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शनिवार, 10 नवंबर 2018

इतनी मीडिया विरोधी क्यों है मोदी सरकार






 ढाई लाख से अधिक अखबारों के टाइटिल रद्द
804 अखबार डीएवीपी की विज्ञापन सूची के बाहर

नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2016-17 के दौरान आरएनआई और डीएवीपी के नियमों में बदलाव के जरिए छोटे-मंझोले अखबारों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया साथ ही इलेक्ट्रोनिक और डिजिटल मीडिया के अनुकूलन की पूरी व्यवस्था कर ली। यह कोई नई बात नहीं है। केंद्र में जब भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनती है तो वह स्वयं को अपराजेय समझने लगती है। उसका पहला हमला मीडिया पर होता है। 1980 में जब इंदिरा गांधी की सरकार शर्मनाक हार के बाद पूरे दम-खम के साथ वापस लौटी तो वे जनता सरकार के ढाई वर्षों के दौरान अखबारों की भूमिका से बेहद खार खाई हुई थीं। उन्होंने अखबारों को सबक सिखाने के लिए कई उपाय किए। एक तो न्यूजप्रिंट का मामला अधर में लटकाये रखा। दूसरे टीवी के अधिकतम विस्तार की नीति अपनाई ताकि प्रिंट मीडिया का महत्व घटे। उन्होंने यह कोशिश नहीं की कि अखबारी कागज देश में बन कर सस्ता मिले या विदेशों से आयातित न्यूजप्रिंट का दाम कम हो। गरीब और मध्यमवर्गीय जनता को अखबार और पत्र पत्रिकाएं सस्ते दामों पर मिलें। उन्होंने ऐसी नीति अपनाई कि अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के दाम बेहिसाब बढ़ते चले गए। उधर जनहित के नाम पर कलर टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर रियायतें दी गईं जो पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में था।
         
नरेंद्र मोदी सरकार मीडिया से खार तो नहीं खाई हुई थी लेकिन संभवतः वे किसी किस्म की आलोचना सुनने के आदी नहीं थे। या मीडिया उनके एजेंडे में बाधा डाल सकता था। उन्होंने ऐसी सख्ती बरती कि छोटे-मंझोले अखबारों का संचालन मुश्किल हो गया। इससे आमजन की आवाज बुलंद करने वाली पत्र-पत्रिकाएं बंद होने लगीं उनसे जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बड़े मीडिया घरानों से सरकार को परेशानी नहीं थी क्योंकि वे पूरी तरह कारपोरेट के चंगुल में आ चुके थे। जनता के मुद्दों को दरकिनार कर वे रागदरबारी गाने लगे थे। सरकार को उन छोटे-मंझोले अखबारों से परेशानी थी जो अपने सरकारी तंत्र के अंदर की गड़बड़ियों का पर्दाफाश करते थे। जरूर उनके बीच ऐसे तत्व भी थे जो अखबारों पत्रिकाओं की आड़ में सिर्फ और सिर्फ सरकारी विज्ञापन हासिल करने की जुगत में लगे रहते थे। जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं रहता था। जो ब्लैकमेलिंग और उगाही के धंधे में भी लिप्त थे। लेकिन घुन का सफाया करने के नाम पर गेहूं के गोदाम में जहर का छिड़काव कर दिया गया।

मोदी सरकार के नए नियमों के बाद आरएनआई और डीएवीपी काफी सख्त हो गए। समाचार पत्र के संचालन में जरा भी नियमों की अवहेलना होने पर आरएनआई समाचार पत्र के टाईटल पर रोक लगाने लगा। उधर, डीएवीपी विज्ञापन देने पर प्रतिबंध लगाने को तत्पर हुआ। देश के इतिहास में पहली बार लगभग 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए गए और 804 अखबारों को डीएवीपी ने अपनी विज्ञापन सूची से बाहर निकाल दिया गया। आरएनआई ने समाचार पत्रों के टाइटल की समीक्षा में समाचार पत्रों की विसंगतियां तलाश कर प्रथम चरण में  प्रिवेंशन ऑफ प्रापर यूज एक्ट 1950 के तहत देश के 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए। इसमें सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के 59703, और फिर उत्तर प्रदेश के 36822 पत्र-पत्रिकाएं शामिल थीं। इसके अलावा बिहार के 4796, उत्तराखंड के 1860, गुजरात के 11970, हरियाणा के 5613, हिमाचल प्रदेश के 1055, छत्तीसगढ़ के 2249, झारखंड के 478, कर्नाटक के 23931, केरल के 15754, गोआ के 655, मध्य प्रदेश के 21371, मणिपुर के 790, मेघालय के 173, मिजोरम के 872, नागालैंड के 49, उड़ीसा के 7649, पंजाब के 7457, चंडीगढ़ के 1560, राजस्थान के 12591, सिक्किम के 108, तमिलनाडु के 16001, त्रिपुरा के 230, पश्चिम बंगाल के 16579, अरुणाचल प्रदेश के 52, असम के 1854, लक्षद्वीप के 6, दिल्ली के 3170 और पुडुचेरी के 523 पत्र-पत्रिकाओं के टाइटिल रद्द किए गए।

