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गुरुवार, 9 मई 2019

डा. मोती प्रसाद सिंह को दी गई श्रद्धांजलि


* श्रद्धासुमन अर्पित करने जुटे चिकित्सकगण व अन्य गणमान्य लोग

रांची। श्रद्धांजलि सभा में देश-विदेश में ख्यातिप्राप्त दिवंगत चिकित्सक डॉ.मोती प्रसाद सिंह को गुरुवार को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। राजधानी के हिनू स्थित उनके आवास पर काफी संख्या में रांची व  जमशेदपुर सहित अन्य जगहों के चिकित्सक, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधिगण और अन्य गणमान्य लोगों ने स्व.डाॅ.सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर श्रृद्धासुमन अर्पित किया। उल्लेखनीय है कि गत तीन मई को जमशेदपुर के टीएमएच में इलाज के दौरान उनका अकस्मात निधन हो गया था। वे कोल इंडिया के डायरेक्टर, स्वास्थ्य सेवा के अलावा एच ई सी, मेकान में भी सेवारत रहे थे। वे विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चिकित्सा संगठनों से भी जुड़े हुए थे। उन्हें देश विदेश के सेमिनारों में बतौर मुख्य अतिथि व मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता था। सेवानिवृत्त होने के बाद वे रांची के हिनू स्थित शुक्ला कॉलोनी में अपने आवास में रहते थे।
   डॉ. मोती प्रसाद सिंह  की श्रद्धांजलि सभा में मुख्य रूप से डॉ. राघव शरण, डॉ.आर एन सिंह, डॉ.ओपी सिंह, डॉ.रेखा रानी सिंह, डॉ.सुमंत मिश्रा, डॉ.आर आर भट्टाचार्य, डॉ.अनंत सिन्हा, कोल इंडिया के चिकित्सक गण, एचईसी व मेकान के चिकित्सक गण, शहर के कई जाने-माने चिकित्सक, चेबर ऑफ काॅमर्स के प्रतिनिधि, विभिन्न सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधिगण शामिल हुए। इसके अलावा उनकी तीनों पुत्रियां, दामाद सहित अन्य परिजन मौजूद थे।

बुधवार, 8 मई 2019

संस्मरणः जब डा. मोती प्रसाद सिंह ने मुझे दो दिनों में चंगा कर दिया



देवेंद्र गौतम

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चिकित्सक डा. मोती प्रसाद सिंह का आकस्मिक निधन रांची की बड़ी आबादी की तरह मेरे लिए भी व्यक्तिगत क्षति है। उनके निधन की खबर सुनने के बाद उनका चेहरा आंखों के सामने घूम गया। वर्ष 2010 में एक बार मैंने उनका वृहत इंटरव्यू लिया था। इसके कुछ ही दिनों बाद अचानक मेरी तबीयत खराब हुई। पत्रकार मित्र नवल किशोर सिंह मुझे उनके पास ले गए। डाक्टर साहब ने कुछ टेस्ट कराए। रिपोर्ट में टायफायड, यूरिन इंफेक्शन और डायबिटिज निकला। डाक्टर साहब ने मेरा पारिवारिक इतिहास जानने के बाद कहा कि डायबिटिज मुझे ज्यादा परेशान नहीं करेगा लेकिन जब-जब मानसिक तनाव होगा, यह बढ़ेगा। उन्होंने डायबिटिज के लिए एक दवा ग्लुकोनार्म जी वन लगातार खाने की सलाह दी और टीयफायड तथा यूरिन इंफेक्शन के लिए मात्र एक टैबलेट दिया। दो दिन के अंदर मैं पूरी तरह चंगा हो गया। आज भी मैं डायबिटिज के लिए उनकी लिखी दवा खाता हूं।
मैं जानता हूं कि उस समय किसी भी डाक्टर के पास गया होता तो वह पचीसों टेस्ट कराता और मुझे ठीक होने में अच्छा-खासा समय लग जाता। लंबे समय तक कमजोरी रहती। इतने कुशल और देवता समान चिकित्सकों की पीढ़ी अब खत्म होती जा रही है। हाल में ऐसे ही विश्व प्रसिद्ध न्यूरो चिकित्सक डां केके सिन्हा का निधन हो गया। पता नहीं ईश्वर ऐसी विभूतियों को अपने पास क्यों बुला लेते हैं जिनकी समाज को बेहद जरूरत होती है।
2013 में मैं दिल्ली चला गया था। इस बीच रांची आना भी हुआ तो बहुत कम समय के लिए। अभी जब रांची रहना हो रहा है तो कई बार नवल जी से कहा कि डाक्टर साहब से मिलना है। हम उनसे मिलने गए भी लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। उनका एक और इंटरव्यू लेने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

