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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी रूढ़िवाद



देवेंद्र गौतम

सोशल मीडिया के इस जमाने में हर पर्व त्योहार या धार्मिक आयोजन के मौके पर कोई न कोई कथित वामपंथी विद्वान उसे ढोंग, ढकोसला, अंधविश्वास आदि करार दे ही देता है। फिर दक्षिणपंथी खेमे से इसके जवाबी पोस्ट आने लगते हैं। इस क्रम में भाषा की मर्यादा तक ताक़ पर रख दी जाती है। सच्चाई यह है कि दोनो ही अपने-अपने ढंग के रूढ़िवाद से ग्रसित हैं। अपने कालखंड की विशिष्टताओं, ज्ञान-विज्ञान से पूरी तरह के कटे हुए। लकीर के फकीर। वामपंथ चीजों को वैज्ञानिक नजरिए से देखने और तार्किक तरीके से विश्लेषण करने की प्रेरणा देता है। लेकिन वामपंथी अपने पूर्वजों यानी मार्क्स, लेनिन, माओ आदि की कही बातों के आधार पर अपनी धारणा बनाते हैं और विभिन्न मंचों से व्यक्त करते हैं। इस क्रम में सामयिक घटनाओं और प्रवृतियों का विश्लेषम तो हो जाता है लेकिन धर्म और अध्यात्म के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हो पाते। सवाल है कि क्या मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओं के देहांत के बाद विज्ञान का विकास रुक गया था? समय का पहिया थम गया था? उनकी प्रस्थापनाओं में कुछ नया जोड़ने की जरूरत नहीं है?
हाल के वर्षों में देशी-निदेशी विश्वविद्यालयों में जो शोध हुए हैं उनसे पता चलता है कि धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों के अंदर भी विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान परमाणु से विकसित हुआ है तो आध्यात्मिक विज्ञान। विशुद्ध ऊर्जा, महाशून्य, कास्मिक रेज अथवा ब्रह्म से। आधुनिक शोधों से धर्म और विज्ञान के बीच की दूरी निरंतर कम होती जा रही है। माना जा रहा है कि धार्मिक ग्रंथों में वैज्ञानिक बातों को अंधविश्वास की भाषा में कहा गया है। संभवतः यह उस काल के बौद्धिक और सामान्य जन की चेतना के स्तर में अंतर के कारण किया गया हो। ठीक उसी तरह जैसे इतिहास को मिथिहास की भाषा में लिखा गया था। वैज्ञानिक स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह भूमंडल और जीवमंडल अरवों-खरबों वर्षों से अस्तित्व में है। तो क्या यह मान लिया जाए कि मानव सभ्यता हड़प्पा, मिश्र और मेसेपोटानिया से पहले नहीं रही रही होगी इसलिए कि हम उससे अवगत नहीं हैं। तो क्या धर्मग्रंथों में जो बातें अंधविश्वास की भाषा में कही गई हैं उन्हें वैज्ञानिक भाषा में नहीं कहा जाना चाहिए? क्योंकि वामपंष के पूर्वजों ने उन्हें सिरे से नकार दिया था? धर्म के प्रति पूर्वाग्रह पूर्ण नकारात्मक धारणा के कारण ही वामपंथ की धारा सिमटती और व्यापक जन समुदाय से कटती जा रही है। भाकपा माले के पूर्व महासचिव विनोद मिश्र ने कहा था कि धर्म व्यक्तिगत आस्था की चीज है, उसे इसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। अगर माओ ने धर्म को अफीम करार दिया तो इसका कारण था कि उस समय तक उसके अंदर की वैज्ञानिकता की पड़ताल नहीं की गई थी। अब जब उसका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा रहा है तो क्या इसे इसलिए अस्वीकार कर देना चाहिए कि वामपंथ के पूर्वजों ने स्वीकार नहीं किया था। स्थापित प्रस्थापना को मानने और बनी बनाई लीक पर चलना कत्तई वामपंथ नहीं है। यह एक किस्म का रूढ़िवाद है। हर विचारधारा अपने उदयकाल में सर्वाधिक आधुनिक और प्रासंगिक होती है लेकिन कालांतर में जब वह अपने समय, काल, परिस्थितियों और ज्ञान-विज्ञान के विकास के अनुरूप परिमार्जित नहीं होती तो रूढ़ होने लगती है। वामपंथ का रूढ़िवाद अभी शैशवकाल में है। इससे छुटकारा पाया जा सकता है। दक्षिणपंथ का रूढ़िवाद क्रोनिक है। से दूर करने के लिए वामपंथ को ही आगे आना होगा लेकिन अपने रूढ़िवाद से मुक्त होने के बाद। दक्षिणपंथियों को रूढ़िवादी और ढपोरपंथी क्यों कहा जाता है? इसीलिए न कि वे सदियों से स्थापित प्रस्थापनाओं के अनुरूप आचरण करते हैं। पूर्वजों की हर बात को ब्रह्मवाक्य मानते हैं। अगर वामपंथी भी यही करते रहेंगे तो फिर वामपंथी और दक्षिणपंथी में अंतर क्या है? दोनों अपने-अपने पूर्वजों की कही बातों को ब्रह्मवाक्य मानकर चलते हैं।
दक्षिणपंथियों की समस्या यह है कि वे विज्ञान को अपना शत्रु मानते हैं। ठीक जैसे वामपंथी धर्म को पूरी तरह अवैज्ञानिक मानते हैं। लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम न तो आदिम युग में जी रहे हैं और न 19 वीं शताब्दी में। यह 21 वीं सदी है। कम से कम अब तो पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर चीजों को नए सिरे से देखने का प्रयास करें। अभी दुर्गा पूजा, दीपावली, छठ आदि पर्वों के मौसम में एक दूसरे पर कटाक्ष करने की जगह अगर इनके अंदर के वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक तथ्यों पर स्वस्थ चर्चा करते तो हम सबका बौद्धिक विकास होता। आमलोगों को नए नज़रिए से चीजों को देखने की प्रेरणा मिलती। लेकिन मुझे लगता है कि सारी चीजें अंततः राजनीति पर आकर टिक जाती हैं। नास्तिकता और आस्तिकता के आधार पर जनता को विभाजित करने का मकसद ज्यादा होता है। स्वस्थ बहस और लोक शिक्षण का मकसद कम होता है। यही विडंबना है।

