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बुधवार, 17 अगस्त 2011

एक उजडी हुई बस्ती की दास्तां


शंकर प्रसाद साव

बाघमारा : मैं रायटोला हूं. कभी मैं बहुत सुंदर थी. सैकडों लोग यहां बसा करते थे. 50 से अधिक घरों का यह टोला में लोग खुशहाल थे. सभी चिजों की सुख सुविधा थी. बिजली पानी की कभी परेशानी नही हुई. यहां आ कर लोग राहत महशूस करते थे. आज मै बहुत बदसुरत हो गयी हूं. दर्जनों घर एक-एक कर के गोफ में समा गये. जान बचाने के लिए लोग इधर-उधर भाग रहे हैं.कुछ दिनों के बाद मेरा नामोनिशान मिट जायेगा. मुझे इस हाल में बीसीसीएल ने पहुंचाया हैं. अगर रायटोला बस्ती न होकर कोई मनुष्य होता तो यह दर्दभरी दास्तां इसी तरह से बयान करता. जिस तरह यहां के ग्रामीण अपना दुखडा सुनाते हैं.

                       सुर्खियों में है यह मामला
 वर्ष 2005 में घटी घटना को अभी तक लोग भुला नहीं पाये हैं. लोगों के जहन मे डर अभी तक खौफ खाये हुए है. इसी तरह बरसात के समय अचानक 6 घर गोफ में समा गये थे. इसके ठिक दूसरे-तिसरे दिन लगाातार कुल 12 घर भी भरभरा कर गिर गया. जिसमें दर्जनों की संख्या में बैल, बकरी, मुर्गी भी गोफ में समा गये थे. अधिकांश लोग घायल हो गये थे. इस घटना के बाद मची कोहराम से जिला प्रशासन को आगे आना पडा था. तत्कालीन डीसी श्रीमती बिला राजेश की हस्तक्षेप के बाद बीसीसीएल प्रबंधन ने पीडित परिवारों को भिमकनाली क्वाटर में सिट कराया था
                      क्या था योजना
विश्व बैंक की मदद से चालु किये गये ब्लॉक टू ओसीपी का विस्तारी करण के एद्देश्य से रायटोला  बस्ती को खाली कर ग्रामीणों को पूर्नवास कराने को था. यह योजना बर्ष 1992  में ही पूर्व सीएमडी ए के गंप्ता के कुशल नेतृत्व में बनी थी. योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए बीसीसीएल की हाई पावर की टिम द्धारा सर्वे भी किया गया था. जिसमें जिला प्रशासनिक अधिकारियों भी शामिल किया गया था.
                      अधर में लटका मामला
सर्वे के दौरान की कॉरपोरेट विलेज की अवधारणा 27 भू-स्वामियों को नियोजन देने के अलावा सभी ग्रामीणों को खानूडीह के पास सरकारी लैंड में बसाने के साथ पानी, बिजली, सडक, सामुदायिक भवन, स्कूल, अस्पताल सहित सभी सुविधायुक्त व्यवस्था देने के अलावा विस्थापित बेरोजगारों कोलडंप  रोजगार देने की योजना बनी थी. इस योजना पर आंदोलित सभी ट्रेड यूनियनों ने सहमति जतायी थी. फिलहाल मामला अधर में लटका हुआ हैं.
                      आंदोलन की रूप रेखा तैयार
रायटोला के ग्रामीणों की मांग एंव अस्तित्व की लडाई लड रहे घटवार आदिवासी समाज के लोग आर-पार की लडाई लडने के लिए प्रबंधन को नोटिस थमाया हैं. जिसमें कोलियरी का चक्का जाम करने की चेतावनी दी हैं. आंदोलन का नेतृत्व जिप सदस्य सह समाज के वरिय नेता सहदेव सिंह कर रहे हैं.

रविवार, 7 अगस्त 2011

नक्सलवाद..आतंकवाद और ड्रग माफिया

 दंतेवाडा कांड के बाद लम्बे समय तक चुप्पी साधे केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की भृकुटी फिर तनी दिखने लगी है. उन्होंने माओवादियों के विरुद्ध एक बड़ा अभियान चलने की तैयारी के संकेत दिए हैं. ऑपरेशन ग्रीन हंट की कमियों की उन्होंने किस हद तक समीक्षा की है और उन्हें दूर करने के क्या उपाय किये हैं. सूचना तंत्र कितनी मजबूत हुई है  यह तो पता नहीं लेकिन माओवादियों की ताक़त पहले से और बढ़ गयी है. इसका संकेत हाल के दिनों में उनकी गतिविधियों से जरूर मिला है. खनन क्षेत्रों में उनके आर्थिक स्रोत और मजबूत हुए हैं. स्थितियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गयी हैं. गृह मंत्रालय के पास ख़ुफ़िया संस्थानों की रिपोर्ट क्या कहती है यह तो पता नहीं लेकिन देश में अभी काले धन पर आधारित जो तंत्र  चल रहा है अपने प्रभाव क्षेत्रों में माओवादी उसका एक अहम हिस्सा बन चुके हैं.