अब पांच विधानसभा और लोकसभा के चुनाव सामने हैं। भारी संख्या में जनता की आवाज़ उठाने वाले छोटे-मंझोले अखबार बंद हो चुके हैं लेकिन उनकी बंदी से बेरोजगार हुए पत्रकार किसी न किसी माध्यम से अपनी कलम चलाते रहे हैं। कुछ अखबार उल्टी सांस लेते हुए भी जीवित बच गए हैं। मोदी की अपराजेय होने की खुशफहमी कई मौकों पर भंग हो चुकी है। दामन पर कई दाग भी लग चुके हैं। जिन्हें जनता देख रही है। अपने मीडिया विरोधी चेहरे को लेकर यह सरकार चुनाव में कौन सा चमत्कार दिखा पाती है, यही देखना है।



डीएवीपी विज्ञापन नीति पर लीपा का पत्र

(इसे 25 अगस्त 2016 को जारी किया गया था। )



मेरे साथियों,
पिछले दो महीने से डीएवीपी एड पॉलिसी को लेकर हम सभी परेशान हैं और इस पॉलिसी के विरोध में लीपा द्वारा अनेक कोशिश की गयी बल्कि हम सबने अपने अपने स्तर पर कोशिश की। लेकिन आज मैं आपसे कुछ ऐसे बिन्दुओं पर बात करने जा रहा हूँ जो शायद बहुत से साथियों को ना पसंद आये और कई लोग लीपा पर अनर्गल आरोप लगाने लगें, मेरे खिलाफ अभियान चलायें, मेरा पुतला फूकें और ना जाने क्या क्या हो..
लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ कि डीएवीपी की नई एड पॉलिसी आखिर किसके खिलाफ है? क्या यह वाकई स्माल और मीडियम अख़बारों के खिलाफ है? क्या वास्तव में 25000 से ज्यादा कॉपी छापने वाले अखबारों को सरकार के सामने गिड़गिड़ाने की जरुरत है या सरकार को इन अख़बारों के सामने घुटने टेकने की जरुरत है? (लेकिन 25000 छपे तो सही) अब सवाल है ऐसी पॉलिसी आखिर आई क्यूँ, और क्या हम इस नीति पर सरकार, किसी मंत्री, सिस्टम या डीएवीपी को गाली देकर अपने आप को संतुष्ट कर सकते हैं? इन सवालों पर सबको सोचने की जरुरत है लेकिन उससे पहले मैं बताना चाहता हूँ लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन को बनाने का हमारा उद्देश्य है कि रीजनल मीडिया में कार्य करने वाले अपने वरिष्ठ साथियों के सम्मान को पुन: स्थापित करें, उनकी आर्थिक समृद्धि के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था को विकसित कर सकें।
लेकिन समस्या यह है कि आज प्रकाशक और अखबार मालिक के तौर पर हमारे बीच कुछ ऐसे दलाल किस्म के लोग आ गये जिन्होंने रीजनल मीडिया के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर दिया है। ऐसे लोगों का पत्रकारिता या अखबार के प्रकाशन से कोई लेना देना नहीं है उनका मकसद सिर्फ पैसा या अपना रूतबा कायम करना है। ऐसे लोग उन प्रकाशकों को बदनाम कर रहे हैं जो पत्रकारिता को मिशन मानते हैं और अपने अखबार के माध्यम से जनता को न्याय दिलाने का काम करते हैं। ऐसे ही दलाल किस्म के लोगों की वजह से आज यह स्थिति आई है।
वो यह नहीं समझते कि डीएवीपी के कुछ भ्रष्ट अफसर ही पूरा राजतंत्र नहीं है और ना ही फर्जी सर्कुलेशन को चेक करना नामुमकिन है। ये तो एक उघड़ा हुआ सत्य है, जब ऐसे 50 कॉपी छापने वाले अखबार 50 और 75 हजार सर्कुलेशन दिखाते हैं तो वो ये भूल जाते हैं कि सरकार में बैठे लोग ये देख रहे हैं कि एक प्रिंटिंग प्रेस जिसकी क्षमता कम है फिर भी उसी की डिकलेरेशन के साथ 100-100 अखबार इतना बड़ा सर्कुलेशन दिखाने का दावा कर रहे हैं। मैं ऐसे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो अपने अखबार के माध्यम से लोगो की वर्षों से सेवा कर रहे हैं, उनके क्षेत्र में उनका अखबार आम लोगों की सशक्त आवाज़ बना हुआ है।
