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रविवार, 10 जून 2018

लोजपा ने लिया शिक्षा व्यवस्था में सुधार का संकल्प

रांची।  रविवार  10 जून  को  लोक जन शक्ति पार्टी झारखंड प्रदेश कार्यालय में, झारखंड प्रदेश छात्र इकाई की ओर से ,रांची जिला छात्र अध्यक्ष नियुक्ति की गई l जिसमें छात्र के पदाधिकारी मौजूद थे, राजेश कुमार को रांची जिला के छात्र अध्यक्ष बनाया गया l  झारखंड प्रदेश अध्यक्ष छात्र इकाई के गौरव प्रसाद ने सभी छात्र पदाधिकारियों को छात्र हित के लिए कार्य करने के लिए प्रेरणा दीl  छात्रों की तमाम परेशानियों को देखते हुए स्कूल, कॉलेजों में छात्रों के शिक्षा में समानता जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई l  झारखंड प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने , त्रूटियों में सुधार करने के लिए शिक्षा विभाग को ज्ञापन  दिया जाएगाl शिक्षा सचिव के माध्यम से बहुत सारे प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय को बंद कर दिया गया हैl  जो कि मौलिक अधिकार का हनन है l लोक जनशक्ति पार्टी के आजीवन सदस्य अमर कुमार महतो ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था जब तक मजबूत नहीं होगी तब तक  समाज  मजबूत नहीं होगा l ग्नामीण सशक्त नहीं होंगे। जबतक अधिकारों और कर्तव्यों  का ज्ञान नहीं होगा तब तक लोग एवं भटके हुए रहेंगे l रांची जिला नवनियुक्त छात्र इकाई के राजेश कुमार ने कहा कि रोजगार के प्रति श्रद्धा के साथ अपनी क्षमता को  प्रदर्शित करना होगा l इस मौके पर लोक जनशक्ति पार्टी के रांची जिला युवा अध्यक्ष अमित सिन्हा  मौजूद थे l नामकोम प्रखंड अध्यक्ष  विशुन कुमार महतो ने छात्रों को संबोधित किया l आगे आने की प्रेरणा दिया आगे उज्जवल भविष्य की कामना की l छात्र पदाधिकारी के रूप में आसिफ खान ,पवन पांडेय, विजिट  मिश्रा ,हिमांशु शाही, अनुराग ,आनंद  कुमार ,रोहित कुमार ,राजू कुमार ,सोनू साहनी  अमृतराज ,अंकित कुमार ,अशोक मुंडा आदि मौजूद थे ll

हरमू रोड श्री श्याम मंदिर में एकादशी संर्कीतन का आयोजन



रोम रोम में रमा हुआ है तेरी ज्योत का आला खाटु वाला खाटु वाला.... से गुजायमान रहा मंदिर

राँची।
हरमू रोड स्थित श्री श्याम मित्र मण्डल द्वारा निर्मित श्री श्याम मंदिर में 10 जून रविवार को रात्रि 10 बजे से एकादशी संर्कीतन का आयोजन किया गया।सर्वप्रथम बाबा को मनमोहक बाँगा(वस्त्र) पहना कर अनुपम श्रृंगार रंग बिरंगे फूलों से श्री गोपाल मुरारका एवं श्री अशोक लडिया ने किया।
मंदिर में ही स्थित श्री शिव परिवार एवं श्री बालाजी महाराज का भी नवीन वस्त्र पहना कर फूलों से श्रृंगार किया गया।
बाबा को आम,लिच्ची,मेवा,पेडा,दूध, रबडी,रोट,चना,गुड इत्यादि नाना प्रकार की मिठाईयों का भोग लगाया गया।
रात्रि 10 बजे मण्डल के सदस्य श्री पंकज गाडोदिया ने अपनी धर्मपत्नी एवं इष्टजनों संग बाबा श्री श्याम जी का अखण्ड ज्योत प्रज्जवलित किया।बाबा को भोग लगाया।मण्डल के श्री कृष्ण कुमार अग्रवाल ने गणेश वंदना के साथ भजन संध्या प्रांरभ किया।मण्डल के अन्य सदस्यों ने श्री श्रवण ढाढनियां,श्याम सुन्दर शर्मा,राजेश ढाढनिया,राजेश चौधरी,गौरव अग्रवाल, साकेत ढाढनिया आदि ने प्यारे प्यारे भजनों से बाबा को रिझाया।
मंदिर मे उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी बाबा के समक्ष अपनी अपनी अर्जी लगाई।रात्रि 1 बजे बाबा की आरती की गई।दरबार में उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण का कार्य श्री प्रवीण सिंघानियां,विष्णु चौधरी,रोहित अग्रवाल,अनिल नारनोली,विकास मोदी,अमित,निकुज,शैंकी,निखिल,अंकित आदि अन्य ने किया।

