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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

वीरभूम जिले में पंचायत के  आदेश पर घटित सामुहिक बलात्कार कांड पर पश्चिम बंगाल के  राज्यपाल एमके० नारायणन ने देश भर में इस तरह के गैर कानूनी अदालत को  बंद करने की अपील की है 

DEVENDRAउन्होंने यह अपील राज्यपाल की हैसियत से की है अथवा एक संवेदनशील भारतीय नागरिक की हैसियत से अपने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए यह तो  पता नहीं लेकिन इसके  अंदर प्रशासनिक नज़रिये की जगह इस घटना से उपजा हुआ क्षोभ और आक्रोश ही दिखाई  पड़ रहा है। यदि उनकी अपील पर देश के  तमाम राज्यों  की सरकारें  अमल करती हैं तों ¨ यह सत्ता के विकेन्द्रीकरण की अवधारणा और पंचायती राज व्यवस्था की परिकल्पना के  विपरीत होगा ।
निश्चित रूप से यह घटना अ्त्यंत निंदनीय, अमानवीय और  शर्मनाक है। इसकी जितनी भी भर्त्सना  की जाये कम है। लेकिन इस एक फैसले से किसी एक पूरी संस्था के  वजूद के   नकारा जाना उचित नहीं है। बल्कि इस संस्था की गड़बडियों के  दुरुस्त करने पर विचार किया जाना चाहिए। भुक्तभोगी आदिवासी युवती का दोष सिर्फ इतना था कि वह समुदाय के  बाहर के  युवक से प्रेम करती थी। प्रेम करना किसी मायने में अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इक्कीसवीं सदी में भी इतनी दकियानुसी सोच  का विद्यमान होना  इस बात की अलामत है कि पिछड़े समाजों के  ऊपर उठाने की अबतक की तमाम सरकारी गैर सरकारी को¨शिशें व्यर्थ गई हैं।
युवती का मां-बाप का दोष यह था कि वे गरीब थे और पंचायत के  25 हजार रुपये का दंड भरने की उनकी हैसियत नहीं थी। जाहिर तौर  पर पंच स्थानीय थे और उन्हें भुक्तभोगी परिवार की माली हालत की जानकारी रही होगी। फिर इतनी बड़ी रकम का दंड  लगाना उनकी कुत्सित मानसिकता का ही परिचायक था। माता पिता के  दंड भरने में असमर्थता जताने पर पंचायत ने आदिवासी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार का फरमान जारी कर दिया गया और  उसके आस पडोस के  ग्रामीण इसे अंजाम देने लगे। यह फरमान गैर कानूनी ही नहीं क्रूर और  पूरी तरह आपराधिक माना जाना चाहिए। इसे सामंती दबंगई का एक नमूना ही कहा जा सकता है। घटना के  कई दिन¨ बाद इस अपराध के लिए बलात्कार के 13 आरोपियों  के¨ न्यायिक हिरासत में लिया गया।
गिरफ्तारी में विलंब होने पर जिले के पुलिस कप्तान का तबादला कर दिया गया। लेकिन उन पंचों के कटघरे में खड़ा नहीं किया गया जिन्होंने यह शर्मनाक फैसला सुनाया था। उनकी भी गिरफ्तारी हो¨नी चाहिए। उनपर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस घटना के लिए वे भी उतना ही दोषी हैं जितना उनके फैसले के अमली जामा पहनाने वाले युवती के आस-पडोस  के ग्राणीण। यदि राज्यपाल महोदय ने फरमान जारी करने वाले पंचों  की भी गिरफ्तारी का आदेश दिया होता तो  इसका स्वागत किया जाता। इसका संदेश दूर-दूर तक जाता। पंचायती राज के लिए यह एक नज़ीर बनता। तमा्म जातीय पंचायतों  के गैर कानूनी करार दिया जाना कहीं से भी उचित नहीं है।
