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शनिवार, 23 जून 2018

राष्ट्रीय किसान महासंघ ने की गांव बंद आंदोलन की समीक्षा

 नई दिल्ली। राष्ट्रीय  किसान महासंघ की कोर कमेटी की मीटिंग आज पलवल में हुई। इस बैठक में 1 से 10 जून के गाँव बन्द आंदोलन की समीक्षा की गई और आगामी रणनीति पर चर्चा हुई।
बैठक में निम्न निर्णय लिए गए।
1). 4-5 जुलाई को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी जिसमें देशभर के सभी किसान संगठन शामिल होंगे।
2). 26 जुलाई से 26 अगस्त तक देशभर में किसानों से वादाखिलाफी करने वाली बीजेपी की "शवयात्रा" निकाली जाएगी। 26 जुलाई से यात्रा की शुरुआत जम्मू-कश्मीर से होगी और 22 अगस्त को केरल में खत्म होगी। 26 अगस्त को दिल्ली में किसानों की एक बड़ी रैली आयोजित कर के यात्रा का समापन किया जाएगा।
आज की मीटिंग में शिव कुमार कक्काजी, गुरनाम सिंह जी, जगजीत सिंह जी, सुरेश कौथ जी, संतवीर सिंह जी, राजकुमार गुप्ता जी, के.वी. बीजू जी, हामिद मलिक जी, अभिमन्यु कोहाड़ जी उपस्थित रहे।

इसके अलावा 4-5 जुलाई को राष्ट्रीय किसान महासंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली के एन. डी. तिवारी भवन में रखी गयी है। इसमें आंदोलन की आगामी रणनीति तय की जाएगी।
बैठक सुबह 10 बजे से शुरू होगी।
स्थान - कॉन्फ्रेन्स हाल, एन. डी. तिवारी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, निकट आईटीओ मेट्रो स्टेशन
सम्पर्क -
शिव कुमार कक्काजी - 9425010345  गुरनाम सिंह जी - 9812335244, जगजीत सिंह जी - 9417164682, संतवीर सिंह जी - 9928074836,
संदीप गिड्डे - 7038157711
हरपाल सिंह - 9758445521
हामिद मलिक - 7006316522
के. वी. बीजू - 9871368252
राजकुमार गुप्ता - 9302833617
अभिमन्यु कोहाड़ - 8950456616

