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रविवार, 15 जनवरी 2012

शाबाश! अभिनव प्रकाश!


हाल के वर्षों में बिहार झारखंड के कस्बाई इलाकों की कई प्रतिभाओं ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर यह साबित किया है कि ऊंची उड़ान कहीं से भी लगाई जा सकती है. इसके लिए महानगरों में जन्म लेना या वहां की आबो-हवा में पलना ज़रूरी नहीं है. ऐसा ही एक कारनामा कर दिखाया है बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आये युवक अभिनव प्रकाश ने.उसने कैट की 2012  की परीक्षा में 99 .98 प्रतिशत अंक प्राप्त कर सबको चौंका दिया है. उसके पिता अनिल कुमार सिन्हा और मां गीता सिन्हा का सीना तो गर्व से चौड़ा हो ही गया है. पूरे सूबे के लोग स्वयं को गर्वान्वित महसूस कर रहे हैं.
अभिनव आरा के राजेंद्र नगर का रहना वाला है. उसने डीएवी, आरा से 10 वीं और डीएवी खगौल से 12 वीं पास किया. सुपर 30 के जरिये उसने कोचिंग की और 2005  में आईआईटी-जेईई की प्रतियोगी परीक्षा पास कर आईआईटी, बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में दाखिला लिया. वर्ष 2009 में वहां की पढाई पूरी की. कैम्पस प्लेसमेंट के तहत उसे कोल इंडिया लिमिटेड में मैनेजमेंट ट्रेनी के लिए चयनित किया गया. उसने कोल इंडिया में योगदान दिया लेकिन उसे अभी और ऊंची उड़ान भरनी थी लिहाज़ा 2010  में उसे छोड़ कर जेडएस एसोसिएट्स, नई दिल्ली को ज्वाइन कर लिया. इस बीच जमकर तैयारी  की और 2012  में कैट  की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया. अब उसकी अगली उड़ान क्या होगी यही देखना है.
----देवेंद्र गौतम     

