिस्तान का नाम पेश किया था। बाद में कुछ लोग इसे इस्लाम से भी जोड़कर देखने लगे। हालांकि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के दादा हिंदू थे। खुद जिन्ना भी पश्चिमी सभ्यता में ढले नास्तिक थे। इस्लाम में जो चीजें वर्जित  हैं ऐसी तमाम चीजों का वे बेधड़क सेवन करते थे। बाद में वही द्विराष्ट्र सिद्धांत के सबसे बड़े समर्थक बन गए। लेकिन वह पाकिस्तान को कभी भी एक धार्मिक रूप से कट्टर इस्लामी मुल्क नहीं बनाना चाहते थे। इस्लामीकरण की शुरुआत जिन्ना के गुजरने के बाद हुई जब लियाकत अली ने मार्च 1949 में ऑब्जेक्टिव रिजॉल्यूशन पेश कर इस्लामिक पाकिस्तान की बुनियाद रखी। कारण यह था कि लियाकत अली सहित पाकिस्तानी संविधान सभा के अधिकांश सदस्य भारतीय इलाकों से चुने गए थे। उनका पाकिस्तान का सपना तो पूरा हो गया लेकिन वहां उन्हें बाहरी के तौर पर देखा जा रहा था। उन्हें मुहाजिर कहा जाने लगा था। पाकिस्तान के लोग उन्हें दोबारा शायद ही चुनते। संविधान सभा के भारत से आए लोग समझते थे कि इस्लामीकरण के जरिए ही पाकिस्तान में सत्ता की राजनीति पर पकड़ बनाए रखी जा सकती थी। इसीलिए इस्लामिक देश घोषित कर मुल्ला-मौलवियों की ही के वर्चस्व का रास्ता खोलना उनके लिए आवश्यक हो गया था। उन्होंने यही नीति अपनाई।

बाद में लियाकत अली की हत्या कर दी गई। इसके बाद सेना के जनरल अयूब खान ने भी कट्टरपंथी ताकतों को प्रोत्साहित किया। उनके शासन काल में 1953 में अहमदिया मुसलमानों के खिलाफ दंगे भड़के। उस दंगे में 2,000 से अधिक अहमदिया मुसलमान मारे गए और 10,000 से अधिक बेघर हो गए। हालात काबू करने लिए पंजाब में मार्शल लॉ लगाना पड़ा। इससे जनरलों को सत्ता का स्वाद लग गया और फिर उन्होंने अक्टूबर 1958 में देश पर मार्शल लॉ थोप दिया। जल्द ही पाकिस्तान इस्लाम, सेना और अमेरिकी इम्दाद पर जीनेवाला परजीवी मुल्क बनकर रह गया।

इसके बाद जब जुल्फिकार अली भुट्टो लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर सत्ता में आए तो प्रारंभ में एक उदारवादी, पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे शिक्षित कुलीन वर्ग के नेता थे। लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान पर पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने भी कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा दिया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में इस्लाम के नाम पर भीषण रक्तपात मचाया। भुट्टो ने सेना पर लोकतांत्रिक सत्ता की पकड़ बनाने की कोशिश की, पर नाकाम रहे। जुलाई, 1977 में सेना ने उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया। इस घटना को उन्हीं के नियुक्त किए  जनरल जिया उल हक ने अंजाम दिया। अप्रैल 1979 में जिया ने भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया। कट्टर इस्लामी सोच वाले जिया के आने से पाक सेना के साथ ही नागरिक समाज का भी तेजी से इस्लामीकरण हुआ। 1980 के दशक में उन्होंने आइएसआई के माध्यम से ऑपरेशन तुपाक शुरू किया। यह कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को भड़काने वाली त्रिस्तरीय कार्ययोजना थी। इसका मकसद भारत को टुकड़ों में बांटना था। इसके तहत आईएसआई ने लश्कर-ए-तोएबा जैसे छह आतंकी समूहों का गठन किया।

1980 के दशक में अफगान युद्ध ने पाकिस्तान के सियासी एवं सैन्य परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। अपने सामरिक लक्ष्यों के लिए इस्लामाबाद खुद अमेरिका की अगुआई में चल रही लड़ाई में एक पक्ष बन गया। उसका मकसद अफगानिस्तान में पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ाना था ताकि भारत के असर को कम किया जा सके। जिया ने कट्टर इस्लामी विचारधारा को प्रोत्साहन देने के साथ ही उदारवादी राजनीतिक समूहों और कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसा। पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के इस हनन पर पश्चिमी जगत भी आंखें मूंदे रहा, क्योंकि जिया अफगानिस्तान में अमेरिका के छद्म युद्ध में मददगार बने हुए थे। सोवियत संघ से लड़ाई के लिए 1980 के दशक में जिया ने जिन इस्लामी चरमपंथियों को जन्म दिया, आज वही पाकिस्तान में उन्माद फैला रहे हैं। आज का पाकिस्तान तानाशाह जनरल जिया की नीतियों की ही छाया मात्र बना हुआ है, जिसे उनके बाद बेनजीर भुट्टो एवं नवाज शरीफ ने और आगे बढ़ाया।