मंगलवार, 7 मई 2019

सैन्य राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाना भाजपा की भयंकर भूल



देवेंद्र गौतम
भाजपा ने पुलवामा और बालाकोट को चुनावी मुद्दा बनाकर बड़ी भूल कर दी। यह कोई मुद्दा था ही नहीं। इतिहास बताता है कि सैन्य राष्ट्रवाद को हिटलर और मुसोलिनी ने मुद्दा बनाया था। पहले विश्व युद्ध के बाद बर्साय संधि के जरिए विक्षुब्ध राष्ट्रों को जिस तरह हाशिये पर ला खड़ा किया गया था उससे लोगों में आक्रोश था जिसका लाभ हिटलर और मुसोलिनी को मिला था। लेकिन भारत में सैन्य राष्ट्रवाद का राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति नहीं थी। यदि एयर स्ट्राइक के तुरंत बाद चुनाव होते तो भाजपा को इसका कुछ लाभ मिल सकता था लेकिन दोनों के बीच के अंतराल में बहुत से ऐसे तथ्य उजागर हुए जिन्होंने सैन्य राष्ट्रवाद की लहर कमजोर कर दी। इन दोनों घटनाओं में एक पुलवामा मोदी सरकार की इंटेलिजेंस नाकामी का प्रतीक था जिसपर सरकार को शर्मिंदगी प्रकट करनी चाहिए थी, लेकिन इस नाम पर वोट मांगे जाने लगे। दूसरा बालाकोट वायुसेना के शौर्य का जिसपर देशवासी गौरवान्वित हो सकते थे लेकिन उनके रोजमर्रे के जीवन से जुड़े दूसरे मुद्दे थे जिनपर सरकार की चर्चा ही नहीं करना चाहती थी। जो चर्चा करता था उसे पाकिस्तान का एजेंट और देशद्रोही करार दिया जाता था। चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास, रोजगार, नोटबंदी, जीएसटी आदि थे जिनपर सरकार चाहती तो अपने सृजित तर्कों और आंकड़ों के जरिए लोगों को एक हद तक प्रभावित कर सकती थी। उनके भक्त और समर्थक तो थे ही। इन्हें हवा देने के लिए केंद्र सरकार ने तरह-तरह की योजनाएं लाईं उनके लाभुकों को भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित भी कर सकती थी लेकिन उनका क्रियान्वयन जिस ढंग से किया गया उससे समाज के हिस्से को तात्कालिक लाभ तो मिला लेकिन दूरगामी परेशानी बढ़ गई। सोशल मीडिया पर भाजपा के कथित भक्तों ने गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल कर भाजपा का और भी नुकसान किया। कुछ इसी तरह की भाषा का प्रयोग स्वयं पीएम मोदी और उनके कई मंत्री करते रहे। राजीव गांधी पर टिप्पणी कर तो उन्होंने हद ही कर दी। भारत की जनता न तो यह भाषा बोलती है, न पसंद करती है।
भाजपा ने भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर जैसी आतंकवाद की आरोपी को उम्मीदवार बनाकर यह संकेत दे दिया कि वह भारत के हिंदूवाद को किस दिशा में ले जाना चाहती है। तेज़बहादुर यादव का नामांकन रद्द कराने के लिए जिस तरह तंत्र का उपयोग किया गया उसने मोदी सरकार के सैन्यवाद की असली तसवीर दिखा दी। यहां अखिलेश यादव की रणनीति सफल हो गई। इस तरह की कार्रवाइयों के जरिए पीएम मोदी ने अपने पावों में खुद कुल्हाड़ी मार ली। 2014 की बात और थी। उस समय लोग कांग्रेस से नाराज थे और मोदी को एक उम्मीद के रूप में देख रहे थे। 2014 की जीत किसी करिश्मे की नहीं कांग्रेस से नाराजगी की जीत थी। नकारात्मक वोटों से जीती थी भाजपा। जिसे नेरेंद्र मोदी ने अपना करिश्मा समझ लिया और मनमाने तरीके से काम करने लगे। मोदी सरकार ने अच्छी योजनाएं लीं लेकिन क्रियान्वयन बेढंगे तरीके से किया। यह चुनाव भी बेढंगे तरीके से ही लड़ा जिसका नतीजा 23 मई को सामने आ जाएगा। क्या होगा, इसका आभास तो भाजपा नेताओं को भी है।