ऐसे प्रेरक प्रकाशक संपादक भी यदि अपने अखबार को लेकर डीएवीपी या किसी मंत्रालय में जाते है तो उनको हेय दृष्टि से देखा जाता है क्यूंकि हमारे बीच कई ऐसे लोग आ गये है जिन्हें ठीक से बोलना और पढ़ना नहीं आता फिर भी उन्होंने किसी तरह से अखबार का पंजीकरण करा लिया और एक ही लक्ष्य बना लिया कि अब डीएवीपी पैनल कराना है, और वो डीएवीपी के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों से अवैध गठजोड़ कर अखबार को पैनल करा लेते हैं और फिर शुरू होता एक के बाद एक एडिशन का खेल और उन अख़बारों का हक मारते रहते है जो ईमानदारी से छप रहे है। और सही सर्कुलेशन दिखा रहे हैं। डीएवीपी की नई नीति उन लोगों के खिलाफ है जो फर्जीवाडा करते हैं डीएवीपी विज्ञापन नीति उन समूहो के खिलाफ है जो ये समझते हैं कि मैं अपने अखबार के अगर 10 या15 ऐडिशन निकाल दूं तो15 विज्ञापन मिलेंगें, उनका काम ही है जुगाड़ करना।
लीपा ऐसी किसी भी नीति का पुरजोर समर्थन करती है जिससे ऐसे फर्जी पब्लिशर्स खत्म हो और रीजनल मीडिया की विश्वसनीयता फिर से बरकरार हो। इतना ही नहीं वर्तमान में हम देख रहें है कि नीति को पूरा समझे बिना कई लोगों ने अनर्गल प्रलाप शुरू कर दिया। यही वो लोग है जो पॉलिसी के रोल बैक की बातें कर रहें हैं। उन्हें समझना होगा कि सीना तानकर झूठ नहीं बोला जाता। मेरा हाथ जोड कर निवेदन है कि तर्कहीन आन्दोलन और अर्थहीन भूख हड़ताल (जिसे शाम होते ही तोड़ना पड़े) करके इस विषय को कमजोर मत बनाइये। अव्यवस्थित आंदोलनों और भूख हडतालों से रीजनल मीडिया की विश्वसनीयता ही कम होती है। हमारी ताकत है अखबार और इसी के माध्यम से अपनी ताकत दिखानी चाहिए। क्योंकि जब आन्दोलन होते हैं तो अखबर में ही छपते हैं।
हमने 25 जून की बैठक में प्रस्ताव रखा था कि हम क्यों ना हम खुद सरकार को कहें कि आप हमारे अख़बारों का सर्कुलेशन जाँच करें हम आरएनआई और सरकार को चैलेंज करे कि आइये हमारा सर्कुलेशन चेक कीजिये, और जाँच के बाद हमारा जितना भी सर्कुलेशन हो उसके आधार पर हमें विज्ञापन के लिये सूचिबद्ध करें। लीपा इस शक्ति के साथ सरकार पर दबाव बनायेगी कि जब एक अखबार ईमानदारी से चल रहा है और आपने उसका सर्कुलेशन चेक कर लिया तब आप उस अखबार को बिना किसी अनावश्यक कागजी कार्यवाही के डीएवीपी में सूचिबद्ध किजिये, अच्छा विज्ञापन रेट दिजिये, दलालों को खत्म कीजिये। परन्तु साथियों ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस मामले में बिल्कुल पाक-साफ है इस नीति के अंदर दो-तीन खामियां ऐसी है जिससे साफ पता चलता है कि सरकार और सरकार में बैठे लोगों ने रीजनल मीडिया को सिर्फ एक ही नजरिये से देखकर इस नीति को बनाया है। उन्होंने ये मान लिया है कि रीजनल मीडिया में जितने भी अखबार छपते हैं वो सभी फर्जी है और ये मान कर इस नीति को बनाया है। नई नीति के दो-तीन बिन्दुओं से ये साफ पता चलता है कि ऐसे लोग इस विषय पर कितने अज्ञानी है, अव्यवहारिक है।
