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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

किसानों की आय दुगनी करने के लिए अंतर-मंत्रिस्‍तरीय समिति गठित

नई दिल्ली। सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्‍य रखा है। सरकार ने कृषि, सहयोग एवं किसान कल्‍याण विभाग के राष्‍ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी की अध्‍यक्षता में एक अंतर-मंत्रिस्‍तरीय समिति गठित की है। इस समिति को किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और वर्ष 2022 तक सही अर्थों में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्‍त रणनीति की सिफारिश करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है।
वर्तमान में 'वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए रणनीति' के 13 मसौदा खंडों को इस विभाग की वेबसाइट (http://agricoop.nic.in/doubling-farmers)  पर अपलोड किया गया है, ताकि इस बारे में आम जनता की राय जानी जा सके। इन मसौदा खंडों को इसी समिति द्वारा तैयार किया गया है।
समानांतर रूप से सरकार आय को केन्‍द्र में रखते हुए कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने पर विशेष ध्‍यान दे रही है। किसानों के लिए शुद्ध धनात्‍मक रिटर्न सुनिश्चित करने हेतु राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों के जरिए इन योजनाओं को बड़े पैमाने पर प्रोत्‍साहित एवं क्रियान्वित किया जा रहा है : मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड (एसएचसी) योजना, नीम लेपित यूरिया (एनसीयू), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई), परम्‍परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), राष्‍ट्रीय कृषि बाजार योजना (ई-नाम), बागवानी के एकीकृत विकास के लिए मिशन, राष्‍ट्रीय सतत कृषि मिशन, राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना, इत्‍यादि।
कृषि लागत एवं मूल्‍य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर खरीफ और रबी दोनों ही फसलों के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) को अधिसूचित किया जाता है। यह आयोग खेती-बाड़ी की लागत पर विभिन्‍न आंकड़ों का संकलन एवं विश्‍लेषण करता है और फिर एमएसपी से जुड़ी अपनी सिफारिशें पेश करता है।
किसानों की आमदनी में उल्‍लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से सरकार ने वर्ष 2018-19 के सीजन के लिए सभी खरीफ फसलों के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍यों में वृद्धि कर दी है। सरकार का यह निर्णय ऐतिहासिक है, क्‍योंकि इसके जरिए वर्ष 2018-19 के केन्‍द्रीय बजट में किए गए वादे को पूरा किया गया है, जिसमें एमएसपी को उत्‍पादन लागत का कम से कम 150 प्रतिशत तय करने की बात कही गई थी।
इस आशय की जानकारी कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय में राज्‍य मंत्री पुरषोत्‍तम रूपाला ने आज राज्‍यसभा में दी।

...तो गंगा को धरती पर लाने का विचार त्याग देते भगीरथ



गंगा नगरी में भी पानी का धंधा
यदि भगीरथ को इस बात का जरा भी अंदाजा होता कि एक युग ऐसा आएगा जब गंगा के किनारे रहने वालों को भी पानी खरीदकर पीना पड़ेगा तो शायद वे गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने का विचार त्याग देते। अब इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि ऋषिकेश जैसी गंगा नगरी मे भी प्यास बुझाने के लिए पानी के सौदागरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। गंगा का पानी एक तो शुद्ध नहीं रहा ऊपर से गर्मी के मौसम में चट्टानों के बीच इसकी धारा को ढूंढना पड़ रहा है। ठंढा पानी पीने की चाहत भी लोगों को पानी के सौदागरों की शरण में ले जाती है। वहां आरओ प्लांट के पानी के नाम पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पानी पिलाया जा रहा है। पानी का धंधा करने वाले रोजाना हजारों केन पानी बेचकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं।
ऐसी शिकायत मिल रही है कि वहां आरओ के नाम पर सामान्य पानी ठंडा करके पिलाया जा रहा है और खास तौर पर सैलानी से पीने को विवश हैं। कम गुणवत्ता के कारण जल जनित बीमारियां फैलने का डर बना रहता है। सतह पर पानी बह रहा है और धरती की कोख से पानी निकाल कर उससे मोटी कमाई की जा रही है। आरओ प्लांट के के पानी के नमूने लिए जाने को लेकर स्वास्थय विभाग उदासीन रहता है। केन में सप्लाई होने वाले पानी की जांच भी नही की जाती। उसके अंदर कितने प्रकार की बीमारियां के बैक्टीरिया पनप रहे हैं इसकी किसी को चिंता नहीं। सरकारी तंत्र कहीं न कहीं पानी के सौदागरों को संरक्षण ही प्रदान करता दिखता है। सरकार पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की बात करती है। ऋषिकेश धार्मिक पर्यटन का अंतरराष्ट्रीय केंद्र है। यहां लाखों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। अगर सरकार वहां शुद्ध पेयजल का इंतजाम नहीं कर सकती और पानी के सौदागरों की पीठ थपथपाती है तो पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के उसके संकल्प पर सवालिया निशान खड़ा होता है।
ऋषिकेश मे पिछले कुछ वर्षो मे पानी का धंधा खूब चमका है। निजी क्षेत्र के कई वाटर प्लांट यहां लगाए गए हैं। इन प्लांटों से पानी लेकर शहर में जलापूर्ति की जाती है। पानी के केन दुकानदारों, व्यवसायिक संस्थानों के अलावा अब घरों में भी पहुंचने लगा है। सप्लायर सुबह गाड़ियों मे केन भरे पानी भरकर लाते हैं। पानी भरा केन रख देते हैं और खाली केन लेकर चले जाते हैं। प्रत्येक केन बीस लीटर का होता है। एक केन की सप्लाई 25 से 30 रुपये में हो रही है। शहर समेत ग्रामीण इलाकों मे हजार केन पानी की सप्लाई की जाती है। इस हिसाब से आरओ प्लांट के पानी का रोजाना तगड़ा कारोबार हो रहा है। बड़ा सवाल यह है कि गंगा किनारे पानी के लिए ऐसा हाहाकार क्यों मचा हुआ है और सरकार इसके प्रति उदासीन क्यों है।

