जल मार्ग विकास परियोजना के तहत भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण कर रहा है इस टर्मिनल का निर्माण google.co.in |
| नई दिल्ली। जल मार्ग विकास परियोजना के तहत भारतीय अंतर्देशीय जल मार्ग प्राधिकरण द्वारा वाराणसी में 169.59 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे मल्टी मोडल टर्मिनल (एमएमटी) का निर्माण कार्य इसी वर्ष नवम्बर तक पूरा हो जाएगा। यह टर्मिनल इस परियोजना के लिए एक प्रमुख उपलब्धि होगी। साहिबगंज में 280.90 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे एमएमटी का निर्माण कार्य मई, 2019 तक पूरा हो जाएगा, जबकि हल्दिया में 517.36 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे एमएमटी का निर्माण कार्य दिसंबर, 2019 तक पूरा हो जाएगा। इसके अलावा, फरक्का में 359.20 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे अत्याधुनिक नौवहन अवरोध (नैविगेशनल लॉक) का निर्माण कार्य जून, 2019 तक पूरा हो जाएगा। इस नदी के फरक्का-कहलगांव खंड पर तलकर्षण (ड्रेजिंग) के रख-रखाव के लिए 150 करोड़ रुपये का ठेका अप्रैल, 2018 में दिया गया था और इस पर काम शुरू हो गया है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और बिहार के कालूघाट में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर दो इंटर-मोडल टर्मिनलों (आईएमटी) के निर्माण कार्य का ठेका इसी वर्ष दिया जाएगा। जल मार्ग विकास विश्व बैंक से सहायता प्राप्त परियोजना है। राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (गंगा नदी) पर 5369 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य नदी के वाराणसी-हल्दिया खंड पर नौवहन क्षमता बढ़ाना है, ताकि कम से कम 1500-2000 टन के जहाजों का वाणिज्यिक नौवहन संभव हो सके। इस परियोजना के तहत वाराणसी, साहिबगंज एवं हल्दिया में मल्टी-मोडल टर्मिनलों का निर्माण/स्थापना, आईएमटी, नौवहन अवरोध, नदी सूचना प्रणाली, जहाज मरम्मत एवं रख-रखाव सुविधाएं इत्यादि शामिल हैं। |
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
वाराणसी में बनेगा मल्टी मोडल टर्मिनल
रेल दुर्घटनाओं की संख्या में आई कमी
रेल दुर्घटनाओं की संख्या 2013-14 में 118 थी, जो 2017-18 में घटकर 73 हो गई है। रेल दुर्घटनाओं की संख्या का वर्षवार ब्यौरा :
2009-10 से 2013-14 के दौरान तुलनात्मक औसत वार्षिक पूंजीगत परिव्यय, 2014-15 से 2017-18 के दौरान तुलनात्मक औसत वार्षिक पूंजीगत परिव्यय :
करोड़ रुपये में
करोड़ रुपये में
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किसानों की आय दुगनी करने के लिए अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति गठित
नई दिल्ली। सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। सरकार ने कृषि, सहयोग एवं किसान कल्याण विभाग के राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति गठित की है। इस समिति को किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और वर्ष 2022 तक सही अर्थों में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्त रणनीति की सिफारिश करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
वर्तमान में 'वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए रणनीति' के 13 मसौदा खंडों को इस विभाग की वेबसाइट (http://agricoop.nic.in/doubling-farmers) पर अपलोड किया गया है, ताकि इस बारे में आम जनता की राय जानी जा सके। इन मसौदा खंडों को इसी समिति द्वारा तैयार किया गया है।