रांचीवासियों के दिलों में रहेंगे हरदिल अज़ीज डा. मोती प्रसाद सिंह




रांची। राजधानी के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिकित्सक डा. मोती प्रसाद सिंह का निधन रांची वासियों के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई आने वाले कई वर्षों तक हो पाना संभव नहीं दिखता। हिनू स्थित शुक्ला कॉलोनी के प्रवेश मार्ग पर लगे बोर्ड को देखकर लोग यकीन ही नहीं कर पा रहे कि डाक्टर साहब नहीं रहे। वे चिकित्सा का व्यवसाय नहीं बल्कि उसकी साधना करते थे। अमीर-गरीब सबके लिए उनके द्वार खुले रहते थे। गरीब मरीजों का वे न सिर्फ मुफ्त इलाज करते थे बल्कि दवाएं भी अपने पास से दे देते थे।  
उनका देहांत 3 मई को जमशेदपुर के टीएमएस अस्पताल में इलाज के दौरान हो गया। उनकी ज्येष्ठ पुत्री डा. विनीता सिंह और दामाद डां सुनील कुमार ने उनका दाह्य संस्कार और श्राद्ध कर्म जमशेदपुर में ही आर्य समाजी विधि सो कराया। डा. मोती प्रसाद सिंह की तीन पुत्रियां हैं। मंझली पुत्री डां मनीषा सिंह अपने पति डा. राजीव सिंह के साथ ब्रिटेन में रहती है। छोटी बेटी रिंकू सिंह एक कृशल गृहणी हैं और हिंडाल्कों कंपनी में पदस्थापित अभियंता विनीत कुमार के साथ रहती हैं। क्टर मोती प्रसाद सिंह एसोसियेशन ऑफ फिजिसियंस ऑफ इंडिया और कार्डियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की झारखंड इकाई के आजीवन पदधारी रहे। 

स्व, डा. सिंह चिकित्सकों की कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े थे। उन्हें विदेशों में होने वाले चिकित्सा संबंधी सेमिनारों में विशेष वक्ता के रूप में बुलाया जाता था। श्रेष्ठ सेवाओं के लिए उन्हें दर्जनों पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। उन्हें ब्रिटेन स्थित बिहार-झारखंड मेडिकल एसोसिएशन और ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ राजपूत सहित कई संस्थाओं के वार्षिक कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया जाता था।
स्व. डां सिंह दरभंगा मेडिकल कॉलेज ह़ॉस्पीटल से एमबीबीएस की पढ़ाई की। एमडी किया। इसके बाद रांची स्थित एचइसी के प्लांट हास्पीटल में बतौर वरीय चिकित्सक योगदान दिया। वहां अपनी व्यवहार कुशलता से लोकप्रियता हासिल की। वे कोल इंडिया के डायरेक्टर, हेल्थ सर्विसेज चयनित किए गए। वहां भी उन्होंने अपने गहन अनुभव और ज्ञान के जरिए की पलब्धियां हासिल की। कोल इंडिया की परियोजनाओं में स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण में इनका बड़ा योगदान रहा। कोल इंडिया से सेवानिवृत होने के बाद वे रांची आ गए। उन्हें मेकॉन प्रबंधन ने इस्पात अस्पतालों का सलाहकार नियुक्त किया। वहां भी इनका अहम योगदान रहा। रांची में अपनी व्यवहार कुशलता, सहज उपलब्धता और बेहतर इलाज के जरिए काफी लोकप्रियता हासिल की। 9 मई को को उनके हिनू स्थित आवास पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है।