वॉट्सएप को दिया प्रभावी विकल्प तलाशने का निर्देश


अभी तक के प्रयास नाकाफी, अफवाहों ने ली सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान


नई दिल्ली। वॉट्सएप के गलत इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार चिंतित है। इलेक्ट्रोनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 3 जुलाई, 2018 को वॉट्सएप को अपने लिखि‍त संदेश में इस डिजिटल प्लेटफार्म से फैलाये जा रहे भड़काऊ संदेशों के दुरूपयोग को रोकने के लिए शीघ्रता से कदम उठाने को कहा गया था। उसी दिन वॉट्सएप ने मंत्रालय को अपना जबाव देते हुए कहा कि इस तरह के संदेशों और झूठी खबरों को हटाने के लिए आवश्‍यक प्रयास बढ़़ाने की पहल कर दी गई है।
इसके बाद भी बिदर में एक दुर्भाग्‍यपूर्ण घटना घटी, जिसके शिकार एक 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर मोहम्‍मद आजम हुए। वॉट्सएप पर बच्‍चों का अपहरण करने वाली वायरल हुई अफवाह के बाद उन्हें भीड़तंत्र ने मौत के घाट उतार दिया। वॉट्सएप पर इस तरह के बड़े पैमाने पर फैलाये जा रहे गैर जिम्‍मेदाराना और झूठे संदेशों के कारण देश में अपराध बढ़ रहे है, किन्‍तु वॉट्सएप ने अपने मंच के दुरूपयोग से जुड़ी इस समस्‍या का अभी भी पर्याप्‍त रूप से समाधान नहीं निकाला है।
मीडिया की खबरों के मुताबिक आम जनमानस का मानना है कि वॉट्सएप को इस मामले में बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के द्वारा नफरत और उत्‍तेजना फैलाने वाले संदेशों का पता लगाने के मामले में भी वॉट्सएप की जवाबदेही बनती है। जब अराजक तत्‍वों के द्वारा झूठी खबरों को प्रसारित किया जाता है, तो ऐसी खबरों के लिए माध्‍यम बनने वाले मंच अपनी जिम्‍मेदारी और उत्‍तरदायित्‍व से नहीं बच सकते। इसके बावजूद भी अगर वे मूकदर्शक बने रहते है, तो उन्‍हें अपराध में बराबर का सहयोगी होने पर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
उपर्युक्‍त विषयों के संदर्भ वॉट्सएप से ऐसे संदेशों को रोकने के लिए और अधिक प्रभावी समाधान तलाशने के लिए आज अनुरोध किया गया है, जिससे झूठी खबरों की पहचान करने और इन्‍हें आगे बढ़ाने वाले लोगों के प्रति कार्रवाई में कानून को लागू और उत्‍तरदायित्‍व को तय किया जा सके। वॉट्सएप को यह भी संदेश दिया गया है कि यह एक बेहद गंभीर मुद्दा है, जिस पर अत्‍यधिक संवदेनशील प्रतिक्रिया की आवश्‍यकता है।

कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पांच दिवसीय चित्रकला प्रदर्शनी