शनिवार, 30 जुलाई 2011

निजी स्कूलों का मायाजाल


 सरकारी सुविधाएं उठाने में निजी स्कूल हमेशा आगे रहते हैं लेकिन बच्चों और उनके अभिभावकों को किसी तरह की राहत नहीं देना चाहते. झारखंड सरकार ने सभी निजी स्कूलों को 20 फीसदी गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का निर्देश दिया था. लेकिन इसपर अभी कोई भी स्कूल अमल नहीं कर रहा है. करीब 8 वर्ष पूर्व राज्य सरकार ने निजी स्कूलों के बसों के अतिरिक्त कर में 40 फीसदी से अधिक की छूट दी थी. इस छूट के बाद बस भाड़े में बच्चों को कोई राहत नहीं दी गयी लेकिन पिछले 8 वर्षों में करोड़ों के राजस्व की बचत जरूर कर ली गयी.

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

हीरा भी है सोना भी लेकिन किस काम का

जहांगीर के शासन काल में झारखंड में  एक राजा दुर्जन सिंह थे. वे हीरे के जबरदस्त पारखी हुआ करते थे. वे नदी की गहराई में पत्थर चुनने के लिए गोताखोरों को भेजते थे और उनमें से हीरा पहचान कर अलग कर लेते थे. एक बार मुग़ल सेना ने उनका राजपाट छीनकर उन्हें कैद कर लिया. जहांगीर हीरे का बहुत शौक़ीन था. एक दिन की बात है.  उसके दरबार में एक जौहरी दो हीरे लेकर आया. उसने कहा कि इनमें एक असली है एक नकली. क्या उसके दरबार में कोई है जो असली नकली की पहचान कर ले. कई दरबारियों ने कोशिश की लेकिन विफल रहे. तभी एक दरबारी ने बताया कि कैदखाने में झारखंड का राजा दुर्जन सिंह हैं. उन्हें हीरे की पहचान है. वे बता देंगे. जहांगीर के आदेश पर तुरंत उन्हें दरबार में बुलाया गया. उनहोंने हीरे को देखते ही बता दिया कि कौन असली है कौन नकली. जहांगीर ने साबित करने को कहा. उनहोंने दो भेड़ मंगाए एक के सिंघ पर नकली हीरा बांधा और दूसरे के सिंघ पर असली दोनों को अलग-अलग रंग के कपडे से बांध दिया. फिर दोनों को लड़ाया गया. नकली हीरा टूट गया. असली यथावत रहा. दरबार की इज्ज़त बच गयी. जहांगीर इतना खुश हुआ कि दुर्जन सिंह तो तुरंत रिहा कर उसका राजपाट वापस लौटा दिया.

सोमवार, 25 जुलाई 2011

काले धन को मौलिक अधिकार का दर्जा दे सरकार

यदि आप विदेशी बैंकों से काले धन की वापसी की मांग करते हैं तो आप सरकार की नज़र में एक जघन्य अपराध  करते हैं. आपके खिलाफ सरकार के हर विभाग को लगा दिया जायेगा. आपकी जन्म कुंडली खंगाल दी जाएगी. जबतक कांग्रेस की सरकार है न आप महंगाई के खिलाफ शोर मचाएंगे न काले धन का विरोध करेंगे. समझे आप! वरना सोचिये बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण की डिग्री की सीबीआई जांच की जरूरत क्यों पड़ी. क्या वे सरकारी नौकरी करते थे..?...किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन दिया था...?...नहीं न! अपना जड़ी-बूटी बेचते रहते. योग सिखाते रहते. कोई समस्या नहीं थी. उन्हें काले धन के चक्कर में पड़ने की क्या जरूरत थी...? वैश्वीकरण के युग में किसी ने विदेश में धन रख दिया तो क्या हुआ. सरकार से दुश्मनी..? ...अब भुगतो...श्रीमती गांधी ने आपातकाल के दौरान सत्ता का सही इस्तेमाल सिखा दिया था. क्या हुआ अगर उतनी मजबूत महिला को भी सत्ता से हाथ धोना पड़ गया. जनता सब भूल गयी. फिर उन्हें सिंहासन पर बिठा दिया.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

प्रिंट मीडिया : अंध प्रतिस्पर्द्धा की भेंट चढ़ते एथिक्स

  अभी मीडिया जगत की दो ख़बरें जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हैं. पहली खबर है अंतर्राष्ट्रीय मीडिया किंग रुपर्ट मर्डोक के साम्राज्य पर मंडराता संकट और दूसरी हिंदुस्तान टाइम्स  इंदौर संस्करण में लिंग परिवर्तन से संबंधित एक अपुष्ट तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट को लेकर चिकित्सा जगत में उठा बवाल. इन सबके पीछे दैनिक अख़बारों के बीच बढती प्रतिस्पर्द्धा के कारण आचार संहिता की अनदेखी की प्रवृति है. इस क्रम में एक और गंभीर बात सामने  आई की मीडिया हाउसों का नेतृत्व नैतिक दृष्टिकोण से लगातार कमजोर होता जा रहा है. विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने की जगह वह हार मान लेने या अपनी जिम्मेवारी अपने मातहतों के सर मढने की और अग्रसर होता जा रहा है.

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...