शनिवार, 14 जनवरी 2012

'आल्हा'-लुप्त होती परंपरा

आरा, बिहार की ह्रदय स्थली रमना मैदान में लगभग हर शाम बुलंद आवाज़ में एक लोकगीत गूंजने लगता है.....इस गीत का जादू ऐसा की देखते ही देखते चारो ओर भीड़ इकठी हो जाती है....तालियाँ बजने लगती है ....वो हुंकार भरता है -
"रन में दपक -दप बोले तलवार ,
पनपन-पनपन तीर बोलत है ,
कहकह कहे अगिनिया बाण,
कटकट मुंड गिरे धरती पर "
जोश भर देनेवाली इस गायिकी को 'आल्हा' कहते है. इसे गानेवाले गायक का नाम है 'भोला'. इस लोक गायक का 'आल्हा' जब अपने चरम पर होता है तो सुननेवाले की भुजाएं फरकने लगती है ...खून की गति बढ़ जाती है....देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है...... कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया . उनका प्रण था की दुश्मन के हाथ देश की एक अंगुल धरती नहीं जाने देंगे-
"एक अंगुली धरती न देहब
चाहे प्राण रहे चली जाये "
जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं. मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन १२५० में लिखा गाया था . 'आल्हा' लोक गाथा है, जिसे भारत के लगभग सारे हिंदी प्रदेश में गाया जाता है..... हालाँकि क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव इनपर पड़ा है....भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही.....अन्य दूसरे प्रदेशों में भी कुछ ऐसा ही हाल है. लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. मतलब ये कि वह गाथा जिसे गा कर सुनाया जाये लोकगाथा कहलाती है.आल्हा ऊदल ११वीं सदी में चंदेल शासक के सेनानायक थे, जिनकी वीरता का वर्णन कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक ने गेय काव्य के रूप में किया है . इन्होने महोबे के विख्यात वीर आल्हा - ऊदल की कथा 'आल्हा' नामक छंद में लिखी है. यह छंद इतना लोकप्रिय हो गया कि पुस्तक का नाम ही 'आल्हा' पड़ गया. इसके बाद जो भी कविता इस छंद में लिखी गयी उसे 'आल्हा' कहा जाने लगा.वीर रस से ओत-प्रोत भोजपुरी प्रदेशों में आल्हा गाने की प्रथा बड़ी पुरानी है. दोनों वीर भाइयों आल्हा और ऊदल ने किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज से भीषण युद्ध किया. पावस ऋतु के अन्तिम चरण से लेकर पूरे शरद ऋतु तक सामूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत स्तर पर इन दोनों प्रदेशों में आल्हा-गायन होता है. आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं ५२ तो कहीं ५६ लड़ाइयाँ वर्णित हैं. इस लोकमहाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं. आल्हा या वीर छन्द अर्द्धसम मात्रिक छन्द है, जिसके हर पद (पंक्ति) में क्रमशः १६-१६ मात्राएँ, चरणान्त क्रमशः दीर्घ-लघु होता है. यह छन्द वीररस से ओत-प्रोत होता है. इस छन्द में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रचुरता से प्रयोग होता है। एक लोककवि ने आल्हा के छन्द-विधान को इस प्रकार समझाया है-
आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य।
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राई को तुरत पहाड़।
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़।
आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झाँझ, मँजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य का प्रयोग भी किया जाता है। आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आल्हा गानेवाले गायक के पास एक ढोल होता है..... गाने की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती जाती है, ढोल बजने की गति में वैसा ही परिवर्तन होता जाता है. युद्ध भूमि में आल्हा और ऊदल के अद्भुत शौर्य के कारनामों के प्रसंग के समय गायकों की मुखाकृति देखते ही बनती है.............कभी कभी ये जोश में आकर ढोलक पर ही चढ़ जाते हैं और उसे घुटनों से दबाकर "हई जवान" की हुंकार के साथ युद्ध वर्णन करने लगते है. आल्हा गानेवालों की खूबी होती है की अपने लम्बे गायन के क्रम में ये अपने श्रोताओं को जैसे बहा ले जाते है.... वो भी गायक के साथ एकत्व का अनुभव करने लगता है...वैसी ही उद्दाम भावना...वैसा ही जोश....देश पर मर मिटने कि वैसे ही अभिलाषा जाग जाती है जैसी कभी आल्हा और ऊदल कि रही होगी.
किन्तु देशप्रेम कि भावना को जगाने वाले आल्हा गायकों कि स्थिति बहुत दयनीय है. इनकी बदतर आर्थिक स्थिति इन्हें इस से मुह मोरने पर बाध्य कर रही है. कोई भी आल्हा गायक अपने बच्चों को यह हुनर नहीं सिखाता. अपने शहर के जिस भोला उर्फ आकाश राज बादल के बारे में मै बता रही थी उनकी हालत भी बहुत ख़राब है. इन्होने कभी लाल कृष्ण आडवानी, गवर्नर हाऊस, लालू यादव के यहाँ गायिकी का प्रदर्शन किया तो कोलकाता, रामेश्वरम, लखनऊ के बड़े मंचो पर अपना जोहर दिखाकर तालियाँ बटोरी....आज ये रमना मैदान में मजमा लगाकर गाते है और पेट भरने कि कोशिश करते है.......हम सब ने भी इसकी आदत बना ली है...इसे सुनते हुए गुज़र जाते है...थोड़ी बहुत चर्चा भी कर लेते है.....बहुत हुआ तो ऐसे ही लिख मारते है.....पर मदद के लिए कुछ नहीं करते........कुछ भी नहीं करते.......अपनी परंपरा को यु ही मिटने के लिए छोड़ देते है ........
-स्वयम्बरा
http://swayambara.blogspot.in/

रविवार, 20 नवंबर 2011

आखिर आप चाहतीं क्या हैं ?


उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधान सभा के चुनावी दंगल में लगभग सभी पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत के साथ अपना - अपना बिगुल बजा दिया है ! कोई रथ यात्रा कर रहा है ,  कोई वहां की जनता को " भिखारी " कहकर जगा रहा है तो  कोई मुस्लिम आरक्षण के लिए प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखने के साथ - साथ विकास के नाम पर पूरे उत्तर प्रदेश को ही चार भागों में पुनर्गठन करने की दांव चल रहा है ! राजनीतिक उठापटक के बीच सब के सब राजनैतिक दिग्गज अपने राजनैतिक समीकरण बैठाने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं ! होना भी ऐसे चाहिए क्योंकि यही तो एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है ! अभी तक के चुनावी दावों में उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्से में विभाजित करने का ऐसा तुरुप का इक्का चला है की किसी भी पार्टी को उसका तोड़ नहीं मिल रहा है ! लगता है कि उनके इस तुरुप के इक्के के आगे सभी राजनीतक पार्टियाँ  मात खा गयी ! 



