यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जल पंचायतों के गठन की तैयारी

रांची: झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट से निपटने के लिए भूजल पंचायत के गठन की पहल पर विचार किया जा रहा है. इसके जरिये सिंचाई और पेयजल के लिए जल संरक्षण के कारगर उपाय किये जायेंगे. यह जल संरक्षण अभियान के तहत एक नया मॉडल तैयार करने के प्रयास का हिस्सा होगा. इस अभियान के तहत आम ग्रामीणों को जल संरक्षण और वाटर रिचार्ज के प्रति जवाबदेह बनाया जायेगा. हर राज्य के हर पंचायत में भू-जल पंचायत का गठन करने का निर्णय केंद्र सरकर ने लिया है. इस योजना में मैग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित जल पुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र प्रसाद सिंह अहम् भूमिका निभा रहे हैं.इसमें जल संसाधन का दुरूपयोग करने वालों पर उसके उपयोग पर रोक लगाने का अधिकार पंचायतों को दिया जाना है. जल स्रोतों की सुरक्षा पर खास तौर पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा.नदियों, तालाबों को बचने और सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाना इस अभियान का मुख्य उद्देश्य होगा. झारखंड के जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को इस संदर्भ में आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं    

पुलिसिया प्रताड़ना से त्रस्त एक गरीब परिवार

झारखंड की राजधानी रांची से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खेलाडी का एक गरीब यादव परिवार स्थानीय थाना के प्रभारी के जुल्मो-सितम से त्रस्त है. तीन वर्षों से भी अधिक समय से खेलाडी थाना में पदस्थापित थाना प्रभारी अरविन्द कुमार सिंह ने इस परिवार का जीना हराम कर रखा है. वे स्वयं को रांची के सीनियर एसपी  का रिश्तेदार बताते हुए दावा करते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.  

