- सुनो,
कभी ऐसा भी तो हो
कि इक सुबह चल पड़े हम
नंगे पांव घास पर,
बटोरे ढेर सारी ओस की बूंदे
कभी भींग जाये बरिशो में
गुनगुनाए एक गीत
चल पड़े
किसी ओर , कही भी
बस, हम और तुम
बैठे रहे इक नाव पर
बाते करते रहे खामोशियो मे
छत के उस कोने से
देखते रहे, ढलता सूरज
साथ-साथ
कभी मै बोलु और तुम सुनो
सुनते रहो मुझे
थामे हुए मेरा हाथ
इक आखिरी ख्वाहिश भी है
वह तो सुनो
कभी ऐसा हो
कि तुम्हारी गोद में सिर रखकर
पढ्ती रहू 'अमृता' को
तुम गुनगुनाते रहो एक ग़ज़ल
और ...और
उस पल मे ही
थम जाये सबकुछ
बंद हो जाये मेरी पलके
हमेशा-हमेशा के लिये
http://swayambara.blogspot.in/
यह ब्लॉग खोजें
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी
झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी काशीनाथ केवट 15 नवम्बर 2000 -वी...
-
झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी काशीनाथ केवट 15 नवम्बर 2000 -वी...
-
कई साल पहले की बात है ...शायद बी. एस सी. कर रही थी ..मेरी आँखों में कुछ परेशानी हुई तो डोक्टर के पास गयी..वहां नेत्रदान का पोस्टर लगा द...
-
गरीबों के मसीहा संत शिरोमणि श्री श्री 108 स्वामी सदानंद जी महाराज के द्वारा संचालित रांची की सुप्रसिद्ध समाज...
-
* जनता के चहेते जनप्रतिनिधि थे पप्पू बाबू : अरुण कुमार सिंह बख्तियारपुर / पटना : पूर्व विधायक व प्रखर राजनेता स्व.भुवनेश्वर प्रसाद ...
-
2014 के बाद से भारत में ड्रग तस्करी के संदर्भ में कई बदलाव और चुनौतियाँ सामने आई हैं। भारत की भूमिका इस मामले में दोहरी रही है - एक ओर यह...
नवरात्रि की शुभकामनायें आदरणीया-
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति पर बधाई