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सोमवार, 18 जून 2018

सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ अभियान


सोशल मीडिया का जितना सदुपयोग हो रहा है उससे ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाहों के कारण देश के कई इलाकों में निर्दोष लोगों की पीट-पीटकर हत्या की घटनाएं हुई हैं। असम के कार्बी-एंलांग जिले के 29 वर्षीय नीलोत्पल और 30 वर्षीय अभिजीत नाथ एक झरने को देखने गए थे। स्थानीय लोगों ने बच्च चोर होने के संदेह में उन्हें पीट-पीटकर मार डाला। अभी रांची में एक आपत्तिजनक पोस्ट के कारण दो समुदायों के बीच हिंसक टकराव की नौबत आ गई। पुलिस-प्रशासन ने पोस्ट डालने वाले युवक को गिरफ्तार कर लिया और दोनों पक्षों को समझा बुझाकर मामला शांत कराया। एक पोस्ट के कारण बवाल होते-होते बचा। इस तरह की घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में आए दिन हो रही हैं।
दरअसल सोशल साइटों पर आतंकी और अपराधी गिरोहों के अलावा शरारती तत्वों की सक्रियता ने सरकार, साजाजिक संगठनों, बौद्धिक वर्ग और शांतिप्रिय नागरिकों को गंभीर चिंता में डाल दिया है। सरकारी स्तर पर सोशल साइटों के प्रमोटरों पर अंकुश लगाने, दबाव डालने से लेकर कड़े कानूनी प्रावधानों को लागू करने की कोशिश की गई। आपत्तिजनक पोस्टों के कारण कई गिरफ्तारियां हुईं, मुकदमे चले लेकिन कोई अंतर नहीं पड़ा।
समस्या यह है कि सोशल साइटों का निबंधन और संचालन अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के जरिए होता है। भारत सरकार के कानून उनपर लागू नहीं होते। उनपर प्रतिबंध भी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि  इससे सकारात्मक विचारों के आदान प्रदान का रास्ता भी बंद हो जाएगा जो वैश्वीकरण के इस युग में उचित नहीं होगा। सोशल साइटों के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए जन समुदाय की ओर से ही पहल करनी होगी। कानून के जरिए इसे नियंत्रण करने का प्रयास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के सरकारी दुराग्रह के रूप में देखा जाएगा।
सुखद बात यह है कि पूर्वोत्तर के असम राज्य से इसकी शुरुआत हो चुकी है। गौहाटी विश्वविद्यालय के पीजी स्टूडेंट्स युनियन के महासचिव मोंजित शर्मा ने दो निर्दोष पर्यटकों की हत्या की  घटना को गंभीरता से लिया और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ एक जागरुकता अभियान छेड़ने का निर्णय लिया। विश्वविद्यालय के करीब पांच हजार पीजी छात्र  इस अभियान में शामिल हो चुके हैं। अब  विश्वविद्यालय से संबद्ध 400 शैक्षणिक संस्थानों को इस अभियान से जोड़ा जा रहा है। छात्र युनियन की इस सकारात्मक पहल का कुलपति समेत वरीय अधिकारी भरपूर समर्थन कर रहे हैं। यह अभियान धीरे-धीरे एक बड़ा रूप ले सकता है। इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।




रविवार, 17 जून 2018

संघ ही बनेगा तारणहार



            
  
