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बुधवार, 13 जून 2018

कोहेनूर न सही, नीरव और माल्या तो लौटा दे ब्रिटेन



अंग्रेज जाते-जाते कोहेनूर हीरा समेत भारत के कीमती असबाब अपने साथ ले गए थे। उन्हें लौटाने की उसकी मंशा नहीं है। कीमती चीजें जिसके भी हाथ लग जाएतबतक लौटाना नहीं चाहता जबतक उसकी गर्दन न मरोड़ दी जाए। उसकी जान पर न बन आए। लेकिन हीरे-जवारात का प्रेमी ब्रिटेन माल्या और नीरव मोदी को क्यों अपने पास रखे हुए है। समझ से परे है। उसे कौन बताए कि नीरव हीरा व्यापारी है, हीरा नहीं। वह किसी संग्रहालय या अजायबघर की शोभा बढ़ाने लायक वस्तु नहीं है। विजय माल्या एक अय्याश व्यापारी है। वह शराब बनाता है लेकिन अंगूर की बेटी नहीं उसका बेटा है।
भारत सरकार बार-बार उन्हें वापस लौटाने का आग्रह कर रही है। ब्रिटेन के साथ प्रत्यर्पण संधि भी है। फिर बहानेबाजी क्यों...। उनकी जगह भारतीय जेलों में है ब्रिटेन के होटलों और क्लबों में नहीं। गनीमत है कि ब्रिटेन इस बात को स्वीकार कर रहा है कि भारतीय बैंकों का अरबों रुपया लेकर भागे हुए यह दोनों अपराधी उसकी पनाह में हैं। पाकिस्तान की तरह ओसामा बिन लादेन और दाऊद इब्राहिम जैसे मोस्ट वांटेड लोगों को छुपाकर उनके होने से इनकार नहीं कर रहा है। लेकिन उन्हें वापस मांगने पर ब्रिटेन का कहना है कि लाखों भारतीय वहां अवैध रूप से रह रहे हैं। भारत उन्हें भी वापस बुलाए।
अब उनसे कौन पूछे कि भारत में दो सौ वर्षों तक अंग्रेज कौन सा पासपोर्ट और वीजा लेकर रहे थे। भारत के जो लोग ब्रिटेन में रह रहे हैं वे कम से कम राजकीय कार्यों में तो दखल नहीं दे रहे। अपना वर्चस्व तो कायम नहीं कर रहे। वे अपराधी प्रवृत्ति के भी नहीं हैं। अगर हैं तो उन्हें भी माल्या और नीरव के साथ वापस भेजे। किसी भारतीय को इसपर आपत्ति नहीं होगी। जो गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं उन्हें भी कोई भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने नहीं भेजा है। उनपर कार्रवाई करने से कोई रोक नहीं रहा। उन्हें प्लेसमेंट एजेसी के दलालों ने नौकरी दिलाने के नाम पर भेजा है। इसके लिए पैसे लिए हैं। वे नौकरी के लिए गए हैं, कानून से बचने के लिए नहीं। माल्या वहां शान का जीवन जी रहा है और नीरव मोदी वहा के बैंकों में भारतीय बैंकों का पैसा ऱखकर राजकीय शरण मांग रहा है। ब्रिटेन सरकार इसपर विचार भी कर रही है। यह सिलसिला चल निकला तो भारतीय अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन जाएगा। क्या ब्रिटेन यही चाहता है।

