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सोमवार, 2 जुलाई 2018

ऐतिहासिक होगा 5 जुलाई का बंद : सुबोधकांत सहाय

दावाः कार्पोरेट की कठपुतली सरकार के खिलाफ उमड़ेगा जन सैलाब

रांची।  पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता सुबोधकांत सहाय का दावा है कि भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ विपक्ष की ओर से 5 जुलाई को प्रस्तावित झारखंड बंद ऐतिहासिक होगा। रघुवर सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण झारखंड की जनता त्रस्त है। पांच जुलाई को सड़कों पर जनसैलाब उमड़ेगा। उन्होंने कहा कि केन्द्र व राज्यों की भाजपा सरकार कारपोरेट घरानों की कठपुतली बनकर रह गई है। सिर्फ बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए भाजपा ने भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन कराया है। इससे किसानों की कृषि योग्य भूमि भी छिन जाएगी। रघुवर सरकार  ने पेसा एक्ट, पंचायती राज व्यवस्था के विरूद्ध काम किया है। आदिवासियों और मूलवासियों के हक छीने जा रहे हैं। मेहनतकश मजदूर, गरीब किसानों की जमीन औने-पौने दाम पर जबरन अधिग्रहित कर कारपोरेट घरानों को सस्ते दर पर देने के लिए मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल पास कराया है। श्री सहाय ने कहा कि मुख्यमंत्री रघुवर दास जब सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन कराने मे सफल नहीं हो सके तो एक सोची समझी साजिश के तहत कारपोरेट घरानों को कौड़ी के भाव जमीन देने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून मे संशोधन कराने की साजिश रची। सरकार ग्राम सभा को भी नजरअंदाज कर गरीबों की जमीन हथियाने पर आमादा है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कुकृत्य का कांग्रेस पार्टी पुरजोर विरोध करती है। बिल के विरोध में तमाम विपक्षी पार्टियों की एकजुटता सराहनीय है। उन्होंने झारखंड की जनता से बंद को पूर्ण सफल बनाने में सहयोग करने की अपील की।

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक कुशलता की परीक्षा

अभिमन्यु कोहाड़ विदेशी मामलों के जानकार और रक्षा विशेषज्ञ हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन से जुड़कर जम्मू-कस्मीर में राष्ट्रवाद के प्रसार के अलावा अखिल भारतीय किसान महासंघ से जुड़कर किसान आंदोलन को भी गति दे रहे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति और भारत सहित अन्य देशों पर ईरान से संबंध तोड़ने के लिए दबाव डालने को लेकर उनका आलेख....


