रांची। धनतेरस की पूर्व संध्या पर रविवार (4 नवंबर ) को रांची सेनेटरीवियर मर्चेंट्स एसोसिएशन (रास्मा ) की ओर से मोरहाबादी स्थित वृंदावन गार्डेन में दीपावली मिलन समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर समारोह के मुख्य अतिथि रास्मा के संस्थापक अध्यक्ष व संरक्षक भगवती प्रसाद भुवालका को सम्मानित किया गया । उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि प्रकाश पर्व दीपावली खुशहाली व भाईचारगी का त्योहार है। समाज के सभी वर्गों के लिए यह पर्व समरसता का संदेश देता है। उन्होंने दीपावली का त्योहार हर्षोल्लासपूर्वक मनाने की अपील की। इस अवसर पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम व संगीत संध्या का भी आयोजन किया गया। दीपावली स्पेशल तंबोला का भी रास्मा के सदस्यों ने लुत्फ उठाया। मौके पर रास्मा के अध्यक्ष ललित केडिया, सचिव आदित्य भुवालका, प्रवक्ता आदित्य शर्मा, ओमप्रकाश सर्राफ, राजीव खंडेलवाल, अंजय सरावगी, मनोज बंका, हर्ष खंडेलवाल, अनीष सर्राफ, अरविन्द जालान, ओमप्रकाश राजगढ़िया, अनूप अग्रवाल, जुगल केडिया, अरुण शर्मा, रजनीश ,निकेत राजगढ़िया, शीतलनाथ ओहदार, मनीष जैन, राजकुमार गुप्ता सहित काफी संख्या में रास्मा के सदस्यगण सपरिवार उपस्थित थे।
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सोमवार, 5 नवंबर 2018
रास्मा का दीपावली मिलन समारोह आयोजित
रांची। धनतेरस की पूर्व संध्या पर रविवार (4 नवंबर ) को रांची सेनेटरीवियर मर्चेंट्स एसोसिएशन (रास्मा ) की ओर से मोरहाबादी स्थित वृंदावन गार्डेन में दीपावली मिलन समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर समारोह के मुख्य अतिथि रास्मा के संस्थापक अध्यक्ष व संरक्षक भगवती प्रसाद भुवालका को सम्मानित किया गया । उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि प्रकाश पर्व दीपावली खुशहाली व भाईचारगी का त्योहार है। समाज के सभी वर्गों के लिए यह पर्व समरसता का संदेश देता है। उन्होंने दीपावली का त्योहार हर्षोल्लासपूर्वक मनाने की अपील की। इस अवसर पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम व संगीत संध्या का भी आयोजन किया गया। दीपावली स्पेशल तंबोला का भी रास्मा के सदस्यों ने लुत्फ उठाया। मौके पर रास्मा के अध्यक्ष ललित केडिया, सचिव आदित्य भुवालका, प्रवक्ता आदित्य शर्मा, ओमप्रकाश सर्राफ, राजीव खंडेलवाल, अंजय सरावगी, मनोज बंका, हर्ष खंडेलवाल, अनीष सर्राफ, अरविन्द जालान, ओमप्रकाश राजगढ़िया, अनूप अग्रवाल, जुगल केडिया, अरुण शर्मा, रजनीश ,निकेत राजगढ़िया, शीतलनाथ ओहदार, मनीष जैन, राजकुमार गुप्ता सहित काफी संख्या में रास्मा के सदस्यगण सपरिवार उपस्थित थे।
रविवार, 4 नवंबर 2018
बीच मंझधार में न डूब जाए भाजपा की लुटिया
-देवेंद्र गौतम
हिंदू संगठनों और संत-महात्माओं ने
न्यायपालिका के निर्णय का इंतजार करने की जगह दिसंबर में राम मंदिर का निर्माण
शुरू कर देने की घोषणा कर दी है। जाहिर है इससे तनाव बढ़ेगा। उसका दायरा चाहे जो
हो। लेकिन ध्रुवीकरण की प्रक्रिया जरूर शुरू हो जाएगी। भाजपा यही चाहती भी है।
2019 के गदर के लिए यही एक ब्रह्मास्त्र शेष बचा भी है। इस तरह विधायिका परोक्ष रूप
से न्यायपालिका से टकराने से बच जाएगी।
