रांची। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक के खिलाफ विपक्षी दलों का झारखंड बंद अधिकांश जिलों में सफल दिख रहा है। दिन के 12.30 बजे तक बंद समर्थकों के सड़क पर उतरने, कहीं-कहीं टायर जलाकर सड़क जाम करने और गिरफ्तारियां देने की खबरें आ रही हैं। लेकिन अभी तक कहीं से भी जोर जबर्दस्ती अथवा हिंसात्मक टकराव की खबर नहीं है। दुकानें बंद हैं। अधिकांश स्कूल बंद हैं। परीक्षाएं अपने निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक चल रही हैं। राजधानी रांची में सवारी गाड़ियां कम चल रही हैं लेकिन निजी वाहनों का परिचालन जारी है। सड़कों पर रोज की तरह वाहनों का आवागमन नहीं है लेकिन कहीं सन्नाटा नहीं है। सुरक्षा बल चप्पे-चप्पे पर नजर रख रहे हैं। नक्सली इलाकों में विशेष चौकसी बरती जा रही है। विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ निकले हैं लेकिन उनका प्रयास भी शांतिपूर्ण तरीके से बंद को सफल बनाने की है। हालांकि अभी पूरा दिन बाकी पड़ा है।
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गुरुवार, 5 जुलाई 2018
बुधवार, 4 जुलाई 2018
पौधरोपण का कार्यक्रम आयोजित
रांची।
देश के जाने-माने ज्योतिषाचार्य एवं रांची के एक पुराने दैनिक अखबार के आध्यात्मिक
संपादक आचार्य अमरेन्द्र मिश्रा के बूटी स्थित आवास पर पौधरोपण का कार्यक्रम
आयोजित किया गया। इस मौके पर संयुक्त बिहार के मंत्री व राजद की प्रदेश अध्यक्ष
अन्नपूर्णा देवी, तिरंगा सम्मान यात्रा के सूत्रधार व प्रसिद्ध समाज सेवी सुधांशु सुमन
, पवन कुमार सिन्हा ,एक अखबार के वाईस प्रेजिडेंट और दिल्ली पुलिस के
पूर्व आईपीएस अनिल ओझा ने सामूहिक रूप से ग्रीन इंडिया के तहत बूटी मोड़ के पास आचार्य
अमरेन्द्र मिश्रा के आवास पर पौधा रोपण का कार्यक्रम संपन्न किया, इस कार्यक्रम में पूर्व आईपीएस श्री
ओझा ने कहा कि रांची एक्सप्रेस संयुक्त बिहार का प्राचीनतम अखबार है। सम्पूर्ण
बिहार और झारखंड के साथ देश के कोने कोने की खबरों को निष्पक्षता और निर्भीकता के
साथ जनता तक पहुंचाया जाता है जाता है। पिछले तीन वर्षों से अपने मुहिम "एक
हाथ मे तिरंगा दूजे हाथ मे पौधा", जय
जवान जय किसान जैसे नारों को इस अखबार ने
देश के गांव गांव ,घर घर तक पहुंचाने का काम किया है, देश की एकता के लिए गांव गांव में तिरंगा सम्मान यात्रा और पर्यावरण
की सुरक्षा के लिए पौधा रोपण देश भर में करना एक सराहनीय कदम है।
झाऱखंड के वन्य जीवन पर नक्सलवाद का ग्रहण
यह देश के 9 व्याघ्र अभयारण्यों में एक है। यह 1026 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसका कोर एरिया 226 वर्ग किलोमीटर में है। इसके किनारे 200 से अधिक गांव बसे हुए हैं। किसी जमाने में यहां बाघों की बहुतायत थी। ब्रिटिश शासन काल में इनका जमकर शिकार किया गया। उस समय बाघ का शिकार बहादुरी की अलामत मानी जाता थी। बाघ मारने पर सरकार की ओर से ईनाम दिया जाता था और शिकारियों का नागरिक सम्मान होता था। आजादी के बाद भी की वर्षों तक बाघों के शिकार का सिलसिला जारी रहा। बाद में शिकार पर रोक लगी और बाघों को संरक्षण की शुरुआत हुई। पलामू के बेतला टाइगर रिजर्व की स्थापना 1974 में की गई। यह देश का पहला टाइगर प्रोजेक्ट था। 1932 में बाघों की गिनती की शुरुआत यहीं से हुई थी। वर्ष 1992 में यहां 55 बाघ पाए गए थे। 2003 में उनमें से मात्र 36 बाघ बचे थे। 30 बाघ अवैध शिकार की भेंट चढ़ चुके थे। वर्ष 2010 में यूएनओ ने 29 जुलाई को विश्व व्याघ्र दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।