आदिवासियों  की पड़हा पंचायत और  मानकी मुंडा प्रशासन के  ब्रिटिश सरकार के  जमाने में ही कानूनी मान्यता मिल गई थी। इसके लिए आदिवासी इलाके में कितने ही आंदोलन हुए। कुर्बानियां दी गईं। उन्हें एक सिरे से गैरकानूनी कहकर प्रतिबंधित कर देना न उचित है न संभव। जिस पंचायत ने यह क्रूर फैसला दिया उसकी कुछ न कुछ वैधानिक हैसियत तो अवश्य रही होगी। वे आदिवासियों  की पारंपरिक व्यवस्था के  तहत मान्यता प्राप्त पंच रहे हैं अथवा पंचायती राज व्यवस्था के  तहत चुने हुए मुखिया सरपंच। गांव समाज के खुद मुख्तार नेता रहे है अथवा ज¨ भी रहे है। उनका जो  भी स्वरूप रहा हो  लेकिन उन्हें पूरी तरह गैरकानूनी तो  नहीं करार दिया जा सकता।
आदिवासी पंचायतें कठोर  दंड देने के  लिए जरूर चर्चे में रही हैं। उनके  यहां डायन-विसाही के आरोप  में महिलाओं  को  मैला पिलाने, नंगा घुमाने का चलन रहा है लेकिन स्त्रियों की आबरू से खेलना उनकी संस्कृति या पारंपरिक दंड संहिता में शामिल नहीं रहा है। संभवतः यह पहला मौका है जब पूर्वांचल के किसी आदिवासी पंचायत ने हरियाणा की खाफ पंचायतो  की तर्ज पर फैसला किया है। इसके  पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही थी। आदिवासी समाज के  अंदर यह विकृति किधर से आयातित है रही है, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किये जाने की जरूरत है।
एक कड़वा सच यह भी है कि हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी पेंचीदी है कि छोटे –छोटे  मामलें  का फैसला आने में भी कई-कई साल लग जाते हैं। न्याय मिलता भी है त¨ इतने विलंब से कि उससे संतुष्टि या असंतुष्टि के  भाव ही तिर¨हित ह¨ जाते हैं। फरियादी अदालते  के चक्कर लगाता-लगाता पूरी जवानी काटकर बूढ़ा है जाता है।
कभी-कभी तो  फैसला आने तक उसकी आयु ही समाप्त है  जाती है। आरो¨पी भी जमानत पर घूमते-घूमते दंड पाने से पहले ही स्वर्ग सिधार जाते हैं। न मुद्दई बचता है न मुदालय। बच जाते हैं सिर्फ मुकदमें ज¨ तारीख दर तारीख खिंचते चले जाते हैं। क¨यलांचल क¢ बहुर्चिर्चत दास हत्याकांड का फैसला आने आने में कई दशक निकल गए थे। तब तक सारे मुख्य आरोपियों का देहांत हो  चुका था। उनकी जगह परिवादियों  की सूची में शामिल किये उनके  भाई बंधु आजीवन कारावास के  भागी बने। ऐसे सैकडों उदाहरण हैं।
हमारी विलंबित न्याय प्रणाली के कारण ही नक्सल प्रभावित इलाका  में त्वरित फैसला करने वाली नक्सलियों  की जन अदालतें लगाकर  मान्य होती रही हैं। लोग अपनी फरियाद लेकर थाना और कोर्ट -कचहरी का चक्कर लगाने की जगह नक्सलियों  की कमेटियों  में अर्जी देने लगे हैं। उनका कई  वैधानिक अस्तित्व भले नहीं है  लेकिन उनके  इलाके में उनके प्रति एक किस्म की आस्था दिखाई देती है तो  यह हमारी न्याय प्रणाली की कमियों के  कारण ही। नक्सली न भारतीय संविधान के  मानते हैं न दंड संहिता के । उनका अपना अलग जंगल का कानून चलता है।
