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शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

आखिरी ख्वाहिश


  • सुनो, 
    कभी ऐसा भी तो हो
    कि इक सुबह चल पड़े हम 
    नंगे पांव घास पर, 
    बटोरे ढेर सारी ओस की बूंदे 
    कभी भींग जाये बरिशो में 
    गुनगुनाए एक गीत 
    चल पड़े 
    किसी ओर , कही भी 
    बस, हम और तुम 
    बैठे रहे इक नाव पर
    बाते करते रहे खामोशियो मे
    छत के उस कोने से
    देखते रहे, ढलता सूरज
    साथ-साथ
    कभी मै बोलु और तुम सुनो
    सुनते रहो मुझे
    थामे हुए मेरा हाथ
    इक आखिरी ख्वाहिश भी है
    वह तो सुनो
    कभी ऐसा हो
    कि तुम्हारी गोद में सिर रखकर
    पढ्ती रहू 'अमृता' को
    तुम गुनगुनाते रहो एक ग़ज़ल
    और ...और
    उस पल मे ही
    थम जाये सबकुछ
    बंद हो जाये मेरी पलके
    हमेशा-हमेशा के लिये 


    http://swayambara.blogspot.in/

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

डायरी के पन्ने (05.03.2004) : मेरे शिशु मेरे नवगीत

साभार :  http://thebabypicz.com



मेरे शिशु मेरे नवगीत
जीवन बगिया के नन्हे फूल
गर्वित हर्षित ह्रदय मेरा
बन गया नवीन स्रष्टा तेरा,

मातृत्व -निर्झर में भींगा मन
हर पल सोचे कैसा है तू
मुझ जैसी  रुनझुन-पायलिया
या पौरुष का साकार रूप

नन्ही आंखे नन्ही बाहें
नन्हे अधरों की मुस्काने
है अभी कल्पना मेरी
पूरी होगी ये मन जाने

आये जो तू आँचल में मेरे
जी लुंगी फिर बचपन इक बार
तेरी स्मिति में ढूँढूँगी
अपना चेहरा, उनकी मुस्कान

हौले-हौले, चुपके-चुपके
कैसे आया तू जीवन में
अभी-अभी तो जाने था कहाँ
अभी-अभी कह गया तू 'माँ'

अपनी तुतलाती बोली से
'माँ' कहकर देगा ऐसी ख़ुशी
सारे-सारे सुखों में भी
जो कभी किसी को नहीं मिली


मेरी प्रतिकृति मेरा रक्त मांस ,
पल-पल जोहे तुझको ये साँस
पल-पल की ख़ुशी, पल-पल जीवन
पल ही पल में, पूरी होगी आस

......इसे अपनी अत्यंत प्रिय सखी को  लिखकर उपहारस्वरूप दिया था...वह 'माँ' बननेवाली थी...और उसकी ख़ुशी में 'मै' बावली हुए जा रही थी ....क्या दिन थे वे भी ...:)
http://swayambara.blogspot.in/2013/09/05032004.html

सोमवार, 12 अगस्त 2013

बाढ़ ( बरहरा, भोजपुर, बिहार) की कहानी : तस्वीरो की जुबानी

 'स्वयम्बरा'
राम भजो, राम भजो, राम भजो भाई.....

'भगवान' अपने घर को भी नहीं बचा पाए.....

खेतों में चल रही है नाव....

'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' से बनी सड़क..........दिख रही है क्या? 

बाढ़  के बीच 
यहाँ एक सड़क हुआ करती थी .....


बाढ़ से घिरे गांव

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
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गुरुवार, 13 जून 2013

क्यूंकि जिंदगी मे 'रिवर्स गियर' नही होता

चल,
फिर से बच्चा बन जाते है
लड़ते है, झगड़ते है
रूठते है, मनाते है
कट्टी ..कट्टी ....कट्टी
मेल्ली ...मेल्ली ..मेल्ली 

और जो मेल्ली न हो पाया तो?

उह!
हटाओ न, समझदारी का खोल
फेंक दो ना बड़प्पन दूर... बहुत दूर
खेलोगी, आंख मिचौली ?
देंगा-पानी, रुमाल चोर?

हाँ, सब खेल ही तो है !

फिर वही बात ?
ओ सयानी,
चल सुनाती हूँ एक कहानी
फूलकुमारी की
जब हंसती थी तो सारे फूल हँसते थे

जब रोती थी तो.......?

ओ....हो !
चल एक नाव बनाये
खेवेंगे साथ-साथ
बादलों के देश में ले जायेंगे उसे

अच्छा!
पल भर भी टिकेगी तेरी कागज़ की नाव ?

