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सोमवार, 18 जून 2018

उत्पाद ड्यूटी में रियायत से इनकार



प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जब देशवासियों को संबोधित करते हैं तो उनकी भाषा में मिठास होती है। अपनापन का बोध होता है। चाहे वे कोरा दिलासा ही क्यों न दे रहे हों। लेकिन जब वित्त मंत्री अरूण जेटली कोई बयान देते हैं तो अंदाज़ किसी शहंशाह का रियाया से संबोधन का होता है। मसलन पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद ड्यूटी में किसी तरह की रियायत किए जाने से साफ इनकार किया। बल्कि यह भी हिदायत दी कि लोग पूरी ईमानदारी से टैक्स अदा करें। भीषण महंगाई से जूझ रहे देशवासियों के लिए उनका बयान जख्म पर नमक छिड़कने जैसा है। सर्लविदित है कि डीजल और पेट्रोल की कीमतों का बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसके कारण आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई का खर्च बढ़ता है और चीजें महंगी होती हैं। यह भी विदित है कि भारत में पेट्रोलियम उत्पादों का दाम दुनिया के अन्य देशों से कहीं ज्यादा है। कम टैक्स वाली वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाकर ज्यादा स्लैब में लाया गया तो फिर अधिक कर वाली वस्तुओं को कम दर के स्लैब में क्यों नहीं लाया जा सकता। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह संकेत दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार किया जा रहा है। लेकिन जेटली ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। जनता का काम सिर्फ टैक्स देना है। महंगाई बढ़ती है तो बढ़े। लोगों को परेशानी हो रही है तो हो। अगर इसी रह के बयान जेटली जी देते रहे तो मोदी सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी और बढ़ती चली जाएगी और 2019 का चुनाव एनडीए के लिए और चुनौती भरा हो जाएगा। दरअसल जेटली का जनता से कभी सीधा संबंध नहीं रहा है। वे कभी कोई चुनाव नहीं जीते हैं। मोदी सरकार में भी उन्हें पिछले दरवाजे से लाकर महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा गया है। जनता के दुःख-दर्द से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है। अगर जेटली जैसे दो चार शुभचिंतक भाजपा में हों तो मोदी सरकार की कब्र खोदने के लिए विपक्षी दलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसके लिए जेटली और शाह काफी हैं।
जेटली का बयान ऐसे समय में हुआ है जब मनमोहन सरकार की तुलना में 125 प्रतिशत शुल्क बढ़ोत्तरी कर 150 गुना अधिक उत्पाद शुल्क बटोरने की बात सामने आ चुकी है।
भाजपा की चिंता विपक्षी एकता से निपटते हुए 2019 का चुनाव निकालने की है और जेटली को राजस्व की चिंता है। अगर सत्ता हाथ से फिलती तो फिर राजस्व वसूलने के लिए वे अधिकृत नहीं रह जाएंगे। जेटली जी को यह बात समझ में नहीं आ रही है। भाजपा चुनाव हारी भी तो कम से कम उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाकर सदन तक लाने लायक तो रहेगी ही जेटली जी को पूरा भरोसा है।
- देवेंद्र गौतम

सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन का समय



झारखंड की राजधानी रांची की फज़ा में जहर घोलने का षडयंत्र रचा जा रहा है तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं। शांतिपूर्ण जनजीवन में खलल डाला जा रहा है । लोग भी कान टटोलने की जगह कौवे के पीछे भागने लग जा रहे हैं। रोज किसी न किसी इलाके में तनाव और झड़प की खबर आ रही है। छोटी-छोटी बातें बड़ा आकार ग्रहण कर ले रही हैं। यदि पकड़े नहीं गए तो शरारती तत्व झारखंड के दूसरे इलाकों को भी निशाना बना सकते हैं।
पुलिस-प्रशासन मुस्तैदी से स्थिति को नियंत्रित कर ले रही है लेकिन शरारत की साजिश कहां से रची जा रही है, पता नहीं चल पा रहा है। आम लोगों में भय व्याप्त है। सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है लेकिन जबतक षडयंत्रकारी पकड़े नहीं जाते माहौल शांत होने के आसार नहीं दिखते। उसपर भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के प्रस्ताव को लेकर विपक्षी दलों का आक्रामक रुख शांति व्यवस्था के प्रति एक नए खतरे की आशंका को बल दे रहा है। वे अपनी लड़ाई सड़कों पर लाने की जगह यदि विधायिका और न्यायपालिका तक महदूद रखते तो ज्यादा असर छोड़ जाते। लोगों की भरपूर सहानुभूति का पात्र बनते। सरकार पर दबाव डालने के और भी तरीके हो सकते हैं।
सरकारी तंत्र तो माहौल को शांत करने का हर संभव प्रयास कर रहा है लेकिन ऐसे में राजनीतिक दलों, सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों और शांति समितियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उनके सदस्य अपने-अपने इलाके पर नज़र रख सकते हैं और अफवाहों का तत्काल खंडन कर, विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारा कायम करने में भूमिका अदा कर सकते हैं। सिर्फ बैठक करने से या शांति जूलूस निकालने से काम नहीं चलने वाला। जिम्मेदार नागरिकों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने को आगे आना होगा। चुनावी लाभ-हानि के गणित से भी इसे दूर रखा जाना चाहिए।

