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शनिवार, 23 जून 2018

लुगु पहाड़ के जंगलों में......







 कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं जिनका एक-एक लम्हा स्मृति पटल पर स्थाई रूप से अंकित हो जाता है। कुछ घटनाएं इतनी हैरत-अंगेज़ होती हैं कि उन्हें दैवी प्रभाव मानने में आधुनिक सोच आड़े आती है और उनकी वैज्ञानिक व्याख्या संभव नहीं होती. ऐसी ही एक घटना हमारे साथ 1993-94 के दौरान पेश आई थी जब हम गोमिया के घने जंगलों में रास्ता भूल गए थे. विनोबा भावे विश्वविध्यालय के एन्थ्रोपोलोजी के विभागाध्यक्ष अंसारी साहब ने मेरे साथ गोमिया के लुगु पहाड़ पर चलने का प्रोग्राम बनाया था. घने जंगलों से भरे उस पहाड़ की साढ़े तीन हज़ार फुट ऊंचाई पर स्थित गुफाओं की यात्रा मैं 1987-८८ के दौरान कई बार कर चुका था और कमलेश्वर जी  के संपादन में उन दिनों प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका गंगा के लिए उसपर स्टोरी भी लिख चुका था. लिहाज़ा बेरमो कोयलांचल में मुझे उस रहस्यमय पहाड़ का जानकार माना जाता था.
               
  पहाड़ जंगल में ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ होने पर ही आनंद आता है. हमारे प्रोग्राम की चर्चा होने पर बेरमो कोयलांचल के दो पत्रकार मित्र ओम प्रकाश कश्यप और असफाक आलम मुन्ना भी साथ चलने के लिए तैयार हो गए. हम सफ़र की तैयारी में लग गए. चार-पांच दिन का राशन, मोमबत्तियां, टार्च आदि ले लिए गए. सामान ढोने और गुफा में भोजन बनाने के लिए एक आदमी को तैयार किया लेकिन सुबह के वक़्त जब हम ट्रेन पकड़ने के लिए बेरमो स्टेशन पहुंचे तो पट्ठा धोखा दे गया. पहुंचा ही नहीं. अंसारी साहब ने कहा कि दनिया स्टेशन पर उतरने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता धनीराम मांझी के पास चलेंगे. वे कोई न कोई आदमी दे देंगे. हमलोग ट्रेन पर सवार हो गए. डेढ़-दो घंटे बाद ट्रेन दनिया पहुंची तो हम नीचे उतरे. उग्रवाद प्रभावित जंगलों के बीच एक छोटी सी बस्ती के पास स्थित यह बिना प्लेटफार्म का छोटा सा स्टेशन है जो थोडा ढलान पर पड़ता है. बाहर निकलने के लिए कच्चे रास्ते से ऊपर निकलना होता है. ऊपर आते ही एक मिटटी-फूस का ढाबा है. हमने वहां चाय-नाश्ता किया. धनीराम मांझी का घर दस कदम पर ही था. हम उनके घर पर पहुंचे. वहां उनके भतीजे से भेंट हुई. उसने हमारा स्वागत किया. नाश्ता-पानी कराया. पता चला कि आर्थिक नाकेबंदी के कारण पुलिस की दबिश बढ़ी है और नेताजी भूमिगत हो गए हैं. हमने उनके भतीजे को अपनी समस्या बताई साथ ही हमारी यात्रा की जानकारी माओवादियों तक पहुंचवा देने को कहा ताकि पहाड़ पर हमारी उपस्थिति से वे सशंकित न हों. उसने कहा कि गांव के ज्यादातर नौजवान जंगल में महुआ चुनने निकल चुके हैं. कोई गाइड मिलना मुश्किल है. फिर भी वह कोशिश करता है. कुछ देर बाद एक युवक मिला लेकिन वह पहाड़ की तलहट्टी तक ही पहुंचाने को तैयार हुआ. मैंने कहा कि मैं पहाड़ पर कई बार जा तो चुका हूं लेकिन जंगल के रास्ते बहुत याद नहीं रहते फिर भी चलते हैं. धनीराम जी के घर से निकलने के बाद हमने एक पहाड़ी नदी पार की इसके बाद छोटी-छोटी आदिवासी बस्तियों और तलहट्टी के जंगल के बीच से होते हुए आगे बढे. इस इलाके में ज्यादातर संथाल जनजाति के लोग रहते हैं. एक-दो टोले  बिरहोरों के हैं. इस जंगल में ज्यादातर सखुआ के छोटे बड़े वृक्ष हैं.  
       