शुक्रवार, 22 जून 2018

पत्थलगड़ी आंदोलन है या कोई गहरी साजिश

सरना धर्मावलंबी परंपरा के इस रूप को देखकर हैरान

रांची। आदिवासी परंपरा के नाम पर आदिवासियों के उत्पीड़न का माध्यम बन गई है पत्थलगड़ी। दिलचस्प बात यह है कि ईसाई बन चुके आदिवासी इस आंदोलन को संचालित कर रहे हैं जबकि सरना धर्म के माननेवाले आदिवासी अपनी परंपरा के गलत इस्तेमाल को लेकर हतप्रभ हैं। राज्य सरकार के समझ असमंजस की स्थिति है। ज्यादा सख्ती करने पर आदिवासी विरोध का आरोप लग सकता है।
झारखंड की राजधानी रांची से लगे खूंटी जिले के इलाके में पांच आदिवासी युवतियों को भीड़ की मौजूदगी में अगवा कर तीन घंटे तक गैंगरेप की घटना के बाद कोहराम मचा हुआ है। यह घटना पत्थलगड़ी के इलाके में हुई है। वहां आदिवासी परंपरा की रक्षा के नाम पर बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। एक पीड़ित युवती के बयान के मुताबिक उन्हें एक षडयंत्र के तहत कोचांग मिशन स्कूल के पास कार्यक्रम के लिए बुलाया गया। बाजार में नुक्कड़ नाटक करने के बाद स्कूल में बुलाया गया। वहीं पर आए हथियारबंद लोगों ने पूछा कि वे यहां कैसे आ गईं और पांच लड़कियों को उन्हीं की गाड़ी पर उठाकर 10 किलोमीटर दूर जंगल में ले गए। वहां तीन घंटे तक सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद वापस उसी जगह छोड़ गए जहां से उठा ले गए थे। इस घटना की साजिश में मिशन स्कूल के प्रिंसिपल तक की सहमति थी।
गैंगरेप के एक आरोपी का जारी किया गया स्केच
युवतियों का कुसूर यह था कि वे एक सामाजिक संस्था से जुड़कर मानव तस्करी के खिलाफ नुक्कड़ नाटक कर जागरुकता अभियान में शामिल थीं। उन्हें सबक सिखाने के लिए पत्थलगड़ी के इलाके में एक साजिश के तहत बुलाया गया था। पत्थलगड़ी के इलाके में प्रवेश करने का दंड इस रूप में दिया गया है। पत्थलगड़ी समर्थकों ने इस तरह परोक्ष रूप से सरकारी तंत्र को चुनौती दी है कि उनके इलाके में प्रवेश पर आदिवासी समाज को भी बख्शा नहीं जाएगा। युवतियों को भी नहीं। इसके अलावा वे मानव तस्करी को गलत नहीं मानते। इसके खिलाफ नहीं सुन सकते।
इस अराजक, अमानवीय और घृणित कार्रवाई के जरिए उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि वे आदिवासियों के भी सगे नहीं हैं। अपनी समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं। उन्होंने धन-बल और हर्वे हथियार जमा कर लिए हैं। अब आइएस की तर्ज  पर उनका जंगल का कानून चलेगा।
अब उन इलाकों पर गौर किया जाए जहां परिंदों को भी पर मारने से रोका जा रहा है। पहली बात यह इलाके अफीम की अवैध खेती के लिए चिन्हित रहे हैं। यहां कई बार छापेमारी हो चुकी है। अफीम की फसल जब्त कर जलाई जा चुकी है। दूसरी बात यह इलाके माओवादियों के सघन प्रभाव वाले रहे हैं। तीसरी बात यहां मिश्नरियों का काम लंबे समय से चल रहा है। अधिकांश आबादी ईसाई धर्म में दीक्षित है।
स्पष्ट है कि आदिवासी परंपरा के नाम पर अफीम की खेती सुरक्षित ढंग से करने के लिए सुरक्षा कवच बनाया जा रहा है। वर्ना ईसाई धर्म अपनाने के बाद सरना धर्म की परंपराओं की रक्षा के लिए इतनी बेताबी क्यों...। दूसरी बात यह कि साधारण आदिवासियों के पास इतने आधुनिक हथियार और ऐसी आपराधिक प्रवृति कहां से आ गई। पत्थलगड़ी आंदोलन के आसपास के गांवों के सरना धर्मावलंबी आदिवासी पत्थलगड़ी के इस रूप का विरोध कर रहे हैं।
अब जरा उत्तर भारत में अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया के नेटवर्क और गतिविधियों पर एक नजर डालें। दो दशक पहले तक बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित मोहनिया अफीम से हेरोइन तक की प्रोसेसिंग करने वाले भूमिगत कारखानों के केंद्र के रूप में चर्चित था। बाद में बिहार का सासाराम एक नए केंद्र के रूप में उभरा। इन अवैध भूमिगत कारखानों को कच्चे माल यानी अफीम की आपूर्ति बारावंकी के अफीम उपादक करते थे। उन्हें दवा औषधीय आवश्यकताओं के लिए सीमित मात्रा में अफीम उपजाने का लाइसेंस मिला हुआ था। वे तय रकबे से अधिक रकबे पर अफीम उपजाते थे और मोहनिया तथा सासाराम के ड्रग माफिया के हाथ बेच देते थे। एक बार बारावंकी के कुछ किसानों ने अफीम की जगह जापानी पुदीना की खेती की। इससे उन्हें जबर्दस्त आय हुई। इसके बाद अधिकांश किसान औषधीय पौधों की खेती करने लगे। अफीम की खेती की तरफ उनका रूझान कम होता गया।
इस प्रकरण के बाद ड्रग उत्पादकों को कच्चे माल की किल्लत होने लगी। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने झारखंड का रुख किया और नक्सलियों के साथ हाथ मिलाया। इसी के बाद झारखंड के कुछ नक्सल प्रभावित इलाकों में अफीम की अवैध खेती होने लगी। अब आदिवासी परंपरा के नाम पर उन इलाकों को पूरी तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश हो रही है।

गुरुवार, 21 जून 2018

आधुनिक जीवन का आधार है योगयोगः तुषार विजयवर्गीय



चौथे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर मारवाड़ी युवा मंच रांची शाखा के सदस्यों ने योग शिक्षक भास्कर रॉय की अगुवाई में ऑक्सिजन पार्क मोरहाबादी में योग किया।

