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गुरुवार, 14 जून 2018

जंगली हाथियों पर अंकुश लगाने की तैयारी

झारखंड जंगली हाथियों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए जीपीएस युक्त रेडियो कालर लगाने का काम शुरू हो चुका है। इसके लिए कोलकाता से विशेषज्ञों की टीमें बांकुड़ा और मिदनापुर के लिए रवाना की जा चुकी हैं। बेंगलुरु स्थित एशियन नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के वैज्ञानिक इस अभियान में बंगाल वन विभाग के साथ शमिल हैं। उनके दो वैज्ञानिकों के साथ बेहोशी की दवा देने के विशेषज्ञ भी मोर्चे पर आ जुटे हैं।
झारखंड के दलमा पहाड़ पर हाथी परियोजना से हाथियों के दो झुंड अभी बांकुड़ा और मिदनापुर के जंगलों में हैं। उन्होंने आसपास के गांवों में आतंक मचा रखा है। दलमा के हाथी हर वर्ष गर्मियों में पश्चिम बंगाल के जंगलों का रुख करते हैं और बरसात के मौसम में वापस लौट आते हैं। हाथियों की टोली का नेतृत्व हमेशा मादा हथिनी करती है। वन्य जीवन के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि झुंड की मुखिया को जीपीएस युक्त रेडियो कालर लगा दिया जाए तो उसकी टोली की गतिविधियों पर नज़र रखा जा सकता है। इसके कारण मानव बस्तियों में उनके उपद्रव को भी काफी हद तक रोका जा सकेगा। हर वर्ष होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा।
जैसे ही हाथियों के किसी झुंड के मानव बस्ती के करीब होने की जानकारी मिलेगी पालतू हाथी और ग्रामीणों की हल्ला पार्टी को जुटाकर उन्हें जंगल में वापस खदेड़ दिया जाएगा। जीपीएस युक्त रेडियो कालर लगाने के लिए दिलचस्प तकनीक अपनाई जाती है। सबसे पहले झुंड के लोकेशन का पता किया जाता है इसके बाद झुंड के नेता की पहचान की जाती है और सकी गतिविधियों की निगरानी की जाती है। उनकी पहचान कोई मुश्किल काम नहीं। आम तौर पर झुंड की मुखिया सबसे ऊंचे कद की और तगड़े शरीर की होती है। उसकी पहचान और सके स्वभाव के अध्ययन के बाद हल्ला पार्टी को जुटाकर झुंड में भगदड़ मचा दी जाती है। जब झुंड की मुखिया थोड़ा अकेले हो जाती है तो से जाइलाजिन नामक नशीली दवा से युक्त गोली से प्रहार किया जाता है। इसके कारण हथनी आधे घंटे के लिए बेहोश जाती है। गोली लगने के बाद वह शुरुआती दस मिनट वह नशे में रहती है फिर 20 मिनट तक अचेत हो जाती है। उसी बीस मिनट के अंदर उसे जीपीएस रेडियो कालर से युक्त कर दिया जाता है। होश आने पर वह अपनी टोली को एकत्र कर लेती है। जानकारी के मुताबिक अभी दलमा पहाड़ी के 30 हाथी दो टोलियों में बंटकर मिदनापुर और बांकुड़ा में मौजूद हैं। वन विभाग के अधिकारियों को उनके लोकेशन की जानकारी है। वे उनके जंगल के छोर पर किसी मानव बस्ती तक पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं।