रविवार, 11 नवंबर 2018

ईरान से तेल खरीदने में भारत के लिए 5 फायदे


-अभिमन्यु कोहाड़

अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाये गए प्रतिबंध 4 नवम्बर से लागू हो गए हैं। इन प्रतिबंधों के तहत अगर कोई भी देश ईरान के साथ व्यापार करता है तो उस देश की कंपनियों पर अमेरिका कड़ी पाबंदी लगाएगा और वो कंपनियां अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी। अमेरिका द्वारा सभी देशों पर ईरान से तेल न खरीदने का दबाव डाला जा रहा है। भारत ने उस दबाव के सामने झुकने से मना कर दिया है। ईरान पर यह प्रतिबन्ध अमेरिका ने लगाए हैं, संयुक्त राष्ट्र एवम यूरोपियन यूनियन इन प्रतिबंधों का समर्थन नहीं कर रही है। भारत सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को मानता है इसलिए भारत ने अमेरिका के इन प्रतिबंधों को मानने से मना कर दिया है। कल अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ ने भारत, रूस, चीन व इटली समेत 8 देशों को प्रतिबन्ध से छूट देने का फैसला किया है।

ईरान से तेल खरीदने में भारत को 5 फायदे हैं -

1). भारत ईरान के तेल का भुगतान रुपयों में करेगा जिस से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अधिक मजबूत होगा।

2). जब हम डॉलर में व्यापार करना बंद कर देंगे तो डॉलर के मुकाबले रुपया और उसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था स्वयं मज़बूत हो जाएंगे।

3). विदेश नीति के के लिहाज से ईरान के साथ मजबूत सम्बन्ध रखने के भारत को अनेक फायदे हैं। ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिये भारत अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया के अनेक देशों के साथ व्यापार आसानी से कर सकता है।  पाकिस्तान व सऊदी अरब के बढ़ते रिश्तों को ध्यान में रखते हुए ईरान के साथ मज़बूत रिश्ते रखना भारत के लिए सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

4). तेल व्यापार में फ्री इंश्योरेंस व शिपिंग जैसी सुविधाएं ईरान द्वारा भारत को दी जाती हैं, तेल का भुगतान करने के लिए ईरान द्वारा भारत को 60 दिन की समयसीमा भी दी जाती है जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक है।