अभी तेलंगाना को अलग राज्य बनाये जाने की मांग ठंडी हुई भी नहीं थी कि मायावती जी ने वर्तमान उत्तर प्रदेश को चार भागों पश्चिमी प्रदेश ( संभावित राजधानी : आगरा ) , बुंदेलखंड ( संभावित राजधानी : झांसी ) , अवध प्रदेश ( संभावित राजधानी : लखनऊ ) और पूर्वांचल प्रदेश ( संभावित राजधानी : वाराणसी ) में बाँटने का खाका पेश कर दिया ! इस पुनर्गठन के पीछे सुश्री मायावती और उनकी पार्टी बसपा का तर्क है कि छोटे राज्यों में कानून - व्यवस्था बनाये रखने के साथ - साथ विकास करना आसान होता है ! चूंकि वर्ष २०११ की जनगणना के अनुसार वहां की जनसँख्या लगभग २० करोड़ के पास है जो कि देश की आबादी का लगभग  १६ प्रतिशत है इसलिए समुचित प्रदेश के विकास के लिए प्रदेश को छोटे राज्यों में पुनर्गठन करना जरूरी है ! 

सैद्धांतिक रूप से लोकतंत्र में छोटे - छोटे राज्यों से जनता की भागीदारी अधिक होती है , इसलिए राहुल सांस्कृत्यायन ने भी एक बार ४९ राज्यों के गठन की बात कही थी ! मेरा व्यक्तिगत मत है कि अलग राज्यों की मांग उठने के पीछे कही न कहीं केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार है क्योंकि मांग उठाने वालों लोगों को लगता है कि उनके साथ भाषा , जाति, क्षेत्र  के आधार पर उनके साथ न्याय नहीं होता है ! ज्ञातव्य है कि भाषा के आधार  राज्य कर पुनर्गठन का श्रीगणेश तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी अदूरदर्शिता का परिचय देते हुए १९५२  में तेलगू भाषी राज्य की मांग मानकर किया था ! क्योंकि मैंने ऐसा पढ़ा है कि समय रहते हस्तक्षेप न करने के कारण एक समाजसेवी श्रीरामुलू के ५८ दिन के आमरण अनशन के बाद १६ दिसम्बर १९५२ में मृत्यु हो जाने के उपरान्त आंध्र प्रदेश में दंगे भड़क गए और आनन-फानन में नेहरू जी ने मात्र तीन दिन के अन्दर अलग राज्य की संसद में घोषणा कर दी ! 

एक लेख के अनुसार , दिसंबर १९५३ न्यायाधीश सैय्यद फजल अली की अध्यक्षता में पहला राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया ! सितम्बर १९५५ इस आयोग की रिपोर्ट आई और १९५६ में राज्य पुनर्गठन अभिनियम बनाया गया , जिसके द्वारा १४ राज्य और ६ केन्द्रशासित राज्य बनाये गए ! १९६० में राज्य पुनर्गठन का दूसरा दौर चला , परिणामतः बम्बई ( वर्तमान मुंबई ) को विभाजित कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाया गया ! १९६६ में पंजाब का बंटवारा कर हरियाणा राज्य बनाया गया !  इसके बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम १९७१ के अंतर्गत त्रिपुरा, मेघालय और मणिपुर का गठन किया गया ! १९८६ के अधिनियम के अंतर्गत मिजोरम को राज्य के दर्जे के साथ १९८६ के केन्द्रशासित अरुणाचल प्रदेश अधिनियम के अंतर्गत अरुणाचल  प्रदेश को भी पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया ! १९८७ के अधिनियम के तहत गोवा को भी पूर्ण दर्जा दिया गया ! अंतिम पुनर्गठन वर्ष २००० में उत्तराखंड, झारखंड और छतीसगढ़ को बाँट कर किया गया !       