अभिमन्यु कोहाड़

ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते "जेसीपीओए संधि" को अमेरिका द्वारा एकतरफा रद्द किए जाने के बाद से अमेरिका द्वारा भारत समेत अन्य देशों पर ईरान के साथ सम्बन्ध तोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है। भारत के दौरे पर आई हुई संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि निक्की हेले में कहा कि 4 नवम्बर 2018 से पहले ईरान से तेल खरीदना भारत बन्द करे एवम ईरान के साथ सम्बन्ध समाप्त करने पर गम्भीरतापूर्ण विचार करे। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि ईरान के साथ व्यापार करने वाली सभी कंपनियों पर अमेरिका कड़े प्रतिबन्ध लगाएगा।
इस से पहले भी 2011 में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने ईरान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाए थे। उस समय ओबामा प्रशासन द्वारा भारत को इस शर्त पर कुछ रियायतें दी गयी थी कि भारत द्वारा ईरान से खरीदे जाने वाले तेल की मात्रा में कटौती की जाएगी, इसके अलावा भारत की सफल कूटनीति की वजह से ईरान से तेल का आयात जारी रहा। भारत द्वारा सऊदी अरब व इराक के बाद तीसरे नम्बर पर सबसे अधिक तेल ईरान से ही आयात किया जाता है। भारत अपनी जरूरत का 10 प्रतिशत तेल ईरान से आयात करता है।
भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कुछ दिन पहले पत्रकारों से बातचीत के दैरान कहा था कि भारत सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संगठन के प्रतिबंधों को मानता है, किसी देश के प्रतिबंधों को नहीं, इसलिए भारत ईरान के साथ सम्बन्ध जारी रखेगा।
2011 में ईरान पर प्रतिबंध लगने के बाद व्यापार हेतु डॉलर पर पाबंदी लगा होने की वजह से भारत और ईरान ने रुपए में व्यापार करना शुरू कर दिया। ईरान की सरकार ने यूको बैंक में एक खाता खोला जिसमें भारत की तेल रिफाइनरियां ईरान से आयात किये गए तेल के बदले रुपए जमा कर देती थी। इसके अलावा भारत द्वारा ईरान को चावल, सोयाबीन, चीनी, दवाइयों का भी निर्यात किया जाता था।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस बार किसी भी देश को किसी भी तरह की रियायत देने के मूड में नहीं हैं। राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के अनुसार अमेरिका के इस तानाशाही रवैये के सामने भारत को झुकना नहीं चाहिए और ईरान के साथ सम्बन्ध जारी रखने चाहिए।
मित्रता बनाये रखने से भारत व ईरान दोनों को आर्थिक व सामरिक फायदे हैं। भारत को ईरान का तेल सऊदी अरब के मुकाबले काफी सस्ते दामों पर मिलता है और तेल का भुगतान करने के लिए ईरान 90 दिन की समयसीमा देता है, वहीं अन्य देश सिर्फ 30 दिन की समयसीमा देते हैं। ईरान भारत के साथ रुपए में व्यापार करने पर सहमत है, ऐसी स्थिति में भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को भी सुरक्षित रख सकता है। रुपए में व्यापार करने से डॉलर की कीमतों का भी कोई प्रभाव भारत की करेंसी पर नहीं पड़ेगा।
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका के अलावा यूरोप के अन्य देश जेसीपीओए संधि का अभी भी सम्मान कर रहे हैं, इस सूरत में व्यापार हेतु भारत रुपए के अलावा यूरो करेंसी का भी इस्तेमाल कर सकता है। पिछली बार 2011 में ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद तेल के आयात हेतु भारत एवम ईरान उन समुन्द्री टैंकरों का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे जिनका बीमा पश्चिमी कम्पनियों में किया था। इस बार यह समस्या उतनी गम्भीर नहीं है क्योंकि अब की बार उन समुन्द्री टैंकरों के जरिये तेल का आयात हो सकता है जिन का बीमा यूरोपियन कम्पनियों द्वारा किया गया है।

भारत को ईरान के साथ व्यापार जारी रखने के कई सामरिक फायदे भी हैं। भारत ने ईरान में चाबहार पोर्ट को विकसित किया है जिस से भारत अफ़ग़ानिस्तान व अन्य देशों के साथ सीधे तौर पर जुड़ गया है। चीन द्वारा पाकिस्तान में विकसित किये जा रहे ग्वादर पोर्ट का मुकाबला करने हेतु ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब व पाकिस्तान की मित्रता का जवाब देने के लिए भी भारत और ईरान को एक-दूसरे की जरूरत है।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिका एक भरोसेमंद मित्र नहीं है, खासकर ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद। भारत व अमेरिका के विदेश एवम रक्षा मंत्रियों के बीच होने वाले "2+2" बैठक को अमेरिका 3 बार स्थगित कर चुका है।
इन सभी वजहों से भारत को अमेरिका के सामने नहीं झुकना चाहिए एवम ईरान के साथ व्यापार जारी रखना चाहिए।
भारत द्वारा ईरान से तेल का आयात जारी रखना पूरी दुनिया को इस बात का भी संकेत होगा कि भारत अब एक ज़िम्मेदार वैश्विक शक्ति के तौर पर विश्व पटल पर दस्तक दे चुका है।