ग्राम स्तर पर मिल बैठकर मामलों  के  निपटाने की यह क¨ई नई व्यवस्था नहीं है। यह परंपरा प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित रही है। यहां पंच के  परमेश्वर का दर्जा दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी भी पंचायती राज व्यवस्था क¨ ग्राम स्वराज का आधार मानते थे। वे सत्ता के  विकेद्रीकरण के हिमायती थे। तमाम राजनैतिक पार्टियां ग्राम पंचायतों को शक्ति संपन्न बनाने की वकालत करती हैं।
राज्यपाल महोदय ने जिस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की है वह सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में संकेत देता है। यह राजतंत्र अथवा तानाशाही की व्यवस्था में ही संभव है। ल¨कतांत्रिक व्यवस्था में विकेद्रीकरण का महत्व है। तब यह जरूरी है कि सत्ता की छो¨टी से छोटी इकाइयां भी एक नियम के तहत चलें। एक दंड विधान है  जिसका हर स्तर पर पालन है। अपराध और  सज़ा के बीच एक तारतम्य है । तमाम फैसले समाज के मान्य है ।
गलत, पक्षपातपूर्ण, मनमाने और  विधान के विरुद्ध फैसले सुनाने वालों  पर कार्रवाई का प्रावधान भी होना चाहिए। मेहनत मजदूरी करके  गुजारा करने वालों  पर छोटी-छोटी गल्ती के लिए बड़ी-बड़ी राशियों  का आर्थिक दंड लादा जाना अराजकता और मनमानी का प्रतीक है।
निश्चित रूप से विकेद्रीकरण अच्छी चीज है लेकिन इसके  नाम पर अराजकता और  वर्वरता के ¨ प्रश्रय नहीं दिया जा सकता। किसी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार करने का आदेश मध्ययुगीन बर्बर समाज¨ में भी नहीं दिया जाता था। यह पूरी तरह आपराधिक कृत्य है। ऐसा फरमान जारी करने करने वाले के  खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई तो  भविष्य में भी इस तरह के  फरमान जारी किये जा सकते हैं।
लेकिन यदि किसी एक पंचायत ने अपने ही पंचायत की बेटी के साथ इस तरह का अमानुषिक फैसला दिया तो इसके  कारण आदिवासियों  की पूरी परंपरागत स्वशासन की व्यवस्था का  गैरकानूनी करार देकर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। उस पंचायती इकाई क¨ भले भंग कर दिया जाए लेकिन पूरी व्यवस्था के  ध्वस्त नहीं किया जा सकता।
देवेंद्र गौतम 
1516, प्रथम तल, वजी़रपुर,कटला मुबारक़पुर, नई दिल्ली-110003

सोमवार, 13 जनवरी 2014

खेतो से दूर होते हम

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         दूर तक फैली थी हरियाली...बीच मे थे चटख पीले रंग के फूल...ऊपर से बरस रहा था गहरा नीला रंग..और किनारे था गंगा का सफेद निर्मल जल...एक वृहत रंगोली थी वो...जिसे अबतक न देखा था ना ही मह्सूसा था कभी..नतमस्तक थी उस महान कलाकार के सामने...अब किनारे खडे रहने का कोई मतलब नही था..उतर पडी मै भी रंगो के महासमंदर मे...दौड पडी...भागती रही...कभी सरसो के पौधो को निहारा ....कभी चने के साग को दुलराया... मटर की फलियो का ऐसा स्वाद होता है पहली बार जाना.....जी चाहा वही सो जाऊ धरा की गोद मे... ओढ लू उनका आंचल.....खूब रो लू....अपनी सारी गलतियो की माफी माग लू, जिसे जाने-अनजाने हम मनुज करते आ रहे है...पर नही.. कुछ नही किया बडप्पन का झूठा चादर ओढ लिया...और चुपके से मुट्ठी मे खेत की मिट्टी उठाकर माथे से लगा लिया. 