-देवेंद्र गौतम

अपने ही भष्मासुरों से घिरा पाक



 देवेंद्र गौतम
पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां लोकतंत्र सैनिक तानाशाही के साए में सांस लेता रहा है। एक झीना सा पर्दा है जो कई बार चेहरे सा हट गया है और परोक्ष सैनिक सत्ता तानाशाही का मुलम्मा चढाए प्रत्यक्ष सर पर सवार हो गई है। पूरी दुनिया जानती है कि वहां जनता की चुनी हुई सरकारें सेना के रिमोट से नियंत्रित होती रही हैं। सेना के जनरलों ने भारत को सबक सिखाने के लिए आतंकवादियों को पाला पोसा। उन्हें धार्मिक कट्टरता की घूंटें पिलाईं। अब उसके पाले हुए आतंकी इस्लामिक कानूनों के मुताबिक देश को चलाना चाहते हैं। 
कट्टरपंथियों के बीच आपसी अंतर्विरोध भी कम नहीं हैं। बरेलवी, अहमदिया और शिया वहाबियों से खार खाते हैं तो उन्हें खुद अलकायदा और आईएस का खौफ सताता है। जनता के अंदर उन्होंने भारत के खिलाफ इतना जहर भरा है कि आज हर पाकिस्तानी दहशतजदा है। स्थिति भयावह होती जा रही है।
दरअसल पाकिस्तान की स्थापना ही अनैतिक 'द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुई थी। 28 जनवरी, 1933 को चौधरी रहमत अली ने इंग्लैंड में 'नाऊ ऑर नेवर: आर वी लिव ऑर पेरिश फार एवर शीर्षक पैंफलेट जारी किया था। उन्होंने पाकिस्तान का नाम पेश किया था। बाद में कुछ लोग इसे इस्लाम से भी जोड़कर देखने लगे। हालांकि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के दादा हिंदू थे। खुद जिन्ना भी पश्चिमी सभ्यता में ढले नास्तिक थे। इस्लाम में जो चीजें वर्जित  हैं ऐसी तमाम चीजों का वे बेधड़क सेवन करते थे। बाद में वही द्विराष्ट्र सिद्धांत के सबसे बड़े समर्थक बन गए। लेकिन वह पाकिस्तान को कभी भी एक धार्मिक रूप से कट्टर इस्लामी मुल्क नहीं बनाना चाहते थे। इस्लामीकरण की शुरुआत जिन्ना के गुजरने के बाद हुई जब लियाकत अली ने मार्च 1949 में ऑब्जेक्टिव रिजॉल्यूशन पेश कर इस्लामिक पाकिस्तान की बुनियाद रखी। कारण यह था कि लियाकत अली सहित पाकिस्तानी संविधान सभा के अधिकांश सदस्य भारतीय इलाकों से चुने गए थे। उनका पाकिस्तान का सपना तो पूरा हो गया लेकिन वहां उन्हें बाहरी के तौर पर देखा जा रहा था। उन्हें मुहाजिर कहा जाने लगा था। पाकिस्तान के लोग उन्हें दोबारा शायद ही चुनते। संविधान सभा के भारत से आए लोग समझते थे कि इस्लामीकरण के जरिए ही पाकिस्तान में सत्ता की राजनीति पर पकड़ बनाए रखी जा सकती थी। इसीलिए इस्लामिक देश घोषित कर मुल्ला-मौलवियों की ही के वर्चस्व का रास्ता खोलना उनके लिए आवश्यक हो गया था। उन्होंने यही नीति अपनाई।

बाद में लियाकत अली की हत्या कर दी गई। इसके बाद सेना के जनरल अयूब खान ने भी कट्टरपंथी ताकतों को प्रोत्साहित किया। उनके शासन काल में 1953 में अहमदिया मुसलमानों के खिलाफ दंगे भड़के। उस दंगे में 2,000 से अधिक अहमदिया मुसलमान मारे गए और 10,000 से अधिक बेघर हो गए। हालात काबू करने लिए पंजाब में मार्शल लॉ लगाना पड़ा। इससे जनरलों को सत्ता का स्वाद लग गया और फिर उन्होंने अक्टूबर 1958 में देश पर मार्शल लॉ थोप दिया। जल्द ही पाकिस्तान इस्लाम, सेना और अमेरिकी इम्दाद पर जीनेवाला परजीवी मुल्क बनकर रह गया।