मौसम के तल्ख तेवर से परेशान अवाम




रांची। केरल में समय से दो दिन पूर्व दस्तक देने के बाद झारखंड में 11 जून तक मानसून के आगमन के कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन रफ्तार घटने के कारण यह पश्चिम बंगाल में ठहर गया। अब इसके 21 जून तक आगमन की उम्मीद जताई जा रही है। इस बीच भीषण गर्मी ने कहर बरपा रखा है। धूप में कड़ापन है और हवा में तपिश। रांची में पारा 38 और जमशेदपुर में 42 तक पहुंच गया है। एक तो गर्मी ऊपर से बिजली की कटौती जारी है। लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। बारिश कई दिनों से नहीं हुई है लेकिन आंधी लगभग हर रोज आ जा रही है। इसके कारण सबस्टेशनों से बिजली की आपूर्ति बंद कर देनी पड़ रही है। बिजली नहीं रहने का सीधा असर जलापूर्ति पर पड़ता है। गर्मी से कंठ सूख रहे हैं और से तर करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। टैंकरों के जरिए लोगों की जरूरत भर पानी देना संभव नहीं हो पा रहा है। खासतौर पर राजधानी रांची में जबतक भूमिगत तार नहीं बिछाए जाएंगे। उपलब्ध बिजली की भी सामान्य आपूर्ति नहीं की जा सकेगी।


भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ झारखंड बंद बेअसर



सालखन की जल्दबाजी से विपक्षी आंदोलन को झटका
रांची। आदिवासी सेंगल अभियान और झारखंड दिशोम पार्टी के भारत बंद का कुछ खास असर नहीं पड़ा। भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन प्रस्ताव को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की खबर का सभी विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं। उनकी बैठक सोमवार 18 जून को प्रतिपक्ष के नेता हेमंत सोरेन के आवास पर बुलाई गई है। उस बैठक में आंदोलन का स्वरूप तय किया जाएगा और रणनीति बनेगी। लेकिन आदिवासी सेंगल अभियान तथा झारखंड दिशोम पार्टी के नेता सालखन सोरेन ने बैठक में शामिल होने से पूर्व ही बंद का आह्वान कर विपक्षी दलों से सहयोग का अनुरोध कर दिया। यह आंदोलन की अगुवाई का श्रेय लेने के लिए जल्दबाजी में उठाया गया कदम था। उन्होंने सड़क जाम कर आह्वान को सफल बनाने की कोशिश भी की लेकिन पुलिस-प्रशासन ने इनपर आसानी से काबू पा लिया। कई लोग हिरासत में लिए गए। बोकारो जिला के जेरीडीह पंचायत के तुपकाडीह के पास उन्होंने सड़क जाम करने का प्रयास किया लेकिन 20 लोगों के हिरासत में लिए जाने के बाद शांत पड़ गए। इस आह्वान के निष्फल हो जाने से रघुवर दास सरकार के पास दो संदेश गए। पहला यह कि उनके पास जनाधार का अभाव है। वे स्थानीय लोगों के स्वयंभू फौजदार बने बैठे हैं। दूसरा संदेश यह गया कि संशोधन का विरोध करने वाले विपक्षी दलों के बीच अहं का टकराव और नेतृत्व की होड़ है। सालखन सोरेन यदि विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होते और जल्दबाजी में एकला चलने का प्रयास नहीं करते तो उनकी प्रतिष्ठा रह जाती और पार्टी की साख पर आंच नहीं आती। अब सरकार आसानी से यह दावा कर सकती है कि झारखंड की आम जनता संशोधन के खिलाफ नहीं है। व्यवहारतः विपक्षी दलों के लोग अपनी प्रस्तावित बैठक छोड़कर उनके पीछे नहीं आ सकते थे। यह आंदोलन की कमान सालखन मुर्मु के हाथों में सौंप देने और सभी दलों के उनके पिछलग्गू होने का संदेश देने जैसा होता। विपक्षी नेता इतने कमजोर या नासमझ भी नहीं हैं।

सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ अभियान


सोशल मीडिया का जितना सदुपयोग हो रहा है उससे ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों के कारण देश के कई इलाकों में निर्दोष लोगों की पीट-पीटकर हत्या की घटनाएं हुई हैं। असम के कार्बी-एंलांग जिले के 29 वर्षीय नीलोत्पल और 30 वर्षीय अभिजीत नाथ एक झरने को देखने गए थे। स्थानीय लोगों ने बच्च चोर होने के संदेह में उन्हें पीट-पीटकर मार डाला। अभी रांची में एक आपत्तिजनक पोस्ट के कारण दो समुदायों के बीच हिंसक टकराव की नौबत आ गई। पुलिस-प्रशासन ने पोस्ट डालने वाले युवक को गिरफ्तार कर लिया और दोनों पक्षों को समझा बुझाकर मामला शांत कराया। एक पोस्ट के कारण बवाल होते-होते बचा। इस तरह की घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में आए दिन हो रही हैं।
दरअसल सोशल साइटों पर आतंकी और अपराधी गिरोहों के अलावा शरारती तत्वों की सक्रियता ने सरकार, साजाजिक संगठनों, बौद्धिक वर्ग और शांतिप्रिय नागरिकों को गंभीर चिंता में डाल दिया है। सरकारी स्तर पर सोशल साइटों के प्रमोटरों पर अंकुश लगाने, दबाव डालने से लेकर कड़े कानूनी प्रावधानों को लागू करने की कोशिश की गई। आपत्तिजनक पोस्टों के कारण कई गिरफ्तारियां हुईं, मुकदमे चले लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ा।
समस्या यह है कि सोशल साइटों का निबंधन और संचालन अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के जरिए होता है। भारत सरकार के कानून उनपर लागू नहीं होते। उनपर प्रतिबंध भी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि  इससे सकारात्मक विचारों के आदान प्रदान का रास्ता भी बंद हो जाएगा जो वैश्वीकरण के इस युग में उचित नहीं होगा। सोशल साइटों के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए जन समुदाय की ओर से ही पहल करनी होगी। कानून के जरिए इसे नियंत्रण करने का प्रयास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के सरकारी दुराग्रह के रूप में देखा जाएगा।
सुखद बात यह है कि पूर्वोत्तर के असम राज्य से इसकी शुरुआत हो चुकी है। गौहाटी विश्वविद्यालय के पीजी स्टूडेंट्स युनियन के महासचिव मोंजित शर्मा ने दो निर्दोष पर्यटकों की हत्या की  घटना को गंभीरता से लिया और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ एक जागरुकता अभियान छेड़ने का निर्णय लिया। विश्वविद्यालय के करीब पांच हजार पीजी छात्र  इस अभियान में शामिल हो चुके हैं। अब  विश्वविद्यालय से संबद्ध 400 शैक्षणिक संस्थानों को इस अभियान से जोड़ा जा रहा है। छात्र युनियन की इस सकारात्मक पहल का कुलपति समेत वरीय अधिकारी भरपूर समर्थन कर रहे हैं। यह अभियान धीरे-धीरे एक बड़ा रूप ले सकता है। इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।




रविवार, 17 जून 2018

संघ ही बनेगा तारणहार



            
  