-देवेंद्र गौतम

नक्सली इलाकों में अंधविश्वास का मतलब



झारखंड के माओवादी सिर्फ दहशत फैलाकर लेवी वसूल रहे हैं। जनता की पिछड़ी चेतना को उन्नत करने के लिए जन-शिक्षण का कोई कार्यक्रम नहीं चला रहे हैं। इसीलिए उनके सघन प्रभाव वाले इलाकों में भी भूत-प्रेत, डायन बिसाही जैसी आदिम आस्थाएं अभी तक बरकरार हैं। नक्सलवाद अथवा माओवाद एक वैज्ञानिक विचारधारा है। उसके अलमदार यदि सिर्फ पैसे उगाहने के लिए हथियार का उपयोग करते हैं तो उनसे किसी सामाजिक क्रांति या व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती। वामपंथ पिछड़ी चेतना को उन्नत करने की सीख देता है। पिछड़ी चेतना से ग्रसित जन किसी जन क्रांति का हिस्सा नहीं बन सकते। वामपंथ के सिद्धांतकार यह बात स्पष्ट कर चुके हैं।
पिछले बुधवार की घटना है। झारखं की राझधानी रांची से करीब 235 किलोमीटर की दूरी पर नक्सल प्रभावित पलामू जिले में 45 वर्षीय दलित महिला कलावती और उसके 25 वर्षीय भतीजे संजय राम को डायन होने के आरोप में ग्रामीणों ने पेड़ पर बांध दिया और उनकी पिटाई करने लगे। घटना छत्तरपुर प्रखंड के मदनपुर गांव के रविदास टोले की है। ग्रामीणों का मानना था गांव में कई मौतें कलावती के काले जादू के कारण हुई हैं। उसपर उसके किसी पितर का साया है और संजय राम इस काम में उसका मददगार है। अंधविश्वास में डूबे ग्रामीण उनकी पीट-पीटकर हत्या करने की तैयारी में थे कि तभी इतेफाक से किसी जागरुक ग्रामीण ने मोबाइल पर पुलिस को घटना की सूचना दे दी। ग्रामीणों के बीच यह बात फैला दी गई कि पुलिस चल पड़ी है और पहुंचने ही वाली है। इसका असर हुआ और पिटाई बंद कर उन्हें बंधनमुक्त कर दिया गया। पुलिस आई और भुक्तभोगियों को अपने साथ ले जाने लगी तो ग्रामीणों ने इसका जमकर विरोध किया। पुलिस अधिकारियों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि काला जादू कुछ नहीं होता है। यह अंधविश्वास है लेकिन पीढ़ियों से मन की गहराई तक जमा अंधविश्वास अपनी जगह बरकरार रहा। भारी प्रतिरोध के बीच पुलिस किसी तरह उन्हें छत्तरपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक ले जा सकी। चोट तो दोनों को लगी थी लेकिन कलावती संजय से कहीं ज्यादा जख्मी और डरी हुई थी। ग्रामीणों का आरोप था कि डायनों को पुलिस जबरन छुड़ाकर ले गई और विरोध करने पर एक महिला की पिटाई कर उसकी टांग तोड़ दी। उन्हें इस बात पर भी आपत्ति थी कि पुलिस ने कलावती को सुरक्षा की दृष्टि से खजूरी ग्राम स्थित उसके मैके पहुंचा दिया था। रविदास टोला में किसी की भी कलावती से सहानुभूति नहीं थी। सभी उसे डायन मान रहे थे और सकी पिटाई को उचित करार दे रहे थे। पुलिस ने दोनों ओर से प्राथमिकी दर्ज करने की अपनी औपचारिकता पूरी की। टोले में अभी भी पुलिस के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है।
दलितों को नक्सलियों का मुख्य सामाजिक आधार वर्ग में शुमार किया जाता है। दलितों के उस टोले के लोग अंधविश्वास में डूबे हुए हैं तो इसका सीधा मतलब है कि नक्सलियों ने उन्हें अपनी वैज्ञानिक विचारधारा से दीक्षित नहीं किया। सवाल है कि क्या लेवी का धन इकट्ठा करने से और गोला-बारूद जमा करने से, पुलिस बल पर हमला करने से भारतीय क्रांति संपन्न हो जाएगी...। झारखंड में किसी समय ईसाई मिश्नरियां भी आई थीं। उन्होंने कम से कम शिक्षा का प्रचार किया। आदिवासियों को जागरुक किया। आज भी उनके कामकाज के इलाकों के आदिवासी अपेक्षाकृत ज्यादा जागरुक और विकसित हैं। आखिर नक्सली उनके बीच कौन सा अभियान चला रहे हैं। अंध-आस्थाओं पर उन्होंने कभी प्रहार किया हो। जन अदालत लगाई हो इसका कोई दृष्टांत नहीं है। आखिर आदिवासी समाज में उनकी मौजूदगी से अंतर क्या आया है,,,। चरम वामपंथ की धारा की उपलब्धि, प्रासंगिकता और औचित्य क्या है....।  

-देवेंद्र गौतम

सफलता के लिए शिक्षा की नई तकनीक जरूरी : निखिल गुप्ता


शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रौद्योगिकी समाधान
उपलब्ध कराता है कैरियर लिफ्ट एड-टेक