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लेखक - अभिमन्यु कोहाड़

रविवार, 1 जुलाई 2018

जनांदोलन के ताबूत में अराजकता की कील



विफल हुई परंपरा की आड़ में इलाकावार कब्जे की रणनीति


पत्थलगड़ी का नेता यूसुफ पूर्ति
देवेंद्र गौतम

रांची। पत्थलगड़ी आंदोलन के नेता के नक्सली कनेक्शन का अभी खुलासा नहीं हो सका है। लेकिन परंपरा की आड़ में इलाकावार कब्जे की रणनीति नक्सली आंदोलन में एक नया प्रयोग था। अभी तक किसी नक्सली गुट या नेता के जेहन में यह खयाल नहीं आया था। इस आंदोलन का उद्देश्य कुछ और था लेकिन इसे पूरी तरह गैरकानूनी भी नहीं कहा जा सकता था। यूसुफ पूर्ति ने जिस ढंग से इसकी व्यूह रचना की थी उनसे वह सफल हो जाता अगर वह सत्ता को चुनौती देने की जल्दबाजी नहीं करता और अपने कार्यकर्ताओं की राजनीतिक चेतना को उन्नत करने और उन्हें अनुशासित रखने पर ध्यान देता। जन समर्थन के विस्तार पर ध्यान देता। अनुशासन के दायरे से बाहर होने के कारण ही उसके समर्थक गैंगरेप जैसा जघन्य अपराध कर बैठे। जाहिर है कि न तो पत्थलगड़ी के रणनीतिकारों ने और न ही उस इलाके में सक्रिय नक्सली नेताओं ने इसपर सहमति दी होगी। निचली कतारों ने अपनी अराजक प्रवृत्ति के कारण सबक सिखाने का ऐसा तरीका अपनाया जो पूरे आंदोलन को मटियामेट कर देने का कारण बना। भारत की जनता चाहे जिस जाति जिस समुदाय की हो महिलाओं के साथ दुराचार को बर्दास्त नहीं करती। यह कोई सीरिया नहीं कि आइएस के आतंकी महिलाओं को बंधक बनाकर दुराचार करें और पूरा इस्लामी जगत चुपचाप देखता रहे। इस घटना के बाद आंदोलन के प्रति जनता की सहानुभूति खत्म हो गई। उस इलाके के ग्रामीण भी गैंगरेप के आरोपियों की तलाश करने लगे और नक्सली भी उन्हें पकड़कर सज़ा देने को बेताब हो उठे। बस यहीं सरकार को पत्थलगड़ी समर्थकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मौका मिल गया। यदि आंदोलनकारी अपने आचरण को सही रखते तो यह संभव नहीं होता। यह सच है कि इस आंदोलन का जनजातीय कनेक्शन कम और नक्सली कनेक्शन ज्यादा है। सरना धर्मावलंबी आदिवासी जो इस परंपरा के मुख्य वाहक हैं, वे इस प्रयोग का विरोध कर रहे थे। फिर भी सरकारी तंत्र सख्त कदम उठाने से परहेज़ कर रहा था कि कहीं उसपर आदिवासी विरोधी होने का धब्बा न लग जाए। रावण की एक गलती से सोने की लंका जल गई और उसके अंत का कारण बनी। पत्थलगड़ी के नाम पर उसी तरह की गल्ती दुहराई गई। अब यूसुफ पूर्ति की एक-एक कर पोल खुलती जा रही है कि संविधान और कानून को मानने से इनकार करने वाला, पुलिस को इंडियन पुलिस कहने वाला शख्स स्वयं व्यवस्था का लाभ उठाने को कितना तत्पर रहा है। उसने बैंक खाता भी खुलवाया है। गैस कनेक्शन भी लिया है। शिक्षक बनने के लिए आवेदन भी दे चुका है। फिर भारत सरकार को किस मुंह से वह अवैध कह रहा था। अगर से इंडिया से नफरत है तो वह कौन सा देश बनाना चाहता था। उसने पूरे देश में पत्थलगड़ी करने की घोषणा की थी। अपना बैंक खोलने का एलान किया था। क्या पूरे देश में सिर्फ खूंटी के नक्सल समर्थक ईसाई आदिवासी रहते हैं। अन्य इलाकों के सरना और हिन्दू आदिवासियों की नागरिकता उसकी नज़र में गलत है जाहिर है अपनी इस रणनीति से वह इतना ज्यादा जोश में चुका था कि होश खो बैठा था। झारखंड में आदिवासी विद्रोहों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन स्वभाव से आदिवासी सरल प्रवृत्ति के सीधे-साधे इनसान होते हैं। वे मर सकते हैं, मार सकते हैं लेकिन चालबाजी उनके रक्त में नहीं है। वे षडयंत्र के शिकार हो सकते हैं, षडयंत्र रच नहीं सकते। यूसुफ पूर्ति इस बात को समझ नहीं सका और स्वशासन के नाम पर उन्हें बहकाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश की।
गैंगरेप की घटना के बाद यूसुफ पेर्ति को डैमेज कंट्रोल के प्रयास में लग जाना चाहिए था। इसके लिएरक्षात्मक मुद्रा अपनाने की जरूरत थी लेकिन इसके तुरंत बाद वह पत्थलगड़ी कर आक्रामकता का प्रदर्शन करने लगा। सके समर्थक सांसद करिया मुंडा के अंगरक्षकों को अगवा कर दूसरी गलती कर बैठे। पुलिस प्रशासन जो अबतक रक्षात्मक भूमिका में था उसे आक्रामक रुख अपनाने को विवश कर दिया। इस क्रम में सके जन समर्थन की भी पोल खुल गई। सभा में जमा हुए लोगों ने स्वीकार किया कि यदि वे नहीं शामिल होते तो उन्हें 5 सौ रुपया दंड देना पड़ता। यानी आर्थिक दंड का भय दिखाकर भीड़ जमा की जाती रही है। जन आंदोलन के नाम पर एक गिरोह का आतंक कायम किया जा रहा था। पत्थलगड़ी के नाम पर या नक्सलियों की सहायता से यूसुफ पूर्ति ने चाहे जितना भी हथियार इकट्ठा कर लिया हो लेकिन सरकार से ज्यादा हथियार तो उसके पास नहीं ही हो सकता। राजसत्ता से मुकाबला करने लायक न तो उसके पास ताकत थी न जन समर्थन। अब और फजीहत कराने से बेहतर है कि पत्थलगड़ी के नेता स्वयं गैंगरेप के आरोपियों को पकड़कर दंडित करें और जनता के बीच यह संदेश दें कि वे गलत कार्यों को बढ़ावा नहीं देते चाहे उसमें उसके कार्यकर्ता ही क्यों न शामिल हों। हालांकि अब समें विलंब हो चुका है। अब क्षतिपूर्ति का कोई रास्ता यूसुफ पूर्ति के पास नहीं बचा है।