विधायिका और न्यायपालिका के बीच
विभिन्न मौकों पर तनाव उत्पन्न होता ही रहता है लेकिन हाल के दिनों में यह तनाव
कुछ ज्यादा ही तीखा हो चला है। सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारियों की नूराकुश्ती,
सबरीमाला मामले में महिलाओं के पक्ष में निर्णय और राफेल सौदे में हस्तक्षेप। लोकतंत्र
के दो पायों के बीच टकराव बढ़ने का कारण बने। खासतौर पर अयोध्या मामले में सुप्रीम
कोर्ट की सुनवाई टलने पर चुनावी रणनीति ही बिगड़ गई। इधर हिन्दूवादी संगठनों के
सब्र की बांध भी टूट चली है। पहले उन्होंने मोदी सरकार पर अध्यादेश लाकर मंदिर
निर्माण का रास्ता साफ करने का दबाव डाला। संत-महात्मा और तमाम हिंदूवादी संगठनों
से लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत तक यही सुझाव देने लगे। यह न्यायपालिका की भूमिका
को नकार कर अलग राह चलने का सुझाव था। लेकिन इसके लिए स्थिति अनुकूल नहीं थी। केंद्र
की मोदी सरकार को अगर यही करना होता तो इतने समय तक अदालत के रुख का इंतजार क्यों
करती?
पहली
बात यह कि सरकार को पता है कि वह ऐसा कोई अध्यादेश लाती भी है तो उसे पारित नहीं
करा सकेगी। इस मुद्दे पर विपक्ष तो क्या सहयोगी दलों का समर्थन मिलना भी कठिन है। इस
भूमि विवाद के तीन दावेदार हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जब इसे तीनों के बीच
बराबर-बराबर बांट देने का निर्णय दिया था तो किसी पक्ष को मंजूर नहीं हुआ। सभी पौने तीन एकड़ के पूरे भूखंड पर अपने हक में फैसला चाहते थे। सो
सुप्रीम कोर्ट में अपील कर बैठे। अब यदि भाजपा सत्ता में होने के नाते एक पक्ष के
दावे पर मुहर लगाएगी तो अन्य दो पक्षों की प्रतिक्रिया क्या होगी? इसपर भी तो विचार करना होगा। जब एक अदालत का फैसला किसी पक्ष
को स्वीकार नहीं हुआ तो सरकार का फैसला मंजूर हो जाएगा, यह कैसे संभव है। अगर
सरकार रामलला विराजमान या निर्मोही अखाड़ा के पक्ष में खड़ी होती है तो क्या मस्जिद
समर्थक शांत होकर बैठ जाएंगे? जब सभी पक्ष
जिद पर अड़े हों और साक्ष्यों को भी मानने को तैयार न हों तो फैसला देना किसी के
लिए भी जटिल कार्य हो जाता है। न्यायपालिका के लिए भी यह आसान नहीं है। अब अगर सरकार
अध्यादेश लाने पर विचार करती तो इसके पीछे आस्था का दबाव नहीं चुनावी लाभ उठाने की
लालसा होती। अपने चुनावी वायदे को पूरा न कर पाने की खीज होती। न्यायपालिका को
चुनावी लाभ-हानि के गणित से कोई मतलब नहीं है। वह भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि
साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाती है। यदि उसपर भरोसा जताया तो उसके कार्य में
बाधा पहुंचाना उचित नहीं था। चुनाव की पूर्व बेला में अपनी वाणी और पहलकदमी पर
नियंत्रण रखना होता है। लेकिन सत्ता के मद और उसके हाथ से फिसल जाने का डर इस कदर हावी
है कि मर्यादाओं के उलंघन की नौबत भी आई। सुनवाई की तिथि से पूर्व सबरीमाला मामले
में सुप्रीम कोर्ट के महिलाओं के पक्ष में निर्णय और केरल के रूढ़िवादी लोगों के इसके विरोध में उठ खड़े हे के दौरान भाजपा के
अंदर का लैंगिक समानता का भाव तिरोहित हो गया। उसे इस हंगामे के बीच एक वोट बैंक की