मोदी को देंगे दुमका-साहेबगंज सीटों पर जीत का उपहारः रोहित शारदा

रांची/दुमका। मिशन मोदी अगेन पीएम के प्रदेश युवा मोर्चा अध्यक्ष रोहित शारदा व प्रदेश मंत्री अरविन्दर सिंह खुराना ने दुमका में महत्वपूर्ण बैठक की।
बैठक के पूर्व युवा मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष रोहित शारदा व प्रदेश महामंत्री अरविन्दर सिंह खुराना के पहली बार दुमका पहुँचने पे कार्यकर्ताओं द्वारा जोरदार स्वागत किया गया।
प्रदेश युवा मोर्चा अध्यक्ष रोहित शारदा ने दुमका प्रवास के दौरान बैठक को संबोधित करते हुए कहा की अब समय आ चुका है कि हम चुनाव को लेकर कमर कस ले। उन्होंने बताया कि झारखंड में लोकसभा की चौदह सीट है जिसमे से बारह सीट भाजपा की झोली में है। शारदा ने मिशन मोदी के युवाओ में जोश भरते हुए कहा कि मिशन मोदी के युवा इस बार दुमका और साहेबगंज की दोनों सीटे भाजपा को जितवाकर नरेंद्र मोदी को उपहार देंगे।  उन्होंने आगे कहते हुए कहा कि अब मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विकास के पथ पे अग्रसित होने से कोई नही रोक सकता। मोदी जी के नेतृत्व में जो भी काम हो रहा है उससे पूरी दुनिया मे भारत की साख बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मोदी के विकास कार्यो को मिशन मोदी के युवा गांव के अंतिम घर तक ले जाएंगे। प्रदेश युवा मोर्चा अध्यक्ष रोहित शारदा ने दुमका से लोकसभा और विधानसभा के चुनाव का बिगुल फूका।

डीबीटी योजना की समीक्षा करे सरकारःसुबोधकांत



लाभुकों को मिले सस्ते दर पर किरासन, समय पर खाते में जाए सब्सिडी

रांची। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने कहा है कि राज्य सरकार लाभुकों को न्यूनतम दर पर किरासन तेल उपलब्ध कराए। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना (डीबीटी) के अंतर्गत किरासन तेल के वितरण का लाभ संबंधित लोगों को नहीं मिल पा रहा है। गरीब परिवार के लाभुकों के बैंक खाते में सब्सिडी की राशि भी नहीं जा रही है। गरीब लाभुकों और किसानों को अन्य राज्यों की अपेक्षा काफी ऊंचे दाम पर किरासन तेल खरीदने को विवश होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि लाभुकों की शिकायत है कि पीडीएस दुकानदार 45 रुपये प्रति लीटर किरासन तेल की बिक्री कर रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों में 25 रुपये लीटर किरासन तेल की बिक्री की जाती है। श्री सहाय ने इस संबंध मे झारखंड सरकार के खाद्य आपूर्ति, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू राय को पत्र प्रेषित कर डीबीटी योजना की समीक्षा करने और लाभुकों को अन्य राज्यों की तर्ज पर न्यूनतम दर पर किरासन तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है।