  कच्ची पगडंडियों पर पांच-छः किलोमीटर चलने के बाद हम पहाड़ की तलहट्टी में पहुंचे. रास्ते में एक जगह पत्थरों का एक ढेर मिला. स्थानीय आदिवासी इसे पत्थर बाबा या वनदेवी का स्थान मानते हैं. मान्यता है कि पहाड़ पर चढ़ने के पहले इस स्थान पर एक पत्थर श्रद्धा के साथ चढ़ा देने पर रास्ते की बाधाएं दूर हो जाती हैं और जंगली जानवरों का भी भय नहीं रहता. हमने भी पत्थर बाबा को पत्थर समर्पित किया था.   
                    पहाड़ की तलहटी में  पहुंचाने के बाद हमारा मार्गदर्शक ललपनिया की और निकल गया. हम चढ़ाई की और जानेवाली  पगडंडी पर चल पड़े. थोड़ी दूर चलने के बाद पगडंडी से दो रास्ते फूट पड़े. बस यहीं मैं अटक गया. किस पगडंडी से जाना है याद नहीं आ रहा था. इस जंगल में भटकने का अंजाम बहुत बुरा हो सकता था. अभी हम सोच ही रहे थे कि पता नहीं किधर से एक काले रंग का देसी कुत्ता आया और एक पगडंडी पर चलने लगा. मैंने अंसारी साहब और पत्रकार मित्रों से उसके पीछे-पीछे चलने का इशारा किया. ऐसी कहावत है कि इस पहाड़ पर कोई रास्ता भटकता है तो कोई न कोई जानवर आकर रास्ता दिखा देता है. कभी बन्दर कभी दूसरा जानवर. अपनी आंखों से यह करिश्मा पहली बार देख रहा था. उस पहाड़ की आकृति ऐसी है कि शुरूआती डेढ़ हज़ार फुट की चढ़ाई बहुत ही तीक्ष्ण है. करीब 75 डिग्री के कोण पर चट्टानों के सहारे चढ़ना होता है. नीचे  गहराई की और  निगाह जाने पर कलेजा धड़क उठता है. हमारा मार्गदर्शक कुत्ता सामान्य तौर पर हमारे पीछे-पीछे चल रहा था लेकिन हम जहां अटकते थे वह आगे आकर रास्ता बता देता था. रास्ते में एक जगह झरने की कल-कल ध्वनि सुनाई पड़ी लेकिन कहीं झरना नज़र नहीं आया. इस रमणिक स्थल को गुप्तगंगा कहते हैं. दरअसल यहां पहाड़ की ऊंचाई से उतरता नाले का पानी चट्टानों के अन्दर से होकर गुजरता है. तीखी चढ़ाई का हिस्सा पार करने के बाद हमें चाय की तलब हुई. थोड़ी सूखी लकड़ी चुनी गयी. कुछ बड़े पत्थर चुनकर चूल्हा बनाया गया और नाले के पानी में चाय चीनी चढ़ा दी गयी. दूध की जरूरत भी नहीं थी और वह उपलब्ध भी नहीं था. इसके बाद करीब 1000  फुट की चढ़ाई अपेक्षाकृत आरामदेह है लेकिन अंतिम 1000 फुट की चढ़ाई सबसे कठिन है. इस हिस्से में गेरू की फिसलन भरी चट्टानों पर तीखी चढ़ाई चढ़नी होती हैं. अपना संतुलन बनाये रखना मुश्किल हो जाता है. गुफा से थोड़ी दूर पहले ललपनिया की और आती पगडंडी इस पगडंडी से मिलती है. ललपनिया में ही तेनुघाट विद्युत् निगम का सुपर थर्मल प्लांट है. 
                         उस दिन हम पगडंडियों के जंक्शन पर पहुंचने वाले थे कि ऊपर चढ़ाई पर 10-15 हथियारबंद युवकों का एक झुण्ड दिखाई पड़ा. उनमें 6-7 लोगों के पास देसी रायफलें थीं. शेष लोगों के पास तीर-धनुष, कुल्हाड़े आदि परंपरागत हथियार. उनकी नज़र हमीं लोगों पर टिकी थी. मैं समझ गया कि माओवादियों का दस्ता है. मैंने साथियों से कहा कि आपलोग चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आने दीजिये और सामान्य रूप से चलते रहिये. हमारे आगमन की सूचना उनतक पहुंची थी या नहीं कुछ पता नहीं था. बहरहाल हम  ऊपर की और बढ़ते गए तो रायफल वाले दो टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग ढलान से तिरछे उतर  गए. वे हमें पीछे से घेर सकते थे. दो-तीन तीर-धनुष वाले हमारी और आये इससे पहले कि वे कुछ पूछते मैंने पूछा-'लुगु बाबा की गुफा अभी कितनी दूर है?' उसने जवाब दिया-'बहुत दूर है.'  ' अच्छा! ललपनिया की पगडंडी से यह जहां मिलती है वह जगह कितनी दूर है.'  उसके चेहरे पर नाराजगी के भाव उभरे. पूछा-जब जानता है तो पूछता क्यों है?'  'बहुत दिनों पर आये हैं इसलिए थोडा गड़बड़ा रहा था.' उनहोंने कोई जवाब नहीं दिया और नीचे की और चल दिए. हमारी सांस में सांस आई. इन घटनाओं से हमारे मार्गदर्शक कुत्ते को कोई मतलब नहीं था. वह हमारे साथ बना हुआ था.
