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रविवार, 10 जून 2018

बाजारवाद के दौर में साहित्य


देवेंद्र गौतम
वैश्वीकरण के दबाव के कारण हिन्दी साहित्य गंभीर संकट से गुजर रहा है। विचार पर बाजार हावी हो रहा है। लेखक जन सरोकार की जगह बिकाउ साहित्य की जमीन तलाश रहे हैं और तमाम साहित्यिक संगठन निष्क्रिय पड़े हैं।
 बिहार की राजधानी पटना से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आरा भोजपुर जिले का मुख्यालय और एक छोटा सा कस्बानुमा शहर है। लेकिन सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों के कारण इसे बिहार का इलाहाबाद कहा जाता रहा है। इस छोटे से शहर में 70 के दशक तक हिन्दी की चार और उर्दू की चार साहित्यिक संस्थाएं सक्रिय थीं। सबकी मासिक गोष्ठियां नियमित रूप से होती थीं। यानी हर शनिवार-रविवार को कोई न कोई रचना अथवा समीक्षा गोष्ठी होती ही थी। इनमें नए रचनाकार भी शामिल होते थे और जाने-माने साहित्यकार भी। इससे रचनाशीलता का एक माहौल बना रहता था। हिन्दी में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच जैसे राष्ट्रीय संगठन और नवोदित रचनाकारों की स्थानीय स्तर पर गठित मित्र मंडली। उर्दू में हल्का-ए-अहबाब, दायरे-अदबिया, इदारा-ए-अदबे नौ और बज्मे-नूरी।
अब सिर्फ बज्मे-नूरी की ही माहनामा निशिस्त (गोष्ठी) नियमित रूप से होती है। कभी-कभार छठे-छमाही जनवादी लेखक संघ का कुछ आयोजन हो जाता है। बाकी सारी संस्थाएं निष्क्रिय हो चुकी हैं। वर्ष में एकाध साहित्यिक कार्यक्रम सरकारी सौजन्य से हो जाता है। साहित्यिक सक्रियता का वह जमाना जो नवयुवकों को साहित्य सृजन के लिए प्रेरित करता था, इतिहास के पन्नों में गुम हो चला है। नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार भी या तो दुनिया से कूच कर चुके हैं या फिर अपनी खोल में जा छुपे हैं। व्यक्तिगत रचनाशीलता जरूर कायम है लेकिन सामुहिक सृजन का माहौल खत्म हो चला है।
यह सिर्फ आरा की नहीं हिन्दी पट्टी के अधिकांश शहरों की कहानी है। साहित्यिक संगठनों की राष्ट्रीय और राज्य कमेटियां तो अस्तित्व में हैं लेकिन अधिकांश जिलों में कोई इकाई शेष नहीं है। है भी तो निष्क्रिय पड़ी है। कोई मार्गदर्शन नहीं होने के कारण गंभीर साहित्य सृजन सीमित हो चला है और विभिन्न शहरों में फेसबुकिया और इंटरनेटी साहित्यकारों की एक जमात सामने आई है जो रातो-रात शोहरत और दौलत हासिल करने को लालायित दिखाई देती है। चेतन भगत जैसे लेखक उनके रोल मॉडल बन गए हैं। बिकाउ साहित्य का बोलबाला है। जन-सरोकारों का साहित्य अपेक्षाकृत कम लिखा जा रहा है।
निश्चित रूप से लोगों में पढऩे की जगह देखने की प्रवृति बढ़ी है। टीवी और इंटरनेट से जुड़ाव बढ़ा है लेकिन अभी भी बोले हुए शद्ब्रदों की जगह छपे हुए शद्ब्रदों का महत्व कायम है। लुगदी साहित्य की बिक्री में तो कोई कमी नहीं आई है।
दरअसल नब्बे के दशक में सोवियत संघ का विघटन और अमेरिका-परस्त बाजारवाद तथा ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया भारत में हिन्दी-उर्दू साहित्य के लिए जोरदार झटका साबित हुई है। बाजार के समक्ष विचारधारा के कमजोर पडऩे के कारण जमीनी स्तर पर निराशा व्याप्त हो गई। इसका सीधा असर साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर पड़ा। साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों का एक बड़ा हिस्सा उपभोकतावाद की सुनामी में बह गया। अचानक अधिकांश साहित्यिक संगठनों की सक्रियता पर विराम सा लग गया। अखिल भारतीय स्वरूप के तीनों प्रमुख साहित्यिक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जो अलग-अलग वामपंथी दलों और उनकी विचारधारा से प्रेरित थे, अस्तित्व का संकट झेलने लगे।
