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रविवार, 7 अगस्त 2011

नक्सलवाद..आतंकवाद और ड्रग माफिया

 दंतेवाडा कांड के बाद लम्बे समय तक चुप्पी साधे केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की भृकुटी फिर तनी दिखने लगी है. उन्होंने माओवादियों के विरुद्ध एक बड़ा अभियान चलने की तैयारी के संकेत दिए हैं. ऑपरेशन ग्रीन हंट की कमियों की उन्होंने किस हद तक समीक्षा की है और उन्हें दूर करने के क्या उपाय किये हैं. सूचना तंत्र कितनी मजबूत हुई है  यह तो पता नहीं लेकिन माओवादियों की ताक़त पहले से और बढ़ गयी है. इसका संकेत हाल के दिनों में उनकी गतिविधियों से जरूर मिला है. खनन क्षेत्रों में उनके आर्थिक स्रोत और मजबूत हुए हैं. स्थितियां पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गयी हैं. गृह मंत्रालय के पास ख़ुफ़िया संस्थानों की रिपोर्ट क्या कहती है यह तो पता नहीं लेकिन देश में अभी काले धन पर आधारित जो तंत्र  चल रहा है अपने प्रभाव क्षेत्रों में माओवादी उसका एक अहम हिस्सा बन चुके हैं.
कोयला और लौह अयस्क का उत्खनन उनकी रजामंदी से चल रहा है. सूचना तो यह भी है कि पुलिस के कई वरीय अधिकारी अवैध उत्खनन में अपनी पूंजी निवेश किये हुए हैं और माओवादियों से इस मामले में उनका मौसेरा रिश्ता भी बना हुआ है. दूरस्थ इलाकों के थाने उनके रहमो-करम पर संचालित हो रहे हैं. कोई भी विकास योजना उन्हें लेवी दिए बिना क्रियान्वित नहीं हो पाती. यही नहीं ऐसी जानकारी मिल रही है कि अब अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया भी माओवादियों के कंधे पर सवार होकर नक्सल प्रभावित इलाकों में भी अपना जाल फैलाता जा रहा है. ड्रग के अवैध कारोबार से ही आतंकवाद का विषबेल पनपता और विकसित होता है. यही कारण है कि अब नक्सली और आतंकवादी कार्रवाइयों के बीच फर्क कर पाना कठिन होता जा रहा है.  झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसे राज्यों में ड्रग माफिया अपना जाल फैला चुका है. माओवादियों के पास इस अवैध व्यापार से करोड़ों-करोड़ की आय हो रही है. पुलिस को इसकी जानकारी है लेकिन वह एक सीमा तक ही इसे रोकने का प्रयास कर पा रही है. झारखंड पुलिस ने कुछ समय पूर्व ही कई जगहों पर एक-एक  एकड़ खेतों में लगी अफीम की खेती को नष्ट कर इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया था। नामकूम में, खूंटी के मुरहु में और मैक्लुस्कीगंज में  एक-एक एकड़ में लगी पोस्ते की फसल नष्ट की गयी कुछ लोग गिरतार भी किये गये। पुलिस ने इसमें चीरा लगाकर निकाले जाने वाले अफीम की अनुमानित कीमत कई करोड़ आंकीं.  
इसके कुछ ही दिनों पूर्व रांची में करीब 15 लाख के ब्राउन सुगर के साथ दो लोग दबोचे गये थे. पुलिस ने इसे भी बड़ी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ आप थपथपायी जबकि यह घटनाएं बरगद के विशाल वृक्ष से कुछ पत्ते तोड़ लाने के समान हैं. झारखंड में माओवादियों के सघन प्रभाव वाले इलाकों में सैकड़ों एकड़ जमीन पर अफीम की खेती हो रही है यह सर्वविदित है. हजारीबाग, चतरा, गुमला समेत राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित हैं. इनमें कई इलाके ऐसे हैं जहां कानून-व्यवस्था की पहुंच नहीं हैं. मुख्य खेती उन्हीं इलाकों में होती है. अभी तक अफीम या पोस्ते की वही फसल नष्ट की गयी है जो माओवादियों के कम प्रभाव वाले इलाकों में लगी थी. कम रकबे में ऐसी फसल पुलिस को खानापूरी का मौका देने के उद्देश्य से भी लगायी जाती है. इसमें पकड़े गये लोग भी कानून की धाराओं के बीच अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं. सच तो यह है कि राज्य सरकार के कई मंत्री माओवादियों के हमदर्द हैं. पुलिस विभाग में भी माओवादियों के संरक्षक मौजूद हैं. माओवादी अक्सर उनकी काबलियत सिद्ध करने का रास्ता देते हैं.