                         थोड़ी देर बाद हम गुफा में पहुंचे तो वहां चबूतरे पर आदिवासी भगत और भगतिन मिले वे हमें देखते ही खुश हो गए. वे कई दिनों से आये हुए थे. उनका इरादा पूर्णिमा तक ठहरने का था लेकिन उनका राशन ख़तम हो गया था. दो दिनों से भूखे थे. हमने उन्हें मिक्सचर खाने को दिया. हवनकुंड में चाय चढ़ाई. उन्हें आश्वश्त किया कि हम काफी राशन लाये हैं. चिंता की बात नहीं.हमने बताया कि यह कुत्ता नहीं होता तो हम भटक जाते. आदिवासी दम्पति ने आश्चर्य से कहा कि यह तो यहीं गुफा में रहता है. नीचे कैसे चला गया. सब लुगु बाबा की कृपा है. रात को हवनकुंड के अलाव में लिट्टी बनायीं. भगत ने उसमें प्याज लहसुन डालने से मना किया. बोला कि दिन में प्याज-लहसुन डालकर खिचड़ी बनानी होगी तो गुफा के बाहर बना लेना. हमलोग अन्दर सादा  भोजन बना लेंगे. लिट्टी काफी स्वादिष्ट लगी. हमने कुत्ते को भी दिया उसने प्रेम से खाया.
                         अगले दिन हमलोग गुफा के बगल में बने मंदिर के बरामदे पर बैठ कर ब्रश कर रहे थे कि तभी माओवादियों का दस्ता आया. हमसे कुछ बोले बगैर वे करीब से गुजरे आगे जाकर दो-तीन फायर किये और जंगल में घुसते चले गए. मैंने अंसारी साहब से कहा कि प्राचीन सभ्यता के अवशेष गुफा के 100 गज के दायरे में ही खोजिएगा नहीं तो ये लोग हमें भी प्राचीन बना देंगे. पता नहीं उनको हमारे आने की खबर है कि नहीं. हमसे उन्होंने कोई बात तो की नहीं. इसके बाद खिचड़ी बनाने का मोर्चा ओमप्रकाश और मुन्ना ने संभल लिया. मैं अंसारी साहब के साथ थोड़ी दूर पर एक चट्टान पर बैठ गया. मानव सभ्यता के इस स्थान से संबंधों की संभावनाओं पर चर्चा होने लगी. इस बीच हम जिधर-जिधर भी गए वह कुत्ता साये की तरह हमारे साथ रहा. खिचड़ी पक जाने पर हम उसे लेकर नाले के पार चट्टानों के बीच चले गए. सखुआ के पत्तों पर उसे परोसा गया. एक पत्ते पर थोड़ी खिचड़ी कुत्ते के पास भी रख दी गयी. लेकिन आश्चर्य! उसने खिचड़ी को सूंघा और दूर जाकर बैठ गया. मुंह तक  नहीं लगाया. हड्डी और मांस खाने वाले जानवर को प्याज लहसुन से परहेज़  ? बात कुछ समझ में नहीं आई.
                    शाम के वक़्त रामगढ कैम्प के दो फौजी जवान पहुंचे. हमारी उनसे मित्रता हो गयी. हम उनके साथ घुमने-फिरने लगे. उनके आने के बाद वह कुत्ता पता नहीं  कहां चला गया. जाने कैसे वह समझ गया कि फौजियों के पहुचने के बाद हमारे भटकने का खतरा नहं है. अगले दिन मौसम बहुत ख़राब हो गया था. कुहासे की शक्ल में बादल मंडरा रहे थे. छिटपुट बारिश भी हो रही थी. शिकार खेलने, महुआ चुनने, लकड़ी काटने वाले भी जंगल में नहीं आये थे. फौजी जवानों ने कहा कि मौसम ख़राब है आपलोग भी हमारे साथ उतर चलिए. हमें उनका सुझाव सही लगा. हमने साथ लाया राशन भगत-भगतिन के हवाले किया और अपना सामान समेटकर उनके साथ चल दिए. वापसी के दौरान भी वह कुत्ता कहीं दिखाई नहीं पड़ा. हम समझ नहीं सके कि उसे कैसे पता चला कि अब वापसी में हमें कोई दिक्कत नहीं होगी.
     आज की तारीख में उस पहाड़ पर चढ़ना मुश्किल है। नतो उम्र इसकी इजाजत देगी न शरीर. प्रसन्नता की बात यह है कि झारखंड सरकार ने उसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का फैसला किया है. वह आदिवासी आस्था का केंद्र तो है ही. प्राकृतिक पर्यटन का केंद्र भी बन सकता है। उसके हिल स्टेशन के रूप में विकसिन होने की पूरी संभावना है. लेकिन यह तभी संभव है जब माओवादी उस इलाके को खाली कर दें या उसका विकास होने दें.