हा से लौटते समय कई विचार उठने लगे..कि वसुंधरा हमारी हर इच्छा की पूर्ति करती है. हमारी क्षुधा मिटाती है. और हम उसी की सबसे ज्यादा उपेक्षा करते है...देखिये न कितने पास तो है गाव, खेत..इतना कि हाथ बढाकर छू ले पर हम तो उसकी ओर ठीक से देखते तक ही...सह्यात्री भर मानते है...या सैर-सपाटे की एक जगह..किताबो, अखबारो से किसानो के हालात की जानकारी लेते है...पर कुछ मीटर के फासले पर खेत जोतते इंसान से मिल नही पाते? हमारी शहरी जिंदगी मे उनकी समस्यायो का कोई स्थान नही..मिलियन मे कमा रहे पर खेतो से दूर हो रहे...प्रकृति से भाग रहे...सोचिये तो कैसी जिंदगी जी रहे हम? आखिर कैसी जिंदगी है ये?-------स्वयम्बरा http://swayambara.blogspot.in/


शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

तहलका वाले तरुणजीत तेजपाल के नाम खुलापत्र

तहलका से ये उम्मीद थी

जनाब तरुणजीत तेजपाल साहब,
हम जिस तहलका को जानते हैं उसका मतलब विश्वसनीयता का पर्याय होता है। हमें याद है कि रक्षा घोटाले को उजागर करने में आपने किस तरह से स्टिंग और इंस्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग का शानदार नमूना पेश किया थ। मेरे पास जब भी कोई नौजवान साथी पत्रकारिता की ख्वाहिश लेकर आता है, तो मैं उसे उदाहरण देते हुए कहता हूं कि उत्कृष्ट पत्रकारिता पैसे के लिए और पैसे की जोर से नहीं हो सकती। वह जज्बा मांगती है। हमेशा निष्पक्ष रहने की। जब आपने 2008 में हिन्दी में तहलका शुरू की तो हम जैसे हिन्दी पट्टी के पत्रकारों और पाठकों को उम्मीद थी कि इसमें से अपनी मिट्टी की सुगंध निकलेगी और वह इस मानक पर खरी भी उतरी। आपके हिन्दी संपादक संजय दुबे ने बड़े शानदार तरीके से आपके मिशन को आगे बढ़ाया। सच में उन्होंने एक शानदार टीम कायम की, जो काबिले तारीफ काम कर रही है। अपनी निजी पक्षधरता को परे धकेलकर पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन कर। लेकिन जब आपकी पत्रिका में पत्रिका को पक्ष बनकर खड़े देखा तो मन बेहद आहत हो गया, क्योंकि आज भी हमें उम्मीद आपसे और आपकी पत्रिका से ही है। हमें उम्मीद है कि इसे आप किसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर तो देखेंगे ही और साथ में यह भी उम्मीद है कि सिर्फ एक खराब रिपोर्ट के लिए किसी को निकालने जैसी गंभीर सजा नहीं देंगे, बल्कि उसे पत्रकारिता का मानदंड बताते हुए अपने जैसा पत्रकार बनाने की ट्रेनिंग देंगे।