मसलन विविधता से भरे इस देश में क्या हम सिर्फ 3 न्यूज एजेन्सी के भरोसे अखबारों को चला सकते हैं? क्या हम किसी अखबार को बाध्य कर सकते की उसको फ़लां न्यूज एजेन्सी से ही खबर लेनी होगी। ये सरकार की अज्ञानता, अव्यवहारिकता दिखाती है। दूसरा बिन्दू, सबके लिए प्रिंटिंग मशीन होना अनिवार्य कर दिया गया लेकिन यदि मेरा सर्कुलेशन 45000 है और मेरी मासिक पत्रिका है या मेरा 35 हजार सर्कुलेशन है और मेरा अखबार पाक्षिक है तो मुझे क्या जरूरत है प्रिंटिंग मशीन की? सरकार ने बिना समझे प्रिंटिंग मशीन को सबके लिये आधार बना दिया। तीसरा विरोध का घोर का बिन्दू है कि एक अखबार को सूचीबद्ध कराने के लिए अब 36 महीने का इंतजार करना होगा। पहले भी यही अवधि थी लेकिन पिछली सरकार ने इसे घटाकर 18 महीने किया था।
मुझे समझ नहीं आया कि इस अवधि को बढ़ा कर 36 महीने करने का क्या तर्क है? क्या सरकार चाहती है कि एक अखबार पहले अपने घरबार को गिरवी रखकर चले और चल कर खत्म हो जाए। सब जानते हैं कि एक अखबार का बिना व्यवसायिक घराने की सपोर्ट या सरकारी विज्ञापन के इतने लंबे समय चलना बेहद कठिन कार्य है। अगर आपके मापदंड पूरे करते हुए एक अखबार ने ये 18 महीने पूरे कर लिए तो आप उसको क्यू नहीं सूचीबद्ध कर सकते? उसको 36 महीने तक मरने के लिए क्यों छोड रहे हैं? क्या सरकार क्षेत्रीय समाचारपत्रों की हत्या करना चाहती है? क्या सरकार मीडिया को मैनेज करना चाहती है? कुल मिलाकर के लीपा का स्पष्ट रूख है विज्ञापन नीति के अंदर जो खामियां है उसको लीपा बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करगी।
नई नीति के इन बिन्दुओं का लीपा घोर विरोध करती है और ये पूरे साहस के साथ कहती है कि जब तक विज्ञापन नीति की यह कमियां ठीक नहीं होंगी लीपा चैन से नहीं बैठेगी। हो सकता है कि मेरा लेख पढ़ने के बाद आप लीपा के बारे आपकी सोच नकारात्मक हो जाये, लेकिन मेरे साथी मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि “लीड इंडिया ग्रुप” के अखबार ने आज तक सरकार से एक भी विज्ञापन नहीं लिया है, हमने अपने हित को त्याग कर अपने ऑफिस और एसोसिएशन को चलाने का संकल्प लिया। हम आज ऑनलाइन मीडियम और लिमिटेड प्रिंट से यह सब कर रहे है। ऑनलाइन मीडियम के माध्यम से हमने वहां अपनी ताकत से बड़ॆ-बड़े लोगो से लड़कर कर दिखाया है।
आप भी यह कर सकते हैं एक बार उस दिशा में देखें तो सही। अंत में आप सबसे कहना चाहूँगा कि पॉइंट सिस्टम को लेकर फार्म भरने की जो अंतिम तरीख है उससे डरने कि जरुरत नहीं है आप30 अगस्त तक इंतजार करें उसके पहले घोषणा होने की सम्भावना है अन्यथा अंतिम तारीख फिर बढ़ाई जायेगी और इतना आपको पूरे दृढ संकल्प के साथ आश्वस्त करना चाहूँगा कि इस पॉलिसी में जो अन्यायपूर्ण और मूर्खतापूर्ण बातें है उनको हटाने के लिये लीपा हर स्तर पर संघर्ष करेगी।
आपका साथी
सुभाष सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्षलीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन


देश के 91 प्रमुख जलाशयों का जलस्तर 67 प्रतिशत रहा

नई दिल्ली। 08 नवंबर2018 को समाप्त सप्ताह के दौरान देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 107.883 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल संग्रह हुआ। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 67 प्रतिशत है। 01 नवंबर2018 को समाप्‍त सप्ताह में जल संग्रह समान स्तर पर था। 08 नवंबर2018 को समाप्त सप्ताह में यह संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 102 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 98  प्रतिशत है।
इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 161.993 बीसीएम हैजो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 257.812 बीसीएम का लगभग 63 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली लाभ देते हैं।
क्षेत्रवार संग्रहण स्थिति : -
उत्तरी क्षेत्र
उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेशपंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैंजो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 15.35 बीसीएम हैजो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 85 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 71 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 74 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
पूर्वी क्षेत्र
पूर्वी क्षेत्र में झारखंडओडिशापश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैंजो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 13.22 बीसीएम हैजो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 70 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 79 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 74 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
पश्चिमी क्षेत्र
पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 31.26 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैंजो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 16.52 बीसीएम हैजो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 53 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 69 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 66 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
मध्य क्षेत्र
मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेशउत्तराखंडमध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैंजो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 31.47 बीसीएम हैजो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 74 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 57 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 68 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
दक्षिणी क्षेत्र
दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेशतेलंगाना एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं)कर्नाटककेरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैंजो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 31.33 बीसीएम हैजो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 61 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 64 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 65 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें हिमाचल प्रदेशपंजाब,राजस्‍थानउत्तर प्रदेशउत्‍तराखंडमध्य प्रदेशछत्तीसगढ़कर्नाटककेरल और तमिलनाडु शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण कम है उनमें झारखंड, ओडिशा पश्चिम बंगालत्रिपुरागुजरात और महाराष्‍ट्र, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं)आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

पूर्वी सिंहभूम में मत्स्य बीजों का वितरण


जिला मत्स्य कार्यालय का रंडी जमशेदपुर द्वारा माह सितंबर अंतर्गत निजी क्षेत्र तथा सरकारी तालाब बंदोबस्ती लिए हुए किसानों के बीच अनुदानित दर पर विभिन्न मत्स्य क्षेत्र से मत्स्य बीज का वितरण किया गया पूर्वी सिंहभूम जिला के विभिन्न प्रखंडों से मत्स्य कृषकों वैज्ञानिक पद्धति से उन्नत मत्स्य पालन हेतु दिनांक 69 2018 तथा 17 नो 2018 को विभाग की राखी स्थित राज्य स्तरीय मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र में पांच दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कराया गया इसके अतिरिक्त ग्राम स्तर पर मत्स्य मित्र के माध्यम से एकदिवसीय गोष्टी आयोजित करते हुए मत्स्य कृषकों को मत्स्य पालन की जानकारी दी गई माह अक्टूबर अंतर्गत जिला मत्स्य कार्यालय करंडी जमशेदपुर द्वारा 1.20 लॉक प्रति इकाई लागत से बनने वाले वेदव्यास आवास निर्माण हेतु पंचानवे गरीब मछुआरों का चयन उपायुक्त महोदय की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा किया गया पूर्वी सिंहभूम जिला के विभिन्न प्रखंडों से मत्स्य कृषकों को वैज्ञानिक पद्धति से उन्नत मत्स्य पालन हेतु दिनांक 2:10 2018 तथा 2210 2018 को विभाग की रांची स्थित राज्य स्तरीय मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र में पांच दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कराया गया साथ ही ग्राम स्तर पर मत्स्य मित्र के माध्यम से एकदिवसीय गोष्ठी आयोजित करते हुए मत्स्य कृषकों को मत्स्य पालन की जानकारी दी गई

आदिवासी संस्कृति ही झारखंड की पहचानः रघुवर दास


·         मुख्यमंत्री ने की गुमला के बदरी गांव में आयोजित स्व: कार्तिक उरांव जयंती समारोह में शिरकत
·         स्व कार्तिक उरांव की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर दी श्रद्धांजलि
·         मेला में घूम व मांदर बजाकर मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों को दी जतरा मेला की शुभकामनाएं
·         कार्तिक उरांव के सपनों के झारखण्ड का निर्माण करें- मुख्यमंत्री
·         आदिवासी कल्याण को प्राथमिकता- रघुवर दास, मुख्यमंत्री