संभावना दिखाई पड़ने लगी। फैसले पर टिप्पणी करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अमित शाह ने कोर्ट को हिदायत दे डाली कि वह ऐसे फैसले न दे जिसे लागू नहीं किया जा
सके। अर्थात ऐसे ही फैसले दे जो सरकार के मनोनुकूल हो। विधायिका जब न्यायपालिका को
हिदायत देने लगे तो कहीं न कहीं चार पायों पर खड़ी लोकतंत्र की इमारत पर खतरे की
अनुभूति होने लगती है। शाह ने सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर सवाल उठाकर यह संकेत दिया
कि कोर्ट की मर्यादा तभी बची रहेगी जब वह सरकार के मनोनुकूल फैसले दे। अन्यथा उसके
आदेश धरे के धरे रह जाएंगे। इस हिदायत के पीछे कहीं न कहीं उनका इशारा अयोध्या
मामले की ओर था जिसकी सुनवाई 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होनी थी। लेकिन
कोर्ट ने उनकी हिदायत पर अमल करने की जगह सुनवाई को जनवरी तक के लिए टाल दिया। इससे
बौखलाहट उत्पन्न हो गई। सरकार चाहती थी कि चुनाव से पहले सुनवाई पूरी हो जाए और
फैसला आ जाए।
जब यह संभव नहीं हुआ और अध्यादेश
लाना भी लाभप्रद नहीं दिखा तो अब कट्टर हिंदूवादी संगठनों ने जबरदस्ती पर तरने का
फैसला किया है। भाजपा का काम आसान हो जाएगा। उसे चुनावी वैतरणी पार करने का एक
रास्ता मिल जाएगा। मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद कट्टर हिंदू संगठन अति
उत्साहित थे। उन्होंने सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न करने की कई कोशिशें कीं लेकिन इसमें
आंशिक सफलता ही मिली।
सत्ता में आने के पहले भाजपा ने कई
चुनावी वायदे किए थे। उनमें कितने पूरे हुए सर्वविदित है। हिंदूवादी संगठनों से
राम मंदिर बनाने का वादा उसमें एक था। लेकिन भाजपा सिर्फ उन्हीं के समर्थन से
सत्ता में नहीं आई थी। भाजपा नेतृत्व को यह बात याद रखनी चाहिए कि हिंदूवादी
संगठनों ने नहीं बल्कि भारत की आम जनता ने उसे सत्ता की चाबी सौंपी थी। वह भी किसी
सांप्रदायिक आग्रह पर नहीं बल्कि तत्कालीन यूपीए सरकार की मनमानी से ऊबकर। लोगों
ने भाजपा से लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं की रक्षा करते हुए जनहित के कार्यों
की अपेक्षा की थी। जनता के इस भरोसे को कायम रखकर ही सत्तारूढ़ भाजपा चुनाव की वैतरणी
पार कर सकती है सांप्रदायिक उन्माद की नौका बीच मंझधार में उसकी लुटिया डुबो भी
सकती है।
एचइसी प्रबंधन से वेतन पुनरीक्षण पर वार्ता का आग्रह
रांची। एचइसी प्रबंधन और श्रमिक संगठनों के बीच वेतन पुनरीक्षण और मजदूर
समस्याओं को लेकर श्रम विभाग में त्रिस्तरीय वार्ता संपन्न हुई। सभी पक्षो की बात
सुनने के बाद क्षेत्रीय श्रम आयुक्त जी एस दुराई बुरु ने प्रबंधन और श्रमिक
संगठनों के प्रतिनिधियों को द्वीपक्षीय वार्ता कर निदान निकालने का परामर्श दिया।
वार्ता में हटिया मजदूर यूनियन के अध्यक्ष भवन सिंह, कार्यकारणी अध्यक्ष
हरेन्द्र प्रसाद यादव, महामंत्री
राजेन्द्र कांत महतो, संगठन
मंत्री रमा शंकर प्रसाद, संगठन
सचिव जॉन तिग्गा, प्रबंधन की ओर से प्रबन्धक प्रशांत पाठक, उप प्रबंधक संतोष मिश्रा और
श्रम विभाग की तरफ से क्षेत्रीय श्रमायुक्त शामिल थे।
उल्लेख्य है कि प्रबंधन ने 10 अक्टूबर को ही वार्ता के लिए श्रमिक संगठनों से 3 प्रतिनिधियों का नाम मांगा
था। लेकिन श्रमिक संगठनों की तरफ से कृष्णमोहन सिंह का अंतिम नाम 30 अक्टूबर को आया।