...तो क्या सचमुच सबसे बड़ा घोटाला थी नोटबंदी



धीरे-धीरे इस आरोप की पुष्टि हो रही है कि भाजपा के शीर्ष नेताओं को नोटबंदी की पहले से जानकारी थी और उन्होंने इसका भरपूर लाभ उठाया था। भाजपा की विभिन्न इकाइयों पर बिहार समेत देश के कई राज्यों में नोटबंदी से ठीक पहले बड़े-बड़े भूखंड खरीदने का आरोप तो 2016 में ही लगा था। इसकी कोई जांच-पड़ताल नहीं हुई। इधर एक नई बात सामने आई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े सहकारी बैंक के जरिए 745.58 करोड़ के पुराने नोट बदले गए। यह रकम देश के 370 जिला स्तरीय सहकारी बैंकों में सबसे ज्यादा है। यही नहीं भाजपा नेताओं से जुड़े सहकारी बैंकों में सबसे ज्यादा नोट जमा किए और बदले गए हैं। राहुल गांधी ने पहले ही नोटबंदी को आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया था। अब उनकी बात सत्यता के करीब पहुंच रही है। इस मामले की पुष्टि नबार्ड ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए प्रश्न के जवाब में की है। महाराष्ट्र के सूचना अधिकार कार्यकर्ता मनोरंजन एस राय ने नबार्ड से सूचना अधिकार के तहत स संबंध में जानकारी मांगी थी। इसपर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्य वरिष्ट नेताओं ने आरोपों की बौचार की है लेकिन अभी तक भाजपा की ओर से कोई सफाई नहीं आई है। ट्वीटर पर यह मामला गर्म है। टेलीग्राफ ने इसकी विस्तृत रपट प्रकाशित की है। उल्लेख्य है कि नोटों की अदला-बदली नोटबंदी की घोषणा के दो दिन बाद 10 नवंबर से शुरू हुई थी। 14 नवंबर को सहकारी बैंकों में पुराने नोटों को जमा करने पर पाबंदी लगा दी गई थी। तर्क यह था कि उनके जरिए काले धन को सफेद किया जा सकता है। सहकारी बैंकों में यह रकम मात्र पांच दिनों में जमा की गई है।
अहमदाबाद जिला को-आपरेटीव बैंक जिसमें सबसे बड़ी राशि जमा की गई, अमित शाह उसके चेयरमैन हुआ करते थे। अब उनके करीबी भाजपा नेता अजय पटेल चेयरमैन हैं। शाह सिर्फ निदेशक मंडल के सदस्य हैं। कांग्रेस के संचार प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने सवाल किया है कि यह रकम किसकी थी। उनका कहना है कि उन्होंने सरकार से नोटबंदी से पूर्व और उसके पश्चात 25 लाख से अधिक राशि जमा करने वालों की सूची मांगी थी लेकिन उसे मुहैय्या नहीं कराया गया। उनका कहना है कि बड़े भूखंडों की खरीद संबंधी जानकारी उनके पास है। नोटबंदी से पूर्व कुछ भाजपा नेताओं के पास नए नोट पकड़े गए थे। यह कैसे हुआ। इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए क्योंकि यह प्रधानमंत्री पद की विश्वसनीयता और गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। श्री सुरजेवाला ने ,चना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए कहा है कि गुजरात में भाजपा नेताओं के से जुड़े 11 जिलों के सहकारी बैंकों में 10 नवंबर 2016 से 14 नवंबर 2016 के बीच 3118.51 करोड़ के पुराने नोट जमा किए गए। भाजपा शासित राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के नेताओं से जुड़े सहकारी बैंकों में 14293.71 करोड़ जमा किए गए जबकि सभी सहकारी बैंकों को मिलाकर पांच दिनों में कुल जमा रकम 22270.80 करोड़ की थी। सितंबर 2016 में बैंकों में अन्य वर्षों की तुलना में 5.88 लाख करोड़ की राशि अधिक जमा की गई थी। यही नहीं 1 से 15 सितंबर के बीच 3 लाख करोड़ की राशि फिक्स्ड डिपोजिट कराई गई थी। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि नोटबंदी की योजना की जानकारी कुछ लोगों को पहले से थी और उन्होंने अपना काला धन समय रहते व्यवस्थित कर लिया था। हालाकि नबार्ड अहमदाबाद बैंक में जमा की गई राशि को अप्रत्याशित नहीं मानता।