रचनाकारों का एक बड़ा हिस्सा इन संगठनों से जुड़ा हुआ था। हालांकि उस वक्त तक हिन्दी और उर्दू साहित्य में अन्य धाराएं भी मौजूद थीं। हिन्दी में उत्तर आधुनिकतावाद और उर्दू में मा-बादे-जदीदीयत का दौर शुरू हो चुका था। यह सात्र और फ्रैंज काफ्का की विचारधारा से प्रेरित आंदोलन थे। उर्दू में 60 के दशक में ही तरक्कीपसंद (प्रगतिशील)आंदोलन के समानांतर जदीद (आधुनिकतावादी) तहरीक (आंदोलन) को अमली-जामा पहनाया जाने लगा था। लेकिन यह आंदोलन कुछ बड़े नामों, उनके समर्थकों और कुछेक पत्रिकाओंं तक महदूद थे। इनका कोई सांगठनिक ढांचा मौजूद नहीं था। इनसे ज्यादातर उस वक्त की नई पीढ़ी जुड़ी थी। स्थापित रचनाकार नए सिरे से पहचान बनाने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।  बदले परिवेश में कुछ रचनाकारों ने मौन साध लिया। कुछ लोग बाजारवाद को कोसने में व्यस्त हो गए और कुछ उसमें अपनी जगह बनाने में। कुछ सामाजिक सरोकारों से तौबा कर बिकाऊ साहित्य की रचना की जमीन तलाश करने लगे। इस बीच भारतीय समाज में भी पश्चिमी प्रभाव बढऩे लगा। सामाजिक परिवर्तनों ने गति पकड़ी और इसके साथ ही धीरे-धीरे साहित्य लेखन का चरित्र भी बदलने लगा। इस मौके पर साहित्यिक संगठनों ने विचारधारा के स्तर पर रणनीतिक बदलाव की जरूरत नहीं समझी। इसके कारण भी भगदड़ को रोका नहीं जा सका।
इस दौरान पूरी दुनिया में नए सामाजिक आंदोलनों का उभार आया। इस क्रम में स्त्रियों का आंदोलन, राष्ट्रीयताओं का आंदोलन, दलितों का आंदोलन और अन्य वंचित तबकों का आंदोलन जोर पकडऩे लगा। वाम संगठन अपनी वर्ग संघर्ष की पुरानी अवधारणा पर चलते रहे। उन्होंने अपने खोल से बाहर निकलकर इनके साथ सामंजस्य बिठाने की जगह इन्हें प्रतिक्रियावादी आंदोलन के खाते में डाल दिया। इसके कारण भी गतिरोध उत्पन्न हुआ। प्रासंगिकता संदिग्ध होने लगी। नए आंदोलनों के प्रति वाम संगठनों का रवैया फिर भी नकारात्मक बना रहा। जबकि भारत में जाति व्यवस्था की जकडऩ के कारण इस तरह के आंदोलनों की जमीन पहले से ही बनी हुई थी। इस स्थिति में दलितवाद, स्त्री-विमर्श और आदिवासी विमर्श का साहित्य मुख्यधारा में शामिल होने लगा और पूर्व की तमाम धाराएं हाशिए की ओर बढऩे लगीं। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हिन्दी कवि मदन कश्यप कहते हैं, ‘सांगठनिक स्तर पर रणनीतिक बदलाव किए गए होते तो निष्क्रियता का यह माहौल नहीं बनता। बाजारवाद को कोसने की जगह उसका सामना करने की जरूरत थी, जिसमें हम पिछड़ गए।’
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से लेकर कई दशकों तक का हिन्दी और उर्दू का साहित्य वामपंथी धारा का साहित्य रहा है। हिन्दी में प्रगतिशील लेखक संघ और उर्दू में अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्निफ इस धारा के प्रथम संगठन थे। प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना 1935 में लंदन में हुई थी। भारत में 10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में और जुलाई 1936 में कोलकाता में सज्जाद जहीर के नेतृत्व में इसका गठन हुआ। इससे सआदत हसन मंटो, अली जावेद जैदी, प्रो. जोए अंसारी, डा. एमडी तासीर, फैज अहमद फैज, विजयदान देथा, खगेंद्र ठाकुर, भीष्म साहनी, प्रो. अहमद अली, डा. नुसरत जहां, राशिद जहां, अहमद नसीम कासमी, फैज अहमद फैज, हबीबी तालिब, गुलखान नसीर, कैफी आजमी, कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, राजेंद्र सिंह बेदी, अली सरदार जाफरी, जोश मलीहाबादी, जां निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलाम रब्बानी तावां, मख्दूम मोहिनुद्दीन, मुंशी प्रेमचंद, मजनूं गोरखपुरी, फिराक गोरखपुरी, अमृता प्रीतम, मजाज लखनवी, साहिर लुधियानवी और मुल्कराज आनंद जैसी हस्तियां इससे जुड़ी रही हैं। लंबे समय तक यह वाम साहित्यकारों का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन रहा। कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद इसका भी विभाजन होता गया।