समानांतर रूप से सरकार आय को केन्द्र में रखते हुए कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने पर विशेष ध्यान दे रही है। किसानों के लिए शुद्ध धनात्मक रिटर्न सुनिश्चित करने हेतु राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के जरिए इन योजनाओं को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित एवं क्रियान्वित किया जा रहा है : मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) योजना, नीम लेपित यूरिया (एनसीयू), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई), परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना (ई-नाम), बागवानी के एकीकृत विकास के लिए मिशन, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, इत्यादि।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर खरीफ और रबी दोनों ही फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को अधिसूचित किया जाता है। यह आयोग खेती-बाड़ी की लागत पर विभिन्न आंकड़ों का संकलन एवं विश्लेषण करता है और फिर एमएसपी से जुड़ी अपनी सिफारिशें पेश करता है।
किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार ने वर्ष 2018-19 के सीजन के लिए सभी खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि कर दी है। सरकार का यह निर्णय ऐतिहासिक है, क्योंकि इसके जरिए वर्ष 2018-19 के केन्द्रीय बजट में किए गए वादे को पूरा किया गया है, जिसमें एमएसपी को उत्पादन लागत का कम से कम 150 प्रतिशत तय करने की बात कही गई थी।
इस आशय की जानकारी कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने आज राज्यसभा में दी।
...तो गंगा को धरती पर लाने का विचार त्याग देते भगीरथ
गंगा नगरी में भी पानी का धंधा
यदि भगीरथ को इस बात का जरा भी अंदाजा होता कि एक युग ऐसा
आएगा जब गंगा के किनारे रहने वालों को भी पानी खरीदकर पीना पड़ेगा तो शायद वे
गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने का विचार त्याग देते। अब इससे बड़ी विडंबना क्या
होगी कि ऋषिकेश जैसी गंगा नगरी मे भी प्यास बुझाने के लिए पानी के सौदागरों पर
निर्भर रहना पड़ रहा है। गंगा का पानी एक तो शुद्ध नहीं रहा ऊपर से गर्मी के
मौसम में चट्टानों के बीच इसकी धारा को ढूंढना पड़ रहा है। ठंढा पानी पीने की
चाहत भी लोगों को पानी के सौदागरों की शरण में ले जाती है। वहां आरओ प्लांट के
पानी के नाम पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पानी पिलाया जा रहा है। पानी का धंधा
करने वाले रोजाना हजारों केन पानी बेचकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं।
ऐसी शिकायत मिल रही है कि वहां आरओ के नाम पर सामान्य पानी ठंडा
करके पिलाया जा रहा है और खास तौर पर सैलानी से पीने को विवश हैं। कम गुणवत्ता
के कारण जल जनित बीमारियां फैलने का डर बना रहता है। सतह पर पानी बह रहा है और
धरती की कोख से पानी निकाल कर उससे मोटी कमाई की जा रही है। आरओ प्लांट के के
पानी के नमूने लिए जाने को लेकर स्वास्थय विभाग उदासीन रहता है। केन में सप्लाई
होने वाले पानी की जांच भी नही की जाती। उसके अंदर कितने प्रकार की बीमारियां के
बैक्टीरिया पनप रहे हैं इसकी किसी को चिंता नहीं। सरकारी तंत्र कहीं न कहीं पानी
के सौदागरों को संरक्षण ही प्रदान करता दिखता है। सरकार पर्यटन उद्योग को बढ़ावा