साख बचाने की जद्दो-जहद में अमित शाह



देवेंद्र गौतम

विजय रथ का चक्का थमने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बड़बोलापन थम गया है। परेशानी बढ़ गई है। उन्हें न सिर्फ गठबंधन के नाराज साथियों को मनाने की जरूरत महसूस हो रही है बल्कि भाजपा के अंदरूनी विवादों से भी निपटने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभाओं के चुनाव इसी वर्ष होने हैं। इनका आम चुनावों पर गंभीर असर पड़ेगा। 2019 के आम चुनावों में भी ज्यादा समय नहीं रह गया है। विपक्षी गठबंधन बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। गठबंधन के नाराज साथियों में सिवसेना के अधयक्ष उद्धव ठाकरे से उनके मुंबई स्थित आवास पर मिले लेकिन शिवसेना के तेवर नरम पड़ते नहीं दिख रहे। अब वह महाराष्ट्र में जूनियर पार्टनर की भूमिका में रहने को तैयार नहीं है। उसे 282 सदस्यीय विधान सभा में कम से कम 152 सीटें मिलेंगी तभी एनडीए गठबंधन में शामिल रहेगी अन्यथा सभी सीटों पर अकेले लड़ेगी। सेना आलाकमान ने शाह को अपनी शर्तें स्पष्ट तौर पर बता दी हैं। सेना चाहती है कि भाजपा केंद्र संभाले और महाराष्ट्र उसके लिए छोड़ दे। बिहार में नीतीश कुमार तो पहले ही सीनियर पार्टनर के रूप में मौजूद हैं। बिहार के भाजपा नेता सुशील मोदी उनका अग्रत्व पहले ही स्वीकार कर चुके हैं।
उधर राजस्थान की मुख्यमंत्री विजय राजे सिंधिया के साथ शाह का विवाद पहले से ही चल रहा है। इस विवाद के कारण अप्रैल से ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति रुकी हुई है। इसके कारण कार्यकर्ताओं में रोष व्याप्त है। उपचुनावों मे राजस्थान की दो संसदीय और एक विधान सभा सीट हारने के बाद अगले विधान सभा चुनाव के मद्दे-नज़र शाह राजस्थान के पार्टी ढांचे में फेरबदल करना चाहते थे। शाह ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक प्रणामी से इस्तीफा ले लिया लेकिन शाह के पसंदीदा उम्मीदवार जोधपुर के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पर वसुंधरा राजे सिंधिया ने आपत्ति व्यक्त कर दी। कई बैठकों के बाद भी इसपर निर्णय नहीं हो सका। शाह अपनी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष चाहते हैं जबकि सिंधिया अपने प्रति समर्पित व्यक्ति को इस पद पर बिठाना चाहती हैं। वसुंधरा के तेवर शाह की नाराजगी का सबब बन रहे हैं। वसुंधरा का राजस्थान में अपना जनाधार है। उनकी उपेक्षा भाजपा को महंगी पड़ सकती है लेकिन शाह का स्वेच्छाचारी स्वभाव समझौते की जगह टकराव को प्रेरित कर रहा है। यदि कर्नाटक और उपचुनावों में भाजपा को मुंह की नहीं खानी पड़ती तो शाह के तेवर कुछ और होते संभवतः वसुंधरा की छुट्टी कर दी गई होती। पिछले दिनों शाह ने जयपुर ग्रामीण लोकसभा के कार्यकर्ताओं की बैठक दिल्ली में बुलाई। उन्हें जमकर चुनावी तैयारी करने को कहा। सभा में कुछ लोगों ने सवाल उठाए कि यह बैठक दिल्ली में क्यों बुलाई गई। इसे राजस्थान में ही किया जाना चाहिए था। इस बैठक में वसुंधरा राजे नहीं शामिल हुईं। कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि शाह और राजे के विवाद के कारण बैठक दिल्ली में की गई। शाह ने बैठक में मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया और राजस्थान में उनके विजय रथ को आगे बढ़ाने का आह्वान किया लेकिन वसुंधरा सरकार के कार्यों और उपलब्धियों की कोई चर्चा नहीं की गई। जबकि विधानसभा चुनाव राज्य सकार के कार्यों के आधार पर लड़े जाते हैं।
शाह ने साफ संकेत दिया कि राजस्थान का चुनाव वसुंधरा राजे सीएम रहेंगी लेकिन चुनाव उनके नाम पर नहीं बल्कि मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा। दरअसल वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाने की पूरी तैयारी थी। पार्टी को डर था कि वसुंधरा बगावत कर सकी हैं। लेकिन अब शाह ने संकेत दिया कि बदली परिस्थितियों में यह जोखिम नहीं उठाया जाएगा वसुंधरा मुख्यमंत्री बनी रहेंगी। शाह के अहंकारी स्वभाव के कारण राजे ही नहीं भाजपा के बहुत से नेता खार खाए हुए हैं। अब अपराजेय होने का भ्रम टूटने के बाद सबको मनाने की कोशिश चल रही है। समें कितनी सफलता मिलती है और 2019 की लड़ाई में भाजपा अपनी साख बचा पाती है अथवा नहीं यही देखना है।