इसके बाद जब जुल्फिकार अली भुट्टो लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर सत्ता में आए तो प्रारंभ में एक उदारवादी, पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे शिक्षित कुलीन वर्ग के नेता थे। लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान पर पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने भी कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा दिया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में इस्लाम के नाम पर भीषण रक्तपात मचाया। भुट्टो ने सेना पर लोकतांत्रिक सत्ता की पकड़ बनाने की कोशिश की, पर नाकाम रहे। जुलाई, 1977 में सेना ने उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया। इस घटना को उन्हीं के नियुक्त किए  जनरल जिया उल हक ने अंजाम दिया। अप्रैल 1979 में जिया ने भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया। कट्टर इस्लामी सोच वाले जिया के आने से पाक सेना के साथ ही नागरिक समाज का भी तेजी से इस्लामीकरण हुआ। 1980 के दशक में उन्होंने आइएसआई के माध्यम से ऑपरेशन तुपाक शुरू किया। यह कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को भड़काने वाली त्रिस्तरीय कार्ययोजना थी। इसका मकसद भारत को टुकड़ों में बांटना था। इसके तहत आईएसआई ने लश्कर-ए-तोएबा जैसे छह आतंकी समूहों का गठन किया।

1980 के दशक में अफगान युद्ध ने पाकिस्तान के सियासी एवं सैन्य परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। अपने सामरिक लक्ष्यों के लिए इस्लामाबाद खुद अमेरिका की अगुआई में चल रही लड़ाई में एक पक्ष बन गया। उसका मकसद अफगानिस्तान में पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ाना था ताकि भारत के असर को कम किया जा सके। जिया ने कट्टर इस्लामी विचारधारा को प्रोत्साहन देने के साथ ही उदारवादी राजनीतिक समूहों और कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसा। पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के इस हनन पर पश्चिमी जगत भी आंखें मूंदे रहा, क्योंकि जिया अफगानिस्तान में अमेरिका के छद्म युद्ध में मददगार बने हुए थे। सोवियत संघ से लड़ाई के लिए 1980 के दशक में जिया ने जिन इस्लामी चरमपंथियों को जन्म दिया, आज वही पाकिस्तान में उन्माद फैला रहे हैं। आज का पाकिस्तान तानाशाह जनरल जिया की नीतियों की ही छाया मात्र बना हुआ है, जिसे उनके बाद बेनजीर भुट्टो एवं नवाज शरीफ ने और आगे बढ़ाया।

आज पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था लुंजपुंज हो चुकी है। हिंसा और दहशत का माहौल बना हुआ है। तमाम वैश्विक नेता उसे एक नाकाम मुल्क करार दे रहे हैं। पाकिस्तान आतंक के मोर्चे पर दोहरी नीति पर चल रहा है। एक तरफ वह आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाता है तो दूसरी तरफ तालिबान और कश्मीर में सक्रिय आतंकियों को मदद पहुंचाता है। अब अमेरिका भी उसके दोहरो चरित्र को समझ चुका है। उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य-असैन्य सहायता रोक दी है। पाकिस्तान अब साम्राज्यवादी चीन के रहमोकरम पर है जो उसे अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। पाकिस्तान में उप-राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है। बलूच, पख्तून और सिंधी लोग पंजाबियों से आजादी के लिए अपने-अपने इलाकों में संघर्षरत हैं। कहां तो उसने भारत के टुकड़े करने की साजिश रची थी और कहां खुद उसके टुकड़ों में बंटने का खतरा मंडरा रहा है। इस्लामी आतंकवाद के जिस भष्मासुर को उसने पैदा किया था अब वही उसके सर पर हाथ रखने को आतुर है।

लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ



देवेंद्र गौतम

रेलवे बोर्ड ने इस वर्ष विभिन्न जोनों में 10,000 पद समाप्त करने का निर्णय लिया है। इन्हें बेकार और अनुपयोगी करार दिया है। यह पीएम मोदी के हर वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन करने के वायदे के विपरीत है। हर सेक्टर में आर्थिक सुधार के नाम पर ले गए निर्णयों और प्रयोगों के कारण लोगों का रोजगार छिना है।
मोदी सरकार कहती है कि इन प्रयोगों का मीठा और सुखद फल भविष्य में मिलेगा। यह भविष्य कितने वर्षों के बाद आएगा। आएगा भी या नहीं पता नहीं। फिलहाल यह झूठी दिलासा देने की कवायद प्रतीत होता है। जो वर्तमान को नहीं सुधार सकते वे भविष्य सुधारने की बात करें तो हास्यास्पद लगता है। फिर बेढंगे तरीके से काम करने वाले दूरगामी लक्ष्य का भेदन कैसे कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नोटबंदी के उपरांत जब देखा कि 86 फीसद करेंसी को रद्द करने के बाद वैकल्पिक करेंसी तैयार नहीं है तो कैशलेस होने का आह्वान किया। इसके बाद अपनी कैशलेस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए आधार कार्ड से तमाम चीजों को जोड़ने का अभियान चलाया।
उस समय सरकार को लगता था कि इन प्रयोगों के कारण इंटरनेट पर जो दबाव पड़ेगा उसकी भरपाई जियो के 4 जी से हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बैंकिंग और इंटरनेट पर निर्भर दूसरी सेवाओं में सर्वर डाउन होने की समस्या बढ़ने लगी। अमेरिकी जीवन शैली की नकल करने में अपनी सीमाओं की सही पड़ताल नहीं की गई। नोटबंदी के जिन लाभों का दावा किया गया था वह नहीं मिले तो कहा जाने लगा कि इसका दूरगामी लाभ मिलेगा। लोगों ने नोटबंदी की पीड़ा से जरा राहत पाई, नकदी की किल्लत कुछ दूर हुई तो साहब ने जीएसटी लागू कर आर्थिक सुधारों के प्रति अपने संकल्प का लोहा मनवाने का कोशिश की। सर्वर ठीक ढंग से काम नहीं करने के कारण व्यापारियों का जीएसटी जमा करने में विलंब होता तो हर्जाना वसूल किया जाता। इस तरह के प्रयोगों से जनता परेशान हो उठी। टैक्स की वसूली में कड़ाई की सरकारी कोशिश के कारण देश में कैशलेस होने की जगह कैश पर निर्भरता बढ़ने लगी। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के समय से कई लाख करोड़ से ज्यादा की नकदी अभी प्रचलन में है। समाज को जिस दिशा में ले चलने की कोशिश हुई उसकी विपरीत दिशा में यात्रा होने लगी।
यह सरकार जो बोलती है उसका उल्टा हो जाता है। दो करोड़ रोजगार सृजन का वादा किया तो लोगों का रोजगार छिनने लगा। दरअसल बेरोजगारी मात्र समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय अभिशाप है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें इस समस्या को किसी न किसी रूप में बनाए रखती हैं। क्योंकि बेरोजगार न हों तो व्यस्था में कोई रौनक ही नहीं रह जाएगी। दरअसल लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा खूब होती है लेकिन सच्चाई यह है कि इसका एक पांचवा स्तंभ भी है। इस पांचवे स्तंभ का दारोमदार युवा बेरोजगारों पर हैं। चाहे  वे साक्षर हों या निरक्षर, ग्राणीण हों या शहरी, कुशल