आज पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था लुंजपुंज हो चुकी है। हिंसा और दहशत का माहौल बना हुआ है। तमाम वैश्विक नेता उसे एक नाकाम मुल्क करार दे रहे हैं। पाकिस्तान आतंक के मोर्चे पर दोहरी नीति पर चल रहा है। एक तरफ वह आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाता है तो दूसरी तरफ तालिबान और कश्मीर में सक्रिय आतंकियों को मदद पहुंचाता है। अब अमेरिका भी उसके दोहरो चरित्र को समझ चुका है। उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य-असैन्य सहायता रोक दी है। पाकिस्तान अब साम्राज्यवादी चीन के रहमोकरम पर है जो उसे अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। पाकिस्तान में उप-राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है। बलूच, पख्तून और सिंधी लोग पंजाबियों से आजादी के लिए अपने-अपने इलाकों में संघर्षरत हैं। कहां तो उसने भारत के टुकड़े करने की साजिश रची थी और कहां खुद उसके टुकड़ों में बंटने का खतरा मंडरा रहा है। इस्लामी आतंकवाद के जिस भष्मासुर को उसने पैदा किया था अब वही उसके सर पर हाथ रखने को आतुर है।

लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ



देवेंद्र गौतम

रेलवे बोर्ड ने इस वर्ष विभिन्न जोनों में 10,000 पद समाप्त करने का निर्णय लिया है। इन्हें बेकार और अनुपयोगी करार दिया है। यह पीएम मोदी के हर वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन करने के वायदे के विपरीत है। हर सेक्टर में आर्थिक सुधार के नाम पर ले गए निर्णयों और प्रयोगों के कारण लोगों का रोजगार छिना है।
मोदी सरकार कहती है कि इन प्रयोगों का मीठा और सुखद फल भविष्य में मिलेगा। यह भविष्य कितने वर्षों के बाद आएगा। आएगा भी या नहीं पता नहीं। फिलहाल यह झूठी दिलासा देने की कवायद प्रतीत होता है। जो वर्तमान को नहीं सुधार सकते वे भविष्य सुधारने की बात करें तो हास्यास्पद लगता है। फिर बेढंगे तरीके से काम करने वाले दूरगामी लक्ष्य का भेदन कैसे कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नोटबंदी के उपरांत जब देखा कि 86 फीसद करेंसी को रद्द करने के बाद वैकल्पिक करेंसी तैयार नहीं है तो कैशलेस होने का आह्वान किया। इसके बाद अपनी कैशलेस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए आधार कार्ड से तमाम चीजों को जोड़ने का अभियान चलाया।
उस समय सरकार को लगता था कि इन प्रयोगों के कारण इंटरनेट पर जो दबाव पड़ेगा उसकी भरपाई जियो के 4 जी से हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बैंकिंग और इंटरनेट पर निर्भर दूसरी सेवाओं में सर्वर डाउन होने की समस्या बढ़ने लगी। अमेरिकी जीवन शैली की नकल करने में अपनी सीमाओं की सही पड़ताल नहीं की गई। नोटबंदी के जिन लाभों का दावा किया गया था वह नहीं मिले तो कहा जाने लगा कि इसका दूरगामी लाभ मिलेगा। लोगों ने नोटबंदी की पीड़ा से जरा राहत पाई, नकदी की किल्लत कुछ दूर हुई तो साहब ने जीएसटी लागू कर आर्थिक सुधारों के प्रति अपने संकल्प का लोहा मनवाने का कोशिश की। सर्वर ठीक ढंग से काम नहीं करने के कारण व्यापारियों का जीएसटी जमा करने में विलंब होता तो हर्जाना वसूल किया जाता। इस तरह के प्रयोगों से जनता परेशान हो उठी। टैक्स की वसूली में कड़ाई की सरकारी कोशिश के कारण देश में कैशलेस होने की जगह कैश पर निर्भरता बढ़ने लगी। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के समय से कई लाख करोड़ से ज्यादा की नकदी अभी प्रचलन में है। समाज को जिस दिशा में ले चलने की कोशिश हुई उसकी विपरीत दिशा में यात्रा होने लगी।