तहलका के 31 अक्टूबर के अंक मेंसिर्फ यहींकॉलम में एकअनकहा पक्षआया है। जी हां, इस अनकहे पक्ष में तहलका ने हालिया एक साहित्यिक विवाद की रिपोर्टिंग की है और आरोपी प्रमोद का पक्ष उठाया है, लेकिन शायद रिपोर्टर महोदय यह रिपोर्टिंग करते वक्त यह भूल गए कि पत्रिका सच के साथ खड़ा होने के लिए है, कि पक्ष बनने के लिए। वह पत्रकारिता का यह मूलभूत सिद्धांत भी भूल गए कि जो भी कह दिया जाए, वह हर बात सच होती है और खबर। साथ ही जो भी तथ्य सामने रहे हैं उसकी पड़ताल बेहद जरूरी होती है, खासकर जब मामला संवेदनशील हो और पक्ष आरोपी का रख रहे हों। आरोपी और पीड़ित में अंतर करना बेहद जरूरी होता है। इस बात का तो खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि पत्रिका किसी खबर को उठाते वक्त पार्टी बन जाए या फिर वह किसी की वकालत करती नजर आए। इससे पत्रिका की विश्वसनीयता प्रभावित होती है यह तो आप भी जानते ही हैं। व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठकर वह सिर्फ खबर परोसे और वह खबर जो विश्वसनीय हो। किसी का बयान और साक्षात्कार छापते वक्त तो उसे बेहद सजग और संजीदा रहने की जरूरत होती है, ताकि किसी की मर्यादा का हनन हो। इसलिए भी क्योंकि यहां पर झूठ और सच के बीच की बेहद बारीक फर्क में से रिपोर्टर को अपने कौशल से सच निकालना होता है और किसी का पक्ष भी नहीं बनना होता है।
जरा सी असावधानी का नतीजा यह होता है कि पत्रिका किसी की पक्षकार लग सकती है। इस रिपोर्ट के साथ भी जाने-अनजाने वही हुआ है, जिसकी मैं यहां बात कर रहा हूं। पत्रिका की पूरी रिपोर्ट निष्पक्ष और निष्कलुषित लगकर एक पक्ष का पैरोकारी करती लगती है और पत्रिका खुद पार्टी बनी लगती है।अनकहा पक्षके रिपोर्टर ने अपनी तरफ से एक तरह से आरोपी प्रमोद को तमाम आरोपों से बरी ही कर दिया है, जबकि जरा सी पड़ताल कर ली जाती तो इस रिपोर्ट में आए कई गलत तथ्यों का पता रिपोर्टर को खुद चल जाता। जैसे ही मैंने यह रिपोर्ट पढ़ी, यह मुझे चौंका गई, क्योंकि इसमें एक-दो नहीं दर्जनों बातें ऐसी थीं, जो पच नहीं रही थीं। मैंने जरा सी पड़ताल की तो कई ऐसे सच मेरे सामने आए, जिससे लगा कि यह रिपोर्ट किसी दबाव या... में लिखी गई है। इस कोशिश में इस रिपोर्ट में पत्रिका की स्थिति हास्यास्पद नजर आती है और लगता है कि पत्रिका खुद एक पक्ष बन गई है।
एक साहित्यिक विवाद पर लिखी इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि राजेंद्र यादव अपनी पत्रिकाहंसके संपादकीय में विवाद के बाद से अपना पक्ष लिखते रहे हैं, जिसमें वह कभी युवा लेखिका पर आरोप लगा रहे हैं और कभी लिखे गए तथ्यों के लिए खेद जता रहे हैं। रिपोर्टर ने यह लिख तो दिया, लेकिन यह नहीं जानने की कोशिश की कि क्या वे तथ्य जिनकी वे बात कर रहे हैं वह इस केस से जुड़े हैं या वे किसी और मामले को इस मामले में मिक्स करने की कोशिश कर रहे हैं? मैंने भी इस विवाद के बाद आई राजेंद्र यावद की संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिकाहंसकी सारी प्रतियां पढ़ी हैं, लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक किसी भी अंक में इस के बारे में अभी तक नहीं लिखा है, तो क्या मैं यह मानूं कि इस रिपोर्ट के रिपोर्टर को यह सपना आया था?