भुक्तभोगी परिवार का एक सदस्य मीनू यादव कई महीनों से लापता है. वह ट्रेकर चलता था. खेलाडी पुलिस उसे रांची के कमड़े से पूछताछ के बहाने ले गयी थी. इसके बाद उसका कोई अता-पता नहीं है. उसकी पत्नी ने इस मामले को लेकर रांची के एसएसपी तक के पास गयी लेकिन उसे डांटकर भगा दिया गया. उसने न्यायलय में शिकायत दर्ज कराई लेकिन अज्ञात दबाव में आकर उसने समझौता कर अपना कम्प्लेन वापस ले लिया. इसके बाद वह अपने एकलौते बेटे के साथ लापता है. न ससुराल वालों को उसकी कोई जानकारी है न नैहर वालों को.
इसके बाद थाना प्रभारी ने शेष दो भाइयों के परिवार पर कहर ढाना शुरू कर दिया और इसके विरुद्ध उठी आवाज़ को भी दबाने में सफल रहे. मीनू यादव के अन्य दो भाइयों की पत्नियों ने अलग-अलग तिथि में थाना प्रभारी के विरुद्ध यौन प्रताड़ना की शिकायत कोर्ट में दायर की लेकिन अज्ञात दबाव में आकर एक ही तिथि में समझौता कर अपनी शिकायत वापस ले ली. अब इस परिवार को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे न्याय के लिए कौन सा दरवाज़ा खटखटायें... कहां जाकर गुहार लगायें. 
भैरो यादव की पत्नी गीता देवी ने कोर्ट में दिए अपने बयान में कहा था कि थाना प्रभारी २९ अक्टूबर 2010 को शाम 7 .30 बजे पूरे फ़ोर्स के साथ उसके घर पर पहुंचे और दरवाजे को धक्का देते हुए अंदर घुस गए. उसके पति संतोष यादव के बारे में पूछा और उसके घर में नहीं होने का जवाब मिलने पर उसके दोनों स्तन पकड़ लिए और खुश कर देने की मांग करने लगे. परिजनों और अन्य लोगों के जुटने पर वे इसमें  सफल नहीं हो सके तो उसे रंडी कहते हुए गंदी-गंदी गलियां देने लगे और जाते-जाते उसके पति को फर्जी मुठभेड़ में मार डालने की धमकी दी. उसी रात 9.30 बजे थाना प्रभारी दुबारा पहुंचे और भैरो यादव को पकड़कर ले गए हथियार की बरामदगी दिखाकर उसे नक्सली करार देते हुए जेल भेज दिया.   थाना में शिकायत दर्ज होने का कोई प्रश्न ही नहीं था. लिहाज़ा उषा इसकी शिकायत लेकर रांची एसएसपी के पास गयी वहां कोई सुनवाई नहीं हुई तो कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद भी कई महीने तक थाना प्रभारी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. 16 .5 .2011 को कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर रहस्यमय परिस्थितियों में उसने अपनी शिकायत वापस ले ली. रहस्यमय इसलिए भी कि दूसरे भाई संतोष यादव की पत्नी ने भी उसी तिथि को हलफनामा दायर कर समझौता किया था.
संतोष यादव की पत्नी उषा देवी की शिकायत के मुताबिक  1 नवम्बर 2010 की शाम थाना प्रभारी उसके घर पहुंचे और जबरन घर में घुसकर उसके पति को ढूँढने लगे.
उसके नहीं मिलने पर पर उसे गंदी-गंदी गलियां देते हुए उसके गुप्तांग में गोली मारकर मुंह से निकालने की साथ ही पति का इनकाउन्टर  करने की धमकी देने लगे.  उषा देवी ने भी न्यायालय  की शरण ली और 16 मई 2011 को अपनी गोतनी के साथ ही शिकायत वापस ले ली. 
थाना प्रभारी के इस व्यवहार के पीछे एक उद्योगपति और पुलिस के एक वरीय अधिकारी के बीच का गुप्त डील होने की आशंका व्यक्त की जा रही है. इस परिवार की ज़मीन एसीसी सीमेंट कारखाने की स्थापना के वक़्त लीज़ पर ली गई थी. लीज़ की अवधि ख़त्म हो चुकी है. कम्पनी को उसे वापस लौटना या लीज़ का नवीकरण कराना था. ज़मीन संबंधी कागज़ मीनू यादव के पास रहता था. अब मीनू के लापता होने के बाद कागजात भी लापता हैं. सम्भावना व्यक्द्त की जा रही है कि ज़मीन हड़पने के लिए पुलिस को मैनेज कर यह सारा खेल उद्योगपति के इशारे पर हो रहा है. पीड़ित परिवार ने रांची के जोनल आइजी को एक आवेदन देकर मामले की जांच करने और थाना प्रभारी के जुल्मो-सितम से बचने की गुहार लगाई है.

---देवेंद्र गौतम 

रविवार, 17 जुलाई 2011

क्या सचमुच यह कोई खबर थी?



मुंबई सीरियल ब्लास्ट के बाद झारखंड के अख़बारों ने मुख्यपृष्ठ पर सचित्र खबर छापकर एक नया रहस्योद्घाटन किया. खबर यह थी कि जब मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हो रहे तो रांची के सांसद और  केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय दिल्ली के  एक फैशन शो में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत कर रहे थे. यह शो एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने आयोजित किया था. इसे सनसनीखेज़ बनाने के लिए सुबोधकांत सहाय की तसवीर को अलग से घेर दिया गया था ताकि सनद रहे कि यह तसवीर केंद्रीय मंत्री की ही है और मीडिया की तीखी नज़र ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ा है. क्या सचमुच यह कोई रहस्य या खबर थी. जब ख़ुफ़िया एजेंसियों या मुंबई पुलिस को यह जानकारी नहीं थी कि सीरियल ब्लास्ट होनेवाले हैं तो भला केंद्रीय पर्यटन मंत्री को दिल्ली में बैठकर यह जानकारी कैसे हो सकती थी कि मुंबई पर आतंकी हमला होने जा रहा है और उन्हें फैशन शो में नहीं जाना चाहिए था. सीरियल ब्लास्ट के समय कौन-कौन से महत्वपूर्ण व्यक्ति कहां-कहां थे इसकी पड़ताल की जाये तो अखबार का एक विशेष बुलेटिन ही निकाला  जा सकता है लेकिन पाठकों को माथापच्ची करनी पड़ जाएगी कि मीडिया के लोग इसके जरिये कहना क्या चाहते हैं? न तो फैशन शो का आयोजन करना प्रतिबंधित है और न ही उसमें शिरकत करना गैरकानूनी. यह कोई अनैतिक कारोबार भी नहीं है. कोई मनोरंजन का आयोजन भी नहीं. फैशन की दुनिया के नए ट्रेंड का प्रदर्शन मात्र. लिहाजा मंत्री का किसी फैशन शो का मुख्य अतिथि बनना कोई हैरत की बात तो नहीं. बिना मतलब बात का बतंगड़ बनाना कहां की पत्रकारिता है. मात्र कीचड उछालना या सनसनी फैलाना स्वस्थ पत्रकारिता का परिचायक नहीं है. इससे परहेज़ किया जाना चाहिए.