उपचुनावों में लगातार अपनी जीती हुई सीटें गवांने के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं को समझ में आने लगा है कि उनका विजय रथ न मोदी के चमत्कार से संचालित था और न अमित शाह की रणनीतिक कुशलता से। संघ और भाजपा के समर्पित कार्यकर्त्ताओं की सक्रियता और आम जनता की आकांक्षाओं का लाभ भाजपा को मिल रहा था। शाह कार्यकर्त्ताओं की लगातार उपेक्षा करते रहे। उनसे जरखरीद गुलामों की तरह व्यवहार करने लगे। इधर नोटबंदी और जीएसटी की मार से बौखलाए देशवासियों का भी मोदी सरकार के प्रति मोहभंग होता गया। सरकार जनता के जख्मों पर मलहम लगाने की जगह बेतूकी दलीलें देती रही। मंत्रीगण गुस्सा भड़काने वाले बयान जारी करते रहे। शाह तो खैर खुद को बादशाह और चाणक्य के साक्षात अवतार समझने लगे। लोगों को यह समझाया जाता रहा कि उनका कोई विकल्प नहीं है। वे जो कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। तकलीफ हो रही है तो बर्दाश्त करें। जीडीपी और तरह-तरह की आंकड़ेबाजी के जरिए बताया जाता रहा कि भारत सबसे तेज़ अर्थ व्यवस्था बन चुका है। रोज कमाने-खाने वालों को भला इन आंकड़ो से क्या मतलब। उसे तो अपनी रोजी-रोटी पर भी संकट मंडराता दिखा। जीडीपी बढ़ने या घटने से से क्या अंतर पड़ता है।
इसी बीच विपक्षी दलों की एकता एक नई चुनौती के रूप में सामने आई। जनता को मोदीराज से छुटकारा पाने का रास्ता दिखाई पड़ने लगा। अपने अहंकारी स्वभाव और खुशफहमियों का ही भाजपा को खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। शाह और मोदी को अब समझ में आ रहा है कि राजनीतिक दल स्कूल नहीं होते जो हेडमास्टर की छड़ी से नियंत्रित होते हों। कार्यकर्त्ताओं की पहुंच अगर नेता तक नहीं होगी। पार्टी के अंदर उनकी भावनाओं की कद्र नहीं की जाएगी तो वे उदासीन होते जाएंगे। देशवासी जिस तरह अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से बेहतर काम की उम्मीद करते हैं उसी तरह क्षेत्र के लोग सत्तारुढ़ दल के कार्यकर्त्ताओं से अपनी समस्याओं के निदान की उम्मीद रखते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि उनकी पहुंच ऊपर के नेताओं तक नहीं है। पार्टी अध्यक्ष और मंत्री-संतरी उन्हें मिलने का समय ही नहीं देते तो उनको तरजीह देना बंद कर देते हैं। ऐसे में कार्यकर्त्ता वोटरों से किस मुंह से वोट मांगें। मोदी का चमत्कार यहीं फेल हो जाता है।
अब जो स्थिति उत्पन्न हुई है उससे भाजपा से कहीं ज्यादा चिंतित संघ है। संघ के लोग मोदी और शाह की जोड़ी को समय-समय पर सचेत करते रहे हैं। उनकी नीतियों की समीक्षा कर उन्हें संभावित परिणाम से आगाह करते रहे हैं लेकिन उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जब मामला फंसता नज़र आ रहा है तो संघ ही चुनावी वैतरणी पार कराने वाला दिखाई दे रहा है। संघ और भाजपा नेतृत्व के बीच लगातार मंथन चल रहा है। कार्यकर्त्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए चौपाल लगाने के अलावा हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। संघ ने विपक्षी एकता के चक्रव्यूह को तोड़ने और भाजपा की स्थिति मजबूत करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिर भी 2014 के परिणामों तक पहुंचना संभव नहीं दिख रहा है। चार वर्षों से अधिक अवधि तक आम जनजीवन को तरह-तरह की परेशानियों में झोंकने के बाद डैमेज कंट्रोल में सरकार जितना विलंब करेगी परिणाम उतना ही विपरीत आएगा। भारत की जनता चीजों का चुपचाप निरीक्षण करती रहती है और चुनाव के वक्त अपना फैसला सुना देती है। ईवीएम का तिलस्म भी तभी चलता है जब जनता का व्यापक समर्थन हो। बिहार में लालू प्रसाद बैलेट बाक्स से जिन्न निकालते थे लोकिन जब समर्थन घटा तो उनका जिन्न भी चिराग के अंदर समा गया। अब लाख घिसने पर प्रकट नहीं हुआ। सरकारी तंत्र का लाभ भी अनुकूल स्थितियों में ही मिलता है। कर्नाटक में राज्यपाल ने पूरा साथ दिया लेकिन भाजपा की सरकार नहीं बनवा सके। लिहाजा मोदी और शाह को खुशफहमियों की चहारदीवारी से बाहर निकलकर धरातल पर आना होगा और जनता से वादा करना होगा कि अर्थ व्यवस्था में सुधार के नाम पर ऐसे प्रयोग नहीं करेंगे जिससे लोगों की परेशानी बढ़े और नतीजा शून्य निकले। अगर प्रयोग करने भी हों तो जाने-माने अर्थ शास्त्रियों से परामर्श कर, पूरा होमवर्क करके, उसका ब्लू प्रिंट तैयार करने के बाद ही करें। उसके तात्कालिक और दीर्धकालीन प्रभावों पर मंथन कर लें। लोग मोदी की आर्थिक नीतियों के कारण ही नाराज हैं और विकल्प की तलाश कर रहे हैं। कांग्रेस के विकल्प में उन्होंने जिसे चुना अब उसके भी विकल्प की तलाश करनी पड़ रही है। सरकार ने न कार्यकर्त्ताओं की भावनाओं की कद्र की न जन भावनाओं को समझने की कोशिश की। नतीजा सामने है। अब संघ ही भाजपा के अस्तित्व पर मंडराते संकट को दूर करने का रास्ता निकाल सकता है।
-देवेंद्र गौतम