अब तू सुन!
छोड़ ये मासूमियत
ओढ़ ले मुखौटा
बन जा सयानी
मत उलझ,
सपनो की दुनिया में
कि नहीं आता बचपन कभी लौटकर
कि नहीं होता कोई जिसकी ऊँगली पकड़ चल पड़े हम
क्यूंकि जिंदगी मे  'रिवर्स गियर' नही होता
क्यूंकि  जिंदगी मे 'कोई' रिवर्स गियर नही होता
(आत्मालाप )


........स्वयम्बरा
http://swayambara.blogspot.in/2013/06/blog-post_13.htmlhttp://swayambara.blogspot.in/2013/06/blog-post_13.html

बुधवार, 12 जून 2013

बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान



यवनिका 1993 से सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय रही है. वर्ष 1994 से 'यवनिका सम्मान ' की शुरुआत की गयी ...हालाँकि उसके बाद कई साल गुज़र गए ...अब तक जिन्हें सम्मानित किया गया है वो है ...राधा चरण सिंह (खेल), प्रो श्याम मोहन अस्थाना (रंगमंच ), पंडित देव नंदन मिश्र (शास्त्रीय संगीत ), डॉ के. बी. सहाय (कलाक्षेत्र-चिकित्सा व् समाज सेवा ), श्रीमती उर्मिला कॉल (साहित्य जगत ) .

वर्ष 2010 से इसे फिर से शुरू किया गया, जिसके तहत वैसे वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज को एक सकारात्मक दिशा दी है. सम्मान में एक प्रतीक चिन्ह, शाल, प्रशस्ति -पत्र दिया जाता रहा है. वर्ष 2012 से सम्मान का नाम 'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान' गया . साथ ही सम्मान में 5001 रुपये की धनराशि भी जोड़ी गयी, जिसे 'बक्सी परिवार' वहन करता है .... ज्ञात हो कि 'बक्सी जी' यवनिका के संस्थापक सदस्य व् मुख्य संरक्षक थे , जिनका देहांत २०१२ के अगस्त माह में हो गया .

पिछले साल यह सम्मान 'बक्सी जी' की जन्मतिथि 23 दिसंबर को 'श्री सियाराम निर्भय जी' को दिया गया..'निर्भय जी' को उनके सामाजिक- साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया...आर्य समाज से जुड़े निर्भय जी ने 1974 के जे. पी. आन्दोलन में भी योगदान दिया था ..उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया ...

"सच कहना अगर बगावत है तो समझो की हम बागी है'' इनकी प्रसिद्द कविता थी....तत्कालीन सरकार ने इन्हें और इनके लेखन को प्रतिबंधित कर जेल में डाल दिया ..

इस वर्ष भी 'यवनिका सम्मान ' दिया जायेगा...इसमें आप सबो का सहयोग चाहिए..यदि आप 'भोजपुर' में ऐसे बुजुर्गो को जानते है जिन्होंने अपने कार्यों से समाज को एक दिशा दी हो तो हमें बताये... क्यूंकि किसी ने कहा है-
                                               "मंदिर-ओ -मस्जिद में जाना कोई बात नहीं,
                                            हो बुजूर्गों की क़द्र-ओ- इबादत मगर नमाज़ से पहले" 


.................स्वयम्बरा
http://swayambara.blogspot.in/2013/06/1993.html


सोमवार, 10 जून 2013

डायरी के पन्ने

डायरी के पन्ने
दिनांक : 12.10.1998
..................................................
वह लावारिश लाश
पड़ी थी उधर
मुह खोले, टांग पसारे, हाथ फैलाये
सुना है कल रात किसी ने गोली मार दी उसे
यही बीच सड़क पर
तब भीड़ थी यहाँ
सुना है वह खूब चीखा, पुकारता रहा,
सबने अनसुनी, अनदेखी की,
भागते रहे गंतव्य की ओर,
झांकते रहे झिर्रियों से ,
जिसका चलन है शहर में
पुलिस आयी
लाल बत्ती, खाकी वर्दी, चमकते सितारे समेत,
उसके मरने तक खड़ी रही
इन्क्वायरी (?) के लिए
सुना है
वह लड़ता था ऊँची अट्टालिकाओं से
हक की लडाई
और कहते है,
इन्काउन्टर नहीं
मुठभेड़ हो गया, गुंडों का
मारा गया वह,
लोग गुजरने लगे है अब वहां से,
सफ़ेद रेखाओं के ऊपर से भी
पहियों, कदमो की धूल ने ढँक दिया  है
लाल धब्बों को,
अब तो ये भूली सी बात है
लोकतंत्र तो जनसमूह है न,
यहाँ अकेले की क्या बिसात है .
......स्वयम्बरा(जाने किस मनःस्थिति में इन शब्दों का सृजन हुआ था )
http://swayambara.blogspot.in/2013/06/blog-post_9.html

मंगलवार, 28 मई 2013

कब्र, संवेदना की

बाते..बाते,
बस बाते है चारो ओर
नपे तुले शब्द
भाव भंगिमा भी नपी तुली
मुस्कुराहटो के भी हो रहे  पैमाने....
बुद्धिजीवी का मुखौटा पहनकर
नाचते रहते है...
सच कहु तो
लगते है मसखरा सदृश ....
हाथ नचाते, आंख घुमाते
अपनी ही कहे जाते है
वक़्त-बेवक्त चीखते-चिल्लाते, धमकाते
खोदते है कब्र, संवेदना की
मातम मनाते, ग़मज़दा (?) होते
धकेल देते है 'उसे'
फिर भर देते है कब्र
अपने  'अति विशिष्ट' विचारो की मिटटी से

(ऊब और झुंझलाहट )
.......स्वयम्बरा


http://www.swayambara.blogspot.in/2013/05/blog-post.html


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...