मोदी सरकार के पास 2019 में जनता के पास जाने के लिए एकमात्र कश्मीर मुद्दा ही बचा था। इसके लिए एक झटके की जरूरत थी। पीडीपी सरकार से समर्थन वापसी इसी रणनीति का हिस्सा है। वरना जम्मू-कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं हुआ जो पहले नहीं हो रहा था। मोदी सरकार ने अपनी चार वर्षीय कार्यकाल की उपलब्धियों से देशवासियों को अवगत कराने के लिए अपने नुमाइंदों को छोड़ा जरूर लेकिन वे जनता पर कोई खास असर नहीं डाल पा रहे थे। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और प्रयोगों से जो जख्म लगे उपलब्धियों के दावे उसपर नमक छिड़कने का ही काम कर रहे थे। अब दो ही रास्ते बचे थे। महंगाई को नियंत्रित कर लोगों को राहत पहुंचाना या फिर लोगों का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ देना।सरकार ने दूसरा रास्ता अपनाया। कश्मीर संवेदनशील मुद्दा है जो पूरे देश को प्रभावित करता है। वहां सैनिक कार्रवाई तेज़ कर लोगों को भावनात्मक डोज दिया जा सकता है। यह दावा किया जा सकता है कि दूसरी कोई भी सरकार कश्मीर में आतंकियों की नकेल नहीं कस सकती। जम्मू के हिन्दू बहुल लोगों की सहानुभूति भी प्राप्त की जा सकती है। इससे हिंदुत्व कार्ड को भी नये सिरे से भुनाने का अवसर मिल सकता है। महबूबा सरकार से समर्थन वापसी को चुनावी तैयारी के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। यह बहुत सोच समझ कर गंभीर मंथन के बाद लिया गया निर्णय है।
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बुधवार, 20 जून 2018
बैंकों के खाता धारकों का हाल बेहाल
भारत में बैंको की स्थिति इस तरह खराब हो गई है कि खाता धारियों को अब यह महसूस होने लगा है कि,बैंको से किनारा कर लेना ही एकमात्र रास्ता है। बोकारो में तो बैंको की स्थिति इतनी खराब है कि पूछिये मत। विशेष कर सरकारी बैंक। बोकारो स्टील सिटी के सेक्टर 4 के यूको बैंक में दो दिनों से काम काज ठप है। कारण लिंक फेल होने बताया जा रहा है।खाताधारियो को पैसा नहीं मिल रहा है ।बैंक प्रबंधन दो दिनों से हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।इस भीषण गर्मी में अपने पैसे नही मिलने पर ग्राहक अत्यधिक परेशान हैं लेकिन बैंक के बाबू लोग AC में बैठ कर मजा मार रहे है।
पहले तो ATM में लिंक नही हुआ करती थी या फिर कैश की मारामारी थी।लोग परेशान होकर ATM का रुख करना छोड़ बैंकों के काउंटर पर निर्भर रहना प्रारम्भ किये पर वाह रे बैंक।लिंक नही है के बहाने से त्रस्त है ग्राहक
समझ मे नही आता,आखिर वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नही है।आज जब अनेको service provider उपलब्ध है तो एक ही कम्पनी का कनेक्शन लेकर कोई बैंक क्यों उसी पर आश्रित है?अब तो प्रतीत होता है कि पैसे का लेन देन पुराने तरीके से करना ही आसान होगा।अब तो बैंक सुरक्षित भी नही है।किसी के खाते से पैसा गायब हो जाना ,ATM से पैसा गायब होने और तो और लॉकर तोड़ गहने और कीमती सामान गायब होना आम बात होती जा रही है।सरकार चाहती है कि सारा काम ऑनलाइन हो परंतु लिंक नही रहे।ग्राहक सबसे ठगा तो उस समय महसूस करता है जब एटीएम में कार्ड डाल कर पिन दाल देता है और पैसा निकलने के process में रहता है तभी लिंक फेल हो जाता है।ग्राहक का पैसा कहते से काट भी जाता है और पैसा मिलता भी नही है।सम्बंधित बैंक के पास इसका कोई त्वरित उपचार नही है।ग्राहक को सप्ताहों बैंक का चक्कर लगना होता है।
आज जब पुरी दुनिया मे 7G version इंटरनेट सफलता पूर्वक चल रहा है,सपना देश 4G चलाने में भी सक्षम नही है।ऐसे में जनता क्या करे?