1984 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से प्रेरित जनवादी लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में संपन्न हुआ। प्रगतिशील लेखक संघ का एक बड़ा हिस्सा इसमें शामिल हो गया। आज तुलनात्मक दृष्टि से यह संगठन कुछेक इलाकों में सक्रिय है। स्थानीय स्तर की छोटी गोष्ठियां भले ही नियमित न हों लेकिन साल में कुछेक कार्यक्रम करा लेता है। अभी जन संस्कृति मंच के साथ इसके साझा कार्यक्रमों की पहल भी कई राज्यों में की जा रही है। प्रगतिशील लेखक संघ की प्रदेश इकाइयांं ही बची हैं। इसके राष्ट्रीय और प्रदेश इकाइयों की बागडोर वयोवृद्ध साहित्यकारों के हाथ में हैं। उनमें से कई तो अब कुछ बोलने समझने की स्थिति में नहीं रह गए है। नई पीढ़ी को नेतृत्वकारी भूमिका में लाने में इनकी दिलचस्पी नहीं है। निष्क्रियता का यह भी एक बड़ा कारण है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखकीय गुण आत्मप्रेरणा से उत्पन्न होते हैं। सामाजिक विसंगतियों को लेकर अंदर की बेचैनी उसे कलम उठाने को प्रेरित करती है। कोई भी संगठन लेखक बनाने का कारखाना नहीं होता। यह सिर्फ विभिन्न पीढिय़ों के लोगों को एकजुट कर उनके बीच सामंजस्य कायम करने का मंच होता है। इससे लेखन यात्रा को गति और दिशा मिलती है। कुछ करने की तहरीक मिलती है।
बाजारवाद और उपभोक्तावाद के दौर में एक खास प्रवृति यह उत्पन्न हुई कि हर चीज का आर्थिक मूल्यांकन किया जाना लगा। जाहिर तौर पर साहित्य और पत्रकारिता में भी जन सरोकार की जगह बिकाउ माल की तलब होने लगी। इस मामले में लुगदी साहित्य आगे निकल गया। गंभीर साहित्य पिछड़ गया। बाजारवाद की इस कसौटी पर अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं ने तो अपनी जगह बना ली लेकिन कम से कम हिन्दी और उर्दू साहित्य खरा नहीं उतर पाया। इसका एक बड़ा कारण प्रकाशकों में जोखिम उठाने के साहस का अभाव रहा है। साहित्य के प्रकाशक सरकारी खरीद-फरोख्त से आगे बढऩे में हिचकते रहे। पुस्तक मेलों के जरिए उपभोक्ता बाजार तक पहुंच बनाने की छिटपुट कोशिशें जरूर हुईं लेकिन आक्रामक मार्केटिंग की शुरुआत नहीं की जा सकी। यह विज्ञापन का युग है। लेकिन हिन्दी-उर्दू का कोई प्रकाशक बड़े से बड़े लेखक की पुस्तक का प्रिंट अथवा इलेञ्चट्रोनिक मीडिया में विज्ञापन नहीं देता। उनके प्रचार-प्रसार के आधुनिक तौर-तरीके नहीं अपनाए जाते। इसलिए इन भाषाओं की कोई पुस्तक, चाहे वह कितनी भी रोचक और महत्वपूर्ण हो, बेस्टसेलर नहीं बन पाती। जबकि बाजार की शर्तों को पूरा करने वाली अंग्रेजी में बेस्टसेलर की बाढ़ सी आ गई है। कई बेस्टसेलर भारतीय मूल के अंंग्रेजी लेखकों के हैं। प्रकाशकों की सुरक्षात्मक मार्केटिंग के कारण उपभोक्ताओं तक सहीं साहित्य पहुंच नहीं पाता। उनसे सीधे तौर पर जुड़े कवि सम्मेलनों का स्तर भी गिरा है। इनके आयोजक अब हास्य-व्यंग्य या फूहड़ रचनाओं के जरिए ताली बटोरने वाले कवियों को प्राथमिकता देते हैं। जन सरोकार की कविताएं रचने वाले गंभीर कवियों को जनता के सामने नहीं लाया जाता।
जनवादी लेखक संघ से जुड़े अनवर शमीम कहते हैं, ‘उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन करोड़ों में होते हैं लेकिन साहित्य के प्रचार-प्रसार पर एक छदाम भी खर्च नहीं किया जाता। बाजार के साथ नहीं चलने पर पिछड़ जाना तो स्वाभाविक ही है।’
शिक्षा की दुनिया में निजी स्कूलों के बढ़ते वर्चस्व का असर भी पड़ा है। बुनियादी स्तर पर पाठ्य पुस्तकों का चयन स्कूल प्रबंधन स्वयं करते हैं। वे अपने हिसाब से इन्हें तैयार करवाते हैं। इस क्रम में हिन्दी की पुस्तकों में अपने परिचितों की रचनाएं डलवाते हैं। इसके कारण बच्चों को साहित्य का संस्कार नहीं दिया जा पाता। सामाजिक बदलाव के साहित्य से इनका परिचय नहीं हो पाता। पत्रकारिता में भी साहित्य का पन्ना गायब हो चुका है। अधिकांश अखबार साहित्यिक रचनाओं और गतिविधियों को प्रमुखता नहीं देते। साहित्यिक संगठनों की निष्क्रियता का यह भी एक कारण है।