यह सरकार जो बोलती है उसका उल्टा हो जाता है। दो करोड़ रोजगार सृजन का वादा किया तो लोगों का रोजगार छिनने लगा। दरअसल बेरोजगारी मात्र समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय अभिशाप है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें इस समस्या को किसी न किसी रूप में बनाए रखती हैं। क्योंकि बेरोजगार न हों तो व्यस्था में कोई रौनक ही नहीं रह जाएगी। दरअसल लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा खूब होती है लेकिन सच्चाई यह है कि इसका एक पांचवा स्तंभ भी है। इस पांचवे स्तंभ का दारोमदार युवा बेरोजगारों पर हैं। चाहे  वे साक्षर हों या निरक्षर, ग्राणीण हों या शहरी, कुशल हों अथवा अकुशल। यदि वे न हों तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही बेरौनक हो जाएगी। इस व्यवस्था को टिकाए रखने में उनका अहम योगदान होता है। बेरोजगारों की यह जमात दुनिया के लगभग हर देश में कमोबेश मौजूद है। उनका प्रतिशत जरूर घटता बढ़ता रहता है। सत्तारुढ़ दल हो चाहे विपक्षी सभी बेरोजगारी दूर करने का नारा देते हैं, संकल्प लेते हैं, लेकिन इसे बरकरार रखना उनका गुप्त एजेंडा होता है। खासतौर पर उन देशों में जहां संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है और हर पांच साल पर चुनाव का सामना करना पड़ता है। बेरोजगार ही नहीं होंगे तो चुनावों में कार्यकर्ता कहां से आएंगे। राजनीतिक कार्यक्रमों में भीड़ कहां से जुटेगी। वही तो हैं जो कल-पुर्जे के समान कहीं भी फिट होने को सहर्ष तैयार रहते हैं। गनीमत है कि भारत इस मामले में धनी है। यहां कुल आबादी के 11 फीसद बेरोजगार हैं। उनकी संख्या 12 करोड़ से भी अधिक है। 125 करोड़ की आबादी में उनका यह अनुपात सही है। यही नहीं करोड़ों की संख्या में मौजूद अल्प बेरोजगार उन्हें और मजबूती प्रदान करते हैं। मोदी सरकार इस समुदाय की ताकत और उसकी पीड़ा को समझती थी। इसीलिए सत्ता तक पहुंचने के लिए उनके मुद्दे को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया। मोदी जी ने अपने चुनावी भाषणों में वादा किया कि चुनाव जीते और सत्ता में आए तो हर वर्ष कम से कम दो करोड़ रोजगार का सृजन करेंगे। युवा बेरोजगार खुश हुए। उनके चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन नेताओं के लिए कथनी और करनी में सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। सत्ता में आने के बाद हुआ यह कि आर्थिक सुधार का एजेंडा प्रमुख हो गया। तरह-तरह को प्रयोग करने पड़े। इससे बेरोजगारी दर में कमी की जगह वृद्धि होने लगी। इसकी दर पांच वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर जा पहुंची। मनमोहन सिंह के शासन काल के बराबर भी रोजगार सृजित नहीं हुए। भारत में 1915-16 में जहां विकास दर 7.3 फीसद पर पहुंची वहीं बेरोजगारी की दर 5 फीसद तक पहुंच गई। बाद में प्रधानमंत्री जी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह युवा बेरोजगार को पकौड़े बेचकर प्रतिदिन 200 रुपये कमाने का सुझाव देने लगे। विश्व पटल पर भारत की स्थिति मजबूत करने में इस सरकार को सफलता जरूर मिली। वैश्विक स्तर पर देश की साख मजबूत हुई। लेकिन निवेश के आश्वासन के बावजूद कोई बड़ा उद्योग सरज़मीन पर नहीं आया। पकौड़ा बेचने का मकसद दरअसल स्वरोजगार की ओर प्रेरित करना था लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अपनी बात कहने के लिए जो उदाहरण इस्तेमाल किया वह उसकी गंभीरता को हल्का कर गया। विपक्ष को आलोचना के लिए एक मुद्दा भी दे दिया। नरेंद्र मोदी या तो अपने वादे के प्रति गंभीर नहीं रहे या फिर इसके लिए सही योजना नहीं बना सके। अब पेड़ लगाते फल की उम्मीद का उदाहरण देकर लोगों को फुसलाया जा रहा है। युवा वर्ग का एक हिस्सा सब्जबाग देखकर खुशफहमी का शिकार बना हुआ है। यह तटस्थ भाव से स्थिति की समीक्षा नहीं कर पा रहा है।