इसके आगे रिपोर्टर ने अपनी टिप्पणी में लिखा है, ध्यान दीजिए प्रमोद के साक्षात्कार में तो यह लिखा ही है, अपनी जजमेंटल टिप्पणी में भी लिखा है कि प्रमोद को अभी तक कोई वकील नहीं मिला है, जबकि सच यह है कि उच्चतम न्यायालय का वकील उस प्रमोद का केस लड़ने के लिए लोआर ओर सेशन कोर्ट में रहा है। अमूमन ऐसा किसी हाई प्रोफाइल केस में ही देखने को मिलता है, जब सुप्रीम कोर्ट का वकील लोअर या सेशन कोर्ट में किसी मुकदमे की पैरवी के लिए आए। किसी अदने से आदमी के लिए उच्चतम न्यायालय का वकील सेशन और लोअर कोर्ट में किसी मुकदमे की पैरवी के लिए नहीं आता। प्रमोद के बयान में रिपोर्टर महोदय यह भी लिखते हैं कि प्रमोद से एक जज मैडम ने पूछा कि तुझे अपनी जमानत नहीं करानी क्या? तब पुलिसवाले ने कहा कि लगाई थी, लेकिन नहीं मिली। इसके बाद भी रिपोर्टर के कान चौकन्ने नहीं हुए कि आखिर जमानत की अर्जी लगाई किसने, खुद प्रमोद ने या वकील ने! उन्होंने प्रमोद से यह पूछने की जहमत नहीं उठाई (या लिखा) आखिर ऐसा क्यों? क्या वह मान कर गए थे कि आरोपी हर हाल में सच ही बोलेगा? आरोपी पर रिपोर्टर को इतना भरोसा क्यों हुआ। कि उन्होंने सत्यता की पड़ताल तक करने की कोशिश नहीं की, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा आरोपी प्रमोद ने रिपोर्टर को बताया कि उससे जेल में मिलने 15-20 दिन तक कोई आया ही नहीं, जबकि सच यह है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील ने आठवें दिन ही उसकी जमानत याचिका सेशन कोर्ट में लगाई थी।
दूसरी बात यह कि रिपोर्टर ने अपनी पड़ताल में यह भी लिखा है कि फिलहाल जो बातें कहानी के हर पक्ष में समान है, वह यह कि इस दिन जिस वक्त घटना घटी उस वक्त राजेंद्र यादव के घर पर दो-तीन मेहमान भी मौजूद थे, जबकि यह बात हर पक्ष में समान नहीं है। जबकि एफआईआर रिपोर्ट को सच मानें तो जब घटना घटी उस वक्त तक कोई कोई मेहमान नहीं आया था। शायद उन्होंने एफआईआर की कॉपी भी ठीक से देखने की जहमत नहीं उठाई, बस यह मान लिया कि आरोपी जो कुछ बोल रहा है, उसके अलावा और कुछ सच हो ही नहीं सकता है। आखिर उनके इतने पुख्ता यकीन का कारण क्या था, क्या वह यह बताने का कष्ट करेंगे। फिर इसके बाद वह यह भी लिखते हैं कि दोनों (आरोपी और पीड़िता) रात के एक बजे अपने-अपने घर गए। लेकिन सच यह है कि पीड़िता जब घर लौटीं, उसके बाद भी प्रमोद वहीं थाने पर था। इस बात की पुष्टि इसी पत्रिका में छपे प्रमोद के साक्षात्कार से भी होती है। जरा गौर फरमाइएगा- ‘लेखिका वहां से चली गईं। मुझे कोई लेने भी नहीं आया। तब पुलिसवालों ने कहा कि हमारे पास तुझे रखने की जगह भी नहीं है, तू किसी को बोल कि आकर तुझे ले जाएं। तब मैंने किशन भैया को फोन किया। उन्होंने कहा कि मैडम (राजेंद्र यादव की बेटी) किसी को भेज रही हैं। मैंने अपने एजेंसी वाले भैया को भी फोन किया। उन्होंने कहा कि मैं रहा हूं। लेकिन थोड़ी देर में किशन भैया का फोन गया कि मैं ही रहा हूं तुझे लेने। किशन भैया पांच हजार रुपये थाने में जमा किये और मुझे वापस घर ले गए।