शनिवार, 9 जून 2018

हजारीबाग में धू-धू कर जलीं दो लग्जरी बसें

मनीष कुमार
हजारीबाग। पम्मी बस की दो बसों  में फिर  लगी आग । सरकारी बस डिपो में खड़ी थी बस । आज लगातार दूसरे दिन लगी एक ही बस कंपनी में आग । दमकल की दो गाड़ीयां आगे भुझाने में लगी । मौके पर हजारीबाग एसपी सदर एसडीओ मौजूद । 

सुबोधकांत से मिले हरमू फलाईओवर निर्माण से प्रभावित लोग



पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने की नगर विकास सचिव से बात,
कहा, जोर-जबरदस्ती न करे सरकार

रांची । कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने झारखंड सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि राज्य सरकार फलाईओवर निर्माण और सडक चौडीकरण के नाम पर रैयतों के साथ जोर जबरदस्ती न करे। जमीन अधिग्रहण करने से पूर्व उच्च स्तरीय कमिटी बनाकर स्थानीय लोगों के साथ बैठक कर जनहित में निर्णय लें। उन्होंने कहा कि रघुवर सरकार लाठी-गोली के बल पर जमीन अधिग्रहण करने की मंशा छोड, आपसी सहमति बनाकर स्थानीय लोगों के साथ मिल बैठकर बात करने के बाद ही कोई निर्णय ले। जबरन जमीन अधिग्रहण या मकान तोडने से जनाक्रोश बढेगा। उन्होंने कहा कि रांची शहर के मास्टर प्लान में भी भविष्य में हरमू में फलाईओवर निर्माण का जिक्र नहीं था। श्री सहाय से शनिवार को हरमू फलाईओवर निर्माण से प्रभावित होनेवाले हरमू निवासियों का एक प्रतिधिमंडल राजकुमार तिवारी के नेतृत्व में मिला। प्रतिनिधिमंडल ने श्री सहाय को बताया कि हरमू रोड में प्रस्तावित फलाईओवर निर्माण एवं भूमि अधिग्रहण गैर जरूरी योजना है। इसके पूर्व भी हरमू निवासी रैयतों से सडक चौडीकरण के लिए एकीकृत बिहार के समय वर्ष 1987-88 में जमीन ली गई थी। अब फलाईओवर के नाम पर सरकार जमीन छीनने की साजिश कर रही है। प्रतिनिधिमंडल ने हरमू रोड में प्रस्तावित फलाईओवर निर्माण योजना रदद कराने की मांग की। स्थानीय लोगों को की समस्याओं को सुनने के बाद श्री सहाय ने राज्य के नगर विकास विभाग के सचिव अजय कुमार सिंह से दूरभाष पर बात की। कहा कि प्रभावित लोगों की सहमति के बिना सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए, अन्यथा व्यापक जनांदोलन और जनाक्रोश का सरकार को सामना करना पडेगा। कांग्रेस पार्टी रघुवर सरकार के इस जनविरोधी निर्णय का पुरजोर विरोध करेगी। प्रतिनिधिमंडल में मनीष आनंद, रमण शर्मा, ज्ञान प्रकाश, विकास कुमार, ओमप्रकाश, आशीश कुमार गुप्ता, हीरालाल चौरसिया, ओमप्रकाश लाल, राजाराम चौरसिया, मेहुल कुमार, संतोष कुमार गुप्ता, राजकुमार गुप्ता, संतोष चौधरी, राजेश कुमार, मनीष आनंद सहित आनंद सहित अन्य शामिल थे।

शुक्रवार, 8 जून 2018

मोदी जी. कल किसने देखा है



देवेंद्र गौतम