रांची । तेजी से बदलते सामाजिक व शैक्षणिक परिवेश और प्रतिस्पर्द्धात्मक युग में सफलता के लिए शिक्षा की नई तकनीक से लैस होना जरूरी है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए शैक्षणिक संस्थानों को भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए। उक्त बातें शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रौद्योगिकी समाधान उपलब्ध कराने वाले ख्यातिप्राप्त संस्थान कैरियर लिफ्ट के संस्थापक व लोकप्रिय शिक्षाविद निखिल गुप्ता ने कही। श्री गुप्ता ने बताया कि 2012 से भारत और संयुक्त अरब अमिरात के कोचिंग सेंटर, स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों जैसे शैक्षिक संस्थानों में सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। इन संस्थानों के छात्रों को सीखने के नए तरीके बताने के लिए शैक्षणिक मोबाइल ऐप और ऑनलाइन टेस्ट प्लेटफार्म विकसित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि शैक्षणिक संस्थानों की जरूरत के मुताबिक ईडीयू सीएमएस वेबसाइट भी हमारी सेवाओं में शामिल है। अध्ययन सामग्री को तैयार करने में आईआईटी, आईआईएम, सीएएस, कई नामचीन समाचार पत्रों से जुडे रहे पत्रकारों और न्यायिक क्षेत्र के प्रख्यात लोगों की विशेषज्ञता का लाभ लिया जाता है। 
श्री गुप्ता ने बताया कि हमारे 2200 से ज्यादा ग्राहकों में देश के शीर्ष शिक्षा संस्थान शामिल हैं। तेजी से बदलती तकनीक के साथ शिक्षा के नए-नए तरीके भी लगातार विकसित हो रहे हैं। नई प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ शैक्षणिक संस्थान परंपरागत तरीकों से आधुनिक तरीकों की तरफ बढ़ रहे हैं। पारंपरिक शिक्षा विधियां विषय केंद्रित होती हैं, जबकि आधुनिक तरीके के व्यावहारिक दृष्टिकोण पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग ने छात्रों के सीखने का तरीका बिल्कुल ही बदल दिया हैं। अब छात्र को जो कुछ भी सीखना है, वह उसे इंटरनेट पर मिल जाता है। लेकिन जानकारी की उपलब्धता के साथ तेजी से बदलते शिक्षकों से उचित मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण है। इस तेजी से बदलते क्षेत्र में शिक्षा संस्थानों के लिए छात्रों की ज्यादा संख्या बनाए रखकर तथा दूसरों से प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करना भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे में बदलती तकनीक को अपनाना ही एकमात्र तरीका है, क्योंकि इससे ही सम्पूर्ण विकास संभव है। आगे उन्होंने कहा कि हम करियर लिफ्ट एड-टेक में शिक्षा के तरीकों को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि शैक्षणिक संस्थान के इस रुझान को अपना सकें। शिक्षा के क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा शैक्षिक संस्थानों को सर्वोत्तम समाधान प्रदान करने के लिए आर्ट टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर हमारे प्रोडक्ट को डिजाइन किया गया है।


उन्होंने बताया कि हमारा प्रमुख प्रोडक्ट एडु-सीएमएस है जो एक शिक्षा वेबसाइट है, जिसे शैक्षणिक संस्थानों की जरूरतों के मुताबिक तैयार किया गया है। कोचिंग संस्थानों के लिए हम उनके उपयोग के आधार पर एजुकेशन कंटेंट, शैक्षणिक मोबाइल ऐप और ऑनलाइन परीक्षा प्लेटफार्म भी तैयार करते हैं। हम अपने व्यापक शोध को इस कंटेंट में शामिल करके उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सामग्री तैयार करते हैं। स्कूलों के लिए करियर लिफ्ट लर्नो हमारे विशेषज्ञों द्वारा न केवल परीक्षा के लिए डिजाइन किया गया है, बल्कि ये करियर संबंधी सूचना देता हैं और साथ में मार्गदर्शन भी प्रदान करता है। ये मोबाइल ऐप गतिशीलता और सुलभता को बढ़ाने के साथ ही स्कूलों के प्रशासन, छात्र और शिक्षकों को जोडे रखने में मदद देता है। यह ऐप छात्रों के लिए एक बहुत ही उपयोगी संसाधन हो सकता है, जो उन्हें बेहतर करियर विकल्प प्रदान करने के साथ ही करियर संबंधी जानकारी देने और उन्हें सही संस्थानों से जोड़ने में मदद करता है।
उन्होंने कहा कि हमने कॉलेजों के लिए कैंपस रिक्रूटमेंट असिस्टेंस प्लेटफार्म भी तैयार किया है, जो छात्रों के लिये करियर परामर्श, भारत में विभिन्न कंपनियों द्वारा किए गए टेस्ट से संबंधित जानकारी एवं भारत और विदेशों के विभिन्न शैक्षणिक क्षेत्रों में विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की जानकारी प्रदान करता है। हम इन शैक्षणिक संस्थानों के लिए परामर्श सत्र और सेमिनार भी आयोजित करते हैं। गुणवत्ता और ग्राहक उत्कृष्टता पर हमारे फोकस का ही नतीजा है कि पिछले पांच सालों में हमें 2200 से ज्यादा ग्राहकों की सेवा का अवसर मिला है।