5). दुनिया में अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती देने से विश्व-जगत में भारत का मान-सम्मान बढेगा और भारत की पहचान दुनियाभर में ऐसे राष्ट्र के तौर पर बढ़ेगी जो किसी विश्व-शक्ति के दबाव में काम नहीं करता है।

इसलिए भारत को अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुकना चाहिए और ईरान से तेल खरीदना जारी रखना चाहिए।

(लेखक विदेशी मामलों के जानकार व रक्षा विशेषज्ञ हैं)

ब्रह्मभट्ट महासभा ने मनाया दिवाली मिलन समारोह



रांची। झारखंड प्रदेश ब्रह्मभट्ट महासभा की ओर से रांची के होटल सिटी पैलेस में दिवाली मिलन समारोह का आयोजन किया गया ।कार्यक्रम की अध्यक्षता महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष कंचन महाराज ने की । पूर्व न्यायाधीश श्री बालमुकुंद राय,अजय शर्मा, मनोरंजन प्रसाद, नवीन राय,,अजय राय,बिस्वनाथ सिंह, जगदीश राय,मनोज राय,दिनेश शर्मा, सतेन्द्र राय,बी.आर महाराज, लोकनाथ शर्मा, जवाहर पांडेय,गणेश कुमार शर्मा, सुनील कुमार, अनुज कुमार सहित अन्य स्वजनं शामिल हुए और एक दूसरे को दीवाली और छठ पूजा की बधाई दी ।
मिलन समारोह के दौरान यह भी निर्णय लिया गया कि झारखंड प्रदेश ब्रह्मभट्ट महासभा की ओर से रांची में आगामी दिसम्बर माह में  एक राज्यस्तरीय कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा जिसकी तिथि और पुरी कार्यक्रम की  घोषणा छठ पुजा के बाद की जायेगी ।साथ मेंबरशिप ,ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन, भवन का भूमि पूजन आदि मामलों पर भी चर्चा की गई

सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने का रिकार्ड रघुवर सरकार के नाम


                    स्थापना दिवस पर विशेष

झारखंड स्थापना दिवस की तैयारी बैठक को संबोधित करते मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी

देवेंद्र गौतम
रांची। रघुवर दास झारखंड के पहले नेता हैं जो मुख्यमंत्री के रूप में लगातार राज्य का पांचवां स्थापना दिवस मनाने जा रहे हैं। 18 वर्षों के झारखंड में वे झारखंड के 10 वें मुख्यमंत्री हैं। राज्य गठन के 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इतने वर्षों में पहली बार कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है। रघुवर दास इस मायने में भाग्यशाली रहे कि उन्हें बहुमत पर आधारित
एक स्थिर सरकार मिली। हालांकि पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री होने के नाते उनके समक्ष जनता का विश्वास जीतने की गंभीर चुनौती थी। राजनेताओं की एक लाबी उनकी गतिविधियों पर तीखी नज़र गड़ाए हुए थी। उन्हें कटघरे में खड़ा करने की निरंतर कोशिशें होती रहीं। लेकिन वे पूरे धैर्य के साथ अपने काम में लगे रहे। उनके शासन काल में भ्रष्टाचार या घोटाले का कोई आरोप नहीं लगा। उनकी कुर्सी को न कभी कोई चुनौती मिली, न उन्हें सत्ता में बने रहने की चिंता करने की जरूरत पड़ी। इसीलिए उनका पूरा ध्यान विकास कार्यों की ओर केंद्रित रहा। जो कार्य पूरे हुए उनका विवरण और जो अधूरे हैं उनका कारण वे जनता से साझा भी करते रहे। कुछ महीने पूर्व बिजली की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई थी। उत्पादन और आपूर्ति के बीच संतुलन बिगड़ गया था। थर्म प्लांटों की कई यूनिटें कोयले के अभाव में बंद पड़ी थीं। लेकिन मुख्यमंत्री ने स्थिति पर काबू पा लिया और अब वे जुलाई 2019 तक निर्बाध बिजली आपूर्ति के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। अभी तक चार जिले शत-प्रतिशत विद्युतीकृत हो चुके हैं। शेष जिलों में विद्युतीकरण का काम तेजी से चल रहा है। इससे पहले जितने भी मुख्यमंत्री आए उनकी कुर्सी निरंतर डोलती रही और उनकी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा उसे बचाने में व्यय होता रहा। उन्हें समय से पूर्व गद्दी से हटना भी पड़ा। इस हिसाब से रघुवर दास लगातार सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।
      यही कारण है कि इस बार स्थापना दिवस समारोह को पहले से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ और कहीं ज्यादा भव्य तरीके से मनाया जा रहा है। 15 नवंबर की की शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम में झारखंड की जनता फिल्मी दुनिया के मशहूर गायक सुरेश वाडकर और गायिका कविता कृष्णमूर्ति की सुरीली आवाज सुनेगी। वहीं जिला स्तर पर भी असम का बिहू नृत्य, बिहार की कजरी, गुजरात का डांडिया और बंगाल के कलाकारों की कला का प्रदर्शन होगा। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग मुख्य समारोह में ग्रामीण विद्युतीकरण और खुले में शौच से मुक्त होने की दिशा में मिली उपलब्धियों पर लघु फिल्म प्रदर्शित करने जा रहा है। वहीं 13 से 15 नवंबर तक सरकारी भवनों और महत्वपूर्ण चौक-चौराहों पर आकर्षक विद्युत साज-सज्जा की जा रही है। समारोह स्थल पर निर्बाध विद्युत आपूर्ति, ध्वनि विस्तारक यंत्र, पेयजल की व्यवस्था, शौचालय की समुचित व्यवस्था, चिकित्सीय व्यवस्था आदि की जिम्मेवारी संबंधित विभागों के लोग उठाएंगे। इसके अलावा योग्य व्यक्तियों को झारखंड सम्मान से नवाजा जाएगा। साथ ही विभागवार शिलान्यास और लोकार्पण वाली योजनाओं की प्रकृति तय की गई। इसके साथ नव चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र, लाभुकों के बीच परिसंपत्ति का वितरण, कृषि विभाग द्वारा किसानों पर केंद्रित कार्यक्रमों, शत प्रतिशत विद्युतीकृत होनेवाले जिले और पूरे राज्य को खुले में शौचमुक्त घोषित करने की तैयारियों की गई हैं। स्थापना दिवस की सुबह प्रभातफेरी निकाली जाएगी। इस मौके पर मुख्यमंत्री आमंत्रण फुटबॉल प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा।
इस मौके पर सचिवालयों के गलियारे की सूनी दीवारें गुलजार होंगी। जिस गलियारे में जिस विभाग का दफ्तर होगा, वहां उस विभाग से जुड़ी परियोजना और कार्यक्रमों की फ्रेम की गई तस्वीरें लगाई जाएंगी। इससे गलियारे से गुजरनेवालों के सामने उस विभाग के काम-काज और उपलब्धियां मुखर हो उठेंगी। मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी आयोजन की तैयारी का स्वयं जायजा ले रहे हैं। उन्होंने विभागीय सचिवों को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से समन्वय कर इसे अमलीजामा पहनाने का निर्देश दिया।
स्थापना दिवस समारोह के इस जोशो-खरोश की एक वजह यह भी है कि वर्ष 2000 में झारखंड अलग राज्य बनने के बाद 2014 तक लगातार सूबे में राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा। इस बीच दस बार मुख्यमंत्री बदले गए। तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगाया गया। सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड शिबू सोरेन के नाम रहा। 2005 में वे मात्र 2 मार्च से 12 मार्च तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे थे। बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया था।
इस स्थापना दिवस पर रघुवर सरकार एक हज़ार योजनाओं का शिलान्यास करने वाली है। एक हज़ार खुले में शौच से मुक्त पंचायतों की घोषणा की जाने वाली है। सरकार की 101 उपलब्धियों का पत्रक भी जारी किया जाने वाला है।
2014 में रघुवर दास की सरकार सत्ता में आई थी, तब राज्य की विकास दर करीब 4.6 फीसदी थी। अब यह दहाई का आंकड़ा छूने को है। इसी तरह 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' के मामले में झारखंड देश में तीसरे नंबर पर है। इसी आधार पर निवेश हो रहे हैं। ज़ाहिर है कि रघुवर सरकार तेजी से विकास का दावा करने की स्थिति में हैं।