पीएम मोदी के अंध समर्थक दलील दे रहे हैं कि देश को उनके प्रयोगों का दूरगामी लाभ मिलेगा। दूरगामी लाभ तभी मिलता है जब दूरदर्शिता के साथ कोई यत्न किया गया हो। जब प्रयोग बिना होमवर्क के अति उत्साह में लोगों को चौंकाने की नीयत से किए गए हों और जिनका तात्कालिक असर जानलेवा दिखा हो तो उनके दूरगामी लाभ की उम्मीद नहीं की जा सकती है। दूरदर्शिता का आलम यह है कि मोदी ने जब नोटबंदी लागू की थी तो उन्हें यह भी पता नहीं था कि जो वैकल्पिक करेंसी छापी जा रही है वह एटीएम के खांचे में नहीं आएगी। उनके वित्तमंत्री जेटली भी नहीं जानते थे कि एटीएम मशीनों के कैलिब्रेट करना पड़ेगा। इसमें कितना समय लगेगा अंदाजा नहीं था। जब मामला फंस गया तो कैशलेस इकोनोमी की बात की जाने लगी। यह सलाह देते समय भी पता नहीं था कि भारत में इंटरनेट का स्पीड इतना नहीं कि डिजिटलाइजेशन का बोझ उठा सके। नोटबंदी की घोषणा करते वक्त मोदी जी ने कहा था कि दो दिनों बाद एटीएम से दो हजार रुपये प्रति सप्ताह निकाले जा सकेंगे। आतंकवाद का सफाया हो जाएगा। काला धन खत्म हो जाएगा। जाली नोटों का धंधा बंद हो जाएगा। नए नोट विशेष सतर्कता से तैयार के गए हैं। इनकी नकल नहीं की जा सकेगी। लेकिन उनके बयान के दूसरे-तीसरे दिन ही नोएडा के छात्रों ने दो हजार के नकली नोट बना लिए थे और बाजार में चलाने की कोशिश की थी। वे कोई जाली नोटों का धंधा करने वाले अपराधी नहीं थे। नोटों की उपलब्धता का आलम यह था कि आमलोग बैंकों के सामने कतारों में खड़े थे और कश्मीर में मारे गए आतंकी की जेब से नए नोट बरामद हो रहे थे। लाखों के नए नोटों का भुगतान कर रेल दुर्घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा था। नोटबंदी का प्रयोग पूरी तरह फ्लाप हो गया लेकिन आज भी न सरकार इसे मानने को तैयार है न उनके भक्त। अब लीपापोती के लिए दूरगामी लाभ की बात की जा रही है। कांग्रेस के 60 वर्षों के शासन से तुलना नहीं करने की बात की जा रही है। मोदी जी हाड़ मांस के मानव हैं। कोई अजर अमर नहीं। अपनी उम्र को देखते हुए अंदाजा लगाएं कि कितने वर्ष सक्रिय राजनीति में रह सकेंगे। यदि वे अच्छे दिन लाने में लंबा समय लगाने वाले हैं तो इतना इंतजार न उनका शरीर करेगा न भारत की जनता। जिन कम्युनिस्टों को भाजपा के लोग गाली देते हैं उन्होंने जरूर ऐतिहासिक गलतियां की हैं लेकिन उनमें इतनी ईमानदारी तो है कि अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं। यहां तो अपनी विफलताओं पर भी दूरगामी लाभ का मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है। जनता ने मोदी जी को बड़े विश्वास और भरोसे के साथ पांच वर्षों के लिए चुना था तो उन्हें पांच वर्ष में लाभ देने वाले प्रयोग ही करने चाहिए थे। अपने चुनावी वादों में उन्होंने कभी यह नहीं कहा था कि उनके कार्यों का लाभ लंबे अंतराल के बाद होगा। इसमें समय लगेगा। बार-बार गद्दी सौंपिए और इंतजार कीजिए। मोदी जी, कल किसने देखा है। जो आज है वही सच है और सच यही है आपने देशवासियों उम्मीदों पर पानी फेरा है। भरोसे को तोड़ा है। अगर इत्तेफाक से एक मौका और मिल गया तो इसे अपना चमत्कार या शाह की प्रबंधन क्षमता नहीं बल्कि भारतीय जनता की उदारता और एहसान समझिएगा।