शनिवार, 30 जून 2018

हूल दिवस पर सुबोधकांत ने ली एकता-अखंडता की शपथ


                        
 कांग्रेस भवन वीर सपूतों को अर्पित किया पुष्प

रांची। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने आज हूल दिवस के अवसर पर कांग्रेस भवन में सिद्धु-कान्हु सहित झारखंड के सभी वीर सपूतों को याद कर शत शत नमन किया एवं उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित की। उन्होंने कहा कि आज एक महान दिवस है संथाल में क्रांति की शुरूआत आज हीं के दिन हुई थी, आज पुनः एक बार फिर लोकतंत्र खतरे में है, इस महान दिवस पर शपथ लेते हैं कि देश की एकता एवं अखंडता को बचाने हेतु तत्पर रहेंगे, देश को गुलामी की ओर ढकेलने वालो को सावधान रहने की जरूरत है, श्री सहाय ने कहा कि वर्तमान सरकार की नीतियां अंग्रेजों की याद ताजा कर दी है अंग्रेज भी हमारे देष में फुट डालो शासन करो नीति के तहत सत्ता के शीर्ष पर आसीन हुआ, आज वही दिन दिखाया जा रहा है कि समाज को बांटकर भाजपा 2019 में सत्ताधीन होना चाहती है इस अवसर पर संजय पाण्डे, लाल किशोर नाथ शाहदेव, राजन सिंह राजा, सुरेन्द्र सिंह, राकेश सिन्हा, राजा, बेनी, राजेश सिन्हा सन्नी, ज्योति सिंह मथारू, अशोक सिन्हा, जोगिन्दर सिंह सहित कई कांग्रेसी कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।




शुक्रवार, 29 जून 2018

"मध्यम वर्ग आखिर जाए तो जाए कहां?"