पहले तो ATM में लिंक नही हुआ करती थी या फिर कैश की मारामारी थी।लोग परेशान होकर ATM का रुख करना छोड़ बैंकों के काउंटर पर निर्भर रहना प्रारम्भ किये पर वाह रे बैंक।लिंक नही है के बहाने से त्रस्त है ग्राहक
समझ मे नही आता,आखिर वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नही है।आज जब अनेको service provider उपलब्ध है तो एक ही कम्पनी का कनेक्शन लेकर कोई बैंक क्यों उसी पर आश्रित है?अब तो प्रतीत होता है कि पैसे का लेन देन पुराने तरीके से करना ही आसान होगा।अब तो बैंक सुरक्षित भी नही है।किसी के खाते से पैसा गायब हो जाना ,ATM से पैसा गायब होने और तो और लॉकर तोड़ गहने और कीमती सामान गायब होना आम बात होती जा रही है।सरकार चाहती है कि सारा काम ऑनलाइन हो परंतु लिंक नही रहे।ग्राहक सबसे ठगा तो उस समय महसूस करता है जब एटीएम में कार्ड डाल कर पिन दाल देता है और पैसा निकलने के process में रहता है तभी लिंक फेल हो जाता है।ग्राहक का पैसा कहते से काट भी जाता है और पैसा मिलता भी नही है।सम्बंधित बैंक के पास इसका कोई त्वरित उपचार नही है।ग्राहक को सप्ताहों बैंक का चक्कर लगना होता है।
आज जब पुरी दुनिया मे 7G version इंटरनेट सफलता पूर्वक चल रहा है,सपना देश 4G चलाने में भी सक्षम नही है।ऐसे में जनता क्या करे?
सोमवार, 18 जून 2018
झारखंड में यूरेनियम खनिज की कमी नहीं
दस वर्षों तक देश की आवश्यकता पूरी करने में सक्षम
समरेन्द्र कुमार
रांची। झारखंड के जादूगोड़ा, भाटिन, नरवा पहाड़ और तुमारडीह में यूरेनियम
का खनन वर्षों से चल रहा है। वहां अभी युरोनियम खनिज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध
है। इस बीच पूर्वी सिंहभूम जिले के इलाकों में इसके अलावा 16 हजार टन का नया भंडार
मिला है। यह अगले 10 वर्षों तक राष्ट्र की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त है।
इसमें 11 हजार टन का भंडार बानाडुंगरी-सिमरीडुंगरी में मिला है जबकि 5 हजार टन का
भंडार राजदा में मिला है।
परमाणु खनिज अन्वेषण व अनुसंधान निदेशालय की पूर्वी सिंहभूम शाखा के
अधिकारियों ने इन भंडारों को ढूंढ निकाला है। एक वैज्ञानिक गोष्ठी में देशभर के
वैज्ञानिकों की मौजूदगी में इससे संबंधित शोधपत्र प्रस्तुत किया जा चुका
है।तुरामडीह से पश्चिम की ओर 200 किलोमीटर के क्षेत्र में जमीन की दरारों के बीच
यूरेनियम की शिराएं फैली हुई हैं। इनसे खनन करने की तैयारी की जा रही है।
विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इन भंडारों की भौगौलिक स्थिति खनन
के लिए अनुकूल है और उनके पास जो तकनीक है उसमें रेडियेशन के कुप्रभावों से बचते
हुए खनन किया जा सकता है। इस तकनीक में पहले सेटेलाइट से सर्वे के जरिए सटीक स्थल
का चयन किया जाता है, इसके बाद तीन सेंटीमीटर के पाइप से खुदाई कर यूरेनियम का
नमूना निकाला जाता है। फिर प्रयोगशाला में उसकी जांच की जाती है। इसके बाद पूरे
क्षेत्र को प्रतिबंधित कर खनन शुरू किया जाता है। उल्लेख्य है कि जादूगोड़ा खदान
से यूरेनिटम के खनन का घातक प्रभाव कुछ किलोमीटर तक की आबादी पर पड़ा है।
इंटक में एका स्वागत योग्य, सराहनीयः विकास सिंह
बेरमो।
इंटक नेता विकास कुमार सिंह ने श्रमिक संगठन के दो शीर्ष नेता राजेंद्र प्रसाद
सिंह और चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे के बीच वर्षों से चली आ रही तनातनी की
समाप्ति को समय की मांग और स्वागतयोग्य बताया है। श्री सिंह ने पंडित जवाहरलाल
नेहरू का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू जी कहते थे..अगर हमलोग एक साथ खड़े नही हुये
तो एक साथ मिट जायेँगे। अतः .देर से ही सही इंटक के दो केन्द्रों के ऐतिहासिक
परिप्रेक्ष्य में समय की जरूरत को ध्यान मे रखते हुये एक साथ खड़े होने का निर्णय
लेकर तमाम मेहनतकश मजदूरो एवं राष्ट्रहित मे चिंतित आमजनो के लीए आशाएक नई ज्योति
जलाई है ..