इसके कारण वार्ता में अनावश्यक विलंब हुआ। प्रबन्धन ने 12 अक्टूबर तक सभी यूनियनों से
3 प्रतिनिधियों का नाम मांगा
था। हटिया मजदूर यूनियन ने विलंब के कारण संबंधी प्रबंधन की शिकायत पर सहमति जताते
हुए प्रबंधन से यथाशीघ्र द्विपक्षीय वार्ता बुलाने का आग्रह किया है।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती : आदर्श मल्लिक
* छात्र हित के लिए समर्पित ऊर्जावान युवा
.
कहते हैं बिना कुछ किए जय- जयकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। बिना संघर्ष किए सफलता हासिल नहीं होती। जो कभी संघर्ष का मैदान नहीं छोड़ेगा, हमेशा मेहनत करता रहेगा, उसे सफलता जरूर एक दिन हासिल होगी। इसकी मिसाल है रांची निवासी आदर्श मल्लिक।
आदर्श मल्लिक की प्रारंभिक शिक्षा बहरागोड़ा में हुई। वर्ष 2005 में वह रांची आए और डीएवी स्कूल, धुर्वा से आगे की पढ़ाई की। उन्होंने बीआईटीटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल किया। स्कूल के दिनों से ही उनकी सामाजिक कार्यों में भागीदारी रही। अपने स्कूल का नेतृत्व जेबीएबी जोनल मीट्स में किया और हमेशा पहला रैंक दिलवाया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र हित के लिए बहुत सारा कार्य किया। आदर्श मल्लिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए संघर्षरत रहते हैं।
बीआईटीटी पॉलिटेक्निक का उन्होंने नेतृत्व ऑल इंडिया इंजिनियर्स मीट में कोलकाता में 2016 में किया।
इस बीच छात्र नेतृत्व कर्ता में आदर्श मल्लिक का नाम सबसे आगे आने लगा और आदिवासी मूल वासी छात्र मोर्चा के 2017 में वे रांची विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने। आदर्श मल्लिक के अच्छे कार्य को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार मीडिया संगठन ने 2017 में प्रदेश सचिव का पदभार दिया। राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन में रहकर उन्होंने पूरा झारखंड का दौरा किया। वह मजदूरों को उनका हक दिलाने लगे। 2018 में उन्हें मजदूर मोर्चा का रांची जिला महासचिव का पदभार दिया गया। धनबाद में आयोजित युवा सुरक्षा मंच की बैठक में उन्हें युवा सुरक्षा मंच का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। आदर्श मलिक ने रांची के विभिन्न कॉलेज में महिला की सुरक्षा को किस तरह से बेहतर बनाया जाए इसे लेकर वरीय पुलिस अधीक्षक के साथ बैठक किया और विभिन्न कॉलेजों में महिलाओं के लिए शक्ति ऐप को लॉन्च करवाया।
गर्मी के समय में रांची के हर एक चौक चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की मेहनत को देखते हुए उन्होंने हर चौक चौराहों में जाकर ट्रैफिक कर्मियों को ग्लूकोज पानी डा पानी छाता का वितरण किया हर एक रविवार को उन्होंने मंदिर मस्जिद दरगाह इत्यादि जाकर वस्त्र चावल दाल खाने की सामग्री का वितरण किया
बहुत से संगठनों में आदर्श मलिक ने रक्तदान शिविर लगाया। इनका मानना है कि जब गरीबी रेखा खत्म हो जाए जब सभी को अपना अधिकार मिलने लगे जब गरीब बच्चे आगे जाकर झारखंड और अपने देश का नाम रोशन करें तभी हमारा देश आगे बढ़ेगा आदर्श मलिक के जीवन में काफी कठिनाइयां आई, पर वे कभी रुके नहीं, कभी हार नहीं मानी। उनका यह मानना है कि बिना संघर्ष किए सफलता हासिल नहीं होती। युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाएं। इससे देश व समाज खुशहाल होगा।