जरा गौर फरमाइएगा रिपोर्टर ने बड़ी सफाई से यह बात छिपा ली कि प्रमोद कौन से घर गया। उन्होंने लिखा, दोनों अपने-अपने घर गए। प्रमोद का अपना घर कौन-सा था, यहां यह स्पष्ट नहीं है। मैं जरा स्पष्ट करता चलूं, वह अपना घर राजेंद्र यादव का था, जहां से वह 4 सितम्बर को गिरफ्तार हुआ। यानी कि उसे कोई बचाने की कोशिश नहीं कर रहा था, लेकिन इतने घिनौने आरोप के बावजूद राजेंद्र यादव ने अपने यहां पनाह दी। एक जुलाई से 4 सितम्बर तक, जब तक कि वह गिरफ्तार होकर जेल नहीं चला गया। मैडम ने प्रमोद को थाने से लिवा लाने को किशन को भेजा। किशन प्रमोद का जमानतदार बना। प्रमोद की मानें तो किशन ने पुलिसवाले को पांच हजार रुपये भी घूस में दिये। अगर प्रमोद की ही मानें तब तो यह भी जाहिर होता है कि मैडम ने किशन को थाने भेजा और किशन ने पांच हजार रुपये घूस दिये... तो आप समझ सकते हैं कि माजरा क्या है। लेकिन उसके बावजूद रिपोर्टर अपनी जजमेंटल टिप्पणी में (प्रमोद के कहे से अलग) कहते हैंराजेंद्र यादव अपने इस सेवक को बचाने के लिए कुछ नहीं करते। अदालत में अपने बचाव के लिए प्रमोद को कोई वकील तक नहीं मिला है।
इतना ही नहीं वह सीधे लिख देते हैं कि पुलिसवाले ने पांच हजार रुपये लिये, ऐसा लगता है कि इस बारे में उन्हें पुलिस का पक्ष जानना भी जरूरी नहीं लगा। आखिर उन्हें प्रमोद को निर्दोष बताने की इतनी जल्दी क्या है। यह सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए।
इसके अलावा इस केस में प्रमोद को बचाने के लिए रखूस और दबदबे का किस कदर इस्तेमाल किया गया है, इसका पता प्रमोद की इस बात से भी चलता है कि पुलिसवाले कहते हैं कि हमारे पास (थाने में) तुझे रखने की जगह भी नहीं है, तू किसी को बोल कि तुझे आकर ले जाएं। अगर प्रमोद की इस बात को सच मानें तो क्या रिपोर्टर ने इस बात की पड़ताल की कि आजतक उस थाने में क्या कभी किसी को रखा गया है या नहीं। क्या ऐसा भी संभव है कि थाने में किसी आरोपी को जिसे पुलिस ने पकड़ा हो उसे रखा ही हो? जाहिर है नहीं, तब प्रमोद की बात से इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस पर उसे थाने में रोकने के लिए किसी किसी ने बेहद दबाव बनाया होगा और वे दबाव किसने बनवाया होगा, इतनी मामूली सी बात भी रिपोर्टर की समझ में नहीं आई।
रसूख और दबदबे का एक और उदाहरण देखिए, बकौल प्रमोद, सितम्बर में पुलिसवाले आए और प्रमोद के बाऊजी उर्फ राजेंद्र यादव से बोले की तीन सितम्बर को प्रमोद को कोर्ट लेकर जाना है। तीन तारीख को मंगलवार था और बाऊजी को कहीं बाहर जाना था, तो बाऊजी ने पुलिस से कहा कि तुम उसे या तो सोमवार को कोर्ट ले जाओ या फिर बुधवार को ले जाना। और कमाल देखिए, कितना वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है प्रमोद को। पुलिसवाले मान जाते हैं और नहीं ले जाते तीन सितम्बर को प्रमोद को, वह उसे चार सितम्बर, बुधवार को आकर ले जाते हैं। इतना ही नहीं, प्रमोद के अनुसार, ले जाने से पहले पुलिस राजेंद्र यादव को गारंटी भी देती है कि उसे दिन में कोर्ट में पेश करेंगे और शाम तक घर छोड़कर जाएंगे। ध्यान दीजिए छोड़कर जाएंगे। वह तो न्यायालय थी, जिसने उसे नहीं छोड़ा। लेकिन तब भी पुलिसवालों ने अपना खेल, खेल ही दिया। मामूली से मामूली मामले में भी लंबी रिमांड मांगने वाली पुलिस ने इस मामले में प्रमोद से पूछताछ के लिए एक दिन का भी रिमांड नहीं मांगा। आखिर क्यों? यह इतनी अबूझ पहेली भी नहीं। लेकिन इसके बावजूद रिपोर्टर का यह मानना है कि प्रमोद को बचाने के लिए राजेंद्र यादव ने कुछ नहीं किया।