उपचुनावों में लगातार अपनी जीती हुई सीटें गवांने के बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं को समझ में आने लगा है कि उनका विजय रथ न मोदी के चमत्कार से संचालित था और न अमित शाह की रणनीतिक कुशलता से। संघ और भाजपा के समर्पित कार्यकर्त्ताओं की सक्रियता और आम जनता की आकांक्षाओं का लाभ भाजपा को मिल रहा था। शाह कार्यकर्त्ताओं की लगातार उपेक्षा करते रहे। उनसे जरखरीद गुलामों की तरह व्यवहार करने लगे। इधर नोटबंदी और जीएसटी की मार से बौखलाए देशवासियों का भी मोदी सरकार के प्रति मोहभंग होता गया। सरकार जनता के जख्मों पर मलहम लगाने की जगह बेतूकी दलीलें देती रही। मंत्रीगण गुस्सा भड़काने वाले बयान जारी करते रहे। शाह तो खैर खुद को बादशाह और चाणक्य के साक्षात अवतार समझने लगे। लोगों को यह समझाया जाता रहा कि उनका कोई विकल्प नहीं है। वे जो कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। तकलीफ हो रही है तो बर्दाश्त करें। जीडीपी और तरह-तरह की आंकड़ेबाजी के जरिए बताया जाता रहा कि भारत सबसे तेज़ अर्थ व्यवस्था बन चुका है। रोज कमाने-खाने वालों को भला इन आंकड़ो से क्या मतलब। उसे तो अपनी रोजी-रोटी पर भी संकट मंडराता दिखा। जीडीपी बढ़ने या घटने से से क्या अंतर पड़ता है।
इसी बीच विपक्षी दलों की एकता एक नई चुनौती के रूप में सामने आई। जनता को मोदीराज से छुटकारा पाने का रास्ता दिखाई पड़ने लगा। अपने अहंकारी स्वभाव और खुशफहमियों का ही भाजपा को खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। शाह और मोदी को अब समझ में आ रहा है कि राजनीतिक दल स्कूल नहीं होते जो हेडमास्टर की छड़ी से नियंत्रित होते हों। कार्यकर्त्ताओं की पहुंच अगर नेता तक नहीं होगी। पार्टी के अंदर उनकी भावनाओं की कद्र नहीं की जाएगी तो वे उदासीन होते जाएंगे। देशवासी जिस तरह अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से बेहतर काम की उम्मीद करते हैं उसी तरह क्षेत्र के लोग सत्तारुढ़ दल के कार्यकर्त्ताओं से अपनी समस्याओं के निदान की उम्मीद रखते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि उनकी पहुंच ऊपर के नेताओं तक नहीं है। पार्टी अध्यक्ष और मंत्री-संतरी उन्हें मिलने का समय ही नहीं देते तो उनको तरजीह देना बंद कर देते हैं। ऐसे में कार्यकर्त्ता वोटरों से किस मुंह से वोट मांगें। मोदी का चमत्कार यहीं फेल हो जाता है।
अब जो स्थिति उत्पन्न हुई है उससे भाजपा से कहीं ज्यादा चिंतित संघ है। संघ के लोग मोदी और शाह की जोड़ी को समय-समय पर सचेत करते रहे हैं। उनकी नीतियों की समीक्षा कर उन्हें संभावित परिणाम से आगाह करते रहे हैं लेकिन उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब जब मामला फंसता नज़र आ रहा है तो संघ ही चुनावी वैतरणी पार कराने वाला दिखाई दे रहा है। संघ और भाजपा नेतृत्व के बीच लगातार मंथन चल रहा है। कार्यकर्त्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए चौपाल लगाने के अलावा हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। संघ ने विपक्षी एकता के चक्रव्यूह को तोड़ने और भाजपा की स्थिति मजबूत करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिर भी 2014 के परिणामों तक पहुंचना संभव नहीं दिख रहा है। चार वर्षों से अधिक अवधि तक आम जनजीवन को तरह-तरह की परेशानियों में झोंकने के बाद डैमेज कंट्रोल में सरकार जितना विलंब करेगी परिणाम उतना ही विपरीत आएगा। भारत की जनता चीजों का चुपचाप निरीक्षण करती रहती है और चुनाव के वक्त अपना फैसला सुना देती है। ईवीएम का तिलस्म भी तभी चलता है जब जनता का व्यापक समर्थन हो। बिहार में लालू प्रसाद बैलेट बाक्स से जिन्न निकालते थे लोकिन जब समर्थन घटा तो उनका जिन्न भी चिराग के अंदर समा गया। अब लाख घिसने पर प्रकट नहीं हुआ। सरकारी तंत्र का लाभ भी अनुकूल स्थितियों में ही मिलता है। कर्नाटक में राज्यपाल ने पूरा साथ दिया लेकिन भाजपा की सरकार नहीं बनवा सके। लिहाजा मोदी और शाह को खुशफहमियों की चहारदीवारी से बाहर निकलकर धरातल पर आना होगा और जनता से वादा करना होगा कि अर्थ व्यवस्था में सुधार के नाम पर ऐसे प्रयोग नहीं करेंगे जिससे लोगों की परेशानी बढ़े और नतीजा शून्य निकले। अगर प्रयोग करने भी हों तो जाने-माने अर्थ शास्त्रियों से परामर्श कर, पूरा होमवर्क करके, उसका ब्लू प्रिंट तैयार करने के बाद ही करें। उसके तात्कालिक और दीर्धकालीन प्रभावों पर मंथन कर लें। लोग मोदी की आर्थिक नीतियों के कारण ही नाराज हैं और विकल्प की तलाश कर रहे हैं। कांग्रेस के विकल्प में उन्होंने जिसे चुना अब उसके भी विकल्प की तलाश करनी पड़ रही है। सरकार ने न कार्यकर्त्ताओं की भावनाओं की कद्र की न जन भावनाओं को समझने की कोशिश की। नतीजा सामने है। अब संघ ही भाजपा के अस्तित्व पर मंडराते संकट को दूर करने का रास्ता निकाल सकता है।
-देवेंद्र गौतम