----देवेंद्र गौतम

सोमवार, 11 जुलाई 2011

झारखंड: विलुप्त हो चली हैं ये आदिम जनजातियां

झारखंड के अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आये 11 साल हो गए. इस बीच जितनी भी सरकारें बनीं उनमें मुख्यमंत्री का पद आदिवासियों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित रखा गया. लेकिन सरकार की कृपादृष्टि उन्हीं जजतियों की और रही जो वोट बैंक बनने की हैसियत रखते थे.  झारखंड की उन नौ आदिम जनजातियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया जिनका अस्तित्व आज खतरे में है. उनकी जनसंख्या में ह्रास होता जा रहा है. मृत्यु दर में वृद्धि और जन्म दर में कमी के कारण ऐसा हो रहा है. भूख, कुपोषण और संक्रामक रोगों के कारण उनके यहां अकाल मौत के साये मंडराते रहते हैं. अशिक्षा, गरीबी और रोजगार के अवसरों का अभाव उनकी नियति बन चुकी है. वे आज भी जंगलों पहाड़ों के बीच पर्णकुटी बनाकर आदिम युग की मान्यताओं के बीच रह रहे हैं. भूत-प्रेत, ओझा-डायन बिसाही में अभी भी उनका गहरा विश्वास है. बीमार होने पर वे अस्पताल में नहीं बल्कि अपने इलाके के ओझा-सोखा की शरण में जाते हैं.