सरकार ने वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या दुगनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए आधारभूत संरचना को बेहतर करने का काम किया जा रहा है। बेतला टाइगर रिजर्व को इसके लिए 7 करोड़ की राशि आवंटित की गई थी लेकिन नक्सलियों के कारण इसमें बाधा आ रही है। 2012 में जब बाघों की गणना हुई तो पता चला कि मादा बाघ गिनती में सिर्फ पांच रह गई हैं। ऐसे में उनका प्रजनन सीमित संख्या में ही हो सकता था। दूसरे अभयारण्यों से मादा बाधों के लाने की योजना बनी लेकिन नक्सलियों के रहते वन्य जीवन की कोई योजना शायद ही फलीभूत हो सके। यहां बाघों के अलावा हाथी, तेंदुआ, सांभर, चीतल सहित हजारों नस्लों के छोटे बड़े जानवर, 174 प्रकार के पक्षी निवास करते थे। इसके जंगलों में 970 प्रकार के पेड़ पौधे और 139 तरह की दुर्लभ जड़ियां मिलती थीं। वन्य जीवन में रुचि रखने वाले हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते थे। अब उनकी संख्या नगण्य रह गई है। इससे स्थानीय ग्रामीणों के रोजगार के अवसर भी घटे हैं। जबसे यह इलाका नक्सल आंदोलन की जद में आया है, वन्य जीवन सिमटता जा रहा है। हाल में हाथियों के एक झुंड ने अभयारण्य में लगे दो ट्रैप कैमरों को तोड़ डाला था। वन्य जीवन की निगरानी के लिए लगे इन कैमरों पर नक्सलियों की भी कुदृष्टि रहती है। क्योंकि जंगली जानवरों के साथ उनकी गतिविधियां भी रिकार्ड होती हैं। बेतला टाइगर रिजर्व ही नहीं झारखंड के जंगलों में वन्य जीवन के भविष्य पर फिलहाल नक्सलवाद का ग्रहण लगा हुआ है।
-देवेंद्र गौतम
मंगलवार, 3 जुलाई 2018
सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी का दिन
कल 5 जुलाई है। झारखंड में भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच रस्साकशी को दिन। झामुमो और कांग्रेस समेत सारे विपक्षी दलों का झारखंड बंद का आह्वान और उसे विफल करने की सरकारी तैयारी। यह शक्ति प्रदर्शन का मामला है। इसकी घोषणा एक पखवारे पहले ही हो चुकी थी। इस बीच प्रचार युद्ध चल रहा था। इस क्रम में एक दूसरे की पोल भी खोली गई। इस मामले में सबसे संतुलित सुझाव आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो ने दिया है। उनका कहना है कि मानसून सत्र में इस मुद्दे पर दो दिनों तक सदन में बहस हो। अभी आम जनता पूरी तरह अनभिज्ञ है कि बिल में क्या संशोधन किया जा रहा है और उसके किन बिंदुओं पर विरोध है। आम जनता के लिए यह कैसे लाभदायक अथवा हानिकारक है। सदन में अथवा खुले मंच पर बहस होने पर ही आम जनता पूरी बात समझ पाएगी। दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के दौर के कारण लोग दिग्भ्रमित हैं। बिल का पूरा मसौदा पक्ष विपक्ष के नेताओं के पास है। इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है।
ऐसे में बंद का मतलब सिर्फ शक्ति प्रदर्शन ही हो सकता है। लोग बंद में इसलिए साथ देंगे क्योंकि वे हेमंत सोरेन, सुबोधकांत सहाय अथवा अन्य नेताओं के समर्थक हैं। यह बंद नेताओं के प्रति समर्थन की अभिव्यक्ति होगा मुद्दा विशेष पर आम जनता की राय नहीं। बेहतर होता कि इस लड़ाई को पहले सदन में लड़ा जाता। इसके बाद उसे सड़क पर लाया जाता। सुदेश महतो ने बहुत ही व्यावहारिक और सुलझा हुआ सुझाव दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बंद और आंदोलन किसी मुद्दे पर जनता की राय का आखिरी हथियार होता है। विधायी मामलों को पहले विधायी संस्थाओं में निपटाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद ही जनता की अदालत में जाना चाहिए। राजनीति सिर्फ राजनीति के लिए नहीं होनी चाहिए। एक दिन के बंद का दिहाड़ी मजदूरों और रोज कमाने खाने वालों पर क्या प्रभाव होता है, एक बार िसपर भी विचार कर लेना चाहिए। धनी वर्ग के लोगों को इससे कोई नुकसान नहीं होता। एक दिन की कमाई की भरपाई वे ्अगले दिन ही कर लेते हैं। लेकिन गरीबों को भरपाई में कई दिन लग जाते हैं। हमारे यहां बात-बात में बंद का आह्वान करने का प्रचलन हो गया है और ुसे जबरन सफल अथवा असफल बनाया जाता है। बंद का आह्वान करके यदि उसे जमता की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। लाठी-डंडा लेकर सड़कों पर न उतरा जाए तो शायद ही कोई बंद सफल हो पाए। लोग नुकसान के डर से सड़कों पर निकलने अथवा दुकानें बंद करते हैं। अपनी मर्जी से बहुत कम ही बंद में शामिल होते हैं। संघर्ष का यह हथियार लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं बल्कि अराजकता को बढ़ावा देने वाला होता है। हर लड़ाई को सड़कों पर नहीं लाना चाहिए। विधायी और न्यायपालिका के संस्थानों का आखिर गठन किसलिए हुआ है...य़