झारखंडी अस्मिता पर दावेदारी की जंग


रांची। झारखंड में स्थानीयता के सवाल पर झारखंड नामधारी दलों के बीच रस्साकशी चल रही है। हर दल स्वयं को इसके प्रति दूसरों से ज्यादा प्रतिबद्ध होने का दावा कर रहा है। एक तरफ झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को एकत्र कर आंदोलन खड़ा करने की तैयारी में हैं दूसरी तरफ आजसू प्रमुख सुदेश महतो ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उनकी नीतियों पर सावाल खड़े किए हैं। आजसू झारखंड में एनडीए के सहयोगी दलों में प्रमुख हैं। सिल्ली और गोमिया विधानसभाओं के उपचुनावों में थोड़े अंतर से दूसरे स्थान पर रहने के बाद आजसू आलाकमान सुदेश महतो एनडीए से नाराज चल रहे हैं। उन्होंने एनडीए में रहते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास की स्थानीय नीति का लगातार विरोध किया है। अभी भूमि अधिग्रहण संशोधन प्रस्ताव को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद ताल ठोकते हेमंत सोरेन को आजसू के महासचिव राजेंद्र मेहता ने आड़े हाथों लिया है। श्री मेहता के मुताबिक झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड आंदोलन की सौदागीरी करता रहा है। कई बार आंदोलन को बेचा है। उसे स्थानीय नीति पर बोलने का कोई हक नहीं है। उनका कहना है कि हेमंत ने 2010 में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की थी। 14 महीने तक मुख्यमंत्री रहे लेकिन स्थानीय नीति बनाने की जरूरत नहीं समझी। जेपीएससी से क्षेत्रीय भाषाओं को हटाने पर सहमति दी। अगस्त 2017 में जब भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक सदन में आया तो उसका विरोध नहीं किया। सरकार की जनविरोदी नीतियों पर कभी आपत्ति नहीं की। अब सीएनटी-सीपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में रघुवर सरकार के बैकफुट पर आने का श्रेय ले रहे हैं। झारखंड की जनता जानती है कि संशोधन का विरोध आजसू ने किया था और सी के विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। विपक्ष के नेता ने तो अपनी सहमति दे ही दी थी। उन्होंने कहा कि आजसू एनडीए में जरूर है लेकिन झारखंडी अस्मिता के सवाल पर कभी समझौता नहीं करता। झामुमो अराजक कार्रवाइयां कर सकता है कोई निर्णायक आंदोलन नहीं। स्थानीयता की लड़ाई आजसू के अलावा कोई ईमानदारी से नहीं लड़ सकता।