देने की बात करती है। ऋषिकेश धार्मिक पर्यटन का अंतरराष्ट्रीय केंद्र है। यहां
लाखों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। अगर सरकार वहां शुद्ध पेयजल का
इंतजाम नहीं कर सकती और पानी के सौदागरों की पीठ थपथपाती है तो पर्यटन उद्योग को
बढ़ावा देने के उसके संकल्प पर सवालिया निशान खड़ा होता है।
ऋषिकेश मे पिछले कुछ वर्षो मे पानी का धंधा खूब चमका है। निजी
क्षेत्र के कई वाटर प्लांट यहां लगाए गए हैं। इन प्लांटों से पानी लेकर शहर में जलापूर्ति
की जाती है। पानी के केन दुकानदारों, व्यवसायिक संस्थानों के अलावा अब घरों में भी पहुंचने लगा है।
सप्लायर सुबह गाड़ियों मे केन भरे पानी भरकर लाते हैं। पानी भरा केन रख देते हैं
और खाली केन लेकर चले जाते हैं। प्रत्येक केन बीस लीटर का होता है। एक केन की
सप्लाई 25 से 30 रुपये में हो रही है। शहर समेत ग्रामीण इलाकों मे हजार केन पानी
की सप्लाई की जाती है। इस हिसाब से आरओ प्लांट के पानी का रोजाना तगड़ा कारोबार
हो रहा है। बड़ा सवाल यह है कि गंगा किनारे पानी के लिए ऐसा हाहाकार क्यों मचा हुआ
है और सरकार इसके प्रति उदासीन क्यों है।
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वॉट्सएप को दिया प्रभावी विकल्प तलाशने का निर्देश
अभी तक के प्रयास नाकाफी,
अफवाहों ने ली सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान
नई दिल्ली। वॉट्सएप के
गलत इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार चिंतित है। इलेक्ट्रोनिक्स और सूचना
प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 3 जुलाई, 2018 को वॉट्सएप को अपने लिखित संदेश में इस
डिजिटल प्लेटफार्म से फैलाये जा रहे भड़काऊ संदेशों के दुरूपयोग को रोकने के लिए
शीघ्रता से कदम उठाने को कहा गया था। उसी दिन वॉट्सएप ने मंत्रालय को अपना जबाव
देते हुए कहा कि इस तरह के संदेशों और झूठी खबरों को हटाने के लिए आवश्यक
प्रयास बढ़़ाने की पहल कर दी गई है।
इसके बाद भी बिदर में
एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जिसके शिकार एक 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर
मोहम्मद आजम हुए। वॉट्सएप पर बच्चों का अपहरण करने वाली वायरल हुई अफवाह के
बाद उन्हें भीड़तंत्र ने मौत के घाट उतार दिया। वॉट्सएप पर इस तरह के बड़े
पैमाने पर फैलाये जा रहे गैर जिम्मेदाराना और झूठे संदेशों के कारण देश में अपराध
बढ़ रहे है, किन्तु वॉट्सएप ने अपने मंच के दुरूपयोग से
जुड़ी इस समस्या का अभी भी पर्याप्त रूप से समाधान नहीं निकाला है।
मीडिया की खबरों के
मुताबिक आम जनमानस का मानना है कि वॉट्सएप को इस मामले में बहुत कुछ किये जाने
की जरूरत है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के द्वारा नफरत और उत्तेजना फैलाने वाले
संदेशों का पता लगाने के मामले में भी वॉट्सएप की जवाबदेही बनती है। जब अराजक
तत्वों के द्वारा झूठी खबरों को प्रसारित किया जाता है, तो ऐसी खबरों के लिए माध्यम
बनने वाले मंच अपनी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व से नहीं बच सकते। इसके बावजूद
भी अगर वे मूकदर्शक बने रहते है, तो उन्हें अपराध में
बराबर का सहयोगी होने पर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
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कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पांच दिवसीय चित्रकला प्रदर्शनी
निर्धन छात्राओं को कलाकृति देता है निशुल्क प्रशिक्षण