ऐसे में बंद का मतलब सिर्फ शक्ति प्रदर्शन ही हो सकता है। लोग बंद में इसलिए साथ देंगे क्योंकि वे हेमंत सोरेन, सुबोधकांत सहाय अथवा अन्य नेताओं के समर्थक हैं। यह बंद नेताओं के प्रति समर्थन की अभिव्यक्ति होगा मुद्दा विशेष पर आम जनता की राय नहीं। बेहतर होता कि इस लड़ाई को पहले सदन में लड़ा जाता। इसके बाद उसे सड़क पर लाया जाता। सुदेश महतो ने बहुत ही व्यावहारिक और सुलझा हुआ सुझाव दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बंद और आंदोलन किसी मुद्दे पर जनता की राय का आखिरी हथियार होता है। विधायी मामलों को पहले विधायी संस्थाओं में निपटाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद ही जनता की अदालत में जाना चाहिए। राजनीति सिर्फ राजनीति के लिए नहीं होनी चाहिए। एक दिन के बंद का दिहाड़ी मजदूरों और रोज कमाने खाने वालों पर क्या प्रभाव होता है, एक बार िसपर भी विचार कर लेना चाहिए। धनी वर्ग के लोगों को इससे कोई नुकसान नहीं होता। एक दिन की कमाई की भरपाई वे ्अगले दिन ही कर लेते हैं। लेकिन गरीबों को भरपाई में कई दिन लग जाते हैं। हमारे यहां बात-बात में बंद का आह्वान करने का प्रचलन हो गया है और ुसे जबरन सफल अथवा असफल बनाया जाता है। बंद का आह्वान करके यदि उसे जमता की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। लाठी-डंडा लेकर सड़कों पर न उतरा जाए तो शायद ही कोई बंद सफल हो पाए। लोग नुकसान के डर से सड़कों पर निकलने अथवा दुकानें बंद करते हैं। अपनी मर्जी से बहुत कम ही बंद में शामिल होते हैं। संघर्ष का यह हथियार लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं बल्कि अराजकता को बढ़ावा देने वाला होता है। हर लड़ाई को सड़कों पर नहीं लाना चाहिए। विधायी और न्यायपालिका के संस्थानों का आखिर गठन किसलिए हुआ है...य़
सोनामून की सैंडल-रजनीगन्धा अगरबत्ती लान्च
रांची, आकर्षक और सुगंधित अगरबत्ती निर्माण करनेवाले सोनामून इंडस्ट्रीज वर्क्स ने अगरबत्ती का नया ब्रांड सैंडल-रजनीगंधा बाजार मे उतारा है। मंगलवार को कंपनी के संस्थापक प्रवीण जयसवाल और ब्रांड एंबेसेडर प्रिया जयसवाल ने राजधानी में सैंडल रजनीगंधा अगरबत्ती लान्च किया। इस मौके पर उन्होंने बताया कि पहले से कंपनी की और से दिव्य ज्योति, गुडलक और श्रद्धा ब्रांड अगरबत्तियां बाजार में उपलब्ध कराई जा रही है। सोनामून की अगरबत्तियां गुणवत्तापूर्ण और मनमोहक हैं। कंपनी के प्रति ग्राहकों की बढ़ती विश्वसनीयता से उत्साहित होकर अगरबत्ती का नया ब्रांड पेश किया गया है। प्रवीण ने कहा कि सोनामून की ब्रांडेड अगरबत्तियां झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल के कई शहरों में भी उपलब्ध है।
वरिष्ठ पत्रकार शिशिर टुडु के निधन पर सुबोधकांत सहाय ने जताया शोक
रांची : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने शहर के वरिष्ठ पत्रकार शिशिर टुडु के असामयिक निधन पर शोक व्यक्त किया है। शोक संवेदना व्यक्त करते हुए श्री सहाय ने कहा कि स्व.टुडु जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता करते थे। विशेष रूप से आदिवासी मुद्दों को लेकर उनकी बेबाक लेखनी समाज के सभी वर्गों के लोगों के लिए पठनीय होती थी। उनके अकस्मात निधन से पत्रकारिता जगत में जो रिक्तता आ गई है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नही है।