गुमला। नगाड़ा, मांदर की गूंज से झारखण्ड की धरती गुंजायमान होता रहे कोई और धुन ना बजे। क्योंकि हमारी संस्कृति ही झारखण्ड की पहचान है। इस संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए कार्तिक उरांव हमेशा से प्रयासरत रहे। जतरा मेला और यहां दिख रही झारखण्ड की समृद्ध संस्कृति उनके प्रयास को परिलक्षित कर रहा है। आनेवाली पीढ़ी अपनी संस्कृति से अवगत होती रहेगी, इससे सुखद बात और क्या ही सकती है। उक्त बातें मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कही। श्री दास शुक्रवार को गुमला के घाघरा प्रखंड स्थित बदरी गांव में  कार्तिक उरांव स्मृति जतरा सह खेलकूद प्रतियोगिता कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कही। श्री दास ने कहा कि जिस तरह मेला में मिठास होता है उसी मिठास की भावना से हमें इस सार्वजनिक स्थल में मिलना चाहिए। साथ ही, कार्तिक उरांव जी के सपनों के झारखण्ड का निर्माण करना है। जहां कोई अशिक्षित, वंचित और शोषित ना रहे।
आदिवासियों का सर्वांगीण विकास सरकार की प्राथमिकता
सीएम रघुवर दास ने कहा कि कार्तिक उरांव ने विदेश जाकर शिक्षा ग्रहण की। वे इंजीनियर बनें। स्वदेश व अपने घर लौटने पर उन्हें लगा कि झारखण्ड के आदिवासियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। वे चाहते तो कहीं नौकरी कर आराम से जीवन जी सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और आदिवासी कल्याण में खुद को झोंक दिया। उनकी इन्हीं बातों को आत्मसात कर केंद्र और राज्य सरकार कार्य कर रही है। पहली बार आदिवासी कल्याण हेतु आदिवासी मंत्रालय का गठन हुआ। राज्य के शहीदों के गांव में मूलभूत सुविधाओं से आच्छादित कर आदर्श गांव बनाया जा रहा है। झारखण्ड में आदिवासी विकास परिषद के माध्यम से आदिवासी के हित में कार्य हो रहें हैं। जनजातियों को डाकिया योजना के तहत हर माह खाद्यान्न पहुंचाया जा रहा है। आदिवासी युवाओं हेतु रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय में सीट आरक्षित हैं। पहली बार आदिम जनजाति युवक युवतियों के लिए बटालियन का गठन हुआ। जिन्हें प्रधानमंत्री जी द्वारा नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया।
 युवा शिक्षित समाज की कल्पना को पूरा करें, खुद को हुनरमंद बनाएं
मुख्यमंत्री ने कहा कि कार्तिक उरांव ने शिक्षित समाज की कल्पना की थी। उनके सपने को युवा पूरा करें। क्योंकि शिक्षा से समझदारी और समझदारी से ईमानदारी का प्रवाह होगा। युवा शिक्षा के साथ साथ हुनरमंद भी बनें। राज्य सरकार 700 करोड़ रुपये युवाओं को हुनरमंद बनाने में कौशल विकास के माध्यम से कर रही है। हुनरमंद बन युवा स्वरोजगार अपना सकते हैं सरकार की योजनाओं का लाभ के सकते हैं।  श्री दास ने कहा कि समाज में जागरूकता के माध्यम से युवा बड़ा बदलाव में सहायक हो सकते हैं। हमें मिल कर सुनिश्चित करना होगा कि गुमला के हर घर का बच्चा स्कूल जाएं।
किसानों को मिलेगा उनका हक,  वृद्धों को मिलेगा 10 किलो अनाज

मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखण्ड के सुखाड़ की स्थिति का अधतन जानकारी जल्द सरकार को प्राप्त होगी। 18 नवंबर को गुमला के सूखा प्रभावित प्रखंडों में शिविर का आयोजन होगा। जहां किसान फसल बीमा योजना का लाभ ले सकते हैं। किसानों का हक उन्हें जरूर मिलेगा। राज्य सरकार ने सुखाड़ हेतु 100 करोड़ का उपबंध किया है। साथ ही वृद्धों के लिए अन्नपूर्णा योजना के तहत 10 किलो अनाज देने की व्यवस्था की गई है। विपरीत परिस्थितियों के लिए गांव के मुखिया को 10 हजार रुपये दिये गए हैं, जो अनाज उपलब्ध कराने में सहायक होंगे।
67 साल में 38 लाख, 4 साल में 30 लाख
मुख्यमंत्री ने कहा कि 67 साल में झारखण्ड के मात्र 38 लाख घरों तक बिजली पहुंची थी। विगत 4 साल में वर्तमान सरकार द्वार 30 लाख घरों तक बिजली पहुंचा दी गई। 31 दिसम्बर तक छुटे हुए सभी घरों तक बिजली पहुंच जाएगी और झारखण्ड का प्रत्येक घर बिजली से आच्छादित हो जाएगा।
महिला देश, राज्य और परिवार की शक्ति
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह महिला।शक्ति का ही प्रतिफल है कि 15 नवंबर को पूरा राज्य खुले में शौच से मुक्त होने जा रहा है। रानी मिस्त्रियों ने गजब का कार्य किया है। महिलाओं कब सशक्तिकरण हेतु योजनाओं को उनतक पहुंचाया जा रहा है। अब स्कूलों का यूनिफॉर्म भी महिलाएं ही बनाएंगी। उन्हें मशीन और प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस संबंध में जिला के उपायुक्तों को निदेश दिया जा चुका है।
बच्चियों में संस्कार दे मन अभिभूत हुआ
मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस तरह इस जतरा में प्रोजेक्ट बालिका हाइस्कूल की बच्चियों ने राज्य की संस्कृति की गीत और नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है उसे देख मन प्रफुल्लित हुए बिना नहीं रह सका। इन सभी 32 बच्चियों को 5-5 हजार रुपये उत्साहवर्धन हेतु दिया जाएगा। वहीं इस तरह जतरा का आयोजन करने वाले संस्था को 3 लाख रुपये मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से प्रदान किया जाएगा।
इस मौके पर मुख्यमंत्री ने उज्ज्वला योजना के तहत लाभुकों के बीच गैस कनेक्शन, भूमि संरक्षण के तहत पंप सेट का वितरण किया।
इस अवसर पर केंद्रीय राज्यमंत्री श्री सुदर्शन भगत,  विधानसभा अध्यक्ष डॉ दिनेश उरांव, पदमश्री अशोक भगत, अल्पसंख्यक आयोग के अध्य्क्ष मोहम्मद कमाल खां, उपायुक्त गुमला व अन्य उपस्थित थे।