-देवेंद्र गौतम


आदिवासी आरक्षण पर एक नई लड़ाई की तैयारी



रांची। झारखंड में अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के सवाल पर एक नई बहस की पृष्ठभूमि बन रही है। बहस इस बात की कि ईसाई या इस्लाम कुबूल करने के बाद आदिवासियों को आरक्षण जारी रखना उचित है अथवा अनुचित। राज्य सरकार धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासियों को आरक्षण और शिड्यूल् ट्राइव को देय अन्य सुविधाओं से वंचित करने पर विचार कर रही है। रघुवर दास सरकार ने इस संबंध में महाधिवक्ता का मंतव्य मांगा था। महाधिवक्ता अजीत कुमार ने सरकार के विचार को सही ठहराया है। उनका कहना है कि जो आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से दूर हो चुके हैं वे आरक्षण के हकदार नहीं हो सकते। अब इससे संबंधित अध्यादेश लाने की तैयारी हो रही है। सरकार का मानना है कि आदिवासी धर्म परिवर्तन कर ईसाई अथवा इस्लाम विरादरी में शामिल हो जाते हैं तो मुल्लों और पादरियों द्वारा देय लाभ प्राप्त करते हैं और दूसरी तरफ आदिवासी के रूप में सरकारी प्रावधानों का भी लाभ उठाते हैं। इसके कारण धर्म परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है। केंद्रीय सरना समिति और उनकी सामाजिक संस्थाओं ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है क्योंकि इससे उनका हक मारा जाता है। दूसरी तरफ ईसाई आदिवासियों के पैरोकारों ने इसका विरोध किया है। उनके मुताबिक धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी आदिवासी ही रहता है। सबसे बड़ा असमंजस झारखंड नामधारी दलों के समक्ष उत्पन्न होगा। जो आदिवासी की राजनीति करते हैं उन्हें दोनों का ही वोट चाहिए। मिश्नरियों से चुनाव के दौरान नेताओं को और भी कई तरह के लाभ मिलते हैं। सरना और धर्म परिवर्तित आदिवासियों के बीच विवाद बढ़ेगा तो दोनों को खुश रख पाना कठिन होगा। उनके हित आपस में टकराएंगे।
झारखंड में आदिवासियों के धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया ब्रिटिश काल से ही चली आ रही है। मिश्नरियों ने उनके बीच शिक्षा का प्रसार किया। उनके सशक्तीकरण में अहम भूमिका निभाई। उनकी चेतना को उन्नत किया। अब उनका वोट बैंक मिश्नरियों की राजनीतिक शक्ति का आधार रहा है। आरक्षण छिन जाने पर उनके रुत्बे में फर्क पड़ जाएगा।
यह भी सच है कि धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी परंपराओं के नाम पर सबसे ज्यादा हो-हल्ला भी नव दीक्षित ईसाइयों ने ही मचाया। आज खूंटी-खरसावां के जिन गांवों में पत्थलगड़ी के जरिए समानांतर सरकार चलाने की कोशिश की जा रही है उसमें मुख्य भूमिका ईसाई धर्मावलंबी आदिवासियों की ही है। सरना धर्म को मानने वाले इसे अपनी परंपरा का दुरुपयोग बता रहे हैं।
बहरहाल रघुवर सरकार जो निर्णय करती है उसपर टल रहती है। यह मामला एक नई बहस को जन्म देगा लेकिन लागू होकर रहेगा। चाहे इसके राजनीतिक परिणाम जो भी हों।