हों अथवा अकुशल। यदि वे न हों तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही बेरौनक हो जाएगी। इस व्यवस्था को टिकाए रखने में उनका अहम योगदान होता है। बेरोजगारों की यह जमात दुनिया के लगभग हर देश में कमोबेश मौजूद है। उनका प्रतिशत जरूर घटता बढ़ता रहता है। सत्तारुढ़ दल हो चाहे विपक्षी सभी बेरोजगारी दूर करने का नारा देते हैं, संकल्प लेते हैं, लेकिन इसे बरकरार रखना उनका गुप्त एजेंडा होता है। खासतौर पर उन देशों में जहां संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है और हर पांच साल पर चुनाव का सामना करना पड़ता है। बेरोजगार ही नहीं होंगे तो चुनावों में कार्यकर्ता कहां से आएंगे। राजनीतिक कार्यक्रमों में भीड़ कहां से जुटेगी। वही तो हैं जो कल-पुर्जे के समान कहीं भी फिट होने को सहर्ष तैयार रहते हैं। गनीमत है कि भारत इस मामले में धनी है। यहां कुल आबादी के 11 फीसद बेरोजगार हैं। उनकी संख्या 12 करोड़ से भी अधिक है। 125 करोड़ की आबादी में उनका यह अनुपात सही है। यही नहीं करोड़ों की संख्या में मौजूद अल्प बेरोजगार उन्हें और मजबूती प्रदान करते हैं। मोदी सरकार इस समुदाय की ताकत और उसकी पीड़ा को समझती थी। इसीलिए सत्ता तक पहुंचने के लिए उनके मुद्दे को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया। मोदी जी ने अपने चुनावी भाषणों में वादा किया कि चुनाव जीते और सत्ता में आए तो हर वर्ष कम से कम दो करोड़ रोजगार का सृजन करेंगे। युवा बेरोजगार खुश हुए। उनके चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन नेताओं के लिए कथनी और करनी में सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। सत्ता में आने के बाद हुआ यह कि आर्थिक सुधार का एजेंडा प्रमुख हो गया। तरह-तरह को प्रयोग करने पड़े। इससे बेरोजगारी दर में कमी की जगह वृद्धि होने लगी। इसकी दर पांच वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर जा पहुंची। मनमोहन सिंह के शासन काल के बराबर भी रोजगार सृजित नहीं हुए। भारत में 1915-16 में जहां विकास दर 7.3 फीसद पर पहुंची वहीं बेरोजगारी की दर 5 फीसद तक पहुंच गई। बाद में प्रधानमंत्री जी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह युवा बेरोजगार को पकौड़े बेचकर प्रतिदिन 200 रुपये कमाने का सुझाव देने लगे। विश्व पटल पर भारत की स्थिति मजबूत करने में इस सरकार को सफलता जरूर मिली। वैश्विक स्तर पर देश की साख मजबूत हुई। लेकिन निवेश के आश्वासन के बावजूद कोई बड़ा उद्योग सरज़मीन पर नहीं आया। पकौड़ा बेचने का मकसद दरअसल स्वरोजगार की ओर प्रेरित करना था लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अपनी बात कहने के लिए जो उदाहरण इस्तेमाल किया वह उसकी गंभीरता को हल्का कर गया। विपक्ष को आलोचना के लिए एक मुद्दा भी दे दिया। नरेंद्र मोदी या तो अपने वादे के प्रति गंभीर नहीं रहे या फिर इसके लिए सही योजना नहीं बना सके। अब पेड़ लगाते फल की उम्मीद का उदाहरण देकर लोगों को फुसलाया जा रहा है। युवा वर्ग का एक हिस्सा सब्जबाग देखकर खुशफहमी का शिकार बना हुआ है। यह तटस्थ भाव से स्थिति की समीक्षा नहीं कर पा रहा है।