बुधवार, 6 जून 2018

सोने की चमक से दमकता झारखंड

देवेंद्र गौतम


झारखंड में सोने की दो खानें पहले से चल रही हैं लेकिन नए स्वर्ण भंडारों का पता लगने के बाद यह कर्नाटक के बाद सोने की मौजूदगी के मामले में देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन चुका है।
देवेंद्र गौतम
रांची। रांची से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है तमाड़ प्रखंड का परासी गांव। इस नक्सल प्रभावित आदिवासी बहुल गांव में सोने की खदान खुल रही है। जल्द ही वहां की धरती सचमुच का सोना उगलने लगेगी। 1 नवंबर को ग्लोबल माइंस समिट के मौके पर निजी क्षेत्र की खनन कंपनी रुंगटा माइंस को राज्य सरकार ने इसके लिए 69.24 एकड़ का भूखंड आवंटित किया। इसके साथ ही झारखंड कर्नाटक के बाद स्वर्ण खदान आवंटित करने वाला देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया। पिछले दो वर्षों से इस इस स्वर्ण ब्लाक की नीलामी की प्रक्रिया चल रही थी। सिर्फ तीन कंपनियां इसके लिए आगे आई थीं। बाद में रुंगटा माइंस और वेदांता कंपनी ही नीलामी में शामिल हुईं। रुंगटा कंपनी इसमें सफल रही। उसे गोल्ड ब्लाक मिल गया।
कुछ वर्ष पूर्व परासी के किसान जब खेत जोतते थे तो उन्हें मिट्टी के अंदर सोने के कण मिलते थे। ग्रामी लोग इसे दैवी आशीर्वाद समझते थे। बाद में जब जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया ने सर्वेक्षण किया तो पता चला कि वहां जमीन के अंदर 80 लाख टन स्वर्ण खनिज का भंडार है। यह सोना अत्यंत उच्च गुणवत्ता का है। झारखंड सरकार को इस खदान से 1280 करोड़ रुपयों की आय की उम्मीद है। जियोलाजिकल सर्वे ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि झारखंड में इसके अतिरिक्त पांच और सोने के भंडार हैं। इनमें तीन तमाड़ में और दो जमशेदपुर में हैं। सिंहभूम के दलमा पर्वतमाला में ज्वालामुखी फटने से यह सोना ऊपर आया है। जियोलाजिकल सर्वे के अधिकारी पिछले 15 वर्षों से इसपर काम कर रहे थे। इस तरह रांची जिले में कुबासाल, सोना पेट, जारगो और सेरेंगडीह तथा खरसावां के जियलगेड़ा में स्वर्ण भंडारों की मौजूदगी की प्रारंभिक पुष्टि हो चुकी है। चट्टानों के ऊपरी नमूनों की जांच से स्वर्ण भंडारों की ठोस संभावना बनी है। जियोलाजिकल सर्वे ने केंद्र सरकार को इनके गहन सर्वेक्षण का प्रस्ताव भेजा है। यह सारे कोल ब्लाक रांची टाटा रोड के आसपास के इलाकों में हैं। केंद्र सरकार जब प्रस्ताव को मंजूरी दे देगी तो सबसे पहले चिन्हित स्थलों की केमिकल मैपिंग होगी। इससे सोने की मात्रा का पता चलेगा। साथ ही उसके खनन की तकनीक का अंदाजा लगाया जा सकेगा। इसके बाद थिमेटिक मैपिंग होगी। इससे पता चलेगा स्वर्ण भंडार कितनी गहराई में है। उसकी मात्रा क्या है और गुणवत्ता कैसी है। सरकार की मंजूरी के बाद जियोलाजिकल सर्वे को इस कार्य में कम से कम दो साल लग जाएंगे। इसके बाद इनकी नीलामी की प्रक्रिया शुरू होगी।
झारखंड में सोने की दो पुरानी खदानें जमशेदपुर के कुंदरकोचा और लावा में हैं। इनमें खनन कार्य चल रहा है। सरायकेला-खरसावां के पड़डीहा और रांची के परासी माइंस की नीलामी हो चुकी है। इनमें खनन कार्य शुरू करने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है। जमशेदपुर के भितरडाही माइंस की पहले ही खोज हो चुकी है। इसके अलावा घाटशिला की पहाड़ियों में, स्वर्णरेखा नदी की रेत में सोना मौजूद है लेकिन उनका उत्खनन काफी खर्चीला है। उनमें कमर्शियल माइमिंग संभव नहीं है। कुछ ग्रामीण इसके कणों को इकट्ठा कर रोजी-रोटी का जुगाड़ कर लेते हैं।
आमतौर पर एक टन खनिज से एक ग्राम शुद्ध सोना प्राप्त होता है। इससे अधिक मात्रा भी हो सकती है। इतना तय है कि सभी स्वर्ण ब्लाकों में उत्खनन कार्य शुरू हो जाएगा तो कोई हैरत नहीं अगर स्वर्ण उत्पादन के मामले में झारखंड देश का अग्रणी राज्य बन जाए।