राष्ट्रीय किसान महासंघ ने की गांव बंद आंदोलन की समीक्षा

 नई दिल्ली। राष्ट्रीय  किसान महासंघ की कोर कमेटी की मीटिंग आज पलवल में हुई। इस बैठक में 1 से 10 जून के गाँव बन्द आंदोलन की समीक्षा की गई और आगामी रणनीति पर चर्चा हुई।
बैठक में निम्न निर्णय लिए गए।
1). 4-5 जुलाई को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी जिसमें देशभर के सभी किसान संगठन शामिल होंगे।
2). 26 जुलाई से 26 अगस्त तक देशभर में किसानों से वादाखिलाफी करने वाली बीजेपी की "शवयात्रा" निकाली जाएगी। 26 जुलाई से यात्रा की शुरुआत जम्मू-कश्मीर से होगी और 22 अगस्त को केरल में खत्म होगी। 26 अगस्त को दिल्ली में किसानों की एक बड़ी रैली आयोजित कर के यात्रा का समापन किया जाएगा।
आज की मीटिंग में शिव कुमार कक्काजी, गुरनाम सिंह जी, जगजीत सिंह जी, सुरेश कौथ जी, संतवीर सिंह जी, राजकुमार गुप्ता जी, के.वी. बीजू जी, हामिद मलिक जी, अभिमन्यु कोहाड़ जी उपस्थित रहे।

इसके अलावा 4-5 जुलाई को राष्ट्रीय किसान महासंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली के एन. डी. तिवारी भवन में रखी गयी है। इसमें आंदोलन की आगामी रणनीति तय की जाएगी।
बैठक सुबह 10 बजे से शुरू होगी।
स्थान - कॉन्फ्रेन्स हाल, एन. डी. तिवारी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, निकट आईटीओ मेट्रो स्टेशन
सम्पर्क -
शिव कुमार कक्काजी - 9425010345  गुरनाम सिंह जी - 9812335244, जगजीत सिंह जी - 9417164682, संतवीर सिंह जी - 9928074836,
संदीप गिड्डे - 7038157711
हरपाल सिंह - 9758445521
हामिद मलिक - 7006316522
के. वी. बीजू - 9871368252
राजकुमार गुप्ता - 9302833617
अभिमन्यु कोहाड़ - 8950456616