दलमा की गुफाओं में बैठकर करें वन्यजीवन का नजारा



देवेंद्र गौतम

रांची। वन्य जीवन में दिलचस्पी रखने वाले पर्यटकों के लिए खुशखबरी है। अब वे दलमा पहाड़ की गुफा में बैठकर जंगली हाथियों का नजारा कर सकेंगे। जमशेदपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 192 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य में वन विभाग ने मंझला बांध, बड़का बांध और राजोहा बांध के पास तीन गुफाएं निर्मित कर पर्यटकों के लिए खोल दी हैं। अभयारण्य के प्रवेश द्वार से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इन गुफाओं पर डेढ़-ढेढ़ लाख खर्च किया गया है। 17 गुना 13 फुट आकार की इन गुफाओं में खिड़कियां बनाई गई हैं जिनसे जलस्रोतों के पास आने वाले हाथियों और दूसरे वन्यजीवों की गतिविधियों का पर्यटक आराम से आनंद उठा सकेंगे। इनके निर्माण में पूरे छह महीने का समय लगा है। यह 300 करोड़ के इको टूरिज्म परियोजना का हिस्सा है।
अभी अभयारण्य में 20 हाथी मौजूद हैं लेकिन प. बंगाल के मिदनापुर और बांकुड़ा के जंगलों से हाथियों की वापसी का मौसम आ रहा है। उनके आने पर हाथियों का संख्या बढ़ जाएगी। उन्लेख्य है कि यहां वर्ष 2001 में हाथी परियोजना के तहत इस अभयारण्य की शुरुआत की गई थी। यहां हर वर्ष हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। झारखंड सरकार पर्यटकों की सुविधा के लिए आधारभूत संरचना का विकास कर रही है। यहां वातानुकूलित काटेज भी बने हुए हैं। लेकिन बिजली के अभाव के कारण उन्हें खोला नहीं जा पा रहा है। निर्वाध विद्युत आपूर्ति के लिए झारखंड राज्य विद्युत निगम के अधिकारियों से बात चल रही है। उनके खुलने पर पर्यटकों की संख्या में और जाफा होने की उम्मीद है।