बाजारवाद के दौर में साहित्य


देवेंद्र गौतम
वैश्वीकरण के दबाव के कारण हिन्दी साहित्य गंभीर संकट से गुजर रहा है। विचार पर बाजार हावी हो रहा है। लेखक जन सरोकार की जगह बिकाउ साहित्य की जमीन तलाश रहे हैं और तमाम साहित्यिक संगठन निष्क्रिय पड़े हैं।
 बिहार की राजधानी पटना से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आरा भोजपुर जिले का मुख्यालय और एक छोटा सा कस्बानुमा शहर है। लेकिन सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों के कारण इसे बिहार का इलाहाबाद कहा जाता रहा है। इस छोटे से शहर में 70 के दशक तक हिन्दी की चार और उर्दू की चार साहित्यिक संस्थाएं सक्रिय थीं। सबकी मासिक गोष्ठियां नियमित रूप से होती थीं। यानी हर शनिवार-रविवार को कोई न कोई रचना अथवा समीक्षा गोष्ठी होती ही थी। इनमें नए रचनाकार भी शामिल होते थे और जाने-माने साहित्यकार भी। इससे रचनाशीलता का एक माहौल बना रहता था। हिन्दी में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच जैसे राष्ट्रीय संगठन और नवोदित रचनाकारों की स्थानीय स्तर पर गठित मित्र मंडली। उर्दू में हल्का-ए-अहबाब, दायरे-अदबिया, इदारा-ए-अदबे नौ और बज्मे-नूरी।
अब सिर्फ बज्मे-नूरी की ही माहनामा निशिस्त (गोष्ठी) नियमित रूप से होती है। कभी-कभार छठे-छमाही जनवादी लेखक संघ का कुछ आयोजन हो जाता है। बाकी सारी संस्थाएं निष्क्रिय हो चुकी हैं। वर्ष में एकाध साहित्यिक कार्यक्रम सरकारी सौजन्य से हो जाता है। साहित्यिक सक्रियता का वह जमाना जो नवयुवकों को साहित्य सृजन के लिए प्रेरित करता था, इतिहास के पन्नों में गुम हो चला है। नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार भी या तो दुनिया से कूच कर चुके हैं या फिर अपनी खोल में जा छुपे हैं। व्यक्तिगत रचनाशीलता जरूर कायम है लेकिन सामुहिक सृजन का माहौल खत्म हो चला है।
यह सिर्फ आरा की नहीं हिन्दी पट्टी के अधिकांश शहरों की कहानी है। साहित्यिक संगठनों की राष्ट्रीय और राज्य कमेटियां तो अस्तित्व में हैं लेकिन अधिकांश जिलों में कोई इकाई शेष नहीं है। है भी तो निष्क्रिय पड़ी है। कोई मार्गदर्शन नहीं होने के कारण गंभीर साहित्य सृजन सीमित हो चला है और विभिन्न शहरों में फेसबुकिया और इंटरनेटी साहित्यकारों की एक जमात सामने आई है जो रातो-रात शोहरत और दौलत हासिल करने को लालायित दिखाई देती है। चेतन भगत जैसे लेखक उनके रोल मॉडल बन गए हैं। बिकाउ साहित्य का बोलबाला है। जन-सरोकारों का साहित्य अपेक्षाकृत कम लिखा जा रहा है।
निश्चित रूप से लोगों में पढऩे की जगह देखने की प्रवृति बढ़ी है। टीवी और इंटरनेट से जुड़ाव बढ़ा है लेकिन अभी भी बोले हुए शद्ब्रदों की जगह छपे हुए शद्ब्रदों का महत्व कायम है। लुगदी साहित्य की बिक्री में तो कोई कमी नहीं आई है।