इस दौरान मंच के अध्यक्ष तुषार विजयवर्गीय ने कहा कि योग ही वो साधना है जो जीवन को सुंदर बनाती है। योग के माध्यम से इंसान अपने आप को स्वस्थ रख सकता है। योग करने से बीमारियों का सर्वनाश होता है। योग हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मंच अध्यक्ष ने कहा कि योग एक विचार नहीं बल्कि भारतीय जीवन पद्धति है जिसमें भारतीय जीवन मूल्य यानि संस्कृति समाहित हैं। शून्य के आधार पर आधुनिक विज्ञान स्थापित हुआ उसी तरह आधुनिक जीवन का आधार बनता जा रहा है योग। भारतीय वैदिक परम्परा की यह जीवन पद्धति विश्व पटल पर स्वीकार की जा रही है और इसे भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। साफ है कि योग वो जरिया बन गया है जिससे प्राचीन काल से समृद्ध रही भारतीय सभ्यता-संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो रहा है।

योग शिक्षक भास्कर राय ने मंच के  सदस्यों को प्रतिदिन करने वाले कई आसान योग टिप्स दिए और कहा, आज के इस भाग दौड़ की ज़िंदगी से कुछ समय निकालकर हम योग करे तो हम स्वस्थ रह सके। हमारा जीवन आयु बढ़ सकता है। हम फिट रह सकते हैं। हमे कोई रोग नही हो सकता है।

वही मंच के सदस्यों ने प्रतिदिन योग करने का संकल्प लिया।

मारवाड़ी युवा मंच राँची शाखा योग के लिए लोगो के बीच जागरूकता अभियान चलाएगी। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग योग के लिए प्रेरित हो सके।

इस अवसर पे सचिव दीपक गोयनका,उपाध्यक्ष मनीष लोधा,अमित चौधरी, अमित सेठी,दीपक जालान, रवि अग्रवाल,आशीष डालमिया,विकास अग्रवाल,रौनक झुनझुनवाला,रोहित सरावगी,वीरेंद्र तोसावर,अजय खैतान,प्रमोद मोदी,अंकित अग्रवाल,माधव अग्रवाल और किशु जी आदि उपस्थित थे।

रांची में महिलाओं ने किया. सामूहिक.योग

फीमेल फिटनेस प्रो क्लासेस की पहल लाई रंग

*निरंतर योग को महिलाओं ने बनाया जीवनशैली का अभिन्न अंग*


रांची। योग से जुड़कर आज महिलाएं ना सिर्फ स्वास्थ्य है बल्कि उनके जीवनशैली व कार्यक्षमता में अनुकूल बदलाव हुआ है। महिलाओं ने योग को अपने जीवन शैली का एक अभिन्न पार्ट बना लिया है। यह संभव हो सका है स्मृति अपार्टमेंट न्यू एरिया गांधीनगर हिंनू रांची में संचालित फीमेल फिटनेस प्रो क्लासेस के माध्यम से। गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से योग किया और अन्य लोगों को योग के लिए प्रेरित किया। संचालिका शशि प्रिया ने बतलाया कि निरंतर योग करने से महिलाओं के जीवन में बदलाव आया है। आलस्य, जोड़ों के दर्द, सांस लेने की परेशानी व मोटापे जैसी जटिल समस्याओ से काफी हद तक निजात  मिल रहा है। निरंतर योग के माध्यम से महिलाओं ने 15 से 17 किलो तक अपना वजन भी कम किया है और जटिल बीमारियों से निजात मिला है। उन्होंने अधिक से अधिक लोगों को योग से जुड़कर स्वस्थ रहने की अपील की है। मौके पर मुख्य रुप से इंदु देवी, श्वेता सिंह, पायल, श्वेता सिंह, सुषमा सिंह, अनुराधा सिंह, अनुराधा लाल सहित सैकड़ों महिलाएं मौजूद थी।