अपने व्यक्तित्व का लोहा मनवा गए प्रणब दा


 देवेंद्र गौतम
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आरएसएस मुख्यालय, नागपुर का आमंत्रण स्वीकार करने को लेकर जो लोग आपत्ति व्यक्त कर रहे थे, परामर्श दे रहे थे, उन्हें अब समझ में आ गया होगा कि प्रणब दा के व्यक्तित्व के सामने वे कितने बौने और कितने नासमझ थे। प्रणब दा ने कांग्रेसियों के तमाम सुझावों और अटकलबाजियों का उस वक्त कोई जवाब नहीं दिया था। सिर्फ यही कहा था कि उन्हें जो भी कहना है नागपुर में कहेंगे। अब उनके भाषण से कहीं ऐसा नहीं लगता कि वे संघ के विचारों से संक्रमित या प्रभावित हुए हैं। उन्होंने संघ के मंच से अपनी बातें रखीं। उन्होंने वही सब कहा जो नेहरू की विरासत है उनका पूरा भाषण गांधी और नेहरू के राजनीतिक दर्शन का निचोड़ था जिसके सामने आरएसएस और बीजेपी कभी पटेल, तो कभी बोस को खड़ा करने की कोशिश करते रहे हैं।
अपने ज़ोरदार भाषण में प्रणब मुखर्जी ने जिस देश के इतिहास, संस्कृति और पहचान पर रोशनी डाली वह नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया वाला भारत है, यहां तक कि उनके भाषण का प्रवाह भी वही था जो नेहरू की किताब में है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति ये तीनों सब एक दूसरे से जुड़े हैं इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।-
उन्होंने शब्दकोश से पढ़कर नेशन की परिभाषा पढ़कर बताई। उन्होंने भाषण की शुरुआत महाजनपदों के दौर से यानी ईसा पूर्व छठी सदी से की, ये भारत का ठोस, तथ्यों पर आधारित और तार्किक इतिहास है।
यह संघ की अवधारणा वाला इतिहास नहीं था। संघ जिस इतिहास को स्थापित करना चाहता है वह हिंदू मिथकों से भरा काल्पनिक इतिहास है जिसमें देश की तामा गड़बड़ियों की शुरुआत गैर हिन्दू शासकों के आगमन के साथ माना जाता है। उस इतिहास में संसार का समस्त ज्ञान, वैभव और विज्ञान है। तकनीकी ज्ञान है। उसमें पुष्पक विमान उड़ते हैंप्लास्टिक सर्जरी होती हैइंटरनेट होता है।
प्रणब मुखर्जी ने बताया कि ईसा से 400 साल पहले ग्रीक यात्री मेगास्थनीज़ आया तो उसने महाजनपदों वाला भारत देखा, उसके बाद उन्होंने चीनी यात्री ह्वेन सांग का ज़िक्र किया जिसने बताया कि सातवीं सदी का भारत कैसा था, उन्होंने बताया कि तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय पूरी दुनिया की प्रतिभाओं को आकर्षित कर रहे थे। इन सबका ज़िक्र नेहरू ने ठीक इसी तरह अपनी किताब में किया है
प्रणब दा ने बताया कि उदारता से भरे वातावरण में रचनात्मकता पली-बढ़ी, कला-संस्कृति का विकास हुआ और भारत में राष्ट्र की अवधारणा यूरोप से भी पुरानी और उससे अलग है। उन्होंने कहा कि यूरोप का राष्ट्र एक धर्म, एक भाषा, एक नस्ल और एक साझा शत्रु की अवधारणा पर टिका है, जबकि भारत राष्ट्र की पहचान सदियों से विविधता और सहिष्णुता से रही है।
उन्होंने संघ का नाम लिए बिना उसकी नीतियों की ओर इशारा करते हे कहा कि धर्म, नफ़रत और भेदभाव के आधार पर राष्ट्र की पहचान गढ़ने की कोशिश हमारे राष्ट्र की मूल भावना को ही कमज़ोर करेगी।
मुखर्जी के भाषण को लेकर कई तरह की शंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने की बचकानी कोशिश की जा रही थी। लेकिन उन्होंने मौर्य वंश के अशोक को सबसे महान राजा बताया जिसने जीत के शोर में, विजय के नगाड़ों की गूंज के बीच शांति और प्रेम की आवाज़ को सुना, संसार को बंधुत्व का संदेश दिया। पंडित नेहरू भी यही मानते थे इसीलिए अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में स्वीकार किया था।
संघ का हमेशा से भारत को महान सनानत धर्म का मंदिर बताता रहा है। हिन्दू धर्म को भारत का मूल आधार घोषित करता रहा है। उसके मुताबिक इस देश को हिंदू शास्त्रों, रीतियों और नीतियों से चलाया जाना चाहिए लेकिन इसके प्रणव दा ने स्पष्ट कहा कि एक भाषा, एक धर्म, एक पहचान हमारा राष्ट्रवाद नहीं है।
उन्होंने गांधी के वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा कि भारत का राष्ट्रवाद आक्रामक और विभेदकारी नहीं हो सकता, वह समन्वय पर ही चल सकता है। उन्होंने सेकुलरिज्म के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में संविधान के अनुरूप देशभक्ति ही सच्ची देशभक्ति हो सकती है।
उन्होंने हिंदुत्व की संस्कृति की जगह साझा संस्कृति की बात की। बहस में हिंसा ख़त्म करने की जरूरत पर बस दिया।  देश में ग़ुस्सा और नफ़रत को कम करने और प्रेम तथा सहिष्णुता को बढ़ाने का आह्वान किया।
उनका पूरा भाषण उदार, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील, संविधान सम्मत, मानवतावादी भारत की की ओर केंद्रित था। जो गांधी-नेहरू का मिला-जुला राजनीतिक दर्शन है।
प्रणब मुखर्जी ने संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों को यह संदेश दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक अस्पृश्यता के लिए कोई जगह नहीं होती। अपने विचारों को शालीनता के साथ रखना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्देश्य है। वैचारिक मतभेद के कारण वाद-विवाद से परहेज नहीं करना चाहिए।