अगर तहलका में प्रमोद के आए साक्षात्कार की ही बात करें, तब भी प्रमोद ने अपने ऊपर लगे लगभग हर आरोप को स्वीकार लिया है। लेकिन उसके बावजूद इस रिपोर्ट को पढ़कर लगता है कि रिपोर्टर ने उसे निर्दोश मान लिया है। गौर करें इस साक्षात्कार में प्रमोद ने क्या कहा-
मुझे किशन भैया ने बताया कि किसी ने इस लेखिका की वीडियो बनाई है।
‘30 जून  के आसपास की बात है। मैंने कोई धमकी देने के लिए फोन नहीं किया था। मैंने उसे बस यह समझाने के लिए फोन किया था कि ऐसा किया करे। मैंने उससे फोन पर भी यही कहा था, देखो तुम भी मेरे इधर की ही रहने वाली हो इसलिए मैं तुम्हें समझा रहा हूं। वो मुझ पर गुस्सा होने लगी। तब मैंने उसे बताया था कि मैं ऐसे ही नहीं कह रहा, बल्कि तुम्हारा वीडियो बन चुका है।
इस बात से इतना तो कोई मूर्ख भी समझ सकता है कि किशन और प्रमोद दोनों ने मिलकर यह पूरा खेल रचा था और किशन के कहने पर ही फोन कर उसे धमकाया भी होगा, लेकिन क्या कोई आरोपी अपना आरोप स्वीकार करता है? कोर्ट से सजा पाया अपराधी भी अंत तक यही कहता है कि उसने कोई अपराध नहीं किया, उसे फंसाया गया है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। तब प्रमोद क्यों स्वीकारने लगा भला। इसके अलावा वह थप्पड़ मारने की बात भी स्वीकार रहा है। हां, खुद को बचाने के लिए इसमें लेखिका के थप्पड़ मारने की थ्योरी भी जड़ दी होगी उसने। इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उसने ये साफ-साफ कहा कि उसने लेखिका को थप्पड़ मारा। अगर लेखिका ने उसे थप्पड़ मारा होता तो पुलिस प्रमोद का मेडिकल जरूर करवाती। इतना सामान्य ज्ञान तो होना ही चाहिए। इसी बात से प्रमोद के झूठ का पता चलता है। इसके अलावा वह लेखिका के एक नये नंबर पर फोन करने की बात भी वह स्वीकार रहा है।
कमाल की बात यह है कि इस पूरे आलेख को प्रमोद बनाम लेखिका से हटाकर राजेंद्र यादव बनाम लेखिका बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि मुख्य मुद्दे पर से ध्यान हटाया जा सके, जबकि राजेंद्र यादव ने और ही लेखिका ने कभी यह बात कही है। बात इतनी सी है कि लेखिका का आक्रोश अपने पितातुल्य राजेंद्र यादव से बस इतना ही है कि क्यों स्त्री विमर्श के पुरोधा ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। उसकी पूरी लड़ाई वैचारिक दिखती है, जिसे आरोप-प्रत्यारोप में बदलने की कोशिश की जा रही है। हमें सिर्फ इस रिपोर्टर से बल्कि ऐसे बाकी लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है।
वैसे तो इस रिपोर्ट में कई और गंभीर त्रुटियां हैं, लेकिन मैं सिर्फ मोटी-मोटी त्रुटियों की तरफ ही ध्यान दिला रहा हूं। उम्मीद है तरुण जी आप इस तरफ ध्यान देंगे।
एक और कमाल देखिए इसअनकहा पक्षके लेखक निष्कर्ष देते हैं। दोनों पक्षों (यानी राजेंद्र यादव बनाम लेखिका, जो है ही नहीं) से इतर सच यही है। वह तो प्रमोद के लिए जेल मैन्युअल ब्रेक करने की भी बात करते हैं। वह वहां प्रमोद को नेट कनेक्शन दिये जाने की वकालत करते नजर आते हैं। लेकिन अंत में यह सवाल अब भी मौजू है कि रिपोर्टर आखिर इस रिपोर्ट को लिखने में एक पक्ष क्यों बन गया। आखिर वह ऐसा करना क्यों चाहता है। आखिर क्यों?
देवेन्द्र गौतम


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

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