उनके इलाके में टीबी, मलेरिया, डायरिया, हैजा, कुष्ठ आदि रोगों का भीषण  प्रकोप है. यह कोई नयी परिघटना नहीं है. झारखंड के मानवशास्त्री कई दशकों से उनके अस्तित्व पर मंडराते खतरे के प्रति आगाह करते आ रहे हैं. उनके संरक्षण के लिए हर बजट में अरबों की राशि का प्रावधान किया जाता है. कई कल्याणकारी योजनायें चलाई जाती हैं लेकिन उनतक पहुंचते-पहुंचते सुविधाएं इतनी संकुचित हो जाती हैं कि उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पाता. झारखंड राज्य के गठन के बाद भी इन्हें कोई लाभ नहीं हुआ. आदिवासी मुख्यमंत्री का मिथक तो इनके नाम पर रचा गया लेकिन लाभ आदिवासियों की सामाजिक आर्थिक रूप से विकसित जातियों के मलाईदार तबके ने उठाया.
            2001 की जनगणना के मुताबिक हिल पहाड़िया जनजाति की कुल आबादी मात्र 1625  रह गयी है. सावर पहाड़िया 9946  की संख्या में है. असुर, विरिजिया और विरहोर जाति की भी यही हालत है. उनकी आबादी चार अंकों में ही सिमटी है. कोरवा, माल पहाड़िया, पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया आदि की आबादी जरूर पांच अंकों में है लेकिन उसमें तेजी से गिरावट आ रही है.इन नौ जनजातियों की कुल आबादी एक लाख 94  हजार आंकी जाती है. विडंबना यह है कि इन जातियों के लोग 50 वर्ष की आयु भी पार नहीं कर पाते. संतुलित आहार के अभाव में कुपोषण का शिकार हो जाते हैं. इनकी उत्पादन क्षमता में भी काफी कमी आ गयी है. सुरक्षित प्रसूति की सुविधा नहीं होने के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की मौत भी आम बात है.
             असुर जनजाति के लोग गुमला और दुमका जिले में निवास करते हैं. लौह अयस्क से लोहा बनाना उनकी आजीविका का पारंपरिक साधन रहा है. लोहे के औजार बनाने में इस जनजाति को महारत हासिल है. लेकिन उनके उत्पाद के खरीदार कम रह गए हैं. छोटे किसान भी बड़े कारखानों में निर्मित औजार खरीदना पसंद करते हैं. नतीजतन पुश्तैनी धंधे से उनका पेट नहीं भर पता. खेती लायक ज़मीन भी इनके पास नाममात्र की है.दैनिक मजदूरी का मिल गयी तोदो जून की रोटी का जुगाड़ हुआ वर्ना फाकाकशी के अलावा रास्ता नहीं. सरकार चाहती तो उन्हें पारंपरिक कौशल के उत्पाद तैयार करने के लिए आवश्यक सुविधाए प्रदान कर उनके लिए बाजार उपलब्ध कराती लेकिन वे कोई वोट बैंक तो नहीं कि उनकी चिंता की जाये. बिरिजिया जनजाति के लोग लोहरदगा, गुमला और लातेहार के इलाकों में पाए जाते हैं. बिरहोर जनजाति के लोग सूबे के विभिन्न जिलों के पहाड़ों जंगलों के आसपास छोटे-छोटे समूहों में रहते हैं. यह शिकारी श्रेणी की जनजाति है. जंगली जानवरों का शिकार करना इनका पुश्तैनी व्यवसाय रहा है. रस्सी बुनने कि कला भी इन्हें विरासत में मिली है. इनके उत्थान के लिए कई योजनायें बनीं लेकिन इनकी जगह नौकरशाहों और दलालों का उत्थान हुआ. पहाड़िया जनजाति संथाल परगना के इलाकों में रहती है. यह आज भी टोने-टोटके के आदिम विश्वास के बीच जीती है. इनमें शिक्षा का घोर अभाव है.
             विलुप्ति के कगार पर खड़ी इन जनजातियों के पुनर्वास के लिए राज्य गठन के बाद बिरसा मुंडा आवास योजना के तहत १२,५३६ आवास बनाने का निर्णय हुआ था लेकिन यह योजना अभी तक अधूरी है. लकड़ी तस्कर और जंगल माफिया उनका भरपूर शोषण करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र शोषकों के ही साथ खड़ा रहता है. विश्व के सभी देशों में मानव आबादी बढ़ रही है लेकिन झारखंड में कुछ जजतियां विलुप्ति का संकट झेल रही हैं. यही विडंबना है.
            झारखंड में अबतक की बनी सरकारें कुर्सी की बाधा दौड़ में ही उलझी रही हैं. कोई बहुमत की सरकार बने तो शायद इनके दिन भी फिरें वरना पाठ्य पुस्तकों के एक अध्याय के सिमट जाना ही इनकी नियति है.