10 वीं में मिले 88 प्रतिशत


गुरु नानक स्कूल की छात्रा हसीन फातिमा को सीबीएसई ,10वीं की परीक्षा में मिला 88 प्रतिशत अंक
रांची। राजधानी रांची निवासी छात्रा हसीन फातिमा को सीबीएसई की 10वीं की परीक्षा में सफलता हासिल हुई है। उसे 88 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए हैं। हसीन फातिमा अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता व शिक्षकों को देती है। उनके पिता एस अजहारूल हसनैन जैदी व माता सईदा नाज ने अपनी पुत्री की सफलता पर गर्व करते हुए खुशी का इजहार किया। हसीन फातिमा को सीबीएसई की 10वीं की परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उनके परिजनों व सहपाठियों ने बधाई दी है।

रक्शंदा रजा ने किया पहली बार मतदान



रांची। स्थानीय मारवाड़ी काॅलेज में प्रथम वर्ष (कला) की छात्रा रक्शंदा रजा ने पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग किया। राजधानी के काली स्थान रोड निवासी रक्शंदा रजा वरिष्ठ पत्रकार एस एम शमीम की पौत्री है। रक्शंदा ने बताया कि पहली बार मतदान करने को लेकर वह काफी उत्साहित थी। सुबह उठकर वह अपने मतदान केन्द्र, प्राइमरी स्कूल, काली स्थान रोड, बूथ संख्या 229 पर पहुंच गई और मताधिकार का प्रयोग किया। उसने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबों को अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए। वह मतदान करने के बाद खुशी का इजहार कर रही थी।

सोमवार, 6 मई 2019

क्या इसी भाषा और संस्कार को लेकर विश्वगुरु बनेगा भारत!