निर्धन छात्राओं को कलाकृति देता है निशुल्क प्रशिक्षण

रांची। कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स डोरंडा कन्या पाठशाला में कलाकृति आर्ट फाउंडेशन द्वारा स्कालरशिप प्राप्त 31 निर्धन प्रतिभावान छात्राओं द्वारा बनाई गयी पेंटिंग्स की पांच दिवसीय चित्रकला प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। इसका उद्धाटन झारखंड उच्च न्यालय के *पूर्व न्यायाधीश रमेश मरेठिया* के द्वारा किया गया | इस अवसर पर कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स के द्वारा *निशुल्क प्रशिक्षण प्राप्त छात्राओं द्वारा बनाई गयी 80 पेंटिंग्स* को प्रदर्शित किया गया है | इस अवसर पर मुख्य अथिथि श्री मरेठिया, ने संस्था के कार्यों की सराहना करते हुवे कहा की – कलाकृति द्वारा विगत 17 वर्षों से सैंकड़ो निर्धन और पिछड़ा वर्ग के छात्राओं को निशुल्क चित्रकला की शिक्षा प्रदान कर रही है | यहाँ से निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर छात्राएं कला के क्षेत्र में अपना उज्जवल भविष्य बखूबी संवर रही हैं | संस्था के निदेशक एवं कला शिक्षक धनंजय कुमार ने बताया की कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स हर वर्ष पेंट योर फ्यूचर स्कॉलरशिप कार्यक्रम के तहत *31 निर्धन प्रतिभावान छात्राओं का चयन कर उन्हें निशुल्क प्रशिक्षण* देकर उनके प्रतिभा को निखारने का काम कर रही है | इस प्रदर्शनी में कक्षा 8 से 10 के छात्राओं द्वरा एक वर्ष के प्रशिक्षण के दौरान बनाई गयी चित्रों को प्रदर्शित किया गया है  | प्रदर्शनी में समिलित होने वाले सभी छात्राओं को भी विद्यालय की ओर से पुरस्कृत किया गया | प्रदर्शनी में बच्चों द्वारा विभिन्न माध्यमों और विषयों पर बनायीं गयी चित्रों को प्रदर्शित किया गया है जैसे, प्राकृतिक दृश, काल्पनिक दृश्य, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ो, कृष्णा , जीव जंतु , पक्षी आदि का चित्रण किया गया है |
कार्यक्रम में विशिस्ट अथिथि के रूप में *दिल्ली पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ राम सिंह,  डी.ए. वी हेहल के प्राचार्य श्री एम के सिन्हा,  शिखर संस्कार के अध्यक्ष श्री एम .पी.अजमेरा,  विद्यालय सचिव श्री सुभाष चन्द्र बोथरा , विद्यालय की प्रधान्याधापिका श्रीमती काजल मुख़र्जी*\ के अलावा प्रभंधकरिणी के सदस्य सर्वश्री लब्धि जैन, घेवर चंद नाहटा , गौरी शंकर, जीतन राम, रजनी कुमारी, आरती झा,  के अलावा सभी शिक्षक शिक्षिकाएं उपस्थित थीं | | इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय की छात्राओं का बहोत योगदान रहा जिसमे रूबी, आरती, शिखा, कोमल आदि का सहयोग रहा|

आलोचना की नई शैली प्रस्तुत करती पुस्तक

‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ गणेश ग़नी की पहली काव्य आलोचना की पुस्तक है जो आलोचना को रचना की शैली में प्रस्तुत करती है।गनी पेशेवर आलोचक इस अर्थ में नहीं हैं कि जिस तरह की आलोचना की परिपाटी और लीक हमारी भाषा के साहित्य में है, उस तरह की आलोचना गनी नहीं लिखते। किसी रचना को व्याख्यायित करने और पढ़ने का जो ख़ासा बोरियत भरा अकादमिक रवैया बना हुआ है, उससे भिन्न गनी अपनी अपनी आलोचना को स्वयं रचना में ढाल देते हैं, उनकी आलोचना रचना से टकराती नहीं है, उसके समानांतर चलती है। गनी आलोचना को लकड़हारे की तरह नहीं, माली की तरह बरतते हैं। सामाजिक अनुभवों के बरक्स रचना के पाठ की सैद्धांतिकी तो बहुत प्रचलित है पर गनी रचना को व्यक्तिगत अनुभवों के साथ पढ़ते हैं। यह लगभग नया नज़रिया है। इस प्रस्तुत पुस्तक में मौजूदा दौर में सक्रिय पचासेक कवियों के कवि कर्म को गनी अपनी कसौटी पर परखते हुए एक ऐसी कृति तैयार करते हैं, जिसमें काव्य है, कथा है, संस्मरण है, कवियों का भी जीवन है और कविता के निकष तो हैं ही, बल्कि कविता के निकष नये ढर्रे से बनते हुए दिखाई पड़ते हैं। बहरहाल यह पुस्तक आप अगर साहित्य के विद्यार्थी नहीं हैं, तो भी आपको अपने साथ जोड़ लेगी।

‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ गनी की पहली किताब दरअसल खुद से एक संवाद है। ‘क़िस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ एक प्रक्रिया है सूक्ष्म और शुद्ध होने की। पिछले कई सालों में कई कविताओं से गुज़रते हुए जो कुछ भी भीतर-भीतर चलता रहा, उसे सीधे का़गज़ और कलम उठाकर प्रकट नहीं करके अपनी स्मृतियों के संसार में गुज़रते हुए संजोए रखा। यह यात्रा लम्बी और रोचक है परंतु तयशुदा नहीं है। बस एक सिरे से दूसरे सिरे तक की भटकन है। गनी कि़स्सागोई करते हैं अपनी स्मृतियों के साथ और उनके इस सफ़र में उनके समकालीन कवियों का योगदान दर्ज़ है।

गणेश गनी मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र पांगी घाटी से सम्बद्ध हिन्दी कवि हैं। हिमाचल विश्वविद्यालय से बी.ए., जम्मू विश्वद्यालय से बी.एड., पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए. व एम.बी.ए. तथा इग्नू से पी.जी.जे.एम.सी. की पढ़ाई के उपरांत इन दिनों कुल्लू और मंडी के ग्रामीण इला़कों में एक निजी पाठशाला ग्लोबल विलेज स्कूल का संचालन कर रहे हैं।

गणेश गनी की कविताएं हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘वसुधा’, ‘पहल’, ‘बया’, ‘सदानीरा’, ‘अकार’, ‘आकण्ठ’, ‘वागर्थ’, ‘सेतु’, ‘विपाशा’, ‘हिमप्रस्थ’ आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘हिमतरु’ पत्रिका ने गणेश गनी की कविताओं पर एक विशेषांक भी प्रकाशित किया है।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

देश के 91 प्रमुख जलाशयों के जलस्तर में 8 प्रतिशत की वृद्धि


19 जुलाई, 2018 को समाप्त सप्ताह के दौरान देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 52.355 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल संग्रह हुआ। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 32 प्रतिशत है। 12 जुलाई, 2018 को समाप्‍त सप्ताह में जल संग्रह 24 प्रतिशत के स्तर पर था। 19 जुलाई, 2018 को समाप्त सप्ताह में यह संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 125 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 116 प्रतिशत है।
इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 161.993 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 257.812 बीसीएम का लगभग 63 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली लाभ देते हैं।
क्षेत्रवार संग्रहण स्थिति : -

उत्तरी क्षेत्र
उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 3.66 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 20 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 43 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 39 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
पूर्वी क्षेत्र
पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.23 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 22 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 24 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 23 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कम है।
पश्चिमी क्षेत्र
पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 31.26 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 7.89 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 26 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 24 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से बेहतर है।
मध्य क्षेत्र
मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 12.06 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 32 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण कम है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से बेहतर है।
दक्षिणी क्षेत्र
दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 24.52 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 48 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 16 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 28  प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से बेहतर है और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।
पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पश्चिम बंगाल,  त्रिपुरा, महाराष्‍ट्र, छत्तीसगढ़, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण समान है उनमें उत्‍तराखंड शामिल है। वहीं, पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण कम है उनमें राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश शामिल हैं।