आपसी विवाद के कारण वेतन समझौतो से इंटक
को अलग कर दिया गया था। इसका लाभ उटाते हुए प्रबंधन ने मजदूरों की पूर्व मे जारी बहुत
सारी सुविधाओ को समाप्त कर दिया था या उसमें कटौती कर दी थी। इसमें मृत या सैद्धांतिक रूप से वीमार मजदूरो के आश्रितों के नियोजन
पर रोक लगाना सबसे गंभीर मसला है। साथ ही केप्टिव खदानों के मालिको को
खुले बाजार मे कोयला बेचने की अनुमति देकर कोयला उद्योग के निजीकरण का मार्ग
प्रशस्त करना। इंटक की मौजूदगी में इस तरह के निर्णय कदापि नहीं लिए जाते।
पूर्व मे जारी सारी सुविधाओ का जनक इंटक ही
रहा है आज भी लगभग सभी मजदूरों की आस्था , विश्वास
और ऊम्मीद इंटक से ही है इसलिए इस ऐतिहासिक जरूरत के मद्देनजर इन नेताओ का खुले दिल से एक साथ एक मँच पर आना स्वागत योग्य
कदम है।
उत्पाद ड्यूटी में रियायत से इनकार
प्रधानमंत्री नरेद्र
मोदी जब देशवासियों को संबोधित करते हैं तो उनकी भाषा में मिठास होती है। अपनापन
का बोध होता है। चाहे वे कोरा दिलासा ही क्यों न दे रहे हों। लेकिन जब वित्त
मंत्री अरूण जेटली कोई बयान देते हैं तो अंदाज़ किसी शहंशाह का रियाया से संबोधन
का होता है। मसलन पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद ड्यूटी में किसी तरह की रियायत
किए जाने से साफ इनकार किया। बल्कि यह भी हिदायत दी कि लोग पूरी ईमानदारी से टैक्स
अदा करें। भीषण महंगाई से जूझ रहे देशवासियों के लिए उनका बयान जख्म पर नमक
छिड़कने जैसा है। सर्लविदित है कि डीजल और पेट्रोल की कीमतों का बाजार पर सीधा
प्रभाव पड़ता है। इसके कारण आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई का खर्च बढ़ता है और चीजें
महंगी होती हैं। यह भी विदित है कि भारत में पेट्रोलियम उत्पादों का दाम दुनिया के
अन्य देशों से कहीं ज्यादा है। कम टैक्स वाली वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाकर
ज्यादा स्लैब में लाया गया तो फिर अधिक कर वाली वस्तुओं को कम दर के स्लैब में
क्यों नहीं लाया जा सकता। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह संकेत दिया था
कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार किया जा रहा है।
लेकिन जेटली ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। जनता का काम
सिर्फ टैक्स देना है। महंगाई बढ़ती है तो बढ़े। लोगों को परेशानी हो रही है तो हो।
अगर इसी रह के बयान जेटली जी देते रहे तो मोदी सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी और
बढ़ती चली जाएगी और 2019 का चुनाव एनडीए के लिए और चुनौती भरा हो जाएगा। दरअसल
जेटली का जनता से कभी सीधा संबंध नहीं रहा है। वे कभी कोई चुनाव नहीं जीते हैं।
मोदी सरकार में भी उन्हें पिछले दरवाजे से लाकर महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा गया है।
जनता के दुःख-दर्द से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है। अगर जेटली जैसे दो चार