छोटे राज्यों के पुनर्गठन की वकालत करने वालों का मत है है कि भारत में जनसंख्या के आधार पर और क्षेत्रफल के आधार विषमता बहुत है ! एक तरफ जहां लक्षद्वीप का क्षेत्रफल ३२ वर्ग कि.मी. मात्र है तो वही राजस्थान का क्षेत्रफल लगभग ३.५ लाख वर्ग कि.मी. है ! जनसँख्या में जहा उत्तरप्रदेश लगभग २० करोड़ की संख्या को छूने वाला है तो वही सिक्किम की कुल आबादी ६ लाख मात्र है ! परन्तु यहाँ पर यह भी जानना बेहद जरूरी है कि अभी हाल में ही पुनर्गठित हुआ झारखंड राज्य अपने नौ सालों के इतिहासों में लगभग ६ मुख्यमंत्री बदल चुका है ! उसके एक और साथी राज्य छत्तीसगढ़ में किस तरह नक्सलवाद प्रभावी हुआ है यह लगभग हम सबको विदित है ! प्रायः हम समाचारों में देखते व सुनते भी है कि मिजोरम , नागालैंड और मणिपुर आज भी राजनैतिक रूप से किस तरह अस्थिर बने हुए है ! गौरतलब है कि असम से अलग हुए राज्य ( जो कि अपनी जनजातीय पहचान के कारण अलग हुए थे ) नागालैंड , मेघालय, मणिपुर और मिजोरम में कितना समुचित विकास हो पाया यह अपनेआप में ही एक प्रश्नचिंह है ! 

अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए किस तरह से दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री श्री ब्रहम प्रकाश ने दिल्ली , हरियाणा , राजस्थान के कुछ हिस्से और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मिलाकर 'बृहत्तर दिल्ली' बनाना चाहा था क्योंकि इससे वो लम्बे समय तक अपने 'जाट वोटों' के जरिये राज कर सकते थे ! समय रहते तत्कालीन नेताओं जैसे गोविन्द बल्लभ पन्त ने उनकी महत्वकांक्षा को पहचान कर उनका जोरदार विरोध कर उन्हें उनके मंतव्य में सफल नहीं होने दिया ! और समय रहते उनकी मांग ढीली पड़ गयी ! वर्तमान समय में फिर एक प्रदेश मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के पुनर्गठन की मांग उठाई है ! गौरतलब है कि मात्र छोटे राज्यों के गठन से विकास नहीं होता है ! किसी भी राज्य का विकास वहां  की राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ -साथ सुशासन से होता है !  राज्यों की पंचायत व्यवस्था को दुरुश्त किया जाय , जिसके लिए गांधी जी ने 'पंचायती राज' व्यवस्था की पुरजोर वकालत कर देश के संतुलित विकास की रूपरेखा बनाकर गाँव को समृद्ध बनाने के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास का सपना देखा था ! एक लेख में मैंने पढ़ा है कि अगर हम उत्तर प्रदेश पर एक नजर दौडाएं तो पाएंगे कि पूर्वी भाग के कई जिलों में  आज भी उद्योगों का सूखा पड़ा है ! चीनी मीलों के साथ - साथ खाद व सीमेंट के कारखाने बंद पड़े है ! सिर्फ पश्चिमी भाग में जो कि दिल्ली से सटा हुआ है , थोडा विकास जरूर हुआ है ( फार्मूला रेस -१ का आयोजन )  ऐसा कहा जा सकता है ! ऐसे में सवाल यह उठता है कि माननीय मुख्यमंत्री जी आखिर आप चाहती क्या है ? प्रदेश का समुचित विकास अथवा खालिश राजनीति !          
     
                                                       - राजीव गुप्ता 

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बुधवार, 24 अगस्त 2011

ममता की अनोखी मिसाल


बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाती हुए कुतिया  छाया: काशीनाथ
शंकर प्रसाद साव  
बाघमारा धनबाद : पशुओं की संवेदनशीलता कभी-कभी मनुष्य को भी आत्ममंथन की प्रेरणा देती है. भले ही मनुष्य श्रेष्ठता के अहंकार में उसे समझने की जरूरत न समझे. झारखंड के बाघमारा के खोदोबली में एक बिल्ली बच्चा देने के बाद मर गयी. भूख से बिलबिलाते बच्चे पर एक कुतिया की ममता जग गयी. कुतिया ने नवजात बिल्ली के बच्चे को अपना दूध पिलाया. इस कुतिया को इस बात का अहसास तक नहीं कि यह उसके शत्रु वर्ग का शिशु है. काश ऐसी संवेदना हम मनुष्यों में भी होती. 