पीएम मोदी की ग्रामीण विद्युतीकरण के लाभार्थियों से बातचीत का मूल पाठ


 
आज मुझे देश के उन 18 हजार गांव के आप सब बंधु से मिलने का मौका मिला है, जिनके यहां पहली बार बिजली पहुंची है। सदियां बीत गईं अंधेरे में गुजारा किया और शायद सोचा भी नहीं होगा कि आपके गांव में कभी उजाला आयेगा कि, नहीं आएगा। आज मेरे लिये ये भी खुशी की बात है कि मुझे आपकी खुशियों में शामिल होने का मौका मिल रहा है। आपके चेहरे की मुस्कान बिजली आने के बाद जीवन में आए बदलाव की बातें ये अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है। जो लोग पैदा होते ही उजाला देखते आए हैं, जिन्होंने कभी अंधेरा देखा नहीं है, उनको ये पता नहीं होता कि अंधेरा हटने का मतलब क्या होता है। रात को बिजली होनी घर में या गांव में इसका मतलब क्या होता है। जिन्होंने कभी अंधेरे में जिन्दगी गुजारी नहीं, उनको पता नहीं चलता है। हमारे यहां उपनिषदों में कहा गया है, “तमसो मा ज्योतिर्गमय।।” यानी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
आज मुझे देश भर के उन लोगों से मिलने का अवसर मिला है, जिन्होंने अपने जीवन में अंधकार से प्रकाश का सफर तय करने का सौभाग्य प्राप्त किया है। सालों के अंधेरे के बाद एक तरह उस गांव का जीवन अब रौशन हुआ है। हम सबके पास दिन के 24 घंटे होते हैं। मेरे पास भी 24 घंटे हैं, आपके पास भी 24 घंटे हैं। हर एक व्यक्ति चाहता है कि समय का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग हो, जिससे हमारे स्वयं की, हमारे परिवार की, हमारे समाज और राष्ट्र की तरक्की का रास्ता तैयार हो। लेकिन आपके 24 घंटे में से 10 से 12 घंटे हमेशा-हमेशा के लिये निकल जाते हैं, तब आप क्या कर सकते हैं। क्या बचे हुए 12, 14 घंटों में आप उतना ही कार्य कर सकेंगे, जितने 24 घंटों में करते हैं। आपके मन में सवाल उठेगा कि मोदी जी क्या पूछ रहे हैं और ऐसा किस प्रकार संभव है कि किसी के पास एक दिन में 24 घंटे की जगह मात्र 12, 14 घंटे का समय हो। देशवासियों आपको भले ये सच न लगता हो, लेकिन हमारे देश के सुदूर पिछड़े इलाकों में हजारों गांव में रहने वाले लाखों परिवारों ने दशकों तक इसे जिया है। ऐसे गांव जहां आजादी के इतने वर्ष बाद भी बिजली नहीं पहुंची थी और वहां रहने वालों का जीवन सूर्योदय या सूर्यास्त के बीच सिमट कर रह गया था। सूरज की रौशनी ही उनके काम करने के घंटे तय करती थी। फिर चाहे बच्चे की पढ़ाई हो, खाना पकाना हो, खाना खिलाना हो या और घर के छोटे मोटे काम हों। देश को आजाद हुए कितने दशक बीत गए। लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम सरकार में आए तब देश के 18000 से अधिक गांव ऐसे थे जहां बिजली थी ही नहीं। बड़ी हैरानी होती है ये सोचकर के आखिर ऐसी कौनसी बाधा थी जिसे पार करके पिछली सरकारें अंधियारे में डूबे हजारों गांवों तक बिजली नहीं पहुंचा सकी। पिछली सरकारों ने बिजली पहुंचाने के वादे तो बहुत किये, लेकिन उन वादों को पूरा नहीं किया गया। उस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। 2005 यानि करीब – करीब आज से 13 साल पहले उस वक्त तत्कालीन कांग्रेस की सरकार थी। मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री थे और उन्होंने 2009 तक देश के हर गांव में बिजली पहुंचा देंगे ये वादा किया था और इतना ही कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष ने तो इससे एक कदम और आगे बढ़ाते हुए 2009 तक हर घर में बिजली पहुंचाने की बात कही थी। अच्छा होता जो अपने आपको बड़े जागरूक और जनहितकारी मानने वाले लोग होते हैं। उन्होंने 2009 में गांव में जाकर के पूछताछ की होती, रिपोर्ट तैयार किये होते, सिविल सोसायटी की बात कही होती, तो हो सकता है कि 2009 नहीं 2010 में हो जाता 2011 में हो जाता, लेकिन उस समय वादे पूरे नहीं हुए। इसको कोई गंभीरता से लेता ही नहीं था। और आज हम जब वादों को गंभीरता से लेते हैं, तो आज ये खोजने का प्रयास होता है, अरे ढूंढ़ो यार इसमें कमी कहां है। मैं मानता हूं यही लोकतंत्र की ताकत है। हमलोग अच्छा करने का लगातार प्रयास करें और जहां कमी रह जाती है, उसको उजागर करके उसको ठीक करने का प्रयास करें। जब हम सब मिलकर के काम करते हैं, तो अच्छे परिणाम भी निकलते हैं।