दरअसल नब्बे के दशक में सोवियत संघ का विघटन और अमेरिका-परस्त बाजारवाद तथा ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया भारत में हिन्दी-उर्दू साहित्य के लिए जोरदार झटका साबित हुई है। बाजार के समक्ष विचारधारा के कमजोर पडऩे के कारण जमीनी स्तर पर निराशा व्याप्त हो गई। इसका सीधा असर साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर पड़ा। साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों का एक बड़ा हिस्सा उपभोकतावाद की सुनामी में बह गया। अचानक अधिकांश साहित्यिक संगठनों की सक्रियता पर विराम सा लग गया। अखिल भारतीय स्वरूप के तीनों प्रमुख साहित्यिक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जो अलग-अलग वामपंथी दलों और उनकी विचारधारा से प्रेरित थे, अस्तित्व का संकट झेलने लगे।
रचनाकारों का एक बड़ा हिस्सा इन संगठनों से जुड़ा हुआ था। हालांकि उस वक्त तक हिन्दी और उर्दू साहित्य में अन्य धाराएं भी मौजूद थीं। हिन्दी में उत्तर आधुनिकतावाद और उर्दू में मा-बादे-जदीदीयत का दौर शुरू हो चुका था। यह सात्र और फ्रैंज काफ्का की विचारधारा से प्रेरित आंदोलन थे। उर्दू में 60 के दशक में ही तरक्कीपसंद (प्रगतिशील)आंदोलन के समानांतर जदीद (आधुनिकतावादी) तहरीक (आंदोलन) को अमली-जामा पहनाया जाने लगा था। लेकिन यह आंदोलन कुछ बड़े नामों, उनके समर्थकों और कुछेक पत्रिकाओंं तक महदूद थे। इनका कोई सांगठनिक ढांचा मौजूद नहीं था। इनसे ज्यादातर उस वक्त की नई पीढ़ी जुड़ी थी। स्थापित रचनाकार नए सिरे से पहचान बनाने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।  बदले परिवेश में कुछ रचनाकारों ने मौन साध लिया। कुछ लोग बाजारवाद को कोसने में व्यस्त हो गए और कुछ उसमें अपनी जगह बनाने में। कुछ सामाजिक सरोकारों से तौबा कर बिकाऊ साहित्य की रचना की जमीन तलाश करने लगे। इस बीच भारतीय समाज में भी पश्चिमी प्रभाव बढऩे लगा। सामाजिक परिवर्तनों ने गति पकड़ी और इसके साथ ही धीरे-धीरे साहित्य लेखन का चरित्र भी बदलने लगा। इस मौके पर साहित्यिक संगठनों ने विचारधारा के स्तर पर रणनीतिक बदलाव की जरूरत नहीं समझी। इसके कारण भी भगदड़ को रोका नहीं जा सका।
इस दौरान पूरी दुनिया में नए सामाजिक आंदोलनों का उभार आया। इस क्रम में स्त्रियों का आंदोलन, राष्ट्रीयताओं का आंदोलन, दलितों का आंदोलन और अन्य वंचित तबकों का आंदोलन जोर पकडऩे लगा। वाम संगठन अपनी वर्ग संघर्ष की पुरानी अवधारणा पर चलते रहे। उन्होंने अपने खोल से बाहर निकलकर इनके साथ सामंजस्य बिठाने की जगह इन्हें प्रतिक्रियावादी आंदोलन के खाते में डाल दिया। इसके कारण भी गतिरोध उत्पन्न हुआ। प्रासंगिकता संदिग्ध होने लगी। नए आंदोलनों के प्रति वाम संगठनों का रवैया फिर भी नकारात्मक बना रहा। जबकि भारत में जाति व्यवस्था की जकडऩ के कारण इस तरह के आंदोलनों की जमीन पहले से ही बनी हुई थी। इस स्थिति में दलितवाद, स्त्री-विमर्श और आदिवासी विमर्श का साहित्य मुख्यधारा में शामिल होने लगा और पूर्व की तमाम धाराएं हाशिए की ओर बढऩे लगीं। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हिन्दी कवि मदन कश्यप कहते हैं, ‘सांगठनिक स्तर पर रणनीतिक बदलाव किए गए होते तो निष्क्रियता का यह माहौल नहीं बनता। बाजारवाद को कोसने की जगह उसका सामना करने की जरूरत थी, जिसमें हम पिछड़ गए।’