फोटो : स्केच
चल छोड गांव चल,यह देश हुआ पराया
   क्वाटर खाली कर रहे लोंगो की दास्तां
                  मामला ब्लॉक दो क्षेत्र का
                 शंकर प्रसाद साव
बाघमारा धनबाद: नेताजी कहत रहने तहरा लोग के बचा लेब. येइजा के नेता जिएम बाढे. उनकर काफी चलती बा. राउर नेताजी हमरा के गांव से बुलाके क्वाटर देलेबा रहे खातिर. अब हमरा के प्रबंधन भगावत बा. यह कहना है उन लोगो की है जिसे प्रबंधन द्धारा क्वाटर खाली करने का नोटिस थमाया हैं. बेघर होने का डर से ऐसे लोग काफी बिचलीत हो गये हैं. इस परिस्थिती में उनके नेता भी हाथ खडे कर दिये हैं.कुछ लोग कार्रवाई की डर से अपना बोरिया बिस्तर समेट चुके है कुछ जाने की तैयारी में हैं.
                क्या है मामला
अधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सीबीआइ जांच पडताल में कई नेताओं का नाम अवैध कैंजाधारियों के लिष्ट में शामिल हैं. साथ ही ऐसे नेताओं द्धारा गलत ढंग से बाहरी लोगों को पैसे लेकर क्वाटर में सिट कराने का खुलासा हुआ हैं. इसके पिछे प्रबंधक भी जांच के घेरे में हैं. कल्याण निरीक्षक पिछले 25 सालों से एक ही क्षेत्र में जमे रहने तथा उनकी काली करतूत से कंपनी को हर माह लाखों का चूना लगाने का भी पर्दाफास हुआ हैं.
                  प्रबंधकीय लापरवाही का फायदा
ब्लॉक दो क्षेत्र में प्रबंधन की कमजोरी को तथाकथित दस दरोगा ने अपनी ताकत समझा और मनपसंद क्वाटरों पर कैंजा जमाया. वहीं लापरवाही का फायदा कुछ तथाकथित नेताओं ने जमकर उठाया हैं. न सिर्फ कोयले को लूटा बल्कि क्वाटरों में भी धाक जमाया. कैंजा जमाये क्वाटर में राजनीति की दुकान भी खोल लिया. अपना वर्चस्व जमाने के लिए अपने गांव देहात से सैकडों की तदाद में लोगों को बुलाकर क्वाटरों में सिट कराया था. ऐसे तथाकथित नेताओं के कैंजे सौ से अधिक क्वाटर हैं. जो भाडे पर लगाये हुए हैं.
            ..... हो गई नेताओं की हेगडी गुम
कल तक जो नेता अपने आप को जीएम मानते है वैसे नेताओं का नाम सीबीआइ की सूची में पहले नंबर पर हैं. प्रंबधन द्धारा कोर्ट का आदेश बताते हुए क्वाटर खाली करने का फरमान जारी किया हैं. नोटिस मिलने के बाद वैसे तथकथित नेताओं की हेकडी गुम हो गई हैं. इधर स्थानीय पुलिस भी आदेश पालण नही करने वाले नेताओं के विरूद्ध कार्रवाई करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दिया हैं.