अर्पिता सिन्हा

 र्मै उनलोंगो से प्रश्न पूछना चाहती हूं, जो दावा करते हैं कि,मोदी सरकार 2रूपये किलो चावल दे रही है, एक रुपये किलो गेहूं दे रही है,3 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए,लाखों शौचालय बनाये गए, करोड़ों रुपये खर्च कर बच्चों को मुफ्त  शिक्षा दी जा रही है,मध्याह्न भोजन मुफ्त  में दिए जा रहे है।सस्ते में चीनी,सस्ते में केरोसिन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
         त्रासदी यह है कि मोदी सरकार पर वो लोग उंगली उठा रहे हैं जो पंद्रह से बीस लाख की कार पर घूमते हैं, अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में  पढ़ाते है । उन्हें दो दो लाख की बाइक खरीद कर  घूमने के लिए देते हैं।
          मैं भी मोदी समर्थक हूँ। लेकिन कुछ प्रश्न है जो मैं जानना चाहती हूँ और पूछना चाहती हूँ कि,2रूपये किलो चावल किसे मिल रहा है?1रूपये किलो गेंहू किसे मिल रहा है ? 20 रुपये किलो चीनी किसे मिल रहा है? सस्ते केरोसिन,मुफ्त गैस कनेक्शन,सस्ते घर किसे दिए जा रहे है? मुफ्त शिक्षा, मुफ्त मध्याह्न भोजन किसे मिल रहा है?ये सारी सुविधाएं उपलब्ध है गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले प्रमाणपत्र धारको के लिए।लेकिन इन सुविधाओं का कितना लाभ इन्हें मिलता है यह एक यक्ष प्रश्न है।
        यह प्रश्न वो नही पूछते जिनके बच्चे लाखों की गाड़ियों पर घूमते है ,महंगे स्कूलों में पढते है ,जिनके पास दुनिया की हर सुख सुविधा उपलब्ध है। वे 80 रूपये तो क्या 800 रुपये लीटर पेट्रोल भी आराम से खरीद सकते है। महंगाई कितना भी बढ़े उन्हें कोई फर्क नही पड़ता।
                     भारत की इस धरती पर निम्न और उच्च के बीच एक मध्यम वर्ग रहता है।जो इन दो पाटों के बीच पिसता रहता है। इसी लिए सारे प्रश्न वही पूछता है क्योंकि, सरकार के सभी निर्णयों का सीधा असर उसी पर पड़ता है। क्योंकि, रोज बढ़ती  पेट्रोल की कीमत के कारण उसे अपना बाइक छोड़ साईकल का सहारा लेकर मिलों दूर  नौकरी करने जाना पड़ता है। अपना पेट काट बच्चों को पढ़ाता है। इलाज के लिए अपने भविष्य निधि से कर्ज लेता है।अपने बच्चों के साईकल खरीदने के लिए एकएक पैसा जोड़ता है। बेटी के व्याह के लिए घर जमीन सब बेच देता है।अपने परिवार के पालन-पोषण, बच्चो की पढ़ाई,बेटी की शादी,माँ-बाप के ईलाज और परिवार की अन्य जिम्मेवारियां निभाने में अपना सब कुछ खर्च  कर रिटायरमेंट के बाद पेंशन न मिलने की स्थिति मेंअपने भविष्य की चिंता में डूबता -उतराता रहता है। यह मध्यम वर्ग भी देश के नागरिक हैं।मतदाता है।ईमानदारी से टैक्स भरते हैं,30से40 वर्षों तक नौकरी कर देश की सेवा करते हैं।फिर, यह सौतेलापन क्यों है?सबका साथ सबका विकास का दावा करने वाले सरकार इनके लिए क्यों नही सोचती?
              किसी को पेंशन। किसी को नही।बहुत सारे परिवार हैं जिन्हें रिटायरमेंट के बाद कोई सहारा नही और उन्हें पेंशन भी नहीं।फिर कैसे जिये ये लोग?
         विकास के दावे हो रहे है कुछ झूठ और कुछ सच।चलिये अच्छी बात है।पर, ये भी जानना चाहेंगे कि,बुलेट ट्रेन किसके लिए चलाये जा रहे है?क्या एक आम आदमी उसका किराया देने योग्य है? यह सुविधा उच्च वर्ग के लिए ही लाभदायक होगा।सदियों से अमीर और गरीब के खाई को पाटने की दावा करने वाले राजनीतिज्ञ एवं सरकार अमीरों की सुख सुविधा का अच्छा खयाल रख रही है। मध्यम वर्ग टैक्स चुका कर साईकल तक ही सीमित रहे इसका पूरा ध्यान सरकार रख रही है।झोपड़ियों में गरीबों के बीच खाना खाने का तमाशा आज कल आम हो चला है।परंतु,गरीबों को फांसने के लिए नये नये पाशा फेंकने वाले नेतागण कभी गरीबो को भी बुलेट ट्रेन पे घुमाने का तमाशा दिखाओ। जो सच्चाई है उसे तो सामने लाना ही होगा।जो मूल बाते हैं उनपर तो चर्चा होनी ही चाहिए।
          दावा था कि,चौबीसो घंटे बिजली मिलेंगी ।परंतु,बिजली अठारह अठारह घंटे गायब रहती है।रोजगार की बातें खोखली साबित कर ,बेरोजगारी मुंह बाये  खड़ी है।आरक्षण का सांप पूरे देश मे जहर  फैला रहा है जिससे पूरा समाज विषाक्त हो रहा है और तथा कथित राजनीतिज्ञ इसे दूध पिला कर पाल रहे हैं।
                 इस बात से इनकार नहीं कि, बहुत सारे काम हुए हैं।विदेशों में अपनी साख बढ़ी है।नई टेक्नोलॉजी आ रही है।पड़ोसियों से अपनी संस्कृति एवं संस्कार के अनुसार सम्बन्ध सुधारने का प्रयाश हो रहा है। परंतु,लातों के भूत बातों से माने तब ना।
       सब के बीच मध्यम वर्ग की भी तो बात हो।सब के साथ मध्यम वर्ग का भी विकाश होना जरूरी है।मतदाता और ईमानदार कर दाता यही है।साथ ही बुद्धिजीवी भी है।इस का ध्यान सत्तारूढ़ एवं सत्ता लोलुप पार्टीयों को रखनी चाहिए।