प्रेरणा का संचार करने लगा तिरंगा यात्रा अभियान



एकता काऊ मूलमंत्र है तिरंगा :सुधांशु सुमन

चतरा के सुदूरवर्ती व नक्सल  गांवों के ग्रामीणों ने गाया राष्ट्रट्रगान

रे ग्राम सेवा फाउंडेशन के तहत चलाये जा रहे तिरंगा सम्मान यात्रा देश के सभी राज्यों में जोरो से आगे बढ़ रही है। तिरंगा सम्मान यात्रा के सूत्रधार व प्रसिद्ध समाजसेवी और रांची एक्सप्रेस के चेयरमैन सुधांशु सुमन द्वारा तिरंगा सम्मान यात्रा की शुरुआत 1अक्टूबर 2016 में किया गया जो 2024 तक काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक समापन होगी।  तिरंगा सम्मान यात्रा अब हर गांव - गांव,कस्बा-कस्बा,टोला-मुहल्ला तक  तिरंगा के महत्व को बतलाया जा रहा है।

तिरंगा सम्मान यात्रा के उद्देश्य यह है कि देश के 125 करोड़ लोगों तक तिरंगा का महत्व और शहीदो व महापुरुषों के बारे में जानकारी देना। रांची एक्सप्रेस ग्राम सेवा के माध्यम से झारखंड को तिरंगा मय,राष्ट्रभक्ति, राजभवी,सामाजिक समन्वय, अखण्डता,सामाजिक समरसता, नशा मुक्त,चुआं मुक्त,गरीबी मुक्त करने मकसद है।
साथ साथ ग्राम एक्शन प्लान के माध्यम से गांव का विकास होगा,गांव से हो रहे पलायन व्यक्ति को रोकने का कार्य किया जा रहा है,शिक्षा के लिये विद्यालय एवं महाविद्यालय,सड़क,पेयजल,सिचाई के लिये चेकडेम का भी निर्माण किया जा रहा है।
आजाद भारत में सुदूरवर्ती गाँवों के भोले -भाले ग्रामीण ,किसान,मजदूर बच्चे लोग तिरंगा का अर्थ पूर्ण रूप से नही समझते थे आज तिरंगा सम्मान यात्रा के सूत्रधार सुधांशु सुमन ने झारखंड के चतरा, लातेहार, हजारीबाग, पलामू, के हर सुदूरवर्ती गांवो का दौरा किया और वहा तिरंगा से हर व्यक्ति को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।

शायद इसलिए भारत के कई ऐसे लोग जातिवाद ,धर्मवाद के भेद- भाव में अपने देश की पहचान तिरंगा के संदेश को भुल गये है .यही कारण है कि आज भारत के अधिकांश क्षेत्रों में संप्रदायिक झगड़े उत्पन्न हो रहे है ,जिससे हमारी एकता के ईट खिसकते नजर आ रहे है .यह देखकर सुधांशु सुमन ने भारत माता व तिरंगे को सम्मान देने का कार्य प्रारंभ किया है।
इन्होंने तिरंगा सम्मान यात्रा निकाल कर एकता ,जाती-धर्म रूपी इमारते के खिसकते ईट को राजमिस्त्री की तरह जोड़ने का काम कर रहे है ।तिरंगा यात्रा के सूत्रधार सुधांशु सुमन के यह  अभियान से अब हर व्यक्ति तिरंगा को समझ रहे है।

रे ग्राम सेवा फाउंडेशन द्वारा भारत के वैसे सुदूरवर्ती गांव में तिरंगा यात्रा निकाला जा रहा है ,जहां चुवां नदी -नाले,बिजली और सड़क की व्यवस्था नही है लोग पगडंडियों के सहारा पर निर्भर रहते हैं बुनियादी समस्याओं से वंचित रहते हैं तथा मूलभूत आवश्यकताओं से कोसो दूर है।वैसे स्थानों में सुधांशु सुमन ने तिरंगा यात्रा निकालकर नागरिकों को मौलिक अधिकार एवं उनकी इन सभी परेशानियों को दूर करने के लिये राज्य सरकार व केंद्र सरकार से बात करेंगे और सुदूरवर्ती गांवो में इनसभी समस्या से निजात दिलाएंगे।

सुधांशु सुमन  का कहना है कि पूरे देश में 6 लाख 47 हजार गांव हैं। 32,623 गांवों वाला झारखंड राज्य में 24 जिले हैं जिसमें चतरा, लातेहार, हजारीबाग, पलामू में तिरंगा यात्रा जोरो से चल रहा है।