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से लेकर कई दशकों तक का हिन्दी और उर्दू का साहित्य वामपंथी धारा का साहित्य रहा है। हिन्दी में प्रगतिशील लेखक संघ और उर्दू में अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्निफ इस धारा के प्रथम संगठन थे। प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना 1935 में लंदन में हुई थी। भारत में 10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में और जुलाई 1936 में कोलकाता में सज्जाद जहीर के नेतृत्व में इसका गठन हुआ। इससे सआदत हसन मंटो, अली जावेद जैदी, प्रो. जोए अंसारी, डा. एमडी तासीर, फैज अहमद फैज, विजयदान देथा, खगेंद्र ठाकुर, भीष्म साहनी, प्रो. अहमद अली, डा. नुसरत जहां, राशिद जहां, अहमद नसीम कासमी, फैज अहमद फैज, हबीबी तालिब, गुलखान नसीर, कैफी आजमी, कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, राजेंद्र सिंह बेदी, अली सरदार जाफरी, जोश मलीहाबादी, जां निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलाम रब्बानी तावां, मख्दूम मोहिनुद्दीन, मुंशी प्रेमचंद, मजनूं गोरखपुरी, फिराक गोरखपुरी, अमृता प्रीतम, मजाज लखनवी, साहिर लुधियानवी और मुल्कराज आनंद जैसी हस्तियां इससे जुड़ी रही हैं। लंबे समय तक यह वाम साहित्यकारों का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन रहा। कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद इसका भी विभाजन होता गया।
1984 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से प्रेरित जनवादी लेखक संघ का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में संपन्न हुआ। प्रगतिशील लेखक संघ का एक बड़ा हिस्सा इसमें शामिल हो गया। आज तुलनात्मक दृष्टि से यह संगठन कुछेक इलाकों में सक्रिय है। स्थानीय स्तर की छोटी गोष्ठियां भले ही नियमित न हों लेकिन साल में कुछेक कार्यक्रम करा लेता है। अभी जन संस्कृति मंच के साथ इसके साझा कार्यक्रमों की पहल भी कई राज्यों में की जा रही है। प्रगतिशील लेखक संघ की प्रदेश इकाइयांं ही बची हैं। इसके राष्ट्रीय और प्रदेश इकाइयों की बागडोर वयोवृद्ध साहित्यकारों के हाथ में हैं। उनमें से कई तो अब कुछ बोलने समझने की स्थिति में नहीं रह गए है। नई पीढ़ी को नेतृत्वकारी भूमिका में लाने में इनकी दिलचस्पी नहीं है। निष्क्रियता का यह भी एक बड़ा कारण है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखकीय गुण आत्मप्रेरणा से उत्पन्न होते हैं। सामाजिक विसंगतियों को लेकर अंदर की बेचैनी उसे कलम उठाने को प्रेरित करती है। कोई भी संगठन लेखक बनाने का कारखाना नहीं होता। यह सिर्फ विभिन्न पीढिय़ों के लोगों को एकजुट कर उनके बीच सामंजस्य कायम करने का मंच होता है। इससे लेखन यात्रा को गति और दिशा मिलती है। कुछ करने की तहरीक मिलती है।