शुक्रवार, 22 जून 2018

पत्थलगड़ी आंदोलन है या कोई गहरी साजिश

सरना धर्मावलंबी परंपरा के इस रूप को देखकर हैरान

रांची। आदिवासी परंपरा के नाम पर आदिवासियों के उत्पीड़न का माध्यम बन गई है पत्थलगड़ी। दिलचस्प बात यह है कि ईसाई बन चुके आदिवासी इस आंदोलन को संचालित कर रहे हैं जबकि सरना धर्म के माननेवाले आदिवासी अपनी परंपरा के गलत इस्तेमाल को लेकर हतप्रभ हैं। राज्य सरकार के समझ असमंजस की स्थिति है। ज्यादा सख्ती करने पर आदिवासी विरोध का आरोप लग सकता है।
झारखंड की राजधानी रांची से लगे खूंटी जिले के इलाके में पांच आदिवासी युवतियों को भीड़ की मौजूदगी में अगवा कर तीन घंटे तक गैंगरेप की घटना के बाद कोहराम मचा हुआ है। यह घटना पत्थलगड़ी के इलाके में हुई है। वहां आदिवासी परंपरा की रक्षा के नाम पर बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है। एक पीड़ित युवती के बयान के मुताबिक उन्हें एक षडयंत्र के तहत कोचांग मिशन स्कूल के पास कार्यक्रम के लिए बुलाया गया। बाजार में नुक्कड़ नाटक करने के बाद स्कूल में बुलाया गया। वहीं पर आए हथियारबंद लोगों ने पूछा कि वे यहां कैसे आ गईं और पांच लड़कियों को उन्हीं की गाड़ी पर उठाकर 10 किलोमीटर दूर जंगल में ले गए। वहां तीन घंटे तक सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद वापस उसी जगह छोड़ गए जहां से उठा ले गए थे। इस घटना की साजिश में मिशन स्कूल के प्रिंसिपल तक की सहमति थी।
गैंगरेप के एक आरोपी का जारी किया गया स्केच
युवतियों का कुसूर यह था कि वे एक सामाजिक संस्था से जुड़कर मानव तस्करी के खिलाफ नुक्कड़ नाटक कर जागरुकता अभियान में शामिल थीं। उन्हें सबक सिखाने के लिए पत्थलगड़ी के इलाके में एक साजिश के तहत बुलाया गया था। पत्थलगड़ी के इलाके में प्रवेश करने का दंड इस रूप में दिया गया है। पत्थलगड़ी समर्थकों ने इस तरह परोक्ष रूप से सरकारी तंत्र को चुनौती दी है कि उनके इलाके में प्रवेश पर आदिवासी समाज को भी बख्शा नहीं जाएगा। युवतियों को भी नहीं। इसके अलावा वे मानव तस्करी को गलत नहीं मानते। इसके खिलाफ नहीं सुन सकते।
इस अराजक, अमानवीय और घृणित कार्रवाई के जरिए उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि वे आदिवासियों के भी सगे नहीं हैं। अपनी समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं। उन्होंने धन-बल और हर्वे हथियार जमा कर लिए हैं। अब आइएस की तर्ज  पर उनका जंगल का कानून चलेगा।
अब उन इलाकों पर गौर किया जाए जहां परिंदों को भी पर मारने से रोका जा रहा है। पहली बात यह इलाके अफीम की अवैध खेती के लिए चिन्हित रहे हैं। यहां कई बार छापेमारी हो चुकी है। अफीम की फसल जब्त कर जलाई जा चुकी है। दूसरी बात यह इलाके माओवादियों के सघन प्रभाव वाले रहे हैं। तीसरी बात यहां मिश्नरियों का काम लंबे समय से चल रहा है। अधिकांश आबादी ईसाई धर्म में दीक्षित है।
स्पष्ट है कि आदिवासी परंपरा के नाम पर अफीम की खेती सुरक्षित ढंग से करने के लिए सुरक्षा कवच बनाया जा रहा है। वर्ना ईसाई धर्म अपनाने के बाद सरना धर्म की परंपराओं की रक्षा के लिए इतनी बेताबी क्यों...। दूसरी बात यह कि साधारण आदिवासियों के पास इतने आधुनिक हथियार और ऐसी आपराधिक प्रवृति कहां से आ गई। पत्थलगड़ी आंदोलन के आसपास के गांवों के सरना धर्मावलंबी आदिवासी पत्थलगड़ी के इस रूप का विरोध कर रहे हैं।
अब जरा उत्तर भारत में अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया के नेटवर्क और गतिविधियों पर एक नजर डालें। दो दशक पहले तक बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित मोहनिया अफीम से हेरोइन तक की प्रोसेसिंग करने वाले भूमिगत कारखानों के केंद्र के रूप में चर्चित था। बाद में बिहार का सासाराम एक नए केंद्र के रूप में उभरा। इन अवैध भूमिगत कारखानों को कच्चे माल यानी अफीम की आपूर्ति बारावंकी के अफीम उपादक करते थे। उन्हें दवा औषधीय आवश्यकताओं के लिए सीमित मात्रा में अफीम उपजाने का लाइसेंस मिला हुआ था। वे तय रकबे से अधिक रकबे पर अफीम उपजाते थे और मोहनिया तथा सासाराम के ड्रग माफिया के हाथ बेच देते थे। एक बार बारावंकी के कुछ किसानों ने अफीम की जगह जापानी पुदीना की खेती की। इससे उन्हें जबर्दस्त आय हुई। इसके बाद अधिकांश किसान औषधीय पौधों की खेती करने लगे। अफीम की खेती की तरफ उनका रूझान कम होता गया।
इस प्रकरण के बाद ड्रग उत्पादकों को कच्चे माल की किल्लत होने लगी। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने झारखंड का रुख किया और नक्सलियों के साथ हाथ मिलाया। इसी के बाद झारखंड के कुछ नक्सल प्रभावित इलाकों में अफीम की अवैध खेती होने लगी। अब आदिवासी परंपरा के नाम पर उन इलाकों को पूरी तरह सुरक्षित बनाने की कोशिश हो रही है।