नोटबंदी की दूसरी वर्षगांठ पर सिर्फ ज़ुबानी जंग क्यों



न सरकारी जश्न, न विपक्षी प्रतिरोध, न विजय दिवस, न शोक दिवस

देवेंद्र गौतम
चुनावी वर्ष की पूर्व संध्या पर कोई शोर, की हंगामा नहीं। नोटबंदी की दूसरी वर्षगांठ सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच ज़ुबानी जंग में गुजर गई। सत्तापक्ष ने इससे अर्थ व्यवस्था के पटरी पर आने का दावा किया तो विपक्ष ने इसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया। अगर सत्तापक्ष इस फैसले को सही मानता है तो उसने देश के किसी हिस्से में इसका जश्न क्यों नहीं मनाया। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने सिर्फ विपक्ष के हमले का रक्षात्मक जवाब भर दिया। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर की टिप्पणी नहीं की। अरूण जेटली के तर्क और दावे किसी के गले के नीचे शायद ही उतर पाएं। निश्चित रूप से विपक्ष की आलोचना भी अतिरंजित हो सकती है। लेकिन नोटबंदी के दो साल बाद कम से कम इसके लाभ और नुकसान की निष्पक्ष समीक्षा तो की जानी चाहिए थी। दुनिया के किसी अर्थशास्त्री ने इसे सही कदम करार नहीं दिया है।
सेंटर आफ मानिटरिंग इंडियन इकोनोमिक्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद बेरोजगारी की दर 6.9 प्रतिशत बढ़ी है। काम की तलाश करने वाले बालिग युवकों की भागीदारी के अनुपात में 42.4 प्रतिशत की गिरावट आई है जो दो वर्षों में सबसे नीचे आ चुकी है। श्रमिक वर्ग की भागीदारी दर में 47 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आई है। श्रमिक हाट में अबतक की सर्वाधिक गिरावट दर्ज की गई है। अक्टूबर 2018 में 397 मिलियन लोगों को काम मिला जबकि अक्टूबर 2017 में 407 मिलियन लोगों को काम मिला था। यानी 2,4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सीआइइएल के सीइओ एवं एचआर सर्विसेज आदित्य नारायण मिश्रा के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर तक की अवधि विभिन्न सेक्टरों में रोजगार सृजन की अवधि होती है लेकिन इस वर्ष श्रमबल की मांग और आपूर्ति के बीच तालमेल गड़बड़ हो गया है। आमतौर पर हर वर्ष करीब 12 मिलियन लोग रोजगार की तलाश में श्रमिक हाटों का रुख करते हैं लेकिन इस अनुपात में रोजगार का सृजन नहीं हो सका।
सरकारी स्तर पर रोजगार की स्थिति का अध्ययन करने वाले सरकारी संस्थान अपनी रिपोर्ट नियमित रूप से जारी कर रहे हैं लेकिन 2016 के बाद उनकी किसी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया। आखिर उन्हें गोपनीय रखने की क्या विवशता आन पड़ी। दरअसल नोटबंदी एक प्रयोग था जिसका वह परिणाम नहीं निकल पाया जिसकी उम्मीद की गई थी। लेकिन इसे किसी साजिश के तहत लागू किया गया था, ऐसा कहना उचित नहीं है। हां, मोदी सरकार ने अति उत्साहित होकर यह प्रयोग किया था यह जरूर कहा जा सकता है। अति उत्साह का ही नतीजा था कि इसके तात्कालिक और दूरगामी प्रभावों का सटीक आकलन नहीं किया जा सका। इसकी पूरी तैयारी नहीं की जा सकी और जो घोषणा रिजर्व बैंक के गवर्नर को करनी थी वह स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी। प्रयोग, प्रयोग होते हैं। वे सफल भी हो सकते हैं और विफल भी। किसी भी प्रयोग का फलाफल नहीं देखा जाता सके पीछे की नीयत देखी जाती है। जेटली जी को इसके परिणाम सुखद दिखी दे रहे हैंष उन्हें अर्थ व्यवस्था पटरी पर आती दिख रही है। ऐसे तर्क जो विश्वसनीय नहीं होते, तथ्यों को नकारते हुए गढ़े जाते हैं उन्हें कुतर्क कहा जाता है। जब विफलता को सफलता के रूप में दर्शाने के तर्क गढ़े जाते हैं तो बहुत तरह की आशंकाएं भी उत्पन्न होती हैं। विश्वसनीयता पर संदेह होता है।
मोदी सरकार यदि नोटबंदी के पक्ष में थोथी दलील देने की जगह इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की स्वयं विवेचना कर स्वीकार कर लेती कि इस प्रयोग के अपेक्षित परिणाम नहीं आए तो उसके प्रति आम जनता के अंदर एक श्रद्धा और प्रेम का भाव जगता। फिर विपक्ष के कटाक्ष की धार भी कमजोर पड़ जाती। किसी शायर ने कहा है-
गिरते हैं घुडसवार ही मैदाने-जंग में
वे तिफ्ला क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले।
लेकिन अपनी विफलताओं को स्वीकार करने के लिए बड़े नैतिक बल और साहस की जरूरत पड़ती है। महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपनी भूलों को स्वीकार किया तो उसे विश्व साहित्य में श्रेष्ठ आत्मकथाओं में शामिल किया गया जबकि आत्मप्रवंचना पर आधारित आत्मकथाएं भारतीय पाठकों की स्मृति से भी धीरे-धीरे विलुप्त हो गईं।