-----------देवेंद्र गौतम

बुधवार, 25 मई 2011

विस्थापितों की एक नई फ़ौज तैयार करना आत्मघाती कदम


राजेंद्र प्रसाद सिंह
पांच राज्यों  के चुनाव परिणामों  ने यह सिद्ध कर दिया है कि जनता से कटकर रहने वालों को राजनीति के हाशिये  में भी जगह नहीं मिलती और लोकतंत्र में कोई अपराजेय  नहीं होता। जनता को झांसा देकर सत्ता की चाबी नहीं हासिल की जा सकती। कट्टरता और साम्प्रदायिकता  की राजनीति करने वाली भाजपा पांचो राज्यों में  चारो खाने चित गिरी। प. बंगाल में  वामफ्रंट का 34 साल पुराना किला ढह गया। ज्योति बसु ने प. बंगाल में 34 वर्ष पहले जो व्यूह रचना की थी उसे भेदना असंभव माना जा रहा था।वामफ्रंट का अपराजेय होने का अहंकार ही उसे ले डूबा. मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतो से तो वे कट ही चुके थे, जनता से भी कटते गये थे। पूरी तरह मनमानी पर उतर आये थे। नंदीग्राम और सिंगुर में उन्होंने आम जनता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। इसीलिए जनता ने उसे सबक सिखा दिया। केरल में भी कड़े संघर्ष के बाद जनता ने सत्ता की चाबी कांग्रेस को ही सौंपी। असम की जनता ने कांग्रेस पर भरोसा कर तीसरी बार सेवा करने का मौका दिया। तमिल नाडू में कांग्रेस गठबंधन को जरूर झटका लगा. लेकिन कांग्रेस ने यह सिद्ध कर दिया कि उसकी नीतियां सही हैं। जनता का उसपर विश्वास लगातार बढ़ रहा है और आने वाले दिनों यह विश्वास और बढ़ेगा.
हाल के वर्षो में जो राजनैतिक परिवर्तन हुए हैं। विभिन्न चुनावों के जो नतीजे निकले हैं उनसे एक बात तो साफ हो चुकी है कि जनता अब जागरुक हो चुकी है। वह मौन रहकर राजनैतिक दलों के क्रियाकलाप देखती रहती है और समय  आने पर अपना फैसला सुना देती है। अब वोटरों को डरा-धमकाकर, फुसलाकर, जाति धरम और क्षेत्रीयता का हवाला देकर वोट बटोरने का जमाना लद चुका है। इस बात को जो नहीं समझेंगे वे जनता की नजरों से हमेशा के लिये उतर जायेंगे। राजनीति पर बाहुबलियों के दबदबे का युग भी बीत चुका है। हाल के वर्षों में कई बाहुबलियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा है। निश्चित रूप से इसमें चुनाव आयोग की अहम  भूमिका है। उसने आधुनिक चुनाव प्रणाली के जरिये, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के जरिये ऐसा माहौल बनाया कि शांतिप्रिय लोग भी निर्भय होकर अपना वोट देने बूथों पर पहुंचने लगे। युवा और महिला वर्ग के मतदाता भी पूरे उत्साह के साथ बूथों तक पहुंचने लगे. जनता को जागरूक करने में सोशल नेटवर्किंग साइटों ने भी अहम भूमिका निभायी.
झारखंड सरकार को इन चुनाव परिणामों से सबक लेना चाहिए. अतिक्रमण हटाओ के नाम पर जनता के विरुद्ध जंग छेडने की कार्रवाई से बाज आना चाहिए. आज सरकार उन मजदूरों पर गोली चलवा रही है जो कई पीढ़ियों से कोयलांचल में रह रहे हैं. जिनकी जीवन स्थितियों को सुधारने और देश के इस्पात तथा थर्मल पावर प्लांटों की उर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1970 में कोकिंग और १९७२ में नन कोकिंग कोयले का राष्ट्रीयकरण किया था. खानगी मालिकों की परिसंपत्तियों का अधिग्रहण करते वक़्त केंद्र सरकार ने कुल मानव श्रम को बेहतर सुविधाएं मुहैय्या करने की जिम्मेवारी ली थी. उनपर गोली चलाने से इंदिरा गांधी जी की आत्मा दुखी हो रही होगी. कोयला मंत्री और प्रधान मंत्री को स्वयं पहल लेकर कोयलांचल में पुनर्वास की एक ठोस नीति बनानी चाहिए और राज्य सरकार के तानाशाही रुख पर अंकुश लगाना चाहिए. कोयलांचल की स्थितियों को राज्य सरकार नहीं समझ सकती. मजदूरों का दर्द उनके बीच रहने वाले ही महसूस कर सकते हैं.
आज झारखंड में समस्यायों का अंबार लगा है. उनका निबटारा करने की जगह यह सरकार सिर्फ बसे-बसाये लोगों को उजाड़ने में लगी है. यह पूरी तरह जनविरोधी रवैया है। कांग्रेस इसे कत्तई बरदाश्त नहीं करेगी. चाहे इसके लिये जो भी कुर्बानी देनी पड़े.
झारखंड में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में जो लाखों लोग मुआवजा, पुनर्वास और नियोजन के लिये वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं उन्हें उनका हक दिलाने की पहल किये जाने की जरूरत है. जन-समस्याओं को सुलझाने की जगह राज्य में विस्थापितों की एक नई फ़ौज तैयार करना एक आत्मघाती कदम होगा। सरकार यदि समय  रहते नहीं चेती तो इसका खमियाजा उसी तरह भुगतना होगा जिस तरह वामफ्रंट को प. बंगाल और केरल में  भुगतना पड़ा. जनता ने उसे सिरे से खारिज कर दिया.