प्रकाश पर्व के मौके पर गुरुद्वारा में मत्था टेका

रांची। श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी महाराज जी के प्रकाश पर्व के मौके पर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पूर्व सचिव आदित्य विक्रम जायसवाल ने आज मेन रोड स्थित गुरूद्वारा में मत्था टेका और राज्य की खुशहाली, समाज कल्याण एवं अमन-चैन, शांति-सौहार्द की कामना की। इस अवसर पर गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा, रांची द्वारा मनाये जा रहे पर्व पर कांग्रेस नेता आदित्य विक्रम जायसवाल मुख्य रूप से उपस्थित हुए। श्री गुरूद्वारा समिति के सचिव गुरूविंदर सिंह शेट्टी  द्वारा सिरोप दे कर (शाॅल ओढ़ाकर) सम्मानित किया गया। इसके बाद गुरूद्वारा आयोजित श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी के श्री अखंड पाठ में सम्मिलित हुए। साथ ही दीवान कार्यक्रम में भी शामिल रहे एवं गुरू धर्म में लंगर की सेवा किए और लंगर का आनंद भी उठाए।
प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पूर्व सचिव आदित्य विक्रम जायसवाल.ने कहा कि हमें श्री गुरू हरगोंबिन्द साहिब जी के संदेश को प्रचार करते हुए उनके मार्गों पर चलकर अपनी जीवन सफल बनाना चाहिए साथ ही देश की, राज्य की एवं समाज के हर वर्ग की रक्षा के लिए हर समय तत्पर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिख समाज की स्थापना का मुख्य मकसद धर्म की रक्षा करना था। सिख समाज के दस गुरूओं ने इस धर्म को दुनिया की निगाहों में सबसे उपर रखने में मदद की। इन्हीं गुरूओं में से एक थो गुरू हरगोबिन्द सिंह। इनकी जीवनी वृतांत बहुत ही लंबी है संक्षेप्त में कहें तो  वे स्वंय एक क्रांतिकारी योद्धा थे आज  गुरू हरगोबिन्द सिंह की जयंती है।
इस अवसर पर मुख्य रूप से मौके पर रितेश नागपाल सेवा दल के आसिफ जियाउल इरफान अली एनएसयूआई के प्रदेश महासचिव राजीव चौरसिया यूथ कांग्रेस के सचिव प्रेम कुमार गौरव आनंद मौजूद थे।