-देवेंद्र गौतम

राष्ट्रीय तिरंगा सम्मान यात्रा अभियान जारी


चतरा जिले के सभी गांवों मे इस साल के अंत तक पहुंचेगी बिजली  : सुधांशु सुमन

रांची । राष्ट्र प्रेम के जज्बे से ओत-प्रोत और आत्मविश्वास से लबरेज झारखंड के प्रख्यात समाज सेवी सुधांशु सुमन ने कहा है कि उनकी कर्मभूमि चतरा के सभी गांवों में वर्ष 2018 तक बिजली पहुंच जाएगी। सभी गांव रौशन रहेंगे। ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना नहीं पड़ेगा। श्री सुमन रविवार को जिले के कुटी,चौथा सहित आसपास के गांवों में तिरंगा सम्मान यात्रा के दौरान ग्रामीणों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कई वर्षों से चतरा संसदीय क्षेत्र की जनता उपेक्षित है। सुदूरवर्ती गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। सम्मान यात्रा का नेतृत्व मो.गुलाम ने किया। इस अवसर पर ग्रामीणों ने हाथों में तिरंगा लेकर राष्ट्र प्रेम का अलख जगाते हुए देश भक्ति के नारे लगाए। तिरंगा सम्मान यात्रा मे काफी संख्या मे हिन्दू-मुस्लिम समाज के लोग शामिल थे। सुधांशु सुमन ने इस कार्यक्रम मे शामिल होने के लिए ग्रामीणों के प्रति आभार जताया।

हंगामा क्यों है वरपा.....


हंगामा क्यों है वरपा.....