उन्होंने स्व.टुडु के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। साथ ही कामना किया कि दुख की इस घड़ी में ईश्वर उनके परिवार को संबल प्रदान करें।
सोमवार, 2 जुलाई 2018
ऐतिहासिक होगा 5 जुलाई का बंद : सुबोधकांत सहाय
दावाः कार्पोरेट की कठपुतली सरकार के खिलाफ उमड़ेगा जन सैलाब
रांची। पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय का दावा है कि भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ विपक्ष की ओर से 5 जुलाई को प्रस्तावित झारखंड बंद ऐतिहासिक होगा। रघुवर सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण झारखंड की जनता त्रस्त है। पांच जुलाई को सड़कों पर जनसैलाब उमड़ेगा। उन्होंने कहा कि केन्द्र व राज्यों की भाजपा सरकार कारपोरेट घरानों की कठपुतली बनकर रह गई है। सिर्फ बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए भाजपा ने भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन कराया है। इससे किसानों की कृषि योग्य भूमि भी छिन जाएगी। रघुवर सरकार ने पेसा एक्ट, पंचायती राज व्यवस्था के विरूद्ध काम किया है। आदिवासियों और मूलवासियों के हक छीने जा रहे हैं। मेहनतकश मजदूर, गरीब किसानों की जमीन औने-पौने दाम पर जबरन अधिग्रहित कर कारपोरेट घरानों को सस्ते दर पर देने के लिए मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल पास कराया है। श्री सहाय ने कहा कि मुख्यमंत्री रघुवर दास जब सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन कराने मे सफल नहीं हो सके तो एक सोची समझी साजिश के तहत कारपोरेट घरानों को कौड़ी के भाव जमीन देने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून मे संशोधन कराने की साजिश रची। सरकार ग्राम सभा को भी नजरअंदाज कर गरीबों की जमीन हथियाने पर आमादा है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कुकृत्य का कांग्रेस पार्टी पुरजोर विरोध करती है। बिल के विरोध में तमाम विपक्षी पार्टियों की एकजुटता सराहनीय है। उन्होंने झारखंड की जनता से बंद को पूर्ण सफल बनाने में सहयोग करने की अपील की।
रांची। पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय का दावा है कि भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ विपक्ष की ओर से 5 जुलाई को प्रस्तावित झारखंड बंद ऐतिहासिक होगा। रघुवर सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण झारखंड की जनता त्रस्त है। पांच जुलाई को सड़कों पर जनसैलाब उमड़ेगा। उन्होंने कहा कि केन्द्र व राज्यों की भाजपा सरकार कारपोरेट घरानों की कठपुतली बनकर रह गई है। सिर्फ बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए भाजपा ने भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन कराया है। इससे किसानों की कृषि योग्य भूमि भी छिन जाएगी। रघुवर सरकार ने पेसा एक्ट, पंचायती राज व्यवस्था के विरूद्ध काम किया है। आदिवासियों और मूलवासियों के हक छीने जा रहे हैं। मेहनतकश मजदूर, गरीब किसानों की जमीन औने-पौने दाम पर जबरन अधिग्रहित कर कारपोरेट घरानों को सस्ते दर पर देने के लिए मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल पास कराया है। श्री सहाय ने कहा कि मुख्यमंत्री रघुवर दास जब सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन कराने मे सफल नहीं हो सके तो एक सोची समझी साजिश के तहत कारपोरेट घरानों को कौड़ी के भाव जमीन देने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून मे संशोधन कराने की साजिश रची। सरकार ग्राम सभा को भी नजरअंदाज कर गरीबों की जमीन हथियाने पर आमादा है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कुकृत्य का कांग्रेस पार्टी पुरजोर विरोध करती है। बिल के विरोध में तमाम विपक्षी पार्टियों की एकजुटता सराहनीय है। उन्होंने झारखंड की जनता से बंद को पूर्ण सफल बनाने में सहयोग करने की अपील की।
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