बुधवार, 13 जून 2018

कोहेनूर न सही, नीरव और माल्या तो लौटा दे ब्रिटेन



अंग्रेज जाते-जाते कोहेनूर हीरा समेत भारत के कीमती असबाब अपने साथ ले गए थे। उन्हें लौटाने की उसकी मंशा नहीं है। कीमती चीजें जिसके भी हाथ लग जाएतबतक लौटाना नहीं चाहता जबतक उसकी गर्दन न मरोड़ दी जाए। उसकी जान पर न बन आए। लेकिन हीरे-जवारात का प्रेमी ब्रिटेन माल्या और नीरव मोदी को क्यों अपने पास रखे हुए है। समझ से परे है। उसे कौन बताए कि नीरव हीरा व्यापारी है, हीरा नहीं। वह किसी संग्रहालय या अजायबघर की शोभा बढ़ाने लायक वस्तु नहीं है। विजय माल्या एक अय्याश व्यापारी है। वह शराब बनाता है लेकिन अंगूर की बेटी नहीं उसका बेटा है।
भारत सरकार बार-बार उन्हें वापस लौटाने का आग्रह कर रही है। ब्रिटेन के साथ प्रत्यर्पण संधि भी है। फिर बहानेबाजी क्यों...। उनकी जगह भारतीय जेलों में है ब्रिटेन के होटलों और क्लबों में नहीं। गनीमत है कि ब्रिटेन इस बात को स्वीकार कर रहा है कि भारतीय बैंकों का अरबों रुपया लेकर भागे हुए यह दोनों अपराधी उसकी पनाह में हैं। पाकिस्तान की तरह ओसामा बिन लादेन और दाऊद इब्राहिम जैसे मोस्ट वांटेड लोगों को छुपाकर उनके होने से इनकार नहीं कर रहा है। लेकिन उन्हें वापस मांगने पर ब्रिटेन का कहना है कि लाखों भारतीय वहां अवैध रूप से रह रहे हैं। भारत उन्हें भी वापस बुलाए।
अब उनसे कौन पूछे कि भारत में दो सौ वर्षों तक अंग्रेज कौन सा पासपोर्ट और वीजा लेकर रहे थे। भारत के जो लोग ब्रिटेन में रह रहे हैं वे कम से कम राजकीय कार्यों में तो दखल नहीं दे रहे। अपना वर्चस्व तो कायम नहीं कर रहे। वे अपराधी प्रवृत्ति के भी नहीं हैं। अगर हैं तो उन्हें भी माल्या और नीरव के साथ वापस भेजे। किसी भारतीय को इसपर आपत्ति नहीं होगी। जो गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं उन्हें भी कोई भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने नहीं भेजा है। उनपर कार्रवाई करने से कोई रोक नहीं रहा। उन्हें प्लेसमेंट एजेसी के दलालों ने नौकरी दिलाने के नाम पर भेजा है। इसके लिए पैसे लिए हैं। वे नौकरी के लिए गए हैं, कानून से बचने के लिए नहीं। माल्या वहां शान का जीवन जी रहा है और नीरव मोदी वहा के बैंकों में भारतीय बैंकों का पैसा ऱखकर राजकीय शरण मांग रहा है। ब्रिटेन सरकार इसपर विचार भी कर रही है। यह सिलसिला चल निकला तो भारतीय अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन जाएगा। क्या ब्रिटेन यही चाहता है।