गुरुवार, 7 जून 2018

निष्पक्ष न्याय प्रणाली का यक्ष प्रश्न



-देवेंद्र गौतम

झारखंड के सिमडेगा में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग को शराब की लत के कारण जान गंवानी पड़ी। उन्हें उनकी बहुओं ने ही पीट-पीटकर मार डाला। चार जून की घटना है। जलधर बेहरा नामक बुजुर्ग अपनी दो बहुओं से शराब पीने के लिए पैसे मांग रहा था। उनके पैसा देने से इनकार करने पर वह उग्र हो उठा और टांगी लेकर उन्हें मारने को दौड़ा। बहुओं ने लाठी से मुकाबला किया और उसकी पिटाई करने लगीं। पिटाई के कारण जलधर वेहरा की मौत हो गई। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस पहुंची और दोनों बहुओं को गिरफ्तार कर लिया। उनपर हत्या का मुकदमा चलेगा। न्यायालय क्या फैसला देगा यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में लंबी दूरी तक नहीं जाएगा। निचली अदालतों के फैसले को चुनौती देने के लिए ऊपरी अदालतों में अपील करने के लिए न उनके पास धन है न जानकारी। वे महंगे वकीलों की सेवा नहीं ले सकतीं।  दूसरी तरफ पेशेवर अपराधी जघन्य अपराध करने के बाद भी पैसों के बल पर बड़े-बड़े वकीलों की सेवा लेते हैं। वर्षों कानूनी लड़ाई लड़ते रहते हैं और फिर साक्ष्य के अभाव में छूट भी जाते हैं। भारतीय समाज इसे न्यायिक व्यवस्था की मजबूरी और न्याय प्रणाली की विडंबना मानता है। अमीर लोग कानून की बिल्कुल परवाह नहीं करते। उन्हें अपने धनबल पर भरोसा रहता है। इन महिलाओं के पास धनबल नहीं है। उनके साथ कोई जनबल भी नहीं आएगा। धन होता तो ससुर को शराब के लिए पैसे मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ती। उन्होंने परिस्थितिवश अपने बचाव में हत्या की है। वे कोई पेशेवर अपराधी नहीं थीं। भारतीय समाज दबंगों के साक्ष्य के अभाव में छूटने पर कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाता है लेकिन सजा होने पर भी इन महिलाओं को कभी दोषी नहीं मानेगा। यदि वे प्रतिरोध नहीं करतीं तो ससुर की टांगी का निशाना बनतीं। यहां निष्पक्ष न्याय प्रणाली की सीमाओं को समझने की जरूरत है। क्या कानूनी लड़ाई में धनबल की भूमिका खत्म करने या कम करने की कोई प्रणाली विकसित नहीं की जा सकती...। यह मौजूदा व्यवस्था का एक यक्ष प्रश्न है।

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