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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

समाजसेवा के प्रति समर्पित हैं सैयद हसनैन जैदी


* सही मायने में वही समाजसेवी समाज के प्रति समर्पित हैं जो नेकी कर दरिया में डाल के सिद्धांतों पर चलते हैं। अपना कर्म करते रहें, फल की चिंता न करें। इन सिद्धांतों के हिमायती रहे हैं राजधानी के हिंदपीढ़ी स्थित ग्वालाटोली निवासी लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सैयद हसनैन जैदी। वह पीड़ितों व गरीबों के सहायतार्थ सदैव तत्पर रहते हैं। परोपकार करना उनकी दिनचर्या में शुमार है। हसनैन जैदी की प्रारंभिक शिक्षा पलामू जिले के बरवाडीह से हुई। राजधानी रांची स्थित मौलाना आजद कॉलेज से उन्होंने इंटरमीडिएट किया। स्नातक की पढ़ाई के लिए पटना गए, लेकिन कतिपय कारणों से आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सके। उनके पिता स्व. सैयद तौकीर हुसैन जैदी रेलकर्मी  थे। वह भी सेवानिवृति के बाद सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। हसनैन जैदी को समाजसेवा की प्रेरणा अपने पिता से मिली। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने व्यवसाय शुरु किया। पेशे से व्यवसायी हसनैन बचपन से ही दयालु प्रवृति के रहे हैं। किसी की पीड़ा देखकर द्रवित हो जाना और उसकी सहायता में  जुट जाना उनकी आदतों में शुमार है। वह समाजसेवा को सर्वोपरि समझते हैं। सभी धर्मों को समान आदर देना, विभिन्न धर्मों के धार्मिक आयोजनों के अवसर पर  सेवा शिविर लगाकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करना उनकी खासियत है। हर साल वह हज के समय आजमीने हज की सुविधा के लिए मक्का-मदीना में सेवा शिविर का आयोजन करते हैं। यह धर्म के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक है। पूरे विश्व से आनेवाले हजयात्रियों को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसका वह ध्यान रखते हुए शिविर लगाते हैं। मुख्य रूप से उनका सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्षेत्र यूं तो उनके पैतृक निवास स्थान झारखंड के हुसैनाबाद प्रखंड अंतर्गत है, लेकिन समाजसेवा के क्षेत्र में उनका बृहत दायरा है। जाड़े के दिनों में वह अपने वाहन में कंबल व अन्य गर्म वस्त्र साथ लेकर चलते हैं। कहीं भी ठंढ से ठिठुरते गरीब पर नजर पड़ी तो उन्हें कंबल व अन्य गर्म वस्त्र दानस्वरूप दे देते हैं। वह एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल से भी जुड़े हैं। उनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र हुसैनाबाद प्रखंड है। वह समाजसेवा को सर्वोपरि मानते हैं। हसनैन जैदी कहते हैं कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाजसेवा करनी चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में रहते हुए समाज को लाभान्वित करने से राजनीति का मकसद पूरा हो जाता है। वह दानवीर भी हैं। रांची के ओरमांझी प्रखंड अंतर्गत कुच्चू गांव में कब्रिस्तान के लिए कम पड़ रही जमीन के बारे में उन्हें जब जानकारी मिली तो उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन सहित अन्य जमीन क्रय कर कब्रिस्तान निर्माण के लिए तकरीबन 50 डिसमिल जमीन दान में दी। वह कहते हैं कि जनता के बीच समाजसेवी के रूप में कार्य कर रहा हूं। जनता ने जनप्रतिनिधि बनने का अवसर दिया तो उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। समाज के प्रति अपने संदेश में वह कहते हैं कि सभी जाति, धर्म व संप्रदाय के लोगों को देश की एकजुटता व अखंडता के लिए प्रयासरत रहने की आवश्यकता है। इससे राष्ट्र सशक्त होता है।
प्रस्तुति : नवल किशोर सिंह