15 अगस्त, 2015 को मैंने लालकिले के प्राचीर से कहा था। और हमने लक्ष्य तय किया कि हम एक हजार दिन के भीतर देश के हर गांव में बिजली पहुंचाएंगे। सरकार के बिना किसी देरी के इस दिशा में काम करना शुरू किया। इसमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया। उत्तर से लेकर के दक्षिण तक पूर्व से लेकर के पश्चिम तक देश के हर हिस्से में जो भी गांव बिजली की सुविधा से वंचित थे, पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत वहां बिजली पहुंचाने के कार्य में हम जुट गए। इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली सप्लाई से संबंधित सभी पहलुओं को शामिल किया गया। इस योजना में गांवों, बस्तियों के इलेक्ट्रिफिकेशन के साथ-साथ डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम को मजबूत करने और किसानों को बिजली सप्लाई के लिये अलग फेडर की व्यवस्था को भी आरंभ कर लिया गया। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि देश के सभी गांव और उससे जुड़ी बस्तियां चाहे छोटी हो या बड़ी उन्हें इस योजना के तहत एक के बाद एक शामिल करते जाएं और उजाला का विस्तार होता चला गया।
कोई भी गांव या बस्ती चाहे उसकी जनसंख्या कितनी भी कम हो, बिजली सुविधा से वो वंचित न रहे इस लक्ष्य को लेकर के काम कर रहे हैं। जहां पर ग्रि‍ड से जुड़ना संभव न हो उन गांवों पर और उन बस्तियों में ऑफग्रिड माध्यम से बिजली की सप्लाई की व्यवस्था की जा रही है। 28 अप्रैल 2018 यह भारत की विकास यात्रा में एक ऐतिहासिक दिन के रूप में याद किया जाएगा।  मणिपुर का लाइसांग गांव पावर ग्रिड से जुड़ने वाला आखिरी गांव था। यह दिन हर देशवासी के लिये गर्व का क्षण था। और मुझे खुशी है कि आज आखिर में जहां बिजली पहुंची है। उस लाइसांग गांव के लोगों से मैं बातचीत शुरू करना चाहता हूं। सबसे पहले उन्हीं को सुनते हैं, उनका क्या कहना है, ये मणिपुर के सेनापति जिले में हैं .....
देखिये मेरे प्यारे देशवासियों अभी हमनें अलग-अलग अनुभव सुनें कैसे बिजली आने के बाद जीवन आसान हुआ है। जिन 18000 गांवों में बिजली नहीं पहुंची थी। उनमें से अधिकतर गांव बहुत ही दूरदराज इलाकों में है। जैसे कि पर्वतीय क्षेत्रों के बर्फीले पहाड़ों में है, घने जंगलों से घिरे हैं या फिर उग्रवादी एवं नक्सली गतिविधियों के कारण अशांत क्षेत्र में हैं। इन गांवों में बिजली पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं था। ये वो गांव है जहां आने जाने की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है और वहां आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता था। कई ऐसे गांव है जहां पहुंचने के लिये तीन चार दिन पैदल चलना पड़ता है। सामान को अलग-अलग माध्यमों से घोड़े पर, खच्चर पर, कंधों पर लेकर नावों से ले जाया गया। कई गांव जैसे जम्मू एवं कश्मीर के 35 गांव तथा अरुणाचल प्रदेश के 16 गांव हेलिकॉप्टर से सामान पहुंचाना था। मैं मानता हूं कि सरकार की उपलब्धि नहीं है। ये हर उस व्यक्ति की उपलब्धि है, उस गांव वालों की उपलब्धि है, जो इस काम से जोड़े गए या उन सरकार के छोटे मोटे मुलाजिम जो दिन रात मेहनत की कष्ट उठाया। खम्भे उठा-उठा कर गये। उन छोटे-छोटे सरकार के मुलाजिमों की ये इनका काम है। इलेक्ट्रिशियन हो, टैक्निशियन हो, मजदूर हो। इस कार्य में जुड़े लोगों के अथक प्रयास का ही परिणाम है कि आज हम हिन्दुस्तान के हर गांव तक रौशनी पहुंचा पाए हैं। मैं उन सभी लोगों को सारे देशवासियों की तरफ से उनका बहुत धन्यवाद करता हूं। उनको शुभकामनाएं देता हूं।
आप देखिए मुम्बई की जब भी बात आती है, तो हमें बड़े-बड़े बिल्डिंग रौशनी से जगमगाता शहर और सड़कें याद आती हैं। मुम्बई से थोड़ी दूरी पर एलीफेंटा द्वीपस्थित है। यह पर्यटन का एक बहुत बड़ा आकर्षित केन्द्र है।एलीफेंटा के गुफाएं यूनेस्को के वर्ल्ड हैरिटेज में है। वहां पर देश विदेश से विशाल संख्या में पर्यटक हरदिन आते हैं। मुझे ये बात जानकर के हैरानी हुई की मुम्बई के इतने पास होने और पर्यटन का इतना बड़ा केन्द्र होने के बावजूद आजादी के इतने वर्षों तक एलीफेंटा द्वीपके गांवों में बिजली नहीं पहुंची थी और न ये मैंने कभी अख़बार में पढ़ा, न टीवी पर बड़ा विशेष कार्यक्रम हुआ की वहां अंधेरा है। किसी को परवाह नहीं थी। हां अभी खुशी है, अब हम काम कर रहे हैं तो लोग पहुंच जाते हैं की बाईं ओर लाइट नहीं आई, दाईं ओर नहीं आई, पीछेआई, आगे नहीं आई, छोटी आई, बड़ी आई। सब हो रहा है। अगर ये चीजें पहले हुई होती। कोई सोच सकता है 70 साल तक हमारा टूरिस्ट डेस्टीनेशन एलीफेंटा द्वीप गांवों के लोग अंधेरे की जिन्दगी गुजार रहे थे। समुद्र में केबल बिछा कर वहां तक बिजली पहुंचाई गई। आज उन गांव का अंधेरा छट चुका है। जब इरादे नेक हों, नियत साफ हो और नीति स्पष्ट हो, तो मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है।