(लेखक इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री  और झारखंड विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता हैं.)

रविवार, 22 मई 2011

राग-द्वेष से संचालित झारखंड का गृह विभाग


    19 मई को को कैट ने आईजी निर्मला अमिताभ चौधरी को अवमानना का दोषी करार देते हुए 15 दिनों के कारावास की सजा सुनाई है. उनके विरुद्ध वारंट भी जारी हो चुका है. लेकिन अभी तक न तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और न ही गृह विभाग ने उन्हें निलंबित किया. कुछ समय पूर्व आईजी डीके पांडेय के विरुद्ध करीब तीन वर्षों तक फर्जी तरीके से आवास भत्ता उठाने का मामला प्रमाण सहित प्रकाश में आया था लेकिन उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई. उलटे उन्हें प्रोन्नत कर दिया गया. वर्ष 2005 में तत्कालीन डीआइजी परवेज़ हयात के विरुद्ध सुषमा बड़ाइक नामक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया. उनके विरुद्ध विभागीय जांच भी गठित की गयी कोर्ट में भी मामला चला लेकिन उन्हें न तो निलंबित किया गया न कोई कार्रवाई की गयी. उसी युवती के यौन शोषण से सम्बंधित एक सीडी के प्रसारण के मात्र दो घंटे के बाद रविवार की बंदी के बावजूद  तत्कालीन जोनल आइजी पीएस नटराजन के निलंबन की अधिसूचना जारी कर दी गयी. 