रांची। कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स डोरंडा कन्या पाठशाला में कलाकृति आर्ट फाउंडेशन द्वारा स्कालरशिप प्राप्त 31 निर्धन प्रतिभावान छात्राओं द्वारा बनाई गयी पेंटिंग्स की पांच दिवसीय चित्रकला प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। इसका उद्धाटन झारखंड उच्च न्यालय के *पूर्व न्यायाधीश रमेश मरेठिया* के द्वारा किया गया | इस अवसर पर कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स के द्वारा *निशुल्क प्रशिक्षण प्राप्त छात्राओं द्वारा बनाई गयी 80 पेंटिंग्स* को प्रदर्शित किया गया है | इस अवसर पर मुख्य अथिथि श्री मरेठिया, ने संस्था के कार्यों की सराहना करते हुवे कहा की – कलाकृति द्वारा विगत 17 वर्षों से सैंकड़ो निर्धन और पिछड़ा वर्ग के छात्राओं को निशुल्क चित्रकला की शिक्षा प्रदान कर रही है | यहाँ से निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर छात्राएं कला के क्षेत्र में अपना उज्जवल भविष्य बखूबी संवर रही हैं | संस्था के निदेशक एवं कला शिक्षक धनंजय कुमार ने बताया की कलाकृति स्कूल ऑफ़ आर्ट्स हर वर्ष पेंट योर फ्यूचर स्कॉलरशिप कार्यक्रम के तहत *31 निर्धन प्रतिभावान छात्राओं का चयन कर उन्हें निशुल्क प्रशिक्षण* देकर उनके प्रतिभा को निखारने का काम कर रही है | इस प्रदर्शनी में कक्षा 8 से 10 के छात्राओं द्वरा एक वर्ष के प्रशिक्षण के दौरान बनाई गयी चित्रों को प्रदर्शित किया गया है | प्रदर्शनी में समिलित होने वाले सभी छात्राओं को भी विद्यालय की ओर से पुरस्कृत किया गया | प्रदर्शनी में बच्चों द्वारा विभिन्न माध्यमों और विषयों पर बनायीं गयी चित्रों को प्रदर्शित किया गया है जैसे, प्राकृतिक दृश, काल्पनिक दृश्य, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ो, कृष्णा , जीव जंतु , पक्षी आदि का चित्रण किया गया है |
कार्यक्रम में विशिस्ट अथिथि के रूप में *दिल्ली पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ राम सिंह, डी.ए. वी हेहल के प्राचार्य श्री एम के सिन्हा, शिखर संस्कार के अध्यक्ष श्री एम .पी.अजमेरा, विद्यालय सचिव श्री सुभाष चन्द्र बोथरा , विद्यालय की प्रधान्याधापिका श्रीमती काजल मुख़र्जी*\ के अलावा प्रभंधकरिणी के सदस्य सर्वश्री लब्धि जैन, घेवर चंद नाहटा , गौरी शंकर, जीतन राम, रजनी कुमारी, आरती झा, के अलावा सभी शिक्षक शिक्षिकाएं उपस्थित थीं | | इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय की छात्राओं का बहोत योगदान रहा जिसमे रूबी, आरती, शिखा, कोमल आदि का सहयोग रहा|
आलोचना की नई शैली प्रस्तुत करती पुस्तक
‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ गणेश ग़नी की पहली काव्य आलोचना की पुस्तक है जो आलोचना को रचना की शैली में प्रस्तुत करती है।गनी पेशेवर आलोचक इस अर्थ में नहीं हैं कि जिस तरह की आलोचना की परिपाटी और लीक हमारी भाषा के साहित्य में है, उस तरह की आलोचना गनी नहीं लिखते। किसी रचना को व्याख्यायित करने और पढ़ने का जो ख़ासा बोरियत भरा अकादमिक रवैया बना हुआ है, उससे भिन्न गनी अपनी अपनी आलोचना को स्वयं रचना में ढाल देते हैं, उनकी आलोचना रचना से टकराती नहीं है, उसके समानांतर चलती है। गनी आलोचना को लकड़हारे की तरह नहीं, माली की तरह बरतते हैं। सामाजिक अनुभवों के बरक्स रचना के पाठ की सैद्धांतिकी तो बहुत प्रचलित है पर गनी रचना को व्यक्तिगत अनुभवों के साथ पढ़ते हैं। यह लगभग नया नज़रिया है। इस प्रस्तुत पुस्तक में मौजूदा दौर में सक्रिय पचासेक कवियों के कवि कर्म को गनी अपनी कसौटी पर परखते हुए एक ऐसी कृति तैयार करते हैं, जिसमें काव्य है, कथा है, संस्मरण है, कवियों का भी जीवन है और कविता के निकष तो हैं ही, बल्कि कविता के निकष नये ढर्रे से बनते हुए दिखाई पड़ते हैं। बहरहाल यह पुस्तक आप अगर साहित्य के विद्यार्थी नहीं हैं, तो भी आपको अपने साथ जोड़ लेगी।
‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ गनी की पहली किताब दरअसल खुद से एक संवाद है। ‘क़िस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ एक प्रक्रिया है सूक्ष्म और शुद्ध होने की। पिछले कई सालों में कई कविताओं से गुज़रते हुए जो कुछ भी भीतर-भीतर चलता रहा, उसे सीधे का़गज़ और कलम उठाकर प्रकट नहीं करके अपनी स्मृतियों के संसार में गुज़रते हुए संजोए रखा। यह यात्रा लम्बी और रोचक है परंतु तयशुदा नहीं है। बस एक सिरे से दूसरे सिरे तक की भटकन है। गनी कि़स्सागोई करते हैं अपनी स्मृतियों के साथ और उनके इस सफ़र में उनके समकालीन कवियों का योगदान दर्ज़ है।
गणेश गनी मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र पांगी घाटी से सम्बद्ध हिन्दी कवि हैं। हिमाचल विश्वविद्यालय से बी.ए., जम्मू विश्वद्यालय से बी.एड., पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए. व एम.बी.ए. तथा इग्नू से पी.जी.जे.एम.सी. की पढ़ाई के उपरांत इन दिनों कुल्लू और मंडी के ग्रामीण इला़कों में एक निजी पाठशाला ग्लोबल विलेज स्कूल का संचालन कर रहे हैं।
गणेश गनी की कविताएं हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘वसुधा’, ‘पहल’, ‘बया’, ‘सदानीरा’, ‘अकार’, ‘आकण्ठ’, ‘वागर्थ’, ‘सेतु’, ‘विपाशा’, ‘हिमप्रस्थ’ आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘हिमतरु’ पत्रिका ने गणेश गनी की कविताओं पर एक विशेषांक भी प्रकाशित किया है।
‘किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ गनी की पहली किताब दरअसल खुद से एक संवाद है। ‘क़िस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर’ एक प्रक्रिया है सूक्ष्म और शुद्ध होने की। पिछले कई सालों में कई कविताओं से गुज़रते हुए जो कुछ भी भीतर-भीतर चलता रहा, उसे सीधे का़गज़ और कलम उठाकर प्रकट नहीं करके अपनी स्मृतियों के संसार में गुज़रते हुए संजोए रखा। यह यात्रा लम्बी और रोचक है परंतु तयशुदा नहीं है। बस एक सिरे से दूसरे सिरे तक की भटकन है। गनी कि़स्सागोई करते हैं अपनी स्मृतियों के साथ और उनके इस सफ़र में उनके समकालीन कवियों का योगदान दर्ज़ है।
गणेश गनी मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र पांगी घाटी से सम्बद्ध हिन्दी कवि हैं। हिमाचल विश्वविद्यालय से बी.ए., जम्मू विश्वद्यालय से बी.एड., पंजाब विश्वविद्यालय से एम. ए. व एम.बी.ए. तथा इग्नू से पी.जी.जे.एम.सी. की पढ़ाई के उपरांत इन दिनों कुल्लू और मंडी के ग्रामीण इला़कों में एक निजी पाठशाला ग्लोबल विलेज स्कूल का संचालन कर रहे हैं।
गणेश गनी की कविताएं हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘वसुधा’, ‘पहल’, ‘बया’, ‘सदानीरा’, ‘अकार’, ‘आकण्ठ’, ‘वागर्थ’, ‘सेतु’, ‘विपाशा’, ‘हिमप्रस्थ’ आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘हिमतरु’ पत्रिका ने गणेश गनी की कविताओं पर एक विशेषांक भी प्रकाशित किया है।
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