-देवेंद्र गौतम

अपने ही भष्मासुरों से घिरा पाक



 देवेंद्र गौतम
पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां लोकतंत्र सैनिक तानाशाही के साए में सांस लेता रहा है। एक झीना सा पर्दा है जो कई बार चेहरे सा हट गया है और परोक्ष सैनिक सत्ता तानाशाही का मुलम्मा चढाए प्रत्यक्ष सर पर सवार हो गई है। पूरी दुनिया जानती है कि वहां जनता की चुनी हुई सरकारें सेना के रिमोट से नियंत्रित होती रही हैं। सेना के जनरलों ने भारत को सबक सिखाने के लिए आतंकवादियों को पाला पोसा। उन्हें धार्मिक कट्टरता की घूंटें पिलाईं। अब उसके पाले हुए आतंकी इस्लामिक कानूनों के मुताबिक देश को चलाना चाहते हैं। 
कट्टरपंथियों के बीच आपसी अंतर्विरोध भी कम नहीं हैं। बरेलवी, अहमदिया और शिया वहाबियों से खार खाते हैं तो उन्हें खुद अलकायदा और आईएस का खौफ सताता है। जनता के अंदर उन्होंने भारत के खिलाफ इतना जहर भरा है कि आज हर पाकिस्तानी दहशतजदा है। स्थिति भयावह होती जा रही है।
दरअसल पाकिस्तान की स्थापना ही अनैतिक 'द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुई थी। 28 जनवरी, 1933 को चौधरी रहमत अली ने इंग्लैंड में 'नाऊ ऑर नेवर: आर वी लिव ऑर पेरिश फार एवर शीर्षक पैंफलेट जारी किया था। उन्होंने पाकिस्तान का नाम पेश किया था। बाद में कुछ लोग इसे इस्लाम से भी जोड़कर देखने लगे। हालांकि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के दादा हिंदू थे। खुद जिन्ना भी पश्चिमी सभ्यता में ढले नास्तिक थे। इस्लाम में जो चीजें वर्जित  हैं ऐसी तमाम चीजों का वे बेधड़क सेवन करते थे। बाद में वही द्विराष्ट्र सिद्धांत के सबसे बड़े समर्थक बन गए। लेकिन वह पाकिस्तान को कभी भी एक धार्मिक रूप से कट्टर इस्लामी मुल्क नहीं बनाना चाहते थे। इस्लामीकरण की शुरुआत जिन्ना के गुजरने के बाद हुई जब लियाकत अली ने मार्च 1949 में ऑब्जेक्टिव रिजॉल्यूशन पेश कर इस्लामिक पाकिस्तान की बुनियाद रखी। कारण यह था कि लियाकत अली सहित पाकिस्तानी संविधान सभा के अधिकांश सदस्य भारतीय इलाकों से चुने गए थे। उनका पाकिस्तान का सपना तो पूरा हो गया लेकिन वहां उन्हें बाहरी के तौर पर देखा जा रहा था। उन्हें मुहाजिर कहा जाने लगा था। पाकिस्तान के लोग उन्हें दोबारा शायद ही चुनते। संविधान सभा के भारत से आए लोग समझते थे कि इस्लामीकरण के जरिए ही पाकिस्तान में सत्ता की राजनीति पर पकड़ बनाए रखी जा सकती थी। इसीलिए इस्लामिक देश घोषित कर मुल्ला-मौलवियों की ही के वर्चस्व का रास्ता खोलना उनके लिए आवश्यक हो गया था। उन्होंने यही नीति अपनाई।

बाद में लियाकत अली की हत्या कर दी गई। इसके बाद सेना के जनरल अयूब खान ने भी कट्टरपंथी ताकतों को प्रोत्साहित किया। उनके शासन काल में 1953 में अहमदिया मुसलमानों के खिलाफ दंगे भड़के। उस दंगे में 2,000 से अधिक अहमदिया मुसलमान मारे गए और 10,000 से अधिक बेघर हो गए। हालात काबू करने लिए पंजाब में मार्शल लॉ लगाना पड़ा। इससे जनरलों को सत्ता का स्वाद लग गया और फिर उन्होंने अक्टूबर 1958 में देश पर मार्शल लॉ थोप दिया। जल्द ही पाकिस्तान इस्लाम, सेना और अमेरिकी इम्दाद पर जीनेवाला परजीवी मुल्क बनकर रह गया।

इसके बाद जब जुल्फिकार अली भुट्टो लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर सत्ता में आए तो प्रारंभ में एक उदारवादी, पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे शिक्षित कुलीन वर्ग के नेता थे। लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान पर पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने भी कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा दिया। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में इस्लाम के नाम पर भीषण रक्तपात मचाया। भुट्टो ने सेना पर लोकतांत्रिक सत्ता की पकड़ बनाने की कोशिश की, पर नाकाम रहे। जुलाई, 1977 में सेना ने उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया। इस घटना को उन्हीं के नियुक्त किए  जनरल जिया उल हक ने अंजाम दिया। अप्रैल 1979 में जिया ने भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया। कट्टर इस्लामी सोच वाले जिया के आने से पाक सेना के साथ ही नागरिक समाज का भी तेजी से इस्लामीकरण हुआ। 1980 के दशक में उन्होंने आइएसआई के माध्यम से ऑपरेशन तुपाक शुरू किया। यह कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को भड़काने वाली त्रिस्तरीय कार्ययोजना थी। इसका मकसद भारत को टुकड़ों में बांटना था। इसके तहत आईएसआई ने लश्कर-ए-तोएबा जैसे छह आतंकी समूहों का गठन किया।