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा

भारत में जब-जब सत्ता निरंकुशता की और बढ़ी है और उसके प्रति जनता का आक्रोश बढ़ा है एक राजनैतिक संत का आगमन हुआ है जिसके पीछे पूरा जन-सैलाब उमड़ पड़ा है. महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक यह सिलसिला चल रहा है. विनोबा भावे, लोकनायक जय प्रकाश नारायण समेत दर्जनों राजनैतिक संत पिछले छः-सात दशक में सामने आ चुके हैं. इनपर आम लोगों की प्रगाढ़ आस्था रहती है लेकिन सत्ता और पद से उन्हें सख्त विरक्ति होती है. अभी तक के अनुभव बताते हैं कि राजनैतिक संतों की यह विरक्ति अंततः उनकी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है.

senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा

50 हज़ार दो कब्ज़ा बनाये रखो



                       (भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं. इसकी एक बानगी झारखंड के कोयला खदान क्षेत्रों में देखने को मिलती है. हाई कोर्ट के आदेश पर अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है लेकिन इसे भी अवैध कमाई का जरिया बना लिया गया है )

शंकर साव 
शंकर प्रसाद साव
बाघमारा धनबाद :- पूरे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना लहर चल रही है लेकिन झारखंड के कोयलांचल में अभी भी खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है. यहां बीसीसीएल की ज़मीन या क्वार्टर पर सुविधा राशि के आधार पर अवैध कब्ज़ा बरक़रार रखने का अवसर दिया जा रहा है. महत्वाकांक्षी परियोजना ब्लॉक टू क्षेत्र में क्वार्टर आवंटन के खेल में मजदूर प्रतिनिधि और अधिकारियों की मिली   भगत से ऐसा हो रहा  हैं. यहां बेघर नहीं होने की कीमत 50 हजार रुपये लग रही है. घरों पर अधिकारी दे रहे है दस्तक. हाल ही में सेवानिवृत हो चुके कर्मी ही कीमत चुका कर अपना आशियाना बचाने की फिराक में हैं. वेल्फेयर इंस्पेक्टर की काली करतूत से बीसीसीएल में फिर एक नया पेंच खडा होने वाला हैं.एक तरफ कंपनी अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए मुहिम तेज कर रही है.वहीं वेल्फेयर इंस्पेक्टर अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में कंपनी को लाखों का चूना लगा रहे हैं.
              कैसा होगा नया पेंच
अधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जो मजदूर सेवानिवृत हो गये है. उन्हें बीसीसीएल द्धारा सभी तरह की पावना राशि का भुगतान कर दिया गया हैं. राशि मिलने के बाद भी प्रबंधन द्धारा सेवानिवृत मजदूरों का आवंटित क्वाटर को हैंड ओवर नहीं लिया. लेकिन कागज पर हैंड ओवर दिखाया गया हैं. वैसे कर्मी से बेघर नहीं होने की कीमत 50  हजार रुपये वसूले  जा रहे हैं. लेकिन इसके एवज में उन्हें आवास आवंटन का किसी तरह का प्रमाणपात्र  नहीं दिया जा रहा है. भविष्य में किसी तरह का विवाद खडा हो जाय तो उक्त कर्मी को कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड सकता हैं.
               अतिक्रमण के पीछे पैसे का खेल
अनधिकृत के रूप से बीसीसीएल की जमीन पर घर बना कर व दुकान खोल कर रोजी रोटी कमा रहे लोग भी अतिक्रमण के दायरे में हैं. ऐसे लोंगों भी नहीं बख्शा जा रहा हैं. जल्द ही वैसे स्थलों पर बुलडोजर चलेगा. अपना आशियाना बचाने के लिए लोग जनप्रतिनिधियों के शरण में पहुंचे हुए हैं. कुछ लोग वेल्फेयर इंस्पेक्टर को ही कुछ ले देकर बेघर न होने की कीमत चुका रहे हैं.
                 
             क्या कहते है प्रबंधक
बेघर होने के एवज में सेवानिवृत कर्मी द्धारा किसी तरह की राशि अगर किसी अधिकारी को दे रहे है तो गलत है. भविष्य में किसी तरह की परेशानी होने पर वैसे लोग स्वंय जिम्मेवार होंगे.
                         ---प्रेम सागर मिश्रा
                            महाप्रबंधक ब्लॉक दो क्षेत्र
रेंट देकर पुन: क्वार्टर पर रहने का बीसीसीएल में अभी तक ऐसा नियम लागू नहीं हुआ हैं. कोई सेवानिवृत कर्मी अगर पैसे देकर क्वार्टर पर कैंजा जमाये हुए है तो गलत है बहुत जल्द कार्रवाई होगी. दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जायेगी.
                                गोपाल प्रसाद
                                कार्मिक प्रबंध


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...