बाक्स
अब तक के मुख्यमंत्री

15 नवम्बर 2000 से 18 मार्च 2003, बाबूलाल मरांडी, भाजपा
18 मार्च 2003 से 2 मार्च 2005, अर्जुन मुंडा, भाजपा
2 मार्च 2005 से 12 मार्च 2005, शिबू सोरेन, झामुमो
12 मार्च 2005 से 18 सितंबर 2006, अर्जुन मुंडा, भाजपा
18 सितंबर 2006 से 28 अगस्त 2008, मधु कोडा, निर्दलीय
28 अगस्त 2008 से 18 जनवरी 2009, शिबू सोरेन, झामुमो
19 जनवरी 2009 से 29 दिसम्बर 2009, राष्ट्रपति शासन
30 दिसम्बर 2009 से 31 मई 2010, शिबू सोरेन, झामुमो
1 जून 2010 से 10 सितम्बर 2010, राष्ट्रपति शासन
11 सितम्बर 2010 से 18 जनवरी 2013, अर्जुन मुंडा, भारतीय जनता पार्टी
18 जनवरी 2013 से 13 जुलाई 2013 राष्ट्रपति शासन
13 जुलाई 2013 से 23 दिसम्बर 2014, हेमंत सोरेन, झारखंड मुक्ति मोर्चा
28 दिसम्बर 2014 से वर्तमान काल तक, रघुवर दास, भारतीय जनता पार्टी


अब तक के राज्यपाल

1. प्रभात कुमार- 15 नवंबर 2000 से 3 फरवरी 2002 तक
2. विनोदचंद्र पांडे (अतिरिक्त प्रभार)- 4 फरवरी 2002 से 14 जुलाई 2002 तक
3. एम रमा जोइस- 15 जुलाई 2002 से 11 जून 3003 तक
4. वेद मारवाह- 12 जून 2003 से 9 दिसंबर 2004 तक
5. सैय्यद सिब्ते रजी-10 दिसंबर 2004 से 25 जुलाई 2009 तक
6. के शंकरनारायण- 26 जुलाई 2009 से 21 जनवरी 2010 तक
7. एम ओ हसन फारुक मारिकार- 22 जनवरी 2010 से 3 सितंबर 2011 तक
सईद अहमद- 4 सितंबर 2011 से 18 मई 2015 तक
द्रौपदी मुर्मु-18 मई 2015 से वर्तमान तक





हर हाल में होगा आदिवासी संस्कृति का संरक्षणःरघुवर दास


रांची। मुख्यमंत्री रघुवर दास  आज बोकारो जिला से आये आदिवासी पारंपरिक व्यवस्था के प्रतिनिधि माझी हड़ाम, नायकी, जोगमाझी, भोदरन व कुड़ाम नायके से अपने आवास पर मिले। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति के सरंक्षण के लिए कृतसंकल्पित है। विदेशी शक्तियां हमारी संस्कृति को नष्ट करने पर तुली है, लेकिन हमारी सरकार उनके मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगी। हमारी परंपरा और संस्कृति को बचाये रखनेवाले  पारंपरिक धर्म गुरुओं को जनवरी से सम्मान राशि मिलनी शुरू हो जायेगी। विभाग से चर्चा कर उन्हें पहचान पत्र निर्गत करने की भी प्रक्रिया शुरू की जायेगी।

आदिवासी भाषाओं को मिलेगा बढ़ावा
सीएम रघुवर दास ने कहा कि सरकार का मानना है कि मातृभाषा सर्वोपरि है। सरकार इसे बढ़ावा दे रही है। हमें अपनी भाषा, सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को छोड़ना नहीं है। 2019 से ओल चिकी भाषा में स्कूलों में पढ़ाई शुरू कर दी जायेगी। इसके लिए किताबें छपकर आ गयी है। अभी पहली और दूसरी कक्षा में इसकी पढ़ाई होगी। आनेवाले दिनों में पांचवीं तक ओल चिकी भाषा में पढ़ाई होगी। स्कूलों में स्थानीय भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया भी चल रही है। ओल चिकी के अलावा कुडुख, मुंडारी आदि भाषाओं के शिक्षकों की भी नियुक्ति की जा रही है, ताकि हमारे बच्चे अपनी भाषा में पढ़ाई कर सकें।