उनसे कोई स्पष्टीकरण तक मांगने की ज़रुरत नहीं महसूस की गयी. उनपर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया गया. निलंबन की अधिसूचना जारी करने की तिथि तक न तो उनके विरुद्ध कोई प्राथमिकी दर्ज थी और न ही कोई विभागीय जांच ही लंबित थी. इसके बाद भी उन्हें करीब छः वर्षों तक निलंबित रखा गया. उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए कैट ने 9 फ़रवरी 2011 को उनके निलंबन को अवैध करार दिया और निलंबन की अधिसूचना को तत्काल खारिज कर उसी तिथि से सेवा बहाल करने का आदेश दिया. गृह सचिव ने कैट के आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में अपील की. हाईकोर्ट ने कैट के आदेश को रद्द करने से इनकार करते हुए अन्य बिन्दुओं पर सुनवाई के लिए उनकी याचिका स्वीकार कर ली.इस बीच श्री नटराजन ने अवमानना याचिका दर्ज कर दी.  इसके बाद भी गृह सचिव ने कैट के आदेश का पालन करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली. वे मामले को लम्बे समय तक टालने के प्रयास में लग गए. कैट ने उन्हें कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए एक माह से भी ज्यादा समय दिया. 19  मई को गृह सचिव ने अधिवक्ता के माध्यम से अपना जवाब दिया लेकिन कैट न्यायधीश ने उसे खारिज कर उन्हें अगले दिन सशरीर हाज़िर होने का आदेश दिया. अगले दिन गृह सचिव ने पुनः अपने अधिवक्ता के माध्यम से अपना पक्ष रखने की कोशिश की लेकिन जब न्यायधीशों ने उनके विरुद्ध वारंट जारी करने की बात कही तो अधिवक्ता ने उन्हें मोबाइल से खबर कर तुरंत  कोर्ट में हाज़िर कराया.कैट के इसी बेंच ने एक दिन पहले आइजी निर्मला अमिताभ चौधरी को  कारावास की सजा सुनाई थी इसलिए गृह सचिव की हवा ख़राब हो गयी. कोर्ट की फटकार के बाद उन्होंने अंडरटेकिंग लेकर 15 दिनों के अंदर श्री नटराजन का निलंबन रद्द कर सेवा बहाल करने की बात कही लेकिन कोर्ट के रुख को देखते हुए २० मई को ही 2005 के निलंबन आदेश को खारिज करने सम्बन्धी अधिसूचना जारी कर दी. शनिवार 21 मई को श्री नटराजन ने झारखंड पुलिस मुख्यालय में अपना योगदान दे भी दिया. राज्य सरकार न्यायपालिका के प्रति अपने सम्मान की भावना का अक्सर प्रदर्शन करती है लेकिन कोर्ट के आदेश की उसे कितनी परवाह है इसे इन उदाहरणों के जरिये समझा जा सकता है. 
                        आईपीएस अधिकारियों के साथ इस दोहरे व्यवहार का एकमात्र कारण है लॉबी. श्री नटराजन पुलिस मुख्यालय की ताक़तवर लॉबी के नहीं थे इसलिए उन्हें छः वर्षों तक गैरकानूनी निलंबन का दंश झेलना पड़ा. बाकि लोगों की लॉबी मज़बूत थी तो उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई. व्यक्तिगत राग और द्वेष के आधार पर काम करने वाले इन अधिकारियों के जिम्मे राज्य की पूरी सुरक्षा व्यवस्था है. शायद यही कारण है की इस राज्य का हर नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है. 
---देवेंद्र गौतम  

बुधवार, 18 मई 2011

इसे कहते हैं प्रबंधकीय तानाशाही

झारखंड  के औद्योगिक प्रतिष्ठान राज्य सरकार के अतिक्रमण हटाओ अभियान की आड़ में प्रबंधकीय तानाशाही स्थापित करने में लगी हैं. इसका एक दिलचस्प उदाहरण सामने आया है. नियमतः ऐसे सेवानिवृत कर्मी जिनके सेवा लाभ का पूरा भुगतान नहीं हो पाया है उन्हें भुगतान मिलने तक सेवाकाल में आवंटित क्वार्टर में रहने का अधिकार है. इसके एवज में उनकी देय राशि से क्वार्टर का निर्धारित किराया काट लेने का प्रावधान है. हाई कोर्ट ने भी ऐसा ही आदेश दिया है जिसके मुताबिक जिन सेवानिवृत कर्मियों की बकाया राशि का मामला कोर्ट में लंबित है वे राशि भुगतान तक अपने आवास में रह सकते हैं. लेकिन रांची के एचइसी प्रबंधन ने ऐसे कर्मियों के क्वार्टरों को भी अवैध कब्जे की सूची में डाल दिया है और उन्हें जिला प्रशासन की मदद से जबरन खाली कराने की साजिश रच रही है. इसमें नियमों की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है. 
सादे कागज पर नोटिस 
           