मंगलवार, 12 जून 2018

कोई है जो बिगाड़ना चाहता है रांची का माहौल



देवेंद्र गौतम

रांची। रमजान का महीना अपने समापन की ओर पहुंच रहा है। ईद का त्योहार करीब है और ऐसे में रांची की शांति व्यवस्था को भंग करने की सुनियोजित साजिश चल रही है। पुलिस और प्रशासन की सतर्कता के कारण षडयंत्रकारियों के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन तनाव बना हुआ है। इसे गहराने और भड़काने की कोसिश हो रही है। लेकिन यह साजिश कहां किसी संस्था की ओर से रची जा रही है, पता नहीं चल पा रहा है। रविवार 10 जून को भाजयुमो की मोटरसाइकिल रैली में शामिल कुछ लोगों ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भड़काऊ नारे लगाकर टकराव की कोशिश की। रांची मेन रोड से लेकर शहर के की इलाकों में माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया गया। मेन रोड पर दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई जिसमें तीन पुलिसकर्मियों सहित कई लोग घायल हो गए। सुरक्षा बलों ने आधे घंटे के अंदर स्थिति पर काबू पा लिया।
रविवार की ही रात को शहर के दलादिली चौक पर दो मौलानाओं पर कुछ असामाजिक तत्वों ने जानलेवा हमला कर दिया। वे अस्पताल में इलाजरत हैं। पुलिस ने हमलावरों को अगले ही दिन गिरप्तार कर लिया। इस घटना के दो दिन बाद मंगलवार को नगड़ी में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश की गई। सुरक्षा बलों ने इसे भी नियत्रित कर लिया।
सीधे तौर पर देखा जाए तो इसे भाजपा समर्थित संगठनों की 2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा कहा जा सकता है। निश्चित रूप से सांप्रदायिक हिंसा भड़कने से ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होगी और इसका चुनावी लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन रांची में आतंकी संगठनों से जुड़े लोग भी चिन्हित किए गए हैं। हिरासत में लिए गए हैं। पाकिस्तान समर्थित आतंकी देश को अशांत करने को कोई मौका चूकते नहीं। संभव है कोई आतंकी संगठन सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए भाजपा के कंधे पर बंदूक चला रहा हो। खुफिया संस्थाओं को इस मामले की जांच करनी चाहिए और राज्य सरकार को षडयंत्रकारियों की नकेल कसनी चाहिए। पुलिस प्रसासन के लोग जिस सतर्कता के साथ स्थिति को नियंत्रित कर रहे है इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। झारखंड में भाजपा की सरकार है। लेकिन सरकार चुनावी लाभ के लिए आंख मूंदने की जगह शांति व्यवस्था को बनाए रखने को प्राथमिकता दे रही है। सुरक्षा बलों को काम करने की पूरी स्वतंत्रता दी जा रही है। रघुवर सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है।

अजा आयोग के गठन पर बाउरी समाज ने मंत्री को बधाई दी



रांची।  बाउरी संघर्ष मोर्चा, झारखंड प्रदेश का एक प्रतिनिधिमंडल राजस्व, निबंधन, भूमि सुधार, पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री अमर कुमार बाउरी के आवास पर मुलाकात कर उन्हें 17 वर्ष बाद राज्य में बने झारखंड प्रदेश अनुसूचित जाति आयोग के गठन के लिए धन्यवाद और बधाई दी। इस मौके पर केंद्रीय सदस्य करम चंद बाउरी ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत ही सौभाग्य की बात है कि झारखंड सरकार के मंत्री अमर कुमार बाउरी हमारे ही समाज के सुपुत्र हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड प्रदेश में हमारा समाज अनुसूचित जाति का बहुसंख्यक है और अनुसूचित जाति आयोग का उपाध्यक्ष पद एवं सदस्य पद रिक्त हैं।
बाउरी संघर्ष मोर्चा, झारखण्ड प्रदेश ने एक आवेदन के माध्यम से मंत्री से आग्रह किया कि उक्त पद के लिए बाउरी समाज से ही दो लोगों को इस पद पर नियुक्त किया जाये। इससे बाउरी समाज और अधिक मजबूत बन सकेगा। बाउरी संघर्ष मोर्चा के केन्द्रीय सदस्य ने कहा कि इस पद पर बाउरी समाज के व्यक्ति के पदस्थापित होने से हमारा समाज भूख और भय मुक्त बनेगा।
इस मौके पर केंद्रीय सदस्य करमचंद बाउरी, गोपाल प्रसाद बाउरी, रंजीत बाउरी, दीपक कुमार बाउरी, अजय बाउरी, रामदेव बाउरी सहित अन्य केंद्रीय सदस्य मौजूद थे।

मोदी अगेन पीएम के तहत हस्ताक्षर अभियान



रांची। मिशन मोदी अगेन पीएम युवा मोर्चा झारखंड प्रदेश की ओर से 2019 में नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए अल्बर्ट एक्का चौक पे हस्ताक्षर अभियान चलाया गया।