 प्रतिनिधियों की रजरप्पा में भवन की मांग पर मुख्यमंत्री ने कहा कि वहां एक तीन मंजिला इमारत बन रही है, जहां सस्ती दर पर ठहरने व खाने की व्यवस्था रहेगी। राज्य में घेराबंदी से बचे बाकी धार्मिक व पारंपरिक स्थलों की घेराबंदी के लिए अगले साल के बजट में प्रावधान किया जायेगा। अपनी परंपरा और संस्कृति को बचाये रखने के लिए सभी को एकजुट होकर काम करना होगा। विदेशी शक्तियां उनकी परंपरा और संस्कृति को नष्ट करने में लगी हुई है। लालच, भय, अंधविश्वास आदि के चक्कर में कोई धर्म परिवर्तन न कराये, इसके लिए सरकार ने कानून बनाया है। आदिवासी समाज के प्रबुद्ध लोग भी इस बारे में जागरुकता फैलायें। लुगु बुरु मेले को राजकीय मेला घोषित किया है। वहां टेंट सिटी बनायी जा रही है, ताकि हमारे आदिवासी श्रद्धालुओं को खुले आसमान के नीचे रात न बितानी पड़े। वहां पानी, बिजली आदि की व्यवस्था की जा रही है। राज्य पर पलायन का कलंक लगा हु‍आ है। हमारी बच्चियों का आर्थिक और शारीरिक शोषण होता है। किसी सरकार ने उनकी सुध नहीं ली। हमारी बेटियों का पलायन न हो, इसके लिए हमारी सरकार काम कर रही है। उन्हें यहीं रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया गया है। इसके नतीजे दिख रहे हैं। राज्य के आदिवासी युवाओं को आर्थिक सहायता देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोग ये आरोप लगाते हैं कि सरकार उनकी जमीन लूट लेगी। चार साल के शासन में एक भी इंच जमीन नहीं ली गयी है। जो लोग आदिवासियों का शोषण करते हैं, जिन लोगों ने राज्य में हर जगह आदिवासियों की जमीन औने-पौने दाम में खरीदी है, वे ही आज हम पर आरोप लगा रहे हैं। चुनौती देता हूं कि मेरा जमशेदपुर में एक घर के अलावा कोई संपत्ति बताये। 1995 से विधायक हूं, लेकिन गड़बड़ी नहीं की। वहीं हम पर आरोप लगानेवाले नेताओं में आदिवासियों की संपत्ति के लूटेरों का नाम और उनके द्वारा पूरे राज्य में अर्जित की गयी संपत्ति की सूची है। वे नहीं चाहते है कि आदिवासियों का विकास हो। आदिवासी पढ़-लिख गये, तो उनकी वोट बैंक की राजनीति समाप्त हो जायेगी।

कार्यक्रम के दौरान बोकारो से आये परंपरागत धर्मगुरुओं ने मुख्यमंत्री के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें राज्य के माझी हड़ाम की उपाधि से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयास से आदिवासी परंपरा को मजबूती मिलेगी। उनके रीति रिवाज कायम रहेंगे। गांव की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलेगी। प्रतिनिधिमंडल ने लुगु बुरू मेले को राजकीय महोत्सव के रूप में मान्यता देने पर विशेष तौर पर बधाई दी। 

कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता  लखी हेंब्रम, आनंद मुर्मू समेत बड़ी संख्या में गण्यमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

चड़री तालाब में उतरेंगी मां गंगा


40 हजार लीटर गंगा जल वितरित किया जायेगा छठव्रतियों के बीच
14 को होगा जतरा महोत्सव सह रंगारंग कार्यक्रम, महाभंडारा 15 को