रविवार, 7 अगस्त 2011

नक्सलवाद..आतंकवाद और ड्रग माफिया

 दंतेवाडा कांड के बाद लम्बे समय तक चुप्पी साधे केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की भृकुटी फिर तनी दिखने लगी है. उन्होंने माओवादियों के विरुद्ध एक बड़ा अभियान चलने की तैयारी के संकेत दिए हैं. ऑपरेशन ग्रीन हंट की कमियों की उन्होंने किस हद तक समीक्षा की है और उन्हें दूर करने के क्या उपाय किये हैं. सूचना तंत्र कितनी मजबूत हुई है  यह तो पता नहीं लेकिन माओवादियों की ताक़त पहले से और बढ़ गयी है. इसका संकेत हाल के दिनों में उनकी गतिविधियों से जरूर मिला है. खनन क्षेत्रों में उनके आर्थिक स्रोत और मजबूत हुए हैं. स्थितियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गयी हैं. गृह मंत्रालय के पास ख़ुफ़िया संस्थानों की रिपोर्ट क्या कहती है यह तो पता नहीं लेकिन देश में अभी काले धन पर आधारित जो तंत्र  चल रहा है अपने प्रभाव क्षेत्रों में माओवादी उसका एक अहम हिस्सा बन चुके हैं.

सोमवार, 11 जुलाई 2011

झारखंड: विलुप्त हो चली हैं ये आदिम जनजातियां

झारखंड के अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आये 11 साल हो गए. इस बीच जितनी भी सरकारें बनीं उनमें मुख्यमंत्री का पद आदिवासियों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित रखा गया. लेकिन सरकार की कृपादृष्टि उन्हीं जजतियों की और रही जो वोट बैंक बनने की हैसियत रखते थे.  झारखंड की उन नौ आदिम जनजातियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया जिनका अस्तित्व आज खतरे में है. उनकी जनसंख्या में ह्रास होता जा रहा है. मृत्यु दर में वृद्धि और जन्म दर में कमी के कारण ऐसा हो रहा है. भूख, कुपोषण और संक्रामक रोगों के कारण उनके यहां अकाल मौत के साये मंडराते रहते हैं. अशिक्षा, गरीबी और रोजगार के अवसरों का अभाव उनकी नियति बन चुकी है. वे आज भी जंगलों पहाड़ों के बीच पर्णकुटी बनाकर आदिम युग की मान्यताओं के बीच रह रहे हैं. भूत-प्रेत, ओझा-डायन बिसाही में अभी भी उनका गहरा विश्वास है. बीमार होने पर वे अस्पताल में नहीं बल्कि अपने इलाके के ओझा-सोखा की शरण में जाते हैं.