 एचइसी के एक सेवानिवृत कर्मी हैं सुरेन्द्र सिंह. वे क्वार्टर नंबर बी-98 (टी) में रहते हैं. उनके पीएफ, ग्रेच्युटी आदि का भुगतान नहीं हो सका है. उनका मामला कोर्ट में है. उनका क्वार्टर भी अवैध कब्जे की सूची में डाल दिया गया. उन्होंने कोर्ट के आदेश की प्रति संलग्न करते हुए 15 अप्रैल को ही रांची जिले के उपायुक्त,  को एक आवेदन देकर वस्तुस्थिति स्पष्ट की. इसकी प्रति निबंधक, माननीय उच्च न्यायालय,  एचइसी और आवासीय दंडाधिकारी, रांची को दी. लेकिन हाल में प्रबंधन की और से एक सादे कागज पर बिना किसी मुहर के एक नोटिस उनकी अनुपस्थिति में उनके क्वार्टर पर चिपका कर दो दिन के अंदर अवैध कब्ज़ा हटा देने का फरमान जरी कर दिया गया. सुरेन्द्र सिंह जैसा ही व्यवहार अन्य सेवानिवृत कर्मियों के साथ किया जा रहा है. उन्हें बकाया राशि का भुगतान किये बिना रांची से भगाने की साजिश रची जा रही है. जाहिर है कि घर चले जाने के बाद बार-बार भुगतान के लिए उनका रांची आना संभव नहीं होगा. प्रबंधन सेवा निवृत कर्मियों को लम्बे समय तक भुगतान से वंचित रख पायेगी. राज्य सरकार अभी अतिक्रमण हटाओ अभियान के नशे में गलत और सही के बीच फर्क करने की मनः स्थिति में नहीं है. जाहिर है कि प्रबंधन की नीयत साफ़ नहीं है. 
                    एचइसी के 284 क्वार्टर अवैध कब्जे की चपेट में हैं. इनमें 50 फीसदी क्वार्टरों पर पुलिस अधिकारियों और नेताओं का कब्ज़ा है. जिस भी पुलिस अधिकारी को क्वार्टर मिला उसने तबादला होने के बाद भी कब्ज़ा बरक़रार रखा. जो नए पदस्थापित हुए उन्हें दूसरे क्वार्टर दिए गए. इस तरह अधिकारी आते गए कब्ज़ा बढ़ता गया. कुछ क्वार्टरों पर विभिन्न दलों के नेताओं का कब्ज़ा है. .खुद केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय पर दो एक्सीक्युटिव बंगलों पर कब्जे का आरोप है. कुछ क्वार्टरों पर अपराधियों ने भी कब्ज़ा जमा रखा है. एचइसी प्रबंधन के लिए उन्हें खाली करना टेढ़ी खीर है. 25 फीसदी क्वार्टरों को एचइसी के स्टेट डिपार्टमेंट के अधिकारी ही हेराफेरी कर भाड़े पर चला रहे हैं. शेष 25 प्रतिशत क्वार्टरों में या तो बकाया राशि के भुगतान का इंतजार करते सेवानिवृत कर्मी रह रहे हैं या फिर मृत  कर्मियों के आश्रित जिन्हें अनुकम्पा के आधार पर नियोजन दिया गया लेकिन दूसरा क्वार्टर आवंटित नहीं किया गया. नतीजतन वे पिता के ज़माने में आवंटित क्वार्टर में ही रहकर अपनी सेवा दे रहे हैं. प्रबंधन ऐसे क्वार्टरों को भी अवैध कब्जे की सूची में जोड़ता है. पिछले वर्ष लव भाटिया नामक एक व्यवसायी का अपहरण कर एचइसी का ही एक क्वार्टर में रखा गया था. पुलिस ने उसे वहीँ से एक मुठभेड़ के बाद बरामद किया था. मुठभेड़ में चार अपराधी मारे गए थे. उस  वक़्त भी क्वार्टरों से अवैध कब्ज़ा हटाने की बात चली थी. लेकिन बात आयी -गयी हो गयी थी. अपहरण कांड का मुख्य साजिशकर्ता राजू पांडे कई  क्वार्टरों पर पूर्ववत काबिज रहा था. बाद में ओरमांझी में एक ज़मीन विवाद में उसकी हत्या हो गयी थी. इस तरह के लोगों के कब्जे से प्रबंधन को परेशानी  नहीं है.परेशानी  अपने पूर्व कर्मियों और उनके  आश्रितों से है. हैरत की बात है कि राज्य सरकार और प्रशासन भी प्रबंधन की इस साजिश में जाने-अनजाने भागीदार बन जा रहे हैं. सबसे हैरत ट्रेड यूनियन नेताओं पर है जो सबकुछ जानते हुए भी मौन धारण किये हुए हैं. ले-देकर कुछ आवाज उठा भी रहे हैं तो केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ही उठा रहे हैं. 

-----देवेंद्र गौतम   

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...