रांची। छठ व्रतियों के लिए चड़री तालाब की साज-सज्जा शुरू हो गयी है। चड़री सरना समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों की बैठक रविवार को तालाब घाट के प्रांगण में हुई, जिसमें छठ पर्व की तैयारियों पर समीक्षा की गयी। समिति के मुख्य संरक्षक जितेन्द्र सिंह, अध्यक्ष बबलु मुंडा और महासचिव रवि मुंडा ने तैयारियों के संबंध में पत्रकारों को बताया कि इस बार छठ व्रती यहां मां गंगा का अनुभव करेंगे। इसके लिए पटना स्थित गंगा घाट से 40 हजार लीटर गंगा जल मंगवाया जा रहा है, जो छठव्रतियों के बीच अर्घ्य के लिए वितरित किये जायेंगे। समिति का यह प्रयास होगा कि छठ व्रतियां मां गंगा का अनुभव करें तथा भयमुक्त वातावरण में पुजा करें। यहां भगवान भास्कर की विशाल प्रतीमा स्थापित की जायेगी। जहां छठव्रती अपने अराध्यदेव का दर्शन एवं पुजन कर सकेंगे। बैठक की अध्यक्षता चड़री सरना समिति के अध्यक्ष बबलु मुंडा ने की।
बैठक में निर्णय हुआ कि छठ के दूसरे दिन यानी 14 नवंबर को हर साल की भांति इस साल भी जतरा महोत्सव (जो पूर्व से 'रांची कोल जतरा महोत्सव' के नाम से जाना जाता था) धूमधाम से आयोजित की जायेगी। रात्रि में रंगारंग (आर्केस्टा) कार्यक्रम होगा। अगले दिन 15 नवंबर को तालाब परिसर में भगवान भास्कर का महाभंडारा होगा। जिसमें हजारों की संख्या में लोग शिरकत कर प्रसाद ग्रहण करेंगे।
बबलु मुंडा ने प्रशासन से मांग किया कि छठ में अर्घ्य देने बड़ी संख्या में छठव्रती और उनके परिवार के लोग पहंुचते हैं। तालाब गहरा है। लोग स्नान करने तालाब में प्रवेश करते हैं। ऐसे में लोगों का ध्यान रखने के लिए पहले से अधिक एनडीआरएफ टीम के सदस्यों की तैनाती की जाये। साथ ही दो नाव दिये जायें, जो पूरी तरह से बचाव साज-सज्जा के साथ तैनात हो। पर्याप्त संख्या में पुलिस बल के जवान रहें।
जितेन्द्र सिंह ने कहा कि समिति के सैकड़ों वोलेंटियर तालाब के चप्पे-चप्पे पर रहेंगे और उनका काम छठव्रतियों और धर्मावलंबियों को सुविधा प्रदान करना होगा।
रवि मुंडा ने कहा कि हर साल की भांति इस साल भी तालाब को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है। साज-सज्जा और साउंड सिस्टम चारों तरफ लगाये जायेंगे। किसी को कोई परेशानी न हो, उसका समिति पूरा ध्यान रखेगी।
बैठक में मुख्य रूप से छठ पुजा समिति के अध्यक्ष सबलू मुंडा, समाजसेवी जय सिंह यादव, गांडीव सांध्य दैनिक के सुनील पांडेय, आचार्य शशिकांत मिश्रा, धाना नायक, सागर कच्छप, राहुल मुंडा, शांतनु कुमार, विक्की वर्मा, दानिश मुंडा, संदीप मुंडा, विक्की मुंडा, अमनदीप मुंडा, भीम मुंडा, प्रकाश मुंडा, राजेन्द्र मुंडा, दुर्गा तिर्की आदि उपस्थित थे।

अरगोड़ा में खुला भगवान सूर्य का मंदिर


प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए सुबोधकांत सहाय
राजधानी के छठव्रतियों को शुभकामनाएं दीं 
रांची। 11 नवंबर रविवार को अरगोड़ा तालाब पर नवनिर्मित श्री सूर्य मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री सह वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुबोधकांत सहाय ने प्रतिमा का पट खोल इसे आम दर्शनार्थियों को समर्पित किया। इस अवसर पर श्री सहाय ने कहा कि भगवान भुवन भास्कर की कृपा से समस्त विश्व का कल्याण होता है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि अरगोड़ा में स्थापित यह आकर्षक मंदिर राजधानी रांची में श्रद्धा एवं आराधना के प्रमुख केंद्र में रूप में विकसित होगा।
श्री सहाय ने नहाय-खाय के साथ छठ व्रत का संकल्प लेने वाले समस्त व्रतियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह तप और साधना का अनूठा व्रत है, जिसका उद्देश्य सर्वजन का कल्याण है। उन्होंने व्रतियों से आग्रह किया कि वे राज्य के विकास के लिए भगवान से प्रार्थना करें। इस मौके पर मंदिर का निर्माण कराने वाले श्री शिव दुर्गा ट्रस्ट के वरीय पदाधिकारी सुनील साहू, अवध साहू, राजकुमार, प्रकाश साहू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
इसके पहले मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने किया था।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...