झारखंड में भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद राजनीतिक फिज़ा गर्म होती जा रही है। तमाम विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। यह विपक्षी गठबंधन को मजबूत करने का अवसर प्रदान करने वाला मुद्दा बन गया है। 18 जून को इस मुद्दे को लेकर विपक्ष के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर विपक्षी दलों की बैठक बुलाई गई है। वे चाहते हैं कि सीएनटी-सीपीएनटी एक्ट के संशोधन प्रस्ताव की तरह सरकार इसे भी वापस ले-ले। यह स्थिति इसलिए त्पन्न हुई कि सरकार संशोधन के औचित्य पर सर्व सहमति नहीं बना पाई और अब इसे लेकर जिद पर अड़ी हुई है।  दूसरी तरफ विपक्ष को पता है कि जब वे इसके विरोध में सड़कों पर हंगामा करेंगे और जन-जीवन अस्त-व्यस्त होने लगेगा तो सरकार बैकफुट पर आने को विवश हो जाएगी। लेकिन विपक्ष को थोड़ी देर के लिए यह समझना चाहिए कि राष्ट्रपति किसी ऐसे प्रस्ताव को कैसे मंजूरी दे सकते हैं जो जनता के हित में न हो। उनके विवेक पर थोड़ा विश्वास करना चाहिए। सच यही है कि फिलहाल सरकार और विपक्ष के संयुक्त प्रयास से झारखंड का जन-जीवन अशांत करने की तैयारी की जा रही है।
     राज्य के भू-राजस्व मंत्री अमर बाउरी ने इसे जनोपयोगी कार्यों के लिए आवश्यक और राज्य के हित में बताया है। उनके अनुसार जमीन केवल सरकारी कार्यों और विकास योजनाओं के लिए अधिगृहित की जाएगी। विपक्ष की आशंका है कि इस संशोधन का इस्तेमाल कार्पोरेट घरानों को ज़मीन देने के लिए किया जाएगा। मंत्री अमर बाउरी भी झारखंड की मिट्टी से ही उपजे नेता हैं। लिहाजा उनपर या भाजपा के दूसरे नेताओं पर क्षेत्रीय वैमनस्य या पूर्वाग्र का आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि इतना बड़ा निर्णय लेने और इसपर अमल की प्रक्रिया शुरू करने के पहले सरकार यदि एक सर्वदलीय बैठक बुला चुकी होती तो आज यह आशंकाएं नहीं उठतीं। या तो प्रस्वाव लिया ही नहीं जाता या फिर इसमें कोई अवरोध नहीं आता। सवाल है कि प्रस्ताव सदन की स्वीकृति के बिना राष्ट्रपति तक नहीं पहुंच सकता था तो फिर सदन में विपक्ष ने वह आशंकाएं क्यों नहीं व्यक्त कीं जो अब कर रही हैं। विपक्ष का राजनीतिक धर्म होता है सत्तापक्ष के हर निर्णय का विरोध करना। लेकिन अगर सचमुच कोई लोकहितकारी काम हो रहा हो तो उसे हो जाने देना चाहिए। उसमें अडंगा नहीं डालना चाहिए। प्रस्ताव का वास्तविक चित्र इस विधेयक के प्रावधानों के बिंदुवार विश्लेषण के बाद ही साफ हो सकेगा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बिंदुओं पर कोई बात नहीं हो रही है। संशोधन के पीछे की भावना अथवा दुर्भावना को समझने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। रघुवर दास की सरकार कोई आकाश से नहीं टपकी है। झारखंड की जनता ने इसे जनादेश दिया है। सरकार सिर्फ पांच साल के लिए है। इसमें डेढ़ साल बचे हैं। इसके बाद से जनता की अदालत में फिर हाजिरी लगानी होगी। ऐसे में वह कोई ऐसा काम करने का जोखिम नहीं उठा सकती जिसके कारण जनता से मुंह छुपाना पड़े। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने का कोई मतलब नहीं होता।
     निश्चित रूप से रघुवर सरकार कहीं न कहीं ब्रिटिश काल में आदिवासियों के हित में बनाए गए कानूनों में बदलाव चाहती है। सीएनटी-एसपीएनटी एक्ट में संशोधन के असफल प्रयास से यह स्पष्ट है। लेकिन वह ऐसा क्यों चाहती है। उसके क्या तर्क हैं। इसे समझने की जरूरत है। इस सरकार को मूलवासियों का दुश्मन तो करार नहीं दिया जा सकता। अगर वह उद्योग-धंधों का विस्तार चाहती है। बाहरी निवेश लाना चाहती है तो इसमें गलत क्या है। निवेश आएगा तो राज्य का विकास होगा। रोजगार के अवसर सृजित होंगे। हम जांगल युग में तो वापस नहीं लोट सकते। समय के साथ चलना ही होगा। लड़ाई इस बात की होनी चाहिए कि विकास का ज्यादा से ज्यादा लाभ स्थानीय लोगों को मिले। औद्योगीकरण और विकास के लिए ज़मीन की जरूरत तो पड़ेगी ही। अगर ज़मीन का अधिग्रहण नहीं होगा तो विकास का पहिया आगे कैसे बढ़ेगा। दूसरी सोचने की बात यह है कि क्या अभी भी अंग्रेजों के बनाए उन कानूनों को उसी रूप में बने रहने देना चाहिए जिस रूप में ये बने थे। क्या आज 21 सदी में भी स्थितियां वही हैं जो 18 वीं, 19 वीं शताब्दी में थीं। ब्रिटिश शासन आदिवासियों के हित में था और आजाद भारत की सरकारें उनके विरोध में रही हैं यह सोच गलत है। अगर अंग्रेज झारखंड वासियों के इतने ही हितैषी थे तो उनके खिलाफ थोड़े-थोड़े अंतराल पर विद्रोह क्यों होते रहे...। उन्हें सर पर बिठाकर क्यों नहं रखा गया। गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्यों ने आखिर उनके बनाए कानूनों में संशोधन क्यों स्वीकार किया...। क्या उन्हें वह खतरे नहीं दिखाई दे रहे जो झारखंड के विपक्षी दलों को दिख रहे हैं। विकास और औद्योगीकरण की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता। इनका लाभ अथवा नुकसान किसी एक सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहता। आज जो विपक्ष में है, कल सत्ता में होगा। जो सरकार में है वह विपक्ष में बैठेगा लेकिन जो कार्य होंगे वह लंबे समय तक दिखाई देंगे। इस बात को समझने की जरूरत है और सत्ता तथा विपक्ष की आपसी खींचातानी का आम जनजीवन पर असर नहीं आने देना चाहिए। राजनीति हो लेकिन सदन में हो सड़कों पर नहीं।