आइये चलते हैं कुछ और इलाके में, आईए सबसे पहले झारखंड चलते हैं....
देखिये भाइयों बहनों पिछली सरकारों ने देश के पूर्वी क्षेत्र के विकास पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था। ये क्षेत्र विकास और विभिन्न सुविधाओं से वंचित रहा। ये इस बात से समझा जा सकता है कि देश के 18000 से अधिक गांव जहां बिजली नहीं पहुंची थी। उनमें से ये आंकड़ा जरा देश को चौंकाने वाला है। उनमेंसे 18000 में से 14,582 यानि करीब-करीब 15000 गांव ऐसे थे जो हमारे पूर्वी क्षेत्र में थे और उनमें भी यानि 14,582 गांव में से 5790 यानि करीब करीब 6000 गांव नॉर्थ ईस्ट में थे, पूर्वांचल के थे पूर्वोत्तर भारत क्षेत्र के थे। आप देखिये, ये आप टीवी पर देखते होंगे, मैंने उसका नक्शा रखा है। जो लाल-लाल टाइप के दिखते हैं आपको ये सारा इलाका अंधेरे में था। अब मुझे बताइए अगर सबका भला करने के लिये सोचते तो ये हाल होता क्या। लेकिन वहां लोग कम हैं पार्लियामेंट की सीटें भी कम हैं। तो उन सरकारों को ज्यादा फायदा नहीं दिखता था। देश की सेवा राजनीतिक फायदे से जुड़ी हुई नहीं होती। देश की सेवा देशवासियों के लिये होती है और मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि भारत की विकास की यात्रा में और गति आएगी जब हमारे पूर्वी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को यहां के समाज का संतुलित विकास भी तेज गति से होगा।
जब हमारी सरकार बनी हम इसी अपरोच के साथ आगे बढ़े और हमने पूर्वोत्तर को विकास की मुख्य धारा में जोड़ने की दिशा में प्रयास शुरू किया। इसके लिये सबसे पहले आवश्यक था कि वहां के गांवों में बिजली पहुंचे और मुझे खुशी है कि आज न सिर्फ पूर्वी भारत के बल्कि देश के हर गांव में बिजली पहुंच चुकी है। गांव का अंधेरा दूर हो चुका है। बिजली आती है तो क्या होता है। जीवन में क्या बदलाव आता है। आप लोगों से बेहतर इस बात को कौन जान सकता है। मुझे देशवासियों के कई सारे पत्र आते रहते हैं। लोग मुझसे अपने अनुभव शेयर करते हैं। मुझे उनके पत्रों को पढ़कर के काफी कुछ सीखने को मिलता है।
आप कल्पना कर सकते हैं कि बिजली आने से गांव में रह रहे सामान्य जनजीवन में कितना बदलाव आया है। अब गांव के लोगों को समय पर अंधियारे का नहीं इनका स्वयं का अधिकार होता है। अब सूर्यास्त में केवल सूर्य अस्त होता है लोगों का दिन अस्त नहीं होता है। बच्चे दिन डूबने के बाद भी बल्ब की रौशनी में आराम से पढ़ाई कर सकते हैं। गांव की महिलाओं को अब रात का खाना शाम को दोपहर से जो बनाना शुरू करना पड़ता था। खाना अभी बना है जल्दी-जल्दी शुरू कर दो का चक्कर चलता था। उस भय से मुक्ति आई है। हाट, बाजार देर तक रात को खुले मिलेंगे। मोबाइल चार्ज करने के लिये दूरदराज कोई दुकान नहीं तलाश करनी पड़ती। अब रात को दूसरे गांव में मोबाइल छोड़कर आओ और सुबह लेने जाऊं और उसी फोन से रात को कोई गड़बड़ कर दे, तो सारा गुनाह आपका बन जाता आप जेल चले जाते हैं। कैसी-कैसी मुसीबतें थीं। जम्मू-कश्मीर के लोग हमारे बीच में हैं आइये, क्योंकि वहां तो पहाड़ों में बड़ी कठिनाई से ये सारा सामान हेलिकॉप्टर से भेजना पड़ता था, तो मैं चाहूंगा कि जम्मू-कश्मीर के मेरे भाइयों बहनों से मैं सुनूं कुछ बातें।