गुरुवार, 28 जून 2018

झारखंड में फिर पताका लहरा सकती है कांग्रेस

रांची। झारखंड में कांग्रेस अपना खोया जनाधार भी वापस पा सकती है और फिर से अपना पताका लहरा सकती है। बशर्ते अपनी विभूतियों की सही पहचान और उनका सही इस्तेमाल करे। अभी इंटक के दो खेमो के विलय के निर्णय के बाद सकी संभावना प्रबल हो चुकी है। इंटक के रेड्डी गुट के महासचिव राजेंद्र प्रसाद सिंह एक मृदुभाषी, व्यवहार कुशल और सधी गोटियां चलने वाले राजनीतिज्ञ हैं तो दूसरे गुट के अध्यक्ष ददई दुबे बाहुबल के धनी।



इंटक नेता व बेरमो के पूर्व विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह की सोनिया और राहुल दरबार में एक कद्दावर मजदूर नेता के रूप में पहचान है। लेकिन सत्ता की राजनीति में उनकी प्रतिभा और सूझ-बूझ का कांग्रेस ने अभी तक इस्तेमाल नहीं किया है। उनकी प्रतिभाओं की सही परख अभी तक नहीं की गई है। चुनावों में उन्हें उनकी इच्छानुसार टिकट तो दे दिया जाता है लेकिन पूरे राज्य में उम्मीदवारों के चयन, चुनावी मुद्दों की पड़ताल, प्रचार की शैली आदि विषयों पर रणनीति तैयार करने में उन्हें सिर्फ परामर्शदात्री भूमिका तक सीमित रखा गया।  निर्णायक भूमिका में नहीं लाया गया। उन्हें करीब से जानने वाले जानते हैं कि यदि झारखंड में कांग्रेस उनके नेतृत्व में, उनकी रणनीति के आधार पर चुनाव लड़े तो आश्चर्यजनक नतीजे आ सकते हैं। पार्टी अपने खोये हुए जनाधार को वापस पा सकती है।
आजादी के बाद से लेकर संयुक्त बिहार के समय तक झारखंड में कांग्रेस और झारखंड नामधारी दलों का जनाधार सबसे बड़ा था। दोनों मिल जाते थे बड़ी ताकत बन जाते थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस के करीबी सहयोगियों में रहा। पटना और दिल्ली दरबार में यही झारखंड का प्रतिनिधित्व करते थे। अलग राज्य के गठन में अपनी भूमिका का लाभ भाजपा ने उठाया और अपनी पैठ बना ली। इस बीच कांग्रेस नेतृत्व से भी कुछ भूलें हुईं जिसके कारण जनाधार सिमटता चला गया। झामुमो ने तो आदिवासी कार्ड के नाम पर अपनी पकड़ बनाए रखी लेकिन कांग्रेस की चुनावी सफलताओं पर ग्रहण लगता चला गया। कांग्रेस आलाकमान ने कभी स बात पर गौर नहीं किया कि स्व. ज्ञानरंजन के बाद राजेंद्र प्रसाद सिंह ही एकमात्र नेता हैं जिनकी मजदूर वर्ग और बहिरागत आबादी के साथ आदिवासियों और सदानों में भी गहरी पैठ है। बोकारो जिले के आदिवासी तो उन्हें राजेंद्र सिंह की जगह राजेंद्र मुंडा कहकर पुकारते रहे हैं। सत्ता की किसी कुर्सी पर बैठने के बाद वे विकास के मामले में कभी क्षेत्र या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करते। श्रमिक नेता के रूप में उनकी कोशिश होती है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों के सामुदायिक विकास राशि का ज्यादा से ज्यादा लाभ आसपास के ग्रामीणों को मिले।
2019 का चुनाव करीब है। कांग्रेस आलाकमान के समक्ष बड़ी चुनौती है। विपक्षी गठबंधन तैयार हो चुका है। उसे चुनावी सफलता भी मिल रही है। पार्टी भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए हर तरह का त्याग कर रही है। उसे झारखंड के संबंध में सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। अगर लोकसभा और विधान सभा के चुनाव एक साथ हुए तो भी और अलग-अलग हुए तो भी।

स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...