शुभचिंतक भाजपा में हों तो मोदी सरकार की कब्र खोदने के लिए विपक्षी दलों पर
निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसके लिए जेटली और शाह काफी हैं।
जेटली का बयान ऐसे
समय में हुआ है जब मनमोहन सरकार की तुलना में 125 प्रतिशत शुल्क बढ़ोत्तरी कर 150
गुना अधिक उत्पाद शुल्क बटोरने की बात सामने आ चुकी है।
भाजपा की चिंता
विपक्षी एकता से निपटते हुए 2019 का चुनाव निकालने की है और जेटली को राजस्व की
चिंता है। अगर सत्ता हाथ से फिलती तो फिर राजस्व वसूलने के लिए वे अधिकृत नहीं रह
जाएंगे। जेटली जी को यह बात समझ में नहीं आ रही है। भाजपा चुनाव हारी भी तो कम से
कम उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाकर सदन तक लाने लायक तो रहेगी ही जेटली जी को पूरा
भरोसा है।
- देवेंद्र गौतम
सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन का समय
झारखंड की राजधानी
रांची की फज़ा में जहर घोलने का षडयंत्र रचा जा रहा है तरह-तरह की अफवाहें फैलाई
जा रही हैं। शांतिपूर्ण जनजीवन में खलल डाला जा रहा है । लोग भी कान टटोलने की जगह
कौवे के पीछे भागने लग जा रहे हैं। रोज किसी न किसी इलाके में तनाव और झड़प की खबर
आ रही है। छोटी-छोटी बातें बड़ा आकार ग्रहण कर ले रही हैं। यदि पकड़े नहीं गए तो शरारती
तत्व झारखंड के दूसरे इलाकों को भी निशाना बना सकते हैं।
पुलिस-प्रशासन
मुस्तैदी से स्थिति को नियंत्रित कर ले रही है लेकिन शरारत की साजिश कहां से रची
जा रही है, पता नहीं चल पा रहा है। आम लोगों में भय व्याप्त है। सुरक्षा बलों की
तैनाती बढ़ा दी गई है लेकिन जबतक षडयंत्रकारी पकड़े नहीं जाते माहौल शांत होने के
आसार नहीं दिखते। उसपर भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के प्रस्ताव को लेकर विपक्षी
दलों का आक्रामक रुख शांति व्यवस्था के प्रति एक नए खतरे की आशंका को बल दे रहा
है। वे अपनी लड़ाई सड़कों पर लाने की जगह यदि विधायिका और न्यायपालिका तक महदूद
रखते तो ज्यादा असर छोड़ जाते। लोगों की भरपूर सहानुभूति का पात्र बनते। सरकार पर
दबाव डालने के और भी तरीके हो सकते हैं।
सरकारी तंत्र तो
माहौल को शांत करने का हर संभव प्रयास कर रहा है लेकिन ऐसे में राजनीतिक दलों,
सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों और शांति समितियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उनके
सदस्य अपने-अपने इलाके पर नज़र रख सकते हैं और अफवाहों का तत्काल खंडन कर, विभिन्न
समुदायों के बीच भाईचारा कायम करने में भूमिका अदा कर सकते हैं। सिर्फ बैठक करने
से या शांति जूलूस निकालने से काम नहीं चलने वाला। जिम्मेदार नागरिकों को अपनी
सामाजिक जिम्मेदारी निभाने को आगे आना होगा। चुनावी लाभ-हानि के गणित से भी इसे
दूर रखा जाना चाहिए।
मौसम के तल्ख तेवर से परेशान अवाम
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