देखिये लाखों लोग जो आज हमारे साथ जुड़े हैं, वो जान पा रहे हैं कि जब विकास होता है तो जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ता है। कितना बड़ा बदलाव आता है। आज देश के हर गांव में बिजली पहुंच गई है। लेकिन हम इतने से संतुष्ट हुए हैं इतना नहीं है, इसलिए अब गांव से आगे बढ़कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के अंत्योदय के सपने को साकार करने के लिए हमारी सरकार ने इस देश के हर घर को रौशन करने का संकल्प किया है और इस दिशा में प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना जिसका छोटा सा शब्द बनता है सौभाग्य योजना इसकी शुरुआत की गई। इस योजना के तहत बचे हुए सभी घरों को चाहे वो गांव में हो या शहर में बिजली का कनेक्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। और इसके तहत चार करोड़ गरीब परिवारों को बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने का हमने लक्ष्य निर्धारित किया है। और हम इसके लिए एक मिशन मोड में काम कर रहे हैं। अभी तक इस योजना के तहत करीब 80 85 90 लाख से अधिक घरों में बिजली पहुंच चुकी है। गरीब परिवारों के लिए बिजली कनेक्शन बिल्कुल मुफ्त है। वहीं सक्षम परिवारों से सिर्फ 500 रुपये लिए जाएंगे, जिसे कनेक्शन लगने के बाद दस आसान किस्तों में आप अपने बिजली बिल के साथ चुका सकते हैं। घरों में बिजली पहुंचाने के लक्ष्य को तय समय सीमा में पूरा करने के लिए आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कम से कम समय में लोगों के घर तक बिजली पहुंचे इसके लिये गांवों में कैम्प भी लगाए जा रहे हैं। जहां मौके पर ही सारी प्रक्रिया पूरी कर नये कनेक्शन स्वीकृत किये जा रहे हैं।
इसके अलावा दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए सौर ऊर्जा, सूर्य ऊर्जा आधारित प्रणालियों का प्रावधान भी किया गया है। मैं मानता हूं कि बिजली सिर्फ प्रकाश की ही पूर्ति नहीं करती, बिजली लोगों में आत्मविश्वास भी भर्ती है। एनर्जी ऊर्जा ये एक प्रकार से गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने का अच्छा साधन भी बन सकता है। गांव-गांव तक पहुंची रौशनी सिर्फ सूरज डूबने के बाद का अंधियारा नहीं मिटा रही, ये रौशनी गांव और गांव के लोगों के जीवन में तरक्की का उजियारा भर रही है। और इसका प्रमाण है आपकी ये बातें, जिन्हें इस बदलाव के बाद आपने अनुभव किया और हमारे साथ यहां साझा किया। सारे देश ने आपको सुना है। कई गांव और भी है समय की कमी है, संसद चल रही है मुझे पहुंचना है पर कुछ गांवों से नमस्ते जरूर करना चाहूंगा। बस्तर को नमस्ते, अलीराजपुर को नमस्ते, सीहोर को नमस्ते, नवपाड़ा को नमस्ते, सीतापुर को नमस्ते और कभी–कभी आप लोग टीवी में देखते होंगे, अखबार में पढ़ते होंगे हमारे विरोधियों के भाषण सुनते होंगे। विरोधियों के गाने बजाने वालों को सुनते होंगे। वो कहते हैं देखो इतने घरों में बिजली नहीं, इतने घरों में बिजली नहीं है। आप ये मत समझिए कि हमारी टीका है या हमारी सरकार की टीका है। ये पिछले 70 साल जो सरकार चला रहे थे उनकी टीका है। ये हमारी आलोचना नहीं है ये उनकी आलोचना है कि इतना काम बाकी रखा है। हम तो उसे पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।
और इसलिए अगर चार करोड़ परिवारों में बिजली नहीं है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि आपके घर में पहले बिजली थी, आपके गांव में पहले बिजली थी और मोदी सरकार ने आकर के सब काट दिया, खंभे उखाड़कर के ले गया, तार सारे ले गये, ऐसा नहीं है। पहले कुछ था ही नहीं। हम लगाने की कोशिश कर रहे हैं। और इसलिए जो लोग बड़े उत्साह में आकर के हमारे विरोधी हमको गालियां देते रहते हैं, उस परिवार में बिजली नहीं पहुंची, उसके घर में बिजली नहीं पहुंची, उधर खम्भा नहीं लगा। पहले किसीने नहीं लगाया था। हम कोशिश कर रहे हैं और आपका साथ सहयोग रहा और छोटे-छोटे लोग जिन्होंने मेहनत की है हम उनको निराश करने का काम न करें। मोदी को जितनी गालियां देनी है देते रहिए। लेकिन जो छोटे-छोटे लोग मेहनत करते हैं गांव में उजियारा लाने के लिए कोशिश करते हैं। उनका हम मान सम्मान बढ़ाएं, उनका हम गौरव करें उनको काम करने का हौसला बुलंद हो, इसके लिए हम सब प्रयास करें तो फिर देश में जो समस्याएं हैं एक के बाद एक समस्याओं से हम हमारे गांव को, हमारे परिवारों को, हमारे देश को बाहर निकाल सकते हैं। क्योंकि आखिरकार हम सबका काम है समस्याएं गिनते जाना ये हमारा काम नहीं है। हमारा काम है समस्यों से मुक्ति दिलाने के रास्ते खोजना।
मुझे विश्वास है कि परमात्मा हम सबको शक्ति देगा। इरादे हमारे नेक हैं। आप सबके प्रति हमारे दिल में इतना प्यार है कि जितना हम आपके लिये करें कम है। हम करते रहेंगे। मैं आखिर में आपको एक वीडियो भी दिखाना चाहता हूं। आइए हम एक वीडियो देखें उसके बाद मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा हूं।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...