सच पूछें तो झारखंड में नक्सलियों के कंधे पर अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया कई वर्षों से अपनी गोटी लाल कर रहा है. कई बार यह बात सामने आ चुकी है कि बिहार के मोहनिया और सासाराम के भूमिगत हेरोइन कारखानों को कच्चे माल की आपूर्ति झारखंड के माओवाद प्रभावित इलाकों से हो रही है. माओवादी दरअसल किसानों को अफीम की खेती के लिये प्रेरित करते हैं और उसे ब्राउन सुगर में परिणत कर ड्रग माफिया के हवाले कर देते हैं. ड्रग माफिया से उन्होंने अफीम से ब्राउन सुगर बनाने तक की तकनीक हासिल कर ली है. इसके बाद हेरोइन बनाने तक की प्रोसेसिंग मोहनिया और सासाराम में होती है. माओवादियों के गोला-बारूद और हथियारों की खरीद की अर्थव्यवस्था में इस धंधे का बड़ा योगदान होता है. माओवादी ही क्यों पूरे विश्व में गैरकानूनी हथियारबंद हिंसक गतिविधियां ड्रग स्मगलिंग से चल रही हैं. चाहे आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो या फिर खुफिया संस्थाओं के गैरकानूनी अभियान उनके भरण-पोषण का यह एक बड़ा आधार है. अब नशीले पदार्थों की तस्करी आम आपराधिक या तस्कर गिरोहों के हाथ में नहीं रही. खुफिया एजेंसियों और आतंकवादी संगठनों ने इसपर कब्ज़ा कर लिया है. सासाराम और मोहनिया उत्तर भारत में ड्रग स्मगलिंग के पुराने केंद्र रहे हैं. यहां के ड्रग माफियाओं के तार अफगानिस्तान और अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया से जुड़े हैं. यहां से हेरोइन, मार्फिन आदि नेपाल और मुंबई के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचते हैं. कुछ वर्ष पूर्व तक इन इलाकों के गुप्त कारखानों को उत्तर प्रदेश के बारावंकवी से अफीम की आपूर्ति होती थी. 10 -11   वर्ष पहले बारावंकवी के किसानों ने जापानी पुदीना की खेती की जो काफी लाभदाक रही. इसके बाद वे औषधीय पौधों की खेती की तर मुड़ गये. पोस्ते की खेती के झंझटों से उन्होंने किनारा कर लिया. इसके कारण सासाराम और मोहनिया के हेरोइन कारखानों को कच्चा माल यानी अफीम मिलने में परेशानी होने लगी. इस स्थिति में उन्होंने झारखंड के माओवादियों से संपर्क साधा. उन दिनों माओवादी पीपुल्स वार ग्रुप से युद्ध की आधुनिकतम तकनीक सीख रहे थे. उन्हें आधुनिक हथियार और गोला बारूद खरीदने के लिये काफी पैसों की जरूरत थी. लेवी के पैसों और अन्य आर्थिक स्रोतों से उसकी पूर्ति नहीं हो पा रही थी. इसलिये ड्रग माफिया का प्रस्ताव उन्होंने मंजूर कर लिया. इस तरह वे अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादियों के नेटवर्क से जुड़ गये.
उग्रवाद और आतंकवाद के बीच का फर्क काफी हद तक मिट गया. एक रिपोर्ट के मुताबिक 1990 के दशक में एक बार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआई ने तत्कालीन माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर को साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन एमसीसी ने यह कहकर प्रस्ताव को ठुकरा दिया था कि वे व्यवस्था परिवर्तन के लिये लड़ रहे हैं, वे देशद्रोही नहीं हैं. इसलिये देश के दुश्मनों के साथ कोई साझा मोर्चा नहीं बन सकता. इसके कुछ ही वर्षों बाद आर्थिक दबाव के कारण वे परोक्ष रूप से आतंकवादियों के साथ एक गठबंधन बना बैठे. लस्करे-तोएबा समेत कई आतंकवादी संगठनो के साथ इसके संबंधों के संकेत मिलते रहे हैं.