1980 के दशक में अफगान युद्ध ने पाकिस्तान के सियासी एवं सैन्य परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। अपने सामरिक लक्ष्यों के लिए इस्लामाबाद खुद अमेरिका की अगुआई में चल रही लड़ाई में एक पक्ष बन गया। उसका मकसद अफगानिस्तान में पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ाना था ताकि भारत के असर को कम किया जा सके। जिया ने कट्टर इस्लामी विचारधारा को प्रोत्साहन देने के साथ ही उदारवादी राजनीतिक समूहों और कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसा। पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के इस हनन पर पश्चिमी जगत भी आंखें मूंदे रहा, क्योंकि जिया अफगानिस्तान में अमेरिका के छद्म युद्ध में मददगार बने हुए थे। सोवियत संघ से लड़ाई के लिए 1980 के दशक में जिया ने जिन इस्लामी चरमपंथियों को जन्म दिया, आज वही पाकिस्तान में उन्माद फैला रहे हैं। आज का पाकिस्तान तानाशाह जनरल जिया की नीतियों की ही छाया मात्र बना हुआ है, जिसे उनके बाद बेनजीर भुट्टो एवं नवाज शरीफ ने और आगे बढ़ाया।

आज पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था लुंजपुंज हो चुकी है। हिंसा और दहशत का माहौल बना हुआ है। तमाम वैश्विक नेता उसे एक नाकाम मुल्क करार दे रहे हैं। पाकिस्तान आतंक के मोर्चे पर दोहरी नीति पर चल रहा है। एक तरफ वह आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाता है तो दूसरी तरफ तालिबान और कश्मीर में सक्रिय आतंकियों को मदद पहुंचाता है। अब अमेरिका भी उसके दोहरो चरित्र को समझ चुका है। उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य-असैन्य सहायता रोक दी है। पाकिस्तान अब साम्राज्यवादी चीन के रहमोकरम पर है जो उसे अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। पाकिस्तान में उप-राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है। बलूच, पख्तून और सिंधी लोग पंजाबियों से आजादी के लिए अपने-अपने इलाकों में संघर्षरत हैं। कहां तो उसने भारत के टुकड़े करने की साजिश रची थी और कहां खुद उसके टुकड़ों में बंटने का खतरा मंडरा रहा है। इस्लामी आतंकवाद के जिस भष्मासुर को उसने पैदा किया था अब वही उसके सर पर हाथ रखने को आतुर है।

लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ



देवेंद्र गौतम

रेलवे बोर्ड ने इस वर्ष विभिन्न जोनों में 10,000 पद समाप्त करने का निर्णय लिया है। इन्हें बेकार और अनुपयोगी करार दिया है। यह पीएम मोदी के हर वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन करने के वायदे के विपरीत है। हर सेक्टर में आर्थिक सुधार के नाम पर ले गए निर्णयों और प्रयोगों के कारण लोगों का रोजगार छिना है।
मोदी सरकार कहती है कि इन प्रयोगों का मीठा और सुखद फल भविष्य में मिलेगा। यह भविष्य कितने वर्षों के बाद आएगा। आएगा भी या नहीं पता नहीं। फिलहाल यह झूठी दिलासा देने की कवायद प्रतीत होता है। जो वर्तमान को नहीं सुधार सकते वे भविष्य सुधारने की बात करें तो हास्यास्पद लगता है। फिर बेढंगे तरीके से काम करने वाले दूरगामी लक्ष्य का भेदन कैसे कर सकते हैं। मोदी सरकार ने नोटबंदी के उपरांत जब देखा कि 86 फीसद करेंसी को रद्द करने के बाद वैकल्पिक करेंसी तैयार नहीं है तो कैशलेस होने का आह्वान किया। इसके बाद अपनी कैशलेस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए आधार कार्ड से तमाम चीजों को जोड़ने का अभियान चलाया।
उस समय सरकार को लगता था कि इन प्रयोगों के कारण इंटरनेट पर जो दबाव पड़ेगा उसकी भरपाई जियो के 4 जी से हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बैंकिंग और इंटरनेट पर निर्भर दूसरी सेवाओं में सर्वर डाउन होने की समस्या बढ़ने लगी। अमेरिकी जीवन शैली की नकल करने में अपनी सीमाओं की सही पड़ताल नहीं की गई। नोटबंदी के जिन लाभों का दावा किया गया था वह नहीं मिले तो कहा जाने लगा कि इसका दूरगामी लाभ मिलेगा। लोगों ने नोटबंदी की पीड़ा से जरा राहत पाई, नकदी की किल्लत कुछ दूर हुई तो साहब ने जीएसटी लागू कर आर्थिक सुधारों के प्रति अपने संकल्प का लोहा मनवाने का कोशिश की। सर्वर ठीक ढंग से काम नहीं करने के कारण व्यापारियों का जीएसटी जमा करने में विलंब होता तो हर्जाना वसूल किया जाता। इस तरह के प्रयोगों से जनता परेशान हो उठी। टैक्स की वसूली में कड़ाई की सरकारी कोशिश के कारण देश में कैशलेस होने की जगह कैश पर निर्भरता बढ़ने लगी। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के समय से कई लाख करोड़ से ज्यादा की नकदी अभी प्रचलन में है। समाज को जिस दिशा में ले चलने की कोशिश हुई उसकी विपरीत दिशा में यात्रा होने लगी।
यह सरकार जो बोलती है उसका उल्टा हो जाता है। दो करोड़ रोजगार सृजन का वादा किया तो लोगों का रोजगार छिनने लगा। दरअसल बेरोजगारी मात्र समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय अभिशाप है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारें इस समस्या को किसी न किसी रूप में बनाए रखती हैं। क्योंकि बेरोजगार न हों तो व्यस्था में कोई रौनक ही नहीं रह जाएगी। दरअसल लोकतंत्र के चार स्तंभों की चर्चा खूब होती है लेकिन सच्चाई यह है कि इसका एक पांचवा स्तंभ भी है। इस पांचवे स्तंभ का दारोमदार युवा बेरोजगारों पर हैं। चाहे  वे साक्षर हों या निरक्षर, ग्राणीण हों या शहरी, कुशल हों अथवा अकुशल। यदि वे न हों तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही बेरौनक हो जाएगी। इस व्यवस्था को टिकाए रखने में उनका अहम योगदान होता है। बेरोजगारों की यह जमात दुनिया के लगभग हर देश में कमोबेश मौजूद है। उनका प्रतिशत जरूर घटता बढ़ता रहता है। सत्तारुढ़ दल हो चाहे विपक्षी सभी बेरोजगारी दूर करने का नारा देते हैं, संकल्प लेते हैं, लेकिन इसे बरकरार रखना उनका गुप्त एजेंडा होता है। खासतौर पर उन देशों में जहां संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है और हर पांच साल पर चुनाव का सामना करना पड़ता है। बेरोजगार ही नहीं होंगे तो चुनावों में कार्यकर्ता कहां से आएंगे। राजनीतिक कार्यक्रमों में भीड़ कहां से जुटेगी। वही तो हैं जो कल-पुर्जे के समान कहीं भी फिट होने को सहर्ष तैयार रहते हैं। गनीमत है कि भारत इस मामले में धनी है। यहां कुल आबादी के 11 फीसद बेरोजगार हैं। उनकी संख्या 12 करोड़ से भी अधिक है। 125 करोड़ की आबादी में उनका यह अनुपात सही है। यही नहीं करोड़ों की संख्या में मौजूद अल्प बेरोजगार उन्हें और मजबूती प्रदान करते हैं। मोदी सरकार इस समुदाय की ताकत और उसकी पीड़ा को समझती थी। इसीलिए सत्ता तक पहुंचने के लिए उनके मुद्दे को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया। मोदी जी ने अपने चुनावी भाषणों में वादा किया कि चुनाव जीते और सत्ता में आए तो हर वर्ष कम से कम दो करोड़ रोजगार का सृजन करेंगे। युवा बेरोजगार खुश हुए। उनके चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन नेताओं के लिए कथनी और करनी में सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। सत्ता में आने के बाद हुआ यह कि आर्थिक सुधार का एजेंडा प्रमुख हो गया। तरह-तरह को प्रयोग करने पड़े। इससे बेरोजगारी दर में कमी की जगह वृद्धि होने लगी। इसकी दर पांच वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर जा पहुंची। मनमोहन सिंह के शासन काल के बराबर भी रोजगार सृजित नहीं हुए। भारत में 1915-16 में जहां विकास दर 7.3 फीसद पर पहुंची वहीं बेरोजगारी की दर 5 फीसद तक पहुंच गई। बाद में प्रधानमंत्री जी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह युवा बेरोजगार को पकौड़े बेचकर प्रतिदिन 200 रुपये कमाने का सुझाव देने लगे। विश्व पटल पर भारत की स्थिति मजबूत करने में इस सरकार को सफलता जरूर मिली। वैश्विक स्तर पर देश की साख मजबूत हुई। लेकिन निवेश के आश्वासन के बावजूद कोई बड़ा उद्योग सरज़मीन पर नहीं आया। पकौड़ा बेचने का मकसद दरअसल स्वरोजगार की ओर प्रेरित करना था लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अपनी बात कहने के लिए जो उदाहरण इस्तेमाल किया वह उसकी गंभीरता को हल्का कर गया। विपक्ष को आलोचना के लिए एक मुद्दा भी दे दिया। नरेंद्र मोदी या तो अपने वादे के प्रति गंभीर नहीं रहे या फिर इसके लिए सही योजना नहीं बना सके। अब पेड़ लगाते फल की उम्मीद का उदाहरण देकर लोगों को फुसलाया जा रहा है। युवा वर्ग का एक हिस्सा सब्जबाग देखकर खुशफहमी का शिकार बना हुआ है। यह तटस्थ भाव से स्थिति की समीक्षा नहीं कर पा रहा है।