ईएनटी चिकित्सा परामर्श कार्यशाला का आयोजन
रांची। छात्र क्लब चिकित्सक मंच द्वारा आज राज घराना बैंक्वेट हॉल, रातू रोड, रांची नाक, कान, गला (ENT) के विषय पर चिकित्सा परामर्श कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का शुभारंभ बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव आदित्य विक्रम जयसवाल ने दीप प्रज्जवलित कर किया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में नाक कान गला के विशेषज्ञ डॉक्टर अभिषेक श्रीवास्तव, मंच के शिव किशोर शर्मा, सुमित साहू ,नीरज शुभम चौधरी मुख्य रूप से उपस्थित थे।
मुख्य अतिथि आदित्य विक्रम जयसवाल ने अपने संबोधन में कहा की आज के भागदौड़ जीवन में हर किसी को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। लोगों की स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है इसको बेहद ख्याल रखना चाहिए।अक्सर लोग कानदर्द की स्थिति में सरसों के तेल की कुछ बूंदें डाल लेते हैं। इससे संक्रमण और अधिक बढ़ सकता है इसलिए इसके प्रयोग से बचने की सलाह दी।
परामर्श कार्यशाला में डॉक्टर की टीम ने बताया कि बदलते मौसम के दौरान हर किसी को विशेष रूप से सजग रहने की जरूरत है। जिन लोगों को नाक कान, गला व अस्थमा की तकलीफ हो वे घर में एयर कंडीशनर (एसी) का प्रयोग कम से कम करें। एसी की हवा से नाक और गला दोनों खराब होने की आशंका रहती है। वैसे तो सावधानी ही उपचार है लेकिन यदि एलर्जी अधिक बढ़ जाए तो विशेषज्ञ की सलाह से मरीज नाक में डालने के लिए स्नॉजल स्प्रे का उपयोग कर सकते हैं।
कान के लिए नमी सही नहीं होता है, कान के लिए शुष्कता या नमी ठीक नहीं है। इसके अलावा बारिश में भीगने से कान में पानी जाने पर संक्रमण और फंगस होने का खतरा बना रहता है। जब हम ईयरबड से वैक्स निकालने का प्रयास करते हैं तो वह बाहर निकलने की बजाय और अंदर चला जाता है। इससे कान में फंगस व पर्दे पर चोट लग सकती है और सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
मुख्य अतिथि आदित्य विक्रम जयसवाल ने अपने संबोधन में कहा की आज के भागदौड़ जीवन में हर किसी को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। लोगों की स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है इसको बेहद ख्याल रखना चाहिए।अक्सर लोग कानदर्द की स्थिति में सरसों के तेल की कुछ बूंदें डाल लेते हैं। इससे संक्रमण और अधिक बढ़ सकता है इसलिए इसके प्रयोग से बचने की सलाह दी।
परामर्श कार्यशाला में डॉक्टर की टीम ने बताया कि बदलते मौसम के दौरान हर किसी को विशेष रूप से सजग रहने की जरूरत है। जिन लोगों को नाक कान, गला व अस्थमा की तकलीफ हो वे घर में एयर कंडीशनर (एसी) का प्रयोग कम से कम करें। एसी की हवा से नाक और गला दोनों खराब होने की आशंका रहती है। वैसे तो सावधानी ही उपचार है लेकिन यदि एलर्जी अधिक बढ़ जाए तो विशेषज्ञ की सलाह से मरीज नाक में डालने के लिए स्नॉजल स्प्रे का उपयोग कर सकते हैं।