दरअसल यह सिर्फ झारखंड या छत्तीसगढ़ या उड़ीसा या पश्चिम बंगाल की नहीं बल्कि अतर्राष्ट्रीय समस्या है. विश्व के विभिन्न देशों में चलाई जा रही आतंकवादी गतिविधियों का 75 प्रतिशत खर्च नशीली दवाओं के व्यापार से उगाही गयी राशि से पूरा किया जाता है. यह समस्या इतना खौफनाक रूप ले चुकी है कि सयुक्त राष्ट्र संघ ने पिछली सदी के अंतिम यानी नब्बे के दशक को नशीले पदार्थों के विरोध के दशक के रूप में मनाया. संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व के कई ताकतवर देशों के अभियान के बावजूद इसे रोका नहीं जा पा रहा है. नशीले पदार्थों की तस्करी का सबसे बड़ा केंद्र लाओस, म्यांमार, अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाके हैं. इसे गोल्डेन ट्रैंगल कहा जाता है. इसकी सीमाएं भारत और पाकिस्तान से भी मिलती हैं. 1994-95 के जमाने से यहां हजारों हेक्टेयर भूमि पर अफीम की खेती होती है. म्यांमार यूरोप और अमेरिका में भेजे जाने वाले अफीम और हेरोइन के 60 प्रतिशत से ज्यादा की अकेले आपूर्ति करता है. म्यांमार की सीमा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से मिलती है. भारत का हाइवे नंबर 39 ड्रग माफिया का उन्मुक्त अभयारण्य माना जाता है. म्यांमार से भारत को जोड़ने वाला यह हाइवे घने जंगलों से होकर गुजरता है. इसमें सुरक्षा प्रबंध सफल नहीं हो पाता. काठमांडो से दिल्ली और मुंबई के जुड़ जाने से ड्रग माफिया का काम और आसान हो गया है. म्यांमार की सीमा पर तैनात भारतीय सेना के कुछ लोग भी इस व्यवसाय में शामिल रहे हैं. सेना के बड़े अधिकारी भी कई बार हेरोइन बेचते रंगे हाथों पकड़े जा चुके हैं. 1988 में एक कर्नल स्तर के अधिकारी इसी चक्कर में गिरतार किये गये थे. अफगानिस्तान में 1957 से ही नशीले पदार्थों के उत्पादन पर कानूनी प्रतिबंध लागू है. लेकिन वहां की भौगोलिक स्थिति और राजनैतिक अस्थिरता के कारण यह व्यवसाय फलता फूलता रहा. 1979 में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान और ईरान ने सोवियत विरोधी गुटों को हथियारबंद करने के लिये नशीले पदार्थो की तस्करी से धन इकट्ठा करने को प्रेरित किया. सीआइए ने भी इसमें मदद की. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी उसी समय से नशीले पदार्थों की तस्करी में संलिप्त है. अफगानिस्तान की सीमा पर उथल-पुथल के कारण भी भारत ड्रग तस्करी  का वैकल्पिक मार्ग बन गया है. 90 के दशक में ही मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में अफीम से हेरोइन बनाने की कम लागत वाली भारतीय तकनीक ड्रग माफिया के हाथ लगी. इसमें किसी उपकरण की आवश्कता नहीं थी और एक किलोग्राम अफीम से 10 ग्राम शुद्ध हेरोइन बन जाती थी. इस तकनीक की बाजाप्ता फिल्म तैयार की गयी. इसके बाद इस धंधे में भारत की भागीदारी बढ़ी. नारकोटिक्स विभाग ने ऐसी एक कैसेट के साथ पांच तस्करों को गिरतार भी किया था. आज भारत के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों से भारी पैमाने पर हेरोइन की तस्करी हो रही है. ड्रग माफिया प्राय: नक्सली, आतंकी और खुफिया संस्थानों के साथ मिलकर अपना जाल फैलाता है. कई देशों की सरकारें ड्रग माफिया के निर्देशों से संचालित होती हैं. पाकिस्तान उनमें प्रमुख हैं. वहां के नेता एक दूसरे के विरुद्ध ड्रग माफिया से संबंध होने का लांछन लगाते रहे हैं.  सैनिक तानाशाहों ने अपने निहित स्वार्थ के लिये तस्करी को बढ़ावा और तस्करों को संरक्षण दिया। अब आतंकवादियों और अंतर्राष्ट्रीय खुफिया संगठनों की गैरकानूनी  गतिविधियों के खर्च की भरपाई इस धंधे से हो रही है. इसपर रोक लगाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इमानदार पहल और दृढ इच्छाशक्ति की जरूरत है.

---- देवेंद्र गौतम

2 टिप्‍पणियां:

  1. सही मुद्दे को लेकर आपने बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! उम्दा आलेख!

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