मंगलवार, 6 नवंबर 2018

Tata power celebrated Urja Diwas




Ranchi.  TATA Power has put up a stall in Urja Diwas program organised here at Angara Block. However TATA Power is present in complete value chain of Power Sector i.e. fuel & Logistics, generation, transmission and distribution, the main focus of stall was primarily the power distribution part. Content displayed at the stall in terms of video and through brochures was very impressive and mainly focussed on transformation of Power Distribution sector with help of Technology. TATA Power’s Delhi subsidiary, TATA Power Delhi Distribution Limited (TATA Power-DDL), was the key attraction in TATA Power’s Stall primarily due to the work they have done in their License area of North and North West Delhi. They claimed to have reduced the AT&C losses of their areas from 53% from the date of acquisition in year 2002 to 8.4% as on financial year ending 2018.   Apart from showcasing technology, their CSR initiatives that primarily focussed on upliftment of social and economic levels of their BPL consumers, was another impressive showcase.
TATA Power-DDL representative Mr. Sandeep Dhamija quoted “We know that electricity is basic need and unless we lift economic and social level of our poor consumers, they would not be able to pay for the electricity they consume. We help our BPL consumers mainly staying in slums through various initiatives like providing them social security through insurance cover, providing health facilities through availability of doctors and medicines, literacy camps especially for women, drug deaddiction camps, imparting skills and assisting their job placements in areas like retail bazars, food delivery chains, saloons & SPA shops. Many women from slums are our brand ambassadors who help up in propagating our policies. Due to TATA’s DNA of giving back to society, we are also benefitted in terms of low AT&C losses. Our billing and collection efficiencies from slums are approx. 90%”.
Mr. Rakesh Ranjan another TATA Power representative said “TATA Power always believe in self-sustainable approach that creates value for our consumers. While we have investments in Jharkhand through our Jojobera and Maithon power plants, we intent to do more in Jharkhand mainly in distribution sector.  TATA Power-DDL is already working with Jharkhand in various initiatives that includes electrification in DDUGJY 12th plan, assisting JBVNL in implementation of state of art technologies like SCADA and Smart metering aimed at providing 24 x 7 power and better customer services.” We would be keen to invest in distribution sector in Jharkhand if there is an opportunity, their representative replied to a question.


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...