-देवेंद्र गौतम



शनिवार, 16 जून 2018

सउदी अरबिया में आठ महीने से फंसे युवक की गुहार

गोरखपुर के रामलाल बहादुर यादव आठ महीनेे से सउदी अरबिया में फंसे पड़े हैं। उन्होंने एक वीडियो जारी कर मदद की गुहार लगाई है। भारत सरकार तक उनकी आवाज़ पहुंचे तो स्वदेश वापसी की कोई सूरत बने। सुनिए उनकी दर्द भरी कहानी उन्हीं की ज़ुबानी...

ईद के मौके पर जगाया राष्ट्रभक्ति का अलख



समाज सेवी सुधांशु सुमन के नेतृत्व में तिरंगा सम्मान यात्रा  

चतरा। ईद के पावन मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्र प्रेम की अद्भुत मिसाल पेश की। शनिवार को चतरा जिला के सिमरिया प्रखंड अंतर्गत चौथा, एडला और कुट्टी सहित अन्य इलाकों के ग्रामीणों ने प्रख्यात समाज सेवी और राष्ट्र प्रेमी सुधांशु सुमन की अगुवाई में तिरंगा सम्मान यात्रा में शामिल हो कर राष्ट्र भक्ति का अलख जगाया। इस सम्मान यात्रा की खासियत यह थी कि इसमें शामिल अधिकतर लोग मुस्लिम समुदाय के थे। ग्रामीण अपने हाथों में तिरंगा लहराते हुए " सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा, जय जवान-जय किसान " सहित देश भक्ति के अन्य नारे लगा रहे थे। तिरंगा सम्मान यात्रा के दौरान राष्ट्र भक्ति का अद्भुत नजारा दिख रहा था।
 गौरतलब है कि राष्ट्र प्रेम के प्रति जन-जन को प्रेरित करने और राष्ट्रीय ध्वज  के सम्मान मे तिरंगा सम्मान यात्रा के प्रणेता और झारखंड के लोकप्रिय समाजसेवी सुधांशु सुमन विगत तकरीबन दो साल से झारखंड के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्र प्रेम और सांप्रदायिक सौहार्द का अलख जगा रहे हैं।
  यही नहीं श्री सुमन विशेष रूप से चतरा क्षेत्र की जनता की समस्याओं के समाधान के प्रति भी गंभीरता से सक्रिय रहते हैं। इस संदर्भ में श्री सुमन ने चतरा के सभी गांवों में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए गत दिनों विद्युत अधीक्षण अभियंता प्रभात कुमार श्रीवास्तव और महाप्रबंधक सुधीर सिंह से मुलाकात किया।ली अर्थ का अनर्थ करने पर तुली है। आज सेक्युलरिज्म गाली बन चुका है और सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद का प्रतीक। धर्म नफरत की पाठशाला बन चुका है।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...