देवेंद्र गौतम

पीएम नरेंद्र मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने चुनाव के समय बार-बार अपने पांव में खुद कुल्हाड़ी मारी। प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारना, फौजी जवान तेज़ बहादुर का नामांकन रद्द करवाना, बनारस के साधु संतो के नामांकन को खारिज करवाना। चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाना, पूर्व में सेना की कार्रवाइयों को वीडियो गेम बताना और शहीद प्रधानमंत्री राजीव गांध पर अपमानजनक टिप्पणी करना यह सब ऐसी गलतियां हैं जिनका खमियाजा उन्हें और उनकी पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।
पीएम मोदी अभी जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वह सभ्य लोगों की भाषा तो कत्तई नहीं हो सकती। पढ़ा लिखा आदमी तो दूर कोई अनपढ़ चायवाला भी इतनी उदंड भाषा नहीं बोलता। उनकी भाषा शुरू से कटाक्ष करने वाली रही है। लेकिन इतने निचले स्तर पर उतरकर कटाक्ष करना इतने बड़े और जिम्मेदार पर बैठे व्यक्ति को शोभा नहीं देता। ऐसी भाषा की देशवासियों पर क्या प्रतिक्रिया होती है कभी न इसे जानने की कोशिश की न इसकी परवाह की। वे स्वयं को चायवाला बोलते हैं। चायवाला भी अपने ग्राहकों से साथ इस तरह की बात नहीं करता। उनके साथ अदब से पेश आता है। यह जाहिल-जपाट और सड़क छाप लफंगों की भाषा देश के लोग पसंद नहीं करते। आश्चर्य होता है कि वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संगठक कैसे रहे। संघ का एक साधारण कार्यकर्ता भी इतनी शालीन भाषा बोलता है कि सैद्धांतिक विरोध रखने वाले भी उनसे प्रभावित हो जाते हैं। संघ जैसी संस्था में रहकर भी कोई संस्कार नहीं सीखे तो आश्चर्य होता है।
हालांकि राजनीति में गंदी भाषा और मूल्यहीनता की शुरुआत लालू यादव से मानी जाती है जो भूरा बाल साफ करो जैसे नारे लगाते थे। लेकिन लालू की भाषा किसी को कचोटती नहीं थी। लोग उनकी बातों का मज़ा लेते थे। उनका उद्देश्य किसी को अपमानित करना नहीं होता था बल्कि पिछड़ी जातियों को जागृत करना, उनके अंदर आत्मसम्मान की भावना भरना होता था। वे मसखरी कर लोगों को आकर्षित करने की कला जानते थे। आज भी वे देश के सबसे मुंहफट राजनेता माने जाते हैं। लेकिन उनकी भाषा कचोटती नहीं गुदगुदाती है। मायावती भी आक्रामक भाषण देती हैं लेकिन उन्होंने मनुवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध किया किसी व्यक्ति अथवा जाति के लिए कभी अपमानजनक और चुभने वाली बातें नहीं की। अपने विरोधियों को देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त घोषित करने और घटिया बातें करने की शुरुआत मोदी और शाह की जोड़ी ने की। वह भी सत्ता हासिल हो जाने के बाद। सत्ता पाते ही उनका अहंकार, बड़बोलापन सातवें आसमान पर पहुंच गया। भाजपा में और भी तो नेता हैं, उनकी भाषा और उनका आचरण तो मर्यादित है। वे विरोधियों को निशाना जरूर बनाते हैं लेकिन उनपर व्यक्तिगत हमला नहीं करते। राजनाथ सिंह हों, नितिन गडकरी हों या अन्य नेता। वे नपी तुली और तार्किक बातें करते हैं। सिर्फ मोदी और शाह के चहेते लोगों की ज़ुबान बेलगाम हो गई है। वे कब क्या बोल जाएंगे उन्हें खुद पता नहीं।
मोदी जी की भाषा ही नहीं काम करने का तरीका भी बेढंगा है। इसका ताज़ा उदाहरण संसदीय चुनाव में 75 पार के लोगों का टिकट काटने का तरीका है। वे वरिष्ठ नेता रहे हैं। भाजपा की नींव डालने वाले रहे हैं। अगर उनसे इस नीतिगत फैसले पर बात कर लेते और उन्हें इसपर सहमत कराकर उनका आशीर्वाद दिलाकर नए प्रत्याशी उतारते तो यह भारतीय परंपरा के मुताबिक होता। उनकी प्रतिष्ठा भी रह जाती और उनके समर्थकों में भी यह संदेश जाता कि उनके नेता को महत्व दिया गया। लेकिन इसकी जगह सीधे फरमान जारी कर दिया गया कि आपकी जगह फलां प्रत्याशी होंगे। कई नेताओं ने इस फरमान पर बगावत कर दी। कई बार रांची के सांसद रहे रामटहल चौधरी बागी उम्मीदवार के रूप में निर्दलीय मैदान में उतर गए और अब भाजपा के लिए इस जीती हुई सीट को गंवाने का खतरा है। गांधीनगर के मतदाता एलके आडवाणी जी के अपमान को लेकर नाराज हो गए और अब अमित शाह के लिए चुनाव जीतना संदिग्ध हो चला है। तकनीक का सहारा लेकर जीत भी गए तो नैतिक रूप से हार हो गई।


स्वर्ण जयंती वर्ष का झारखंड : समृद्ध धरती, बदहाल झारखंडी

  झारखंड स्थापना दिवस पर विशेष स्वप्न और सच्चाई के बीच विस्थापन, पलायन, लूट और भ्रष्टाचार की लाइलाज बीमारी  काशीनाथ केवट  15 नवम्बर 2000 -वी...