इसकी शुरुआत रांची महानगर भाजपा अध्यक्ष मनोज मिश्रा और मिशन मोदी के प्रदेश अध्यक्ष अनुरंजन अशोक ने किया।
अतिथियों का स्वागत मिशन मोदी युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रोहित शारदा के द्वारा किया गया।
इस दौरान महानगर अध्यक्ष मनोज मिश्रा ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विकास के पथ पे अग्रसर है। आज नरेंद्र मोदी के विकासशील योजनाओं की वजह से देश का हर जनमानस अपने आप को गौरवांवित महसूस कर रहा है।
मिशन के प्रदेश अध्यक्ष अनुरंजन अशोक ने कहा कि मोदी आजादी के बाद के सबसे बेहतर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। आज कई ऐसी योजनायें है जो जनता को 70 सालों बाद मिलीं। नरेंद्र मोदी की सरकार जनता को किए गए वादे को निभा रही है।
मौके पर प्रदेश मंत्री अरविन्दर सिंह खुराना ने कहा कि मोदी के प्रति जनता का उत्साह वही है जो लोकसभा चुनाव के वक्त था। नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता है जो सबका साथ सबका विकास चाहते है।
मिशन मोदी के प्रदेश युवा मोर्चा अध्यक्ष रोहित शारदा ने कहा कि आज मोदी के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान से और रांची के जनमानस को देखते हुए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2019 में भी नरेंद्र मोदी की ही सरकार बनेगी। शारदा ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने आज समुदाय को प्रसन्न किया है।

वही मिशन मोदी के प्रदेश युवा मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष तुषार विजयवर्गीय ने कहा कि मिशन मोदी के युवा अब हर जिलों में हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे। नरेंद्र मोदी के जनकल्याणकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुचायेंगे। विजयवर्गीय ने कहा कि यह हस्ताक्षर अभियान क्षण मात्र का नही है इससे यह मालूम चलता है कि जनता में आज भी मोदी के प्रति दीवानगी हैं।

कार्यक्रम में महिला बच्चे बुजर्ग ने नरेंद्र मोदी को 2019 नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए काफी उत्साह के साथ हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा लिया।

इस अवसर पे राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अलका सिंह, प्रदेश के उपाध्यक्ष प्रीतम साहू, प्रदेश महामंत्री पीयूष विजय, प्रदेश कार्यक्रम संयोजक सुशान्त सिंह, धर्मेंद्र कुमार, सोशल मीडिया प्रभारी धनंजय कुमार, कानूनी सलाहकार प्रीति शर्मा, प्रदेश मीडिया प्रभारी सोनू मिश्रा, राँची जिला अध्यक्ष रामटहल नायक, रविन्द्र कुमार, नीरज पांडेय सतीश कुमार, अनूप पांडेय,गुनी गुप्ता, सूरज सिंह, विकास नायक, अभय कुमार, रिकेश केसरी, मनोज, कमलेश, अनिमेष कर्मकार, राहुल, राहुल सिंह, प्रशांत, कुमार विशाल, धनंजय गुप्ता, श्रवण प्रसाद, प्रवीण कर्मकार, संतोष सिन्हा, उज्ज्वल कुमार, चंचला देवी, सुमंत कुमार, कानू सिन्हा, रमेश खत्री, सोनू वर्मा, निखिल, रानी, अतिल प्रवीण, धुर्वा मंडल अध्यक्ष विश्वजीत सिंह, सचिन सिंह, रवि कुमार, अभिजीत कुमार सिंह, मनु सिंह, मनीष पाठक, रवि ठाकुर, राजू कुमार, बंटी शर्मा, मुकेश कुमार, आदि युवा मोर्चा के सैकडो कार्यकर्ता उपस्थित थे।

पुलिस मेंस कार्यालय में इफ्तार पार्टी आयोजित


 रांचीझारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के कार्यालय में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। स इफ्तार पार्टी में डीआइजी ए वी होमकर, एसएसपी कुलदीप द्विवेदी ,एसडीएम अंजली यादव अन्य अधिकारीगण शामिल हुए।
झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के तरफ से महामंत्री रमेश उरांव। प्रदेश उपाध्यक्ष अम्बर खान ,प्रदेश प्रतिनिधि रहमान खान सहित कई लोग मौजूद थे।


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...