झारखंडी अस्मिता पर दावेदारी की जंग


रांची। झारखंड में स्थानीयता के सवाल पर झारखंड नामधारी दलों के बीच रस्साकशी चल रही है। हर दल स्वयं को इसके प्रति दूसरों से ज्यादा प्रतिबद्ध होने का दावा कर रहा है। एक तरफ झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को एकत्र कर आंदोलन खड़ा करने की तैयारी में हैं दूसरी तरफ आजसू प्रमुख सुदेश महतो ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उनकी नीतियों पर सावाल खड़े किए हैं। आजसू झारखंड में एनडीए के सहयोगी दलों में प्रमुख हैं। सिल्ली और गोमिया विधानसभाओं के उपचुनावों में थोड़े अंतर से दूसरे स्थान पर रहने के बाद आजसू आलाकमान सुदेश महतो एनडीए से नाराज चल रहे हैं। उन्होंने एनडीए में रहते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास की स्थानीय नीति का लगातार विरोध किया है। अभी भूमि अधिग्रहण संशोधन प्रस्ताव को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद ताल ठोकते हेमंत सोरेन को आजसू के महासचिव राजेंद्र मेहता ने आड़े हाथों लिया है। श्री मेहता के मुताबिक झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड आंदोलन की सौदागीरी करता रहा है। कई बार आंदोलन को बेचा है। उसे स्थानीय नीति पर बोलने का कोई हक नहीं है। उनका कहना है कि हेमंत ने 2010 में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की थी। 14 महीने तक मुख्यमंत्री रहे लेकिन स्थानीय नीति बनाने की जरूरत नहीं समझी। जेपीएससी से क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने पर सहमति दी। अगस्त 2017 में जब भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक सदन में आया तो उसका विरोध नहीं किया। सरकार की जनविरोदी नीतियों पर कभी आपत्ति नहीं की। अब सीएनटी-सीपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में रघुवर सरकार के बैकफुट पर आने का श्रेय ले रहे हैं। झारखंड की जनता जानती है कि संशोधन का विरोध आजसू ने किया था और सी के विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। विपक्ष के नेता ने तो अपनी सहमति दे ही दी थी। उन्होंने कहा कि आजसू एनडीए में जरूर है लेकिन झारखंडी अस्मिता के सवाल पर कभी समझौता नहीं करता। झामुमो अराजक कार्रवाइयां कर सकता है कोई निर्णायक आंदोलन नहीं। स्थानीयता की लड़ाई आजसू के अलावा कोई ईमानदारी से नहीं लड़ सकता।

-देवेंद्र गौतम

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...