उन्होंने कहा कि रांची एक्सप्रेस ग्राम सेवा के ग्रीन इंडिया, क्लीन इंडिया, एजुकेट इंडिया, पेट्रोटिक इंडिया की थीम पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि गांवों के विकास को जमी पर उतारने की जरूरत है, ताकि विकास का खाका जमी पर लाया जा सके। तिरंगा लोगों के बलिदान का प्रतीक है। इसके सम्मान को कायम रखना हमारी प्राथमिकता है।

बुधवार, 20 जून 2018

बंदी का समाजशास्त्र

राजनीतिक दल बंद को विरोध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। फिर उसे सफल बनाने के लिए सड़कों पर तांडव मचाते हैं। तोड़ फोड़, मारपीट, वाहन जलाने जैसे कृत्य करते हैं। इस तरह कराया गया बंद कभी भी जन समर्थन का प्रतीक नहीं होता। यह नुकसान के भय से सावधानी के तौर पर उठाया गया कदम होता है। कभी-कभी कुछ ऐसा मुद्दा सामने आ जाता है जब कोई दल बंद का आह्वान न भी करे तो जनता स्वतः स्फूर्त ढंग से बंद पर चली जाती है। इलाके के किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या किसी व्यापारी का निधन होने पर स्वतः बाजार बंद हो जाता  है। इसके लिए किसी को आह्वान नहीं करना पड़ता। स्वतः स्फूर्त बंद ही मुद्दा विशेष पर जनता की राय का प्रतीक होता है अन्यथा दल विशेष की अराजकता का प्रदर्शन। भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधन प्रस्ताव को लेकर झारखंड दिशोम पार्टी का बंद इसलिए सफल नहीं हो सका कि उसके पास सड़कों पर उधम मचाने के लिए पर्याप्त कार्यकर्ता नहीं थे। विरोध के कारणों की जानकारी आम अवाम तक नहीं पहुंच सकी थी या फिर वे सरकार के पक्ष को सही मान रहे थे। अब पांच जुलाई को सभी विपक्षी दल झारखंड को बंद कराने के लिए सड़कों पर उतरेंगे। इसके लिए पहले से ही कारयक्रम शुरू हो जाएंगें। लोगों तक अपनी राय पहुंचाई जाएगी। इसके बाद अगर लाठी डंडा लेकर जोर-जबर्दस्ती करने की जरूरत पड़ी तो विपक्ष को यह मान लेना चाहिए कि वे जनता को अपने पक्ष से सहमत नहीं करा  सके। स्वतः स्फूर्त बंदी में कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं आती इसलिए सरकार जोर-जबर्दस्ती नहीं कर सकती। लेकिन राजनीतिक दलों में इतना सब्र कहां।

चुनावी तैयारी के तहत दिया झटका

मोदी सरकार के पास 2019 में जनता के पास जाने के लिए एकमात्र कश्मीर मुद्दा ही बचा था। इसके लिए एक झटके की जरूरत थी। पीडीपी सरकार से समर्थन वापसी इसी रणनीति का हिस्सा है। वरना जम्मू-कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं हुआ जो पहले नहीं हो रहा था। मोदी सरकार ने अपनी चार वर्षीय कार्यकाल की उपलब्धियों से देशवासियों को अवगत कराने के लिए अपने नुमाइंदों को छोड़ा जरूर लेकिन वे जनता पर कोई खास असर नहीं डाल पा रहे थे। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और प्रयोगों से जो जख्म लगे उपलब्धियों के दावे उसपर नमक छिड़कने का  ही काम कर रहे थे। अब दो ही रास्ते बचे थे। महंगाई को नियंत्रित कर लोगों को राहत पहुंचाना या फिर लोगों का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ देना।सरकार ने दूसरा रास्ता अपनाया। कश्मीर संवेदनशील मुद्दा है जो पूरे देश को प्रभावित करता है। वहां सैनिक कार्रवाई तेज़ कर लोगों को भावनात्मक डोज दिया जा सकता है। यह दावा किया जा सकता है कि दूसरी कोई भी सरकार कश्मीर में आतंकियों की नकेल नहीं कस सकती। जम्मू के हिन्दू बहुल लोगों की सहानुभूति भी प्राप्त की जा सकती है। इससे हिंदुत्व कार्ड को भी नये सिरे से भुनाने का अवसर मिल सकता है। महबूबा सरकार से समर्थन वापसी को चुनावी तैयारी के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। यह बहुत सोच समझ कर गंभीर मंथन के बाद लिया गया निर्णय है।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...