बाजारवाद और उपभोक्तावाद के दौर में एक खास प्रवृति यह उत्पन्न हुई कि हर चीज का आर्थिक मूल्यांकन किया जाना लगा। जाहिर तौर पर साहित्य और पत्रकारिता में भी जन सरोकार की जगह बिकाउ माल की तलब होने लगी। इस मामले में लुगदी साहित्य आगे निकल गया। गंभीर साहित्य पिछड़ गया। बाजारवाद की इस कसौटी पर अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं ने तो अपनी जगह बना ली लेकिन कम से कम हिन्दी और उर्दू साहित्य खरा नहीं उतर पाया। इसका एक बड़ा कारण प्रकाशकों में जोखिम उठाने के साहस का अभाव रहा है। साहित्य के प्रकाशक सरकारी खरीद-फरोख्त से आगे बढऩे में हिचकते रहे। पुस्तक मेलों के जरिए उपभोक्ता बाजार तक पहुंच बनाने की छिटपुट कोशिशें जरूर हुईं लेकिन आक्रामक मार्केटिंग की शुरुआत नहीं की जा सकी। यह विज्ञापन का युग है। लेकिन हिन्दी-उर्दू का कोई प्रकाशक बड़े से बड़े लेखक की पुस्तक का प्रिंट अथवा इलेञ्चट्रोनिक मीडिया में विज्ञापन नहीं देता। उनके प्रचार-प्रसार के आधुनिक तौर-तरीके नहीं अपनाए जाते। इसलिए इन भाषाओं की कोई पुस्तक, चाहे वह कितनी भी रोचक और महत्वपूर्ण हो, बेस्टसेलर नहीं बन पाती। जबकि बाजार की शर्तों को पूरा करने वाली अंग्रेजी में बेस्टसेलर की बाढ़ सी आ गई है। कई बेस्टसेलर भारतीय मूल के अंंग्रेजी लेखकों के हैं। प्रकाशकों की सुरक्षात्मक मार्केटिंग के कारण उपभोक्ताओं तक सहीं साहित्य पहुंच नहीं पाता। उनसे सीधे तौर पर जुड़े कवि सम्मेलनों का स्तर भी गिरा है। इनके आयोजक अब हास्य-व्यंग्य या फूहड़ रचनाओं के जरिए ताली बटोरने वाले कवियों को प्राथमिकता देते हैं। जन सरोकार की कविताएं रचने वाले गंभीर कवियों को जनता के सामने नहीं लाया जाता।
जनवादी लेखक संघ से जुड़े अनवर शमीम कहते हैं, ‘उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन करोड़ों में होते हैं लेकिन साहित्य के प्रचार-प्रसार पर एक छदाम भी खर्च नहीं किया जाता। बाजार के साथ नहीं चलने पर पिछड़ जाना तो स्वाभाविक ही है।’
शिक्षा की दुनिया में निजी स्कूलों के बढ़ते वर्चस्व का असर भी पड़ा है। बुनियादी स्तर पर पाठ्य पुस्तकों का चयन स्कूल प्रबंधन स्वयं करते हैं। वे अपने हिसाब से इन्हें तैयार करवाते हैं। इस क्रम में हिन्दी की पुस्तकों में अपने परिचितों की रचनाएं डलवाते हैं। इसके कारण बच्चों को साहित्य का संस्कार नहीं दिया जा पाता। सामाजिक बदलाव के साहित्य से इनका परिचय नहीं हो पाता। पत्रकारिता में भी साहित्य का पन्ना गायब हो चुका है। अधिकांश अखबार साहित्यिक रचनाओं और गतिविधियों को प्रमुखता नहीं देते। साहित्यिक संगठनों की निष्क्रियता का यह भी एक कारण है।

शनिवार, 9 जून 2018

हजारीबाग में धू-धू कर जलीं दो लग्जरी बसें

मनीष कुमार
हजारीबाग। पम्मी बस की दो बसों  में फिर  लगी आग । सरकारी बस डिपो में खड़ी थी बस । आज लगातार दूसरे दिन लगी एक ही बस कंपनी में आग । दमकल की दो गाड़ीयां आगे भुझाने में लगी । मौके पर हजारीबाग एसपी सदर एसडीओ मौजूद । 

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...