उनके इलाके में टीबी, मलेरिया, डायरिया, हैजा, कुष्ठ आदि रोगों का भीषण  प्रकोप है. यह कोई नयी परिघटना नहीं है. झारखंड के मानवशास्त्री कई दशकों से उनके अस्तित्व पर मंडराते खतरे के प्रति आगाह करते आ रहे हैं. उनके संरक्षण के लिए हर बजट में अरबों की राशि का प्रावधान किया जाता है. कई कल्याणकारी योजनायें चलाई जाती हैं लेकिन उनतक पहुंचते-पहुंचते सुविधाएं इतनी संकुचित हो जाती हैं कि उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पाता. झारखंड राज्य के गठन के बाद भी इन्हें कोई लाभ नहीं हुआ. आदिवासी मुख्यमंत्री का मिथक तो इनके नाम पर रचा गया लेकिन लाभ आदिवासियों की सामाजिक आर्थिक रूप से विकसित जातियों के मलाईदार तबके ने उठाया.
            2001 की जनगणना के मुताबिक हिल पहाड़िया जनजाति की कुल आबादी मात्र 1625  रह गयी है. सावर पहाड़िया 9946  की संख्या में है. असुर, विरिजिया और विरहोर जाति की भी यही हालत है. उनकी आबादी चार अंकों में ही सिमटी है. कोरवा, माल पहाड़िया, पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया आदि की आबादी जरूर पांच अंकों में है लेकिन उसमें तेजी से गिरावट आ रही है.इन नौ जनजातियों की कुल आबादी एक लाख 94  हजार आंकी जाती है. विडंबना यह है कि इन जातियों के लोग 50 वर्ष की आयु भी पार नहीं कर पाते. संतुलित आहार के अभाव में कुपोषण का शिकार हो जाते हैं. इनकी उत्पादन क्षमता में भी काफी कमी आ गयी है. सुरक्षित प्रसूति की सुविधा नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की मौत भी आम बात है.
             असुर जनजाति के लोग गुमला और दुमका जिले में निवास करते हैं. लौह अयस्क से लोहा बनाना उनकी आजीविका का पारंपरिक साधन रहा है. लोहे के औजार बनाने में इस जनजाति को महारत हासिल है. लेकिन उनके उत्पाद के खरीदार कम रह गए हैं. छोटे किसान भी बड़े कारखानों में निर्मित औजार खरीदना पसंद करते हैं. नतीजतन पुश्तैनी धंधे से उनका पेट नहीं भर पता. खेती लायक ज़मीन भी इनके पास नाममात्र की है.दैनिक मजदूरी का मिल गयी तोदो जून की रोटी का जुगाड़ हुआ वर्ना फाकाकशी के अलावा रास्ता नहीं. सरकार चाहती तो उन्हें पारंपरिक कौशल के उत्पाद तैयार करने के लिए आवश्यक सुविधाए प्रदान कर उनके लिए बाजार उपलब्ध कराती लेकिन वे कोई वोट बैंक तो नहीं कि उनकी चिंता की जाये. बिरिजिया जनजाति के लोग लोहरदगा, गुमला और लातेहार के इलाकों में पाए जाते हैं. बिरहोर जनजाति के लोग सूबे के विभिन्न जिलों के पहाड़ों जंगलों के आसपास छोटे-छोटे समूहों में रहते हैं. यह शिकारी श्रेणी की जनजाति है. जंगली जानवरों का शिकार करना इनका पुश्तैनी व्यवसाय रहा है. रस्सी बुनने कि कला भी इन्हें विरासत में मिली है. इनके उत्थान के लिए कई योजनायें बनीं लेकिन इनकी जगह नौकरशाहों और दलालों का उत्थान हुआ. पहाड़िया जनजाति संथाल परगना के इलाकों में रहती है. यह आज भी टोने-टोटके के आदिम विश्वास के बीच जीती है. इनमें शिक्षा का घोर अभाव है.
             विलुप्ति के कगार पर खड़ी इन जनजातियों के पुनर्वास के लिए राज्य गठन के बाद बिरसा मुंडा आवास योजना के तहत १२,५३६ आवास बनाने का निर्णय हुआ था लेकिन यह योजना अभी तक अधूरी है. लकड़ी तस्कर और जंगल माफिया उनका भरपूर शोषण करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र शोषकों के ही साथ खड़ा रहता है. विश्व के सभी देशों में मानव आबादी बढ़ रही है लेकिन झारखंड में कुछ जजतियां विलुप्ति का संकट झेल रही हैं. यही विडंबना है.
            झारखंड में अबतक की बनी सरकारें कुर्सी की बाधा दौड़ में ही उलझी रही हैं. कोई बहुमत की सरकार बने तो शायद इनके दिन भी फिरें वरना पाठ्य पुस्तकों के एक अध्याय के सिमट जाना ही इनकी नियति है.