मंगलवार, 12 जून 2018

कोई है जो बिगाड़ना चाहता है रांची का माहौल



देवेंद्र गौतम

रांची। रमजान का महीना अपने समापन की ओर पहुंच रहा है। ईद का त्योहार करीब है और ऐसे में रांची की शांति व्यवस्था को भंग करने की सुनियोजित साजिश चल रही है। पुलिस और प्रशासन की सतर्कता के कारण षडयंत्रकारियों के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन तनाव बना हुआ है। इसे गहराने और भड़काने की कोसिश हो रही है। लेकिन यह साजिश कहां किसी संस्था की ओर से रची जा रही है, पता नहीं चल पा रहा है। रविवार 10 जून को भाजयुमो की मोटरसाइकिल रैली में शामिल कुछ लोगों ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भड़काऊ नारे लगाकर टकराव की कोशिश की। रांची मेन रोड से लेकर शहर के की इलाकों में माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया गया। मेन रोड पर दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई जिसमें तीन पुलिसकर्मियों सहित कई लोग घायल हो गए। सुरक्षा बलों ने आधे घंटे के अंदर स्थिति पर काबू पा लिया।
रविवार की ही रात को शहर के दलादिली चौक पर दो मौलानाओं पर कुछ असामाजिक तत्वों ने जानलेवा हमला कर दिया। वे अस्पताल में इलाजरत हैं। पुलिस ने हमलावरों को अगले ही दिन गिरप्तार कर लिया। इस घटना के दो दिन बाद मंगलवार को नगड़ी में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश की गई। सुरक्षा बलों ने इसे भी नियत्रित कर लिया।
सीधे तौर पर देखा जाए तो इसे भाजपा समर्थित संगठनों की 2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा कहा जा सकता है। निश्चित रूप से सांप्रदायिक हिंसा भड़कने से ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होगी और इसका चुनावी लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन रांची में आतंकी संगठनों से जुड़े लोग भी चिन्हित किए गए हैं। हिरासत में लिए गए हैं। पाकिस्तान समर्थित आतंकी देश को अशांत करने को कोई मौका चूकते नहीं। संभव है कोई आतंकी संगठन सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए भाजपा के कंधे पर बंदूक चला रहा हो। खुफिया संस्थाओं को इस मामले की जांच करनी चाहिए और राज्य सरकार को षडयंत्रकारियों की नकेल कसनी चाहिए। पुलिस प्रसासन के लोग जिस सतर्कता के साथ स्थिति को नियंत्रित कर रहे है इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। झारखंड में भाजपा की सरकार है। लेकिन सरकार चुनावी लाभ के लिए आंख मूंदने की जगह शांति व्यवस्था को बनाए रखने को प्राथमिकता दे रही है। सुरक्षा बलों को काम करने की पूरी स्वतंत्रता दी जा रही है। रघुवर सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है।

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