कान के लिए नमी सही नहीं होता है, कान के लिए शुष्कता या नमी ठीक नहीं है। इसके अलावा बारिश में भीगने से कान में पानी जाने पर संक्रमण और फंगस होने का खतरा बना रहता है। जब हम ईयरबड से वैक्स निकालने का प्रयास करते हैं तो वह बाहर निकलने की बजाय और अंदर चला जाता है। इससे कान में फंगस व पर्दे पर चोट लग सकती है और सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
स्कूल को सहयोग करने के लिए जताया आभार
* संजीवनी संस्था का शुक्रगुजार हैं डॉ. केपी डे
रांची। जगन्नाथपुर बस्ती स्थित बिरसा शिक्षा निकेतन को सामाजिक संस्था " संजीवनी " द्वारा किए गए सहयोग के लिए स्कूल के संचालक व लोकप्रिय समाजसेवी डॉ. केपी डे ने आभार जताया है। डॉ. डे ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ काम में विश्वास करते हैं। प्रचार- प्रसार से उन्हें कोई खास मतलब नहीं रहता है। संजीवनी नामक संस्था पीड़ित मानवता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहती है। डॉ. डे के मुताबिक संजीवनी से जुड़े समाजसेवी अनिल केडिया, राजेश चौधरी, आनंद खेमका, राजकुमार अग्रवाल, प्रवीण सहित अन्य सदस्यों का अद्भुत सहयोग स्कूल को मिलता रहा है। उन्होंने बताया कि स्कूल के बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए पांच साल तक दो शिक्षकों को वेतन संजीवनी संस्था की ओर से दिया गया। बच्चों को कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम से जोड़ने के लिए स्कूल में दानस्वरूप कंप्यूटर दिया गया। डॉ. डे ने बताया कि स्कूल के शिक्षक व छात्र संजीवनी व इससे जुड़े समाजसेवियों का शुक्रगुजार हैं, जिनके सहयोग से छात्र लाभान्वित हो रहे हैं। संजीवनी से सचमुच छात्रों को संजीवनी मिल रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि " नेकी कर, दरिया में डाल " की तर्ज पर संजीवनी से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता प्रचार - प्रसार से दूर रहते हैं। संस्था हाशिए पर रहने को विवश समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को सहयोग कर पीड़ित मानवता की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। डॉ. डे ने कहा कि बिरसा शिक्षा निकेतन के छात्र व शिक्षक संजीवनी के प्रति सदैव आभारी रहेंगे।
गुरुवार, 1 नवंबर 2018
स्लम एरिया में शिक्षा का अलख जगा रहे डॉ.केपी डे
* रामकृष्ण मिशन व अन्य संस्थाओं का मिल रहा सहयोग।
रांची। कुछ लोग अपने जीवन में परोपकार को सर्वोपरि मानते हैं। समाजसेवा में जीवन समर्पित कर देते हैं। इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ नहीं होता। ऐसे ही एक शख्स हैं एच ई सी परिसर स्थित जगन्नाथपुर झोपड़ी (स्लम एरिया)क्षेत्र के निवासी डॉ.केपी डे। डॉ.डे वर्ष 1982 में पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिला से रांची आए। जगन्नाथपुर क्षेत्र के योगदा सत्संग महाविद्यालय से होमियोपैथी चिकित्सा की डिग्री ली। इसके बाद उसी क्षेत्र में होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति से मरीजों का इलाज करने लगे। कुछ दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। डॉ. साहब की ख्याति उनकी व्यवहारकुशलता और बेहतर इलाज के कारण बढ़ने लगी। जगन्नाथपुर क्षेत्र मे अधिकतर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग रहते हैं। स्लम एरिया है। आदिवासी और पिछड़े तबके के लोग अधिक हैं। डॉ. डे ने अत्यंत पिछड़े व गरीबों का इलाज नि:शुल्क करना शुरू किया। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी सेवा और गरीबों के प्रति उनके दयाभाव की चर्चा चहुंओर होने लगी। इस दौरान उन्होंने देखा कि स्लम एरिया में शिक्षा का अभाव है। बच्चों के अभिभावकों को भी अपने बच्चों को पढ़ाई की तनिक भी चिंता नहीं है। बच्चों के मां-बाप नशापान के आदि हैं। पूरे क्षेत्र में हड़िया-दारू की संस्कृति हावी है। इससे आदिवासी और अन्य पिछड़े समुदाय के लोगों का विकास बाधित हो रहा है। शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं है।
यह सब देखकर उनके मन में इस क्षेत्र के बच्चों को शिक्षित करने की इच्छा जगी। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र की सेवाएं अपने सहयोगी मित्रों के हवाले कर बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। इस क्रम में वर्ष 1992 में जगन्नाथपुर के स्लम एरिया में स्थित एक छोटे से कमरे में बिरसा शिक्षा निकेतन नामक स्कूल की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्हें अभिभावकों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। डॉ. डे सुबह उठकर बच्चों को घर से बुलाकर स्कूल लाया करते, जबकि बच्चों के अभिभावक (माता पिता) नशा का सेवन कर घरों में सोये रहते थे। डॉ. डे ने नशाखोरी के विरुद्ध भी अभियान शुरु किया। नशा मुक्त समाज की परिकल्पना के साथ स्लम एरिया में जागरूकता फैलाने लगे। शुरू में तो उन्हें काफी विरोध और ताने का सामना करना पड़ा। लेकिन इससे बेपरवाह वह अपने मुहिम में लगे रहे। धीरे धीरे उनका प्रयास रंग लाने लगा। क्षेत्र में हड़िया-दारू की संस्कृति पर काफी हद तक लगाम लगा। नशा पान के विरोध में भी लोग जागरूक हो रहे हैं। बिरसा शिक्षा निकेतन में वर्तमान में लगभग सात सौ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को संस्कार युक्त शिक्षा देने में डॉ. डे प्रयासरत हैं। स्कूल की प्राचार्या रीता संध्या टोप्पो व अन्य शिक्षक काफी परिश्रमी हैं। उनकी लगन व परिश्रम से स्कूल के बच्चे शिक्षित हो रहे हैं। इस स्कूल से पढ़कर निकले कई बच्चे रांची के प्रतिष्ठित स्कूलों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं। आज हर वर्ग के बीच डॉ. डे के इस प्रयास की सराहना की जाती है। स्कूल का संचालन सामान्य शुल्क और सामाजिक सहयोग से होता है। डॉ. डे बताते हैं कि समय समय पर रामकृष्ण मिशन, सार्वजनिक उपक्रम सेल, मेकॉन,भारतीय स्टेट बैंक, हटिया शाखा, लायंस क्लब, रोटरी क्लब मिडटाउन, एच ई सी व एच ई सी महिला समिति सहित अन्य संस्थाओं की ओर से स्कूल को संसाधनों से लैस करने में सहयोग किया जाता है। वह बताते हैं कि शिक्षा के बिना समाज का विकास संभव नहीं है। बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्हें शिक्षित होना जरूरी है। इस दिशा में सरकारी व गैर सरकारी दोनों स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा नशा मुक्त समाज का होना भी जरूरी है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि लोगों को सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत को अपनाने की आवश्यकता है। इससे समाज और राष्ट्र सशक्त होगा।
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