गुरुवार, 21 जून 2018

आधुनिक जीवन का आधार है योगयोगः तुषार विजयवर्गीय



चौथे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर मारवाड़ी युवा मंच रांची शाखा के सदस्यों ने योग शिक्षक भास्कर रॉय की अगुवाई में ऑक्सिजन पार्क मोरहाबादी में योग किया।

इस दौरान मंच के अध्यक्ष तुषार विजयवर्गीय ने कहा कि योग ही वो साधना है जो जीवन को सुंदर बनाती है। योग के माध्यम से इंसान अपने आप को स्वस्थ रख सकता है। योग करने से बीमारियों का सर्वनाश होता है। योग हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मंच अध्यक्ष ने कहा कि योग एक विचार नहीं बल्कि भारतीय जीवन पद्धति है जिसमें भारतीय जीवन मूल्य यानि संस्कृति समाहित हैं। शून्य के आधार पर आधुनिक विज्ञान स्थापित हुआ उसी तरह आधुनिक जीवन का आधार बनता जा रहा है योग। भारतीय वैदिक परम्परा की यह जीवन पद्धति विश्व पटल पर स्वीकार की जा रही है और इसे भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। साफ है कि योग वो जरिया बन गया है जिससे प्राचीन काल से समृद्ध रही भारतीय सभ्यता-संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो रहा है।

योग शिक्षक भास्कर राय ने मंच के  सदस्यों को प्रतिदिन करने वाले कई आसान योग टिप्स दिए और कहा, आज के इस भाग दौड़ की ज़िंदगी से कुछ समय निकालकर हम योग करे तो हम स्वस्थ रह सके। हमारा जीवन आयु बढ़ सकता है। हम फिट रह सकते हैं। हमे कोई रोग नही हो सकता है।

वही मंच के सदस्यों ने प्रतिदिन योग करने का संकल्प लिया।

मारवाड़ी युवा मंच राँची शाखा योग के लिए लोगो के बीच जागरूकता अभियान चलाएगी। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग योग के लिए प्रेरित हो सके।

इस अवसर पे सचिव दीपक गोयनका,उपाध्यक्ष मनीष लोधा,अमित चौधरी, अमित सेठी,दीपक जालान, रवि अग्रवाल,आशीष डालमिया,विकास अग्रवाल,रौनक झुनझुनवाला,रोहित सरावगी,वीरेंद्र तोसावर,अजय खैतान,प्रमोद मोदी,अंकित अग्रवाल,माधव अग्रवाल और किशु जी आदि उपस्थित थे।

रांची में महिलाओं ने किया. सामूहिक.योग

फीमेल फिटनेस प्रो क्लासेस की पहल लाई रंग

*निरंतर योग को महिलाओं ने बनाया जीवनशैली का अभिन्न अंग*


रांची। योग से जुड़कर आज महिलाएं ना सिर्फ स्वास्थ्य है बल्कि उनके जीवनशैली व कार्यक्षमता में अनुकूल बदलाव हुआ है। महिलाओं ने योग को अपने जीवन शैली का एक अभिन्न पार्ट बना लिया है। यह संभव हो सका है स्मृति अपार्टमेंट न्यू एरिया गांधीनगर हिंनू रांची में संचालित फीमेल फिटनेस प्रो क्लासेस के माध्यम से। गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से योग किया और अन्य लोगों को योग के लिए प्रेरित किया। संचालिका शशि प्रिया ने बतलाया कि निरंतर योग करने से महिलाओं के जीवन में बदलाव आया है। आलस्य, जोड़ों के दर्द, सांस लेने की परेशानी व मोटापे जैसी जटिल समस्याओ से काफी हद तक निजात  मिल रहा है। निरंतर योग के माध्यम से महिलाओं ने 15 से 17 किलो तक अपना वजन भी कम किया है और जटिल बीमारियों से निजात मिला है। उन्होंने अधिक से अधिक लोगों को योग से जुड़कर स्वस्थ रहने की अपील की है। मौके पर मुख्य रुप से इंदु देवी, श्वेता सिंह, पायल, श्वेता सिंह, सुषमा सिंह, अनुराधा सिंह, अनुराधा लाल सहित सैकड़ों महिलाएं मौजूद थी।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...