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

स्लम एरिया में शिक्षा का अलख जगा रहे डॉ.केपी डे


* रामकृष्ण मिशन व अन्य संस्थाओं का मिल रहा सहयोग।
रांची। कुछ लोग अपने जीवन में परोपकार को सर्वोपरि मानते हैं। समाजसेवा में जीवन समर्पित कर देते हैं। इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ नहीं होता। ऐसे ही एक शख्स हैं एच ई सी परिसर स्थित जगन्नाथपुर झोपड़ी (स्लम एरिया)क्षेत्र के निवासी डॉ.केपी डे। डॉ.डे वर्ष 1982 में पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिला से रांची आए। जगन्नाथपुर क्षेत्र के योगदा सत्संग महाविद्यालय से होमियोपैथी चिकित्सा की डिग्री ली। इसके बाद उसी क्षेत्र में होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति से मरीजों का इलाज करने लगे। कुछ दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। डॉ. साहब की ख्याति उनकी व्यवहारकुशलता और बेहतर इलाज के कारण बढ़ने लगी। जगन्नाथपुर क्षेत्र मे अधिकतर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग रहते हैं। स्लम एरिया है। आदिवासी और पिछड़े तबके के लोग अधिक हैं। डॉ. डे ने अत्यंत पिछड़े व गरीबों का इलाज नि:शुल्क करना शुरू किया। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी सेवा और गरीबों के प्रति उनके दयाभाव की चर्चा चहुंओर होने लगी। इस दौरान उन्होंने देखा कि स्लम एरिया में शिक्षा का अभाव है। बच्चों के अभिभावकों को भी अपने बच्चों को पढ़ाई की तनिक भी चिंता नहीं है। बच्चों के मां-बाप नशापान के आदि हैं। पूरे क्षेत्र में हड़िया-दारू की संस्कृति हावी है। इससे आदिवासी और अन्य पिछड़े समुदाय के लोगों का विकास बाधित हो रहा है। शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं है।
 यह सब देखकर उनके मन में इस क्षेत्र के बच्चों को शिक्षित करने की इच्छा जगी। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र की सेवाएं अपने सहयोगी मित्रों के हवाले कर बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। इस क्रम में वर्ष 1992 में जगन्नाथपुर के स्लम एरिया में स्थित एक छोटे से कमरे में बिरसा शिक्षा निकेतन नामक स्कूल की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्हें अभिभावकों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। डॉ. डे सुबह उठकर बच्चों को घर से बुलाकर स्कूल लाया करते, जबकि बच्चों के अभिभावक (माता पिता) नशा का सेवन कर घरों में सोये रहते थे।  डॉ. डे ने नशाखोरी के विरुद्ध भी अभियान  शुरु किया। नशा मुक्त समाज की परिकल्पना के साथ स्लम एरिया में जागरूकता फैलाने लगे। शुरू में तो उन्हें काफी विरोध और ताने का सामना करना पड़ा। लेकिन इससे बेपरवाह वह अपने मुहिम में लगे रहे। धीरे धीरे उनका प्रयास रंग लाने लगा। क्षेत्र में हड़िया-दारू की संस्कृति पर काफी हद तक  लगाम लगा। नशा पान के विरोध में भी लोग जागरूक हो रहे हैं। बिरसा शिक्षा निकेतन में वर्तमान में लगभग सात सौ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को संस्कार युक्त शिक्षा देने में डॉ. डे प्रयासरत हैं। स्कूल की प्राचार्या रीता संध्या टोप्पो व अन्य शिक्षक काफी परिश्रमी हैं। उनकी लगन व परिश्रम से स्कूल के बच्चे शिक्षित हो रहे हैं। इस स्कूल से पढ़कर निकले कई बच्चे रांची के प्रतिष्ठित स्कूलों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं। आज हर वर्ग के बीच डॉ. डे के इस प्रयास की सराहना की जाती है। स्कूल का संचालन सामान्य शुल्क और सामाजिक सहयोग से होता है। डॉ. डे बताते हैं कि समय समय पर रामकृष्ण मिशन, सार्वजनिक उपक्रम सेल, मेकॉन,भारतीय स्टेट बैंक, हटिया शाखा, लायंस क्लब, रोटरी क्लब मिडटाउन, एच ई सी व एच ई सी महिला समिति सहित अन्य संस्थाओं की ओर से स्कूल को संसाधनों से लैस करने में सहयोग किया जाता है। वह बताते हैं कि शिक्षा के बिना समाज का विकास संभव नहीं है। बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्हें शिक्षित होना जरूरी है। इस दिशा में सरकारी व गैर सरकारी दोनों स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा नशा मुक्त समाज का होना भी जरूरी है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि लोगों को सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत को अपनाने की आवश्यकता है। इससे समाज और राष्ट्र सशक्त होगा।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

ज़िंदगी मिलेगी दोबारा ने एक साल में 1500 शवों को घर पहुंचाया

 रांची। झारखंड की राजधानी रांची में जिंदगी मिलेगी दोबारा फाउंडेशन की शुरुआत 5 नवंबर 2017 को हुए थी अपने 1 साल से भी कम समय में संस्था ने 1500  से भी अधिक शवों और मरीज़ों को घर तक पहुँचाने का काम कर चुका है। जिंदगी मिलेगी दोबारा फाउंडेशन का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को फ्री में एंबुलेंस सेवा मुहैया करना है ताकि गरीब और जरूरतमंद शवो को सम्मान के साथ उसके घर तक पहुंचाने में सहायता दी जाए अपने 10 महीने के कार्यकाल में लगभग 1,500 सौ लोगो को फ्री एंबुलेंस सेवा दी। साथ ही साथ एम्बुलेंस में मुफ्त में बोतलबंद पानी,फोन तक की भी सुविधा दी जा रही है ताकि दुख के घड़ी में किसी तरह की परेसानी ना हो ...संस्था ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए फ्री एम्बुलेंस के साथ साथ मरीज के परिजनों को उसके साथ घर ले जाने के लिए एक पौधा भी दे रही है ताकि पर्यावरण हरा भरा रखा जा सके....

जिंदगी मिलेगी दोबारा फाउंडेशन का उद्देश्य गरीबों की सेवा करना है इस वजह से सुरुआत में 100 किलोमीटर की दूरी रखी गई थी लेकिन बहूत से ग़रीब मरीज़ जो झारखंड के बाहर से जो 100 किलोमीटर दूरी से भी आते थे और वे इतने ग़रीब थे की उतनी दूर की वजह से अपने मरीज़ों को नहीं ले जा सकते थे.. लेकिन संस्था ने अपने नियम को तोड़ कर 100 किलोमीटर दूरी से भी अधिक का सफ़र तय करके की सुरुआत की थी.. जिसमे मरीज़ों और शवों को कलकत्ता ,बिहार ,पटना ,पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहा,दुमका,गोड्डा,बंगाल , देवघर जैसे शहरों के अलावे 500 किलोमीटर से भी ऊपर की दूरी तय करके उनहे उनके घर तक पहुचाँया ....जिंदगी मिलेगी फाउंडेशन ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी सेवा मानवता के नाते इमानदारी से संस्था के द्वारा करते आई है और इसमे संस्था के सभी मेंबरों की बड़ी अहम भूमिका रही है सभी ने इस संस्था को चलाने में अपना पूरा सहयोग दिया है फिलहाल 4 एम्बुलेंस की सहायता सें रिम्स में रह कर फ्री एम्बुलेंस से ग़रीब मरीज़ों को सहायता के रूप में दी जा रही है|

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें *9709500007

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...