-----------देवेंद्र गौतम

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मियां की जूती मियां के सर

इसे कहते हैं मियां की जूती मियां के सर. झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान आदिवासियों के दिशोम गुरु शिबू सोरेन का अपना ही बयान उनके लिए घातक सिद्ध हुआ. सिर्फ गरीबों के आशियाने उजाड़े जाने से क्षुब्ध होकर उन्होंने कहा कि ताक़तवर और रसूखदारों के आवास भी खाली कराये जायें. इसपर बोकारो इस्पात प्रबंधन ने अपने आवासीय क्षेत्र में स्थित उनके भाई लालू सोरेन और दिवंगत पुत्र दुर्गा सोरेन के आवास को खाली करा दिया. अब स्वयं शिबू सोरेन के आवास की बारी है. उन्होंने सिर्फ बोकारो स्टील के आवास ही नहीं बल्कि उसके आसपास के 4-5 एकड़ खाली ज़मीं को भी खेती और गौपालन के लिए घेर रखा है. अब वे प्रबंधन पर कोई दबाव भी नहीं डाल सकते क्योंकि वह तो उन्हीं के आदेश का पालन कर रहा है. यदि वे अपने रुतबे का इस्तेमाल करते हैं तो आम जनता के बीच गलत संदेश जायेगा. 
      झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो और झारखंड राज्य समन्वय समिति के अध्यक्ष शिबू सोरेन का परिवार झारखंड के सबसे रसूखदार राजनैतिक घरानों में गिना जाता है. उनके पुत्र हेमंत सोरेन अभी राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं. पुत्रवधु सीता सोरेन विधायक हैं. बोकारो इस्पात प्रबंधन को कभी उम्मीद ही नहीं थी कि इस परिवार के लोगों से आवास खाली कराये जा सकेंगे. 
       पिछले करीब दो महीने से हाई कोर्ट के आदेश पर पूरे झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जा रहा है. सत्ता में बैठे लोग इसे अमानवीय बता रहे हैं. उजड़े लोगों के पुनर्वास की बात कर रहे हैं. लेकिन इसके प्रति उनकी गंभीरता संदिग्ध दिखती है. अब वे इसके लिए विधानसभा में अध्यादेश लाने की बात कर रहे हैं. जबकि सरकार के पास जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास योजना के हजारों करोड़ रुपये अनुपयोगी हालत में पड़े हुए हैं. इस योजना में स्लम बस्तियों के लोगों को शहर के बाहर बसाये जाने का प्रावधान है. इंदिरा आवास आवंटित किये जा सकते हैं. लेकिन हालत यह है कि सरकार ने विस्थापितों की तात्कालिक राहत  के लिए नगर निगमों को एक करोड़ रुपये आवंटित कर दिए लेकिन अभी तक कहीं भी कोई पंडाल नहीं बना. कोई राहत शिविर नहीं खुला. उजड़े गए परिवारों के लोग महिलाओं, बच्चों और अपने मवेशियों के साथ सड़क किनारे, खुले मैदानों में बिलकुल असुरक्षित अवस्था में रात गुजारने को विवश हैं. उनकी रोजी-रोटी छीन गयी. सर के ऊपर छत हटा ली गयी और सरकार उन्हें बसाने पर अभी विचार ही कर रही है. हास्यास्पद तो यह है कि इंदिरा आवास में रह रहे लोगों को भी अतिक्रमण हटाने की नोटिस दी गयी है. इंदिरा आवास के स्थल चयन और नक्षा पास करने की जिम्मेवारी सर्कार की है. अब वे लोग भी प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं. बिल्कुल  अराजक स्थिति उत्पन्न हो गयी है. अब इसपर राजनीति भी शुरू हो गयी है. चूंकि यह अभियान अभी शहरी इलाकों में ही चलाया जा रहा है इसलिए उजड़े गए ज्यादातर लोग गैर झारखंडी हैं. अलगाववादी राजनीति करनेवाले अब यह मांग कर रहे हैं कि सिर्फ स्थानीय खतियानी लोगों का ही पुनर्वास किया जाये. सवाल है कि क्या कुछलोग झारखंड में भी जम्मू कश्मीर की तरह धारा 370 जैसा कोई प्रावधान लागु करने का इरादा रखते हैं.तृतीय और चतुर्थ वर्गीय नौकरियों से तो गैर झारखंडी लोगों को लगभग वंचित किया ही जा चूका है. अब उन्हें उजाड़कर सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया जाये यही वे चाहते हैं. अभी संकीर्ण दायरों से जरा ऊपर उठकर भोजन, आवास, शिक्षा, चिकित्सा जैसी बुनियादी ज़रूरतों को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल किये जाने की मांग को लेकर एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन छेड़ने की ज़रुरत है. क्षेत्रीयतावाद की जगह गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ते फर्क को समझने की ज़रुरत है. किसी एक तबके की भलाई की लड़ाई लड़ने से पूरे राष्ट्र का भला नहीं होनेवाला. सत्ताधारी तो चाहते ही हैं कि लोग छोटे-छोटे दायरों में बंटे रहें ताकि वे राज करते रहें. उन्हें वोटों का गणित तय करने में आसानी हो. बहरहाल झारखंड की मुंडा सरकार ने यदि विस्थापितों के पुनर्वास के मामले में टालमटोल का रवैया जारी रखा तो आनेवाले समय में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

फर्क बाप बेटे के नज़रिये  का 

हाल में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन ने एक बयां जारी कर कहा कि झारखंड में सरकारी नौकरी सिर्फ मूलवासियों को मिलेगी. इधर उनके सुपुत्र उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बयान में कहा कि बेहतर था कि झारखंड संयुक्त बिहार का ही हिस्सा बना रहता. जाहिर है कि शिबू सोरेन ने अपने जनाधार को मज़बूत बनाये रखने की नीयत से अपना बयान दिया जबकि हेमंत ने राज्य गठन के दस वर्षों बाद भी राज्य का समुचित विकास नहीं हो पाने से क्षुब्ध होकर अपनी बात कही. उनकी प्रतिक्रिया एक युवा नेता की अनुभूतियों का स्वाभाविक इज़हार था. उसके अन्दर कोई राजनीति नहीं बल्कि जनाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पाने का दर्द था. साथ ही यह संदेश कि वे सभी समुदायों को एक नज़र से देखने वाले और सच्चाई का खुला इज़हार करने का साहस रखने वाले एक विजिनरी नेता हैं. अब इस बात पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है कि अलग राज्य बन्ने के दस वर्षों बाद भी नए झारखंड के निर्माण की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाये जा सके. सिर्फ घोटालों का अंबार क्यों लगता चला गया जबकि राज्य के मुख्यमंत्री का पद अघोषित रूप से आदिवासियों के लिए आरक्षित रहा. उन्हें कम से कम आदिवासी समुदाय के उत्थान का काम तो करना चाहिए था. लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने और अपने करीबी लोगों के विकास का काम किया. सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए समुदाय की भावनाओं को भड़काते रहे. राज्य के विकास के लिए इन छोटे-छोटे दायरों से बाहर निकलना होगा. अपने साथ गठित राज्यों से कुछ सबक लेनी होगी. राज्य का गठन चंद लोगों के लिए नहीं पूरी आबादी के उत्थान के उद्देश्य से किया गया था. इसमें विफल हुए तो आनेवाली नस्लों को क्या जवाब देंगे.   

----देवेंद्र गौतम    

गुरुवार, 10 मार्च 2011

हाईटेक होती भारतीय डाक सेवा


वह दिन गए जब पत्रों का आदान-प्रदान कबूतरों के जरिये होता था. वो दिन भी गए जब यह कष्ट डाकियों को उठाना पड़ता था. अब यह काम सैटेलाईट के जरिये बखूबी हो रहा है. लेकिन आधुनिक संचार सेवाओं के विस्तार ने डाक विभाग के औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया. उसे अस्तित्व के संकट से दो-चार होना पड़ा. उसका व्यवसाय मार खाने लगा. आमदनी घटने लगी खर्च बढ़ने लगा. लेकिन अब भारतीय डाक विभाग सैटेलाईट से जुड़कर एक लम्बी छलांग लगाने की तैयारी में है. यूनिक आईडी की अवधारणा उसके लिए.वरदान सिद्ध होने जा रही है. यूनिक आइडेंटीटीफिकेशन अथोरिटी ऑफ़ इंडिया के साथ हुए इकरारनामे के तहत आईडी कार्ड प्रोवाइडर्स के साथ मिलकर उसे सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में संयुक्त रूप से काम करना है. इससे उसे भारत की सवा सौ करोड़ की आबादी के साथ सीधे संपर्क का मौक़ा मिलेगा. घर-घर में उसकी पैठ बनेगी. अपनी आधुनिकतम सेवाओं की जानकारी देकर लोगों को डाक विभाग के प्रति धारणा बदलने को प्रेरित करेगा. उसके व्यवसाय में बढ़ोत्तरी होगी. आर्थिक संकट दूर होगा. अब तेज़ रफ़्तार की विश्वसनीय सेवा उपलब्ध करने के लिए ई-डाकघरों की स्थापना की जा रही है.
निजी क्षेत्र की डाक और संचार कंपनियों के मैदान में उतरने के बाद भारत ही नहीं पूरी दुनिया में डाक सेवा में मंदी का ग्रहण लग गया था. यूनिवर्सल  पोस्टल ने एक सर्वेक्षण में पाया कि 2008 -09 के दौरान वैश्विक स्तर पर घरेलू डाक संचार में 12 % की कमी आयी. जब विकसित देशों की डाक सेवा इन्टरनेट की मार नहीं झेल सकी तो भारत जैसे देश में तो असर पड़ना ही था. 2006 -07  में डाक विभाग ने जहाँ 66771.8 लाख  पत्रों का वितरण किया वहीँ 200 -08  में यह घटकर 63911.5  लाख पर आ गया. 2008 -09  में ज़रूर थोड़ी बढ़ोत्तरी केसाथ यह आकड़ा 654090  लाख पर पहुंचा. 1987 -88  के दौरान भारतीय डाक विभाग ने इसके करीब दुगना यानि 157493  लाख पत्रों का वितरण किया था. हालांकि अब स्थिति में सुधर आ रहा है. पार्सल और एक्सप्रेस सेवाओं के जरिये व्यसाय कुछ बाधा फिर भी बुनियादी चुनौतियां बरक़रार रहीं. दूरभाष सेवा के विस्तार से भी डाक विभाग को कुछ ऊर्जा मिली. वर्ष 2004 में जहां 765 .4   लाख टेलीफोन उपभोक्ता थे वहीँ 2010  में उनकी संख्या बढ़कर 764 .७ लाख  हो गयी.
अब ई-पोस्ट आफिस के जरिये मनीआर्डर  जैसी सेवाओं का विस्तार होगा.इससे डाक सेवा के एक नए युग की शुरूआत होगी.
बहरहाल यूनिक आईडी प्रोग्राम के जरिये डाक विभाग को अपने व्यवसाय में तेज़ी लाने का एक सुनहला अवसर मिल रहा है. अब विश्व के इस सबसे बड़े पोस्टल नेटवर्क के सामने सस्ती, सुन्दर और टिकाऊ सेवा उपलब्ध कराने की चुनौती